Tuesday, September 28, 2021
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Dhol, Ganvaar, Shudra, Pashu, Naari – Decoding the most Controversial Choupai from ShriRamCharitManas

  • Neena Mukherjee

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हि।  मरजादा पुनि तुम्हरी किन्ही।।

ढोल गंवार सूद्र पसु नारी।  सकल ताड़ना के अधिकारी।।

यह प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री रामचरित मानस’ में तब आता है जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए श्री राम समुद्र से मार्ग मांगते है।  तीन दिन की प्रतीक्षा के बाद भी जब समुद्र रास्ता नहीं देता तो श्री राम क्रुद्ध  हो कर अपना अग्निबाण साधते हैं और लक्ष्मण से कहते हैं कि मैं समुद्र को सुखा दूंगा।  तब भय त्रस्त हो कर समुद्र प्रकट होता है और विनीत भाव से यह चौपाई निवेदन करता है कि :

हे प्रभु आपने मुझे सही सीख दी, मुझे मर्यादा में भी आपने ही बांधा है, जिस प्रकार ढोल गंवार शूद्र पशु व नारी ताड़ना के अधिकारी हैं उसी प्रकार आपने मुझे भी अनुशासित किया है। 

यह चौपाई आधुनिक काल में बहुचर्चित रही है, इसका मुख्य कारण है शब्द : ताड़ना। इस छंद को बहुअर्थी छन्द कहा जाता है क्यों कि ताड़ना के कई अर्थ हैं।  एक ओर जहाँ ताड़ना का अर्थ हैं अनुशासित करना वहीँ इसे दण्डित करना भी मान सकते है। इस युग में जहाँ हिन्दूवादी  सोच व उनके साहित्य पर प्रश्न उठाने वालों कि कमी नहीं इस चौपाई का अर्थ ऐसे माना जाता हैं कि इन पांचों को दण्डित कर उचित शिक्षा देनी चाहिये। इसी आधार पर हिन्दू द्वेषिक विचारक कहते हैं कि तुलसीदास जी ने नारी, शूद्र आदि को नीचे माना है तथा उस काल का हिन्दू समाज ऐसा ही था। यह ऐसा प्रचार करने वालों की विकृत मानसिकता दर्शाती है, इसी कारण यहाँ अर्थ का अनर्थ हो गया है।

तुलसीदास द्वारा रचित इस प्रबंध काव्य में कहीं भी नारी, शूद्र या पशु का असम्मान नहीं किया गया है। डा: हिम्मत सिंह जी इसी संदर्भा में कहते हैं कि जिस प्रकार उपन्यास में हर चरित्र के कथन उसके स्वभानुसार होते हैं उसी प्रकार तुलसीदास जी ने इस प्रबंध काव्य में समुद्र को जड़ बता कर यह चौपाई लिखी है जो कि उस समय समुद्र की मानसिकता पर कटाक्ष भी है।

कई जानकारों ने इसका विवरण इस प्रकार भी किया है कि ताड़ना का एक और अर्थ होता है भांपना अथवा जांचना। तो ढोल, गंवार, शूद्र पशु व नारी को भी संपूर्ण अधिकार है सब को परखने का। उनके अनुसार इस चौपाई का मुख्य शब्द है ‘सकल अधिकार’ जो कि सकारात्मकता का परिचय देता है।  

The Hinduphobic thinkers and propagandists have been interpreting this Chopai from Goswami Tulsidas’s ‘ShriRamCharitManas’ in various derogatory ways to prove that the Hindu society was Hierarchal and Oppressive singing in tune with James Mill’s description of Hindu society in his book History of British India published in 1817.

It is very important to understand the context of this Choupai. This was spoken by the arrogant Sea (samudra) when Shri Ram asks the sea to make way for him and it does not relent for three days, Shri Ram takes out his Agnibaan and threatens to dry up the Sea completely. It is then that the Sea apologises and says these words which mean: Oh Lord, you have disciplined me and shown me the right path just as Dhol, Ganvaar, shudra, Pashu and Naari need to be disciplined.

The contentious word here is ‘Taadna’ which can be interpreted in various ways. The other meaning of Taadna is to judge. Some scholars believe that what Tulsidas ji meant here was that these five have equal right to judge anyone or any action.

Dr. Himmat Singh says that ‘ShriRamCharitManas’ is a Narrative poem in which there are many characters. Just like in a novel, the writer writes the dialogues suitable for each character, here too the arrogant Sea Mouths these words. It does not imply that it is a reflection of the society or the writer’s intent to demean anyone. There are multiple examples in the poem where Tulsidas ji’s respect for women, shudra or animals is evident.

Hence the twisted meaning of a Choupai and the controversy around it should be ignored just as Shri Ram says in another choupai: It is useless to argue with those who are soaked in self interest.

ममता रत संग ज्ञान कहानी। अति लोभी संग बिरति बखानी।।

क्रोधिहि सम कामिहि हरी कथा। ऊपर बीज बाएं फल जथा।।

अर्थात: मोह माया में लिप्त से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन,

क्रोधी से शांति की बात तथा कामी से भगवान की कथा, इनका फल ऊसर में बीज बोने जैसा होता है।

 Courtesy:

Dr. Himmat Singh Sinha

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