और मुझे सबरीमाला के प्रश्न का उत्तर देना ही है क्यूँकि इससे अनुचित उदाहरण दूसरा आप दे नहीं सकते थे । क्षमा कीजियेगा पर मैं इसपर बेहिचक अपनी बात कहूँगा । कृपया इसे समझें कि सबरीमाला का प्रश्न न तो संस्कृति का है , न किसी के लिंग से , न ये लोकाचार की बात है , न ये स्त्रियों के प्रति भेद भाव का विषय है , ये एक विशिष्ट परम्परा का विषय है जिसको बहुत ही तोड़ मरोड़कर , विकृत करके जनता के सामने प्रस्तुत किया गया है ।

जो कोई भी व्यक्ति इस विषय पर बोलता है, मैं उससे केवल ये प्रश्न पूछना चाहता हूँ , कृपया मुझे बतायें कि आपको इस परम्परा के उद्भव के बारे में और इसके इतने दिन तक अस्तित्व में रहने और इस आचार के ग्रन्थों में आधार के बारे में क्या पता है कि जिससे आप इस परम्परा के स्त्रियों के प्रति पक्षपाती होने को लेकर इतने विश्वस्त हैं ? आपने निष्कर्ष तो पहले ही दे दिया । मैं चाहूँगा कि आप थोड़ा पीछे जाकर मुझे बतायें कि आप इस आचार के बारे में ऐसा क्या जानते हैं कि जिससे आप इस तथाकथित जागरूक निर्णय पर पहुँचे हैं कि ये परम्परा स्त्रियों के प्रति भेदभाव से जनमी है ।

चलिए,  मैं इस प्रश्न का उत्तर देता हूँ क्योंकि मुझे इसपर बोलने का अवसर ndtv पर मिला था, वो मंच जिसपर ये बोला जाना चाहिये, और मैं प्रश्न का उत्तर दूँगा ।

दो तरह की परम्पराएँ हैं , विशेषकर केरल में , कुछ स्थान केवल स्त्रियों के लिये हैं और कुछ केवल पुरुषों के लिये और कुछ स्थान हैं जो सबके लिये उपलब्ध हैं । आप चाहते हैं कि एक विविधता की रक्षा हो तो इन विविध परम्पराओं को भी बचाइये । ऐसे भी मन्दिर हैं जहाँ पुरुष प्रवेश करने का साहस नहीं कर सकते , और ऐसे कुछ दिन होते हैं कि जब गलियों में पुरुष दिखाई तक नहीं देते हैं । पुरुष उन गलियों में पैर नहीं रख सकते हैं क्योंकि वहाँ प्रयोजन स्त्रियों के पूजा करने का है उस तरह से जैसे वे करना चाहें । ऐसे देवता हैं जो केवल स्त्रियों के लिये हैं, एक तो ये बात है ।

दूसरी समझने वाली बात यह है कि अगर आप ये चर्चा करना चाहते हैं तो ये चर्चा तब तक आरम्भ नहीं हो सकती जब तक हम आधार को न देखें , वो आधार है परम्परा , और वो परंपरा क्या है ? हर मन्दिर की अपनी एक परम्परा है उसके पुराण के सम्बन्ध में, उसके इतिहास के सम्बन्ध में, जहाँ से परम्परा उद्भूत होती है । इस मामले में, सबरीमाला के देवता , अय्यप्पा स्वामी ने ‘नैष्ठिक ब्रह्मचर्य’ का व्रत लिया हुआ है , यानी कि अनन्त काल तक ब्रह्मचारी होने का व्रत । नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का पालन बहुत से साधू करते हैं , जो कि स्त्रियों के स्पर्श से सर्वथा दूर रहते हैं , और ये स्त्रियों के लिये घृणा या उनके प्रति भेदभाव पर आधारित नहीं है ।

ऐसे ही प्रतिनियम स्त्रियों के लिये भी हो सकते हैं , पुरुषों से संपर्क करने के विषय में । ये कोई ऎसी बात नहीं है जो केवल स्त्रियों को अभिलक्षित करके उनके प्रति भेदभाव को मन में रखके की गई हो । ये शायद सबसे बुरा और घटिया दुष्प्रचार है जो इन बातों को घुमा कर , तोड़ – मरोड़ कर प्रस्तुत करने वाले लोगों ने जनता में किया है । उस विचारधारा के नियम अपेक्षा करते हैं कि आपको उन महिलाओं के संपर्क में नहीं आना है जो माता बनने में समर्थ हों । और इन लोगों ने इस पूरे तर्क को इस प्रकार मरोड़ दिया है , और हम सभी वयस्क हैं यहाँ पर तो मैं यह बात कहूँगा , वे कहते हैं कि हमारी ये परम्परा स्त्रियों के रजस्वला होने के प्रति घृणा पर आधारित है । इतने हल्के स्तर तक बात जा चुकी है ।

इस देश में ऐसे भी मन्दिर हैं जो रजस्वला होने की शारीरिक क्रिया की पूजा करते हैं । कामाख्या मन्दिर , इसे कौन नहीं जानता ? इसलिये , एक विशिष्ट उदाहरण का प्रयोग करके , और वो भी उस मन्दिर के इतिहास की आधी अधूरी जानकारी के आधार पर , पूरे संस्थान को कलुषित करना , और इसको एक उन्मोचन स्थल की तरह प्रयोग करके पूरे समुदाय को कलुषित करना । मैं सोचता हूँ इसको रुकना चाहिए । यही इसका तथ्यात्मक उत्तर है , मैंने इसमें भावनाओं को  नहीं मिलाया है ।

दूसरी बात , उनके विश्लेषण का अंगभूत, सर्वोच्च न्यायालय को संविधान को मानते हुए दो काम करने की आवश्यकता है और मैंने विशेष रूप से सबरीमाला पर लिखा है , जिस वजह से मुझे चर्चा के लिये बुलाया गया था , क्योंकि मैंने स्पष्ट होकर कहा कि कृपया जातिवाद और स्त्रीवाद को हर विषय में मत लाइये क्योंकि हर चीज इससे जुड़ी नहीं है , ऐसे भी विषय हैं जो इससे परे होते हैं । सर्वोच्च न्यायलय ने कहा है , संविधान के अनुच्छेद १६५ का उल्लेख करते हुए कहा , मदुरै मीनाक्षी मन्दिर में पुजारियों की नियुक्ति को लेकर , उस मन्दिर के आगम या अन्य ग्रन्थों का सम्मान करो जब तक कि वे नकारात्मक रूप से भेदभाव न करते हों ।

इसका तात्पर्य यह है कि आप लोगों को आवागमन के विषय में चुन सकते हैं , सकारात्मक घटकों के आधार पर । पर यदि आप कहते हैं कि इस जाति का व्यक्ति इस स्थान पर नहीं आना चाहिए , तो ऎसी परम्परा का आधुनिक भारत में कोई स्थान नहीं है , संवैधानिक भारत में कोई स्थान नहीं है । मैं आपके साथ हूँ अगर ऐसा हो कि कोई भी महिला उस स्थान पर नहीं जा सकती , तब आप सही हैं । परन्तु उसने परीक्षक लगाये हैं , एक विशिष्ट आयु वर्ग दिया है , और एक निश्चित परम्परा का पालन करता है जो कि कुछ निश्चित घटकों पर आधारित है जिसमें कि अधिकतर लोग शायद विश्वास भी न करते हों और यदि करते भी हों तो शायद कहें भी न कि वे विशवास करते हैं । आपको ”देवप्रश्न” की परम्परा के बारे में पता है , जिसका पालन सत्य रूप में सबरीमाला में किया जाता है । इस परंपरा के अनुसार मुख्य पुजारी , आराध्य देवता से संवाद करता है और लोगों का चयन बहुत से मानकों के आधार पर होता है जिसमें कुण्डली से लेकर जाने क्या क्या शामिल है । बिलकुल वैसे ही जैसे भिन्न – भिन्न मठों के शंकराचार्य चुने जाते हैं , और इस परम्परा के आधार पर जो कुछ भी मुख्य पुजारी सूचित करता है वही आराध्य देवता की इच्छा मानकर लागू किया जाता है ।

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