आपने दक्षिण भारत के बहुत ही सुन्दर और भव्य मन्दिर देखे होंगे , उन सबके निर्माण में , शिल्प में , निश्चित विधियाँ , निश्चित सिद्धान्त होते हैं जिनका दायित्व एक बिलकुल ही भिन्न समुदाय निभाता है , विश्वकर्मा या स्थपति इनको कहते हैं । यह समुदाय भी आज नष्ट हो रहा है । अब हमारे पास लोग नहीं हैं जो यह जानते हैं कि पत्थरों पर शिल्पकला किस प्रकार दिखाई जाये , ये लोग अपनी कला को उस स्तर तक लेकर गये हैं जहाँ ये पत्थरों में भी , नर पत्थर और स्त्री पत्थर , इस प्रकार से भेद करना जानते हैं । ये लोग और इनकी तरह और बहुत से वर्ग नष्ट होने की स्थिति में हैं क्योंकि मन्दिर , एक संस्था के तौर पर स्वयं ही नष्ट होने कि स्थिति में है , उसको उसकी जड़ों से विच्छिन्न किया जा रहा है , और यह सुनियोजित तरीके से वर्षों से होता आ रहा है ।

जब अंग्रेजों ने यह दुराचार किया , तो कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि भारतीय संस्थाओं से उन्हें लगाव होने का कोई कारण नहीं , वे बाहरी लोग थे । परन्तु यदि उनकी ही नीतियाँ १९४७ के बाद भी चल रही हैं , तो या तो हम ये मानते हैं कि उनकी नीतियाँ सही थीं , या फिर हम आज भी मानसिक रूप से उनके दास हैं । इसको परिवर्तित करने की आवश्यकता है , और उसमें मूल कारण यह है कि एक आम हिन्दू के लिये , चाहे वह भारत कि किसी भी भाग में हो , मन्दिर ही वह जगह है जहाँ वह आध्यात्मिक शान्ति के लिये जाता है । वो आश्रमों में नहीं जाता , उनकी प्राथमिकता मन्दिर ही है । सत्य तो यह है कि आश्रमों का वैभव एक आम हिन्दू को विकर्षित ही करता है ।

अधिकतर चर्चाओं में , आम हिन्दू जन इस तरह की बातें भी कहते हैं कि समाज के लिये दान करना हिन्दू समाज और हिन्दू संगठनों को अप्रिय है , अपने आप को बुद्धिजीवी दिखने के लिये प्रायः हिन्दू स्वयं ही ऐसी बात करते हैं । हम सिर्फ कमाना जानते हैं , हम दान करना नहीं जानते ।   परन्तु दान शब्द का हिन्दू परम्परा और हिन्दू साहित्य में बड़ा ही महत्त्व है । ज्ञान दान या कैसा भी दान बहुत महान माना जाता है । हमारे नायक दानवीरों के रूप में जाने जाते हैं , ये इस देश की परम्परा है ।

अब ऐसा क्यों है कि हिन्दू संस्थाएँ बढ़-चढ़ कर दान और दान से जुड़ी गतिविधियाँ करने में असमर्थ हैं ? आप अपने आस पड़ोस के किसी चर्च में जायें , या किसी मस्जिद या गुरूद्वारे में जायें , तो देखेंगे कि वे जितना चाहें उतना वे अपनी भानाओं के अनुसार , अपने सम्प्रदाय से जुड़े कार्यों के लिये व्यय करने में समर्थ हैं । फिर हिन्दू संस्थाएं ऐसा क्यों नहीं कर पातीं ? हम में से अधिकाँश लोग इस सरल और अज्ञानतापूर्ण निर्णय पर पहुँचते हैं कि देने कि नीयत ही नहीं है, यह असत्य है , हमारे हाथ बंधे हुए हैं , यह हमें समझने की आवश्यकता है ।

हिन्दू संस्थाएं सरकार के नियंत्रण में हैं , इसलिये उनके पास वैसी स्वतंत्रता नहीं है जैसी दूसरी संस्थाओं या दूसरे सम्प्रदायों के पास है अपनी सम्पत्ति के बारे में निर्णय लेने के लिये , अपनी स्वयं की परम्पराओं का निर्वहन करने के लिये , अपनी स्वयं की परम्पराओं पर व्यय करने के लिये , अपने समुदाय पर व्यय करने के लिये ।

एक पादरी अपनी चर्च में आने वाले लोगों को एकजुट रखने के लिये अपने से ऊपर के अधिकारियों से बात करके व्यय करने में या निर्णय लेने में समर्थ है । आप बताइए मुझे , क्या एक पुजारी के पास यह अधिकार है , आप जिस भी मन्दिर में गये हैं , आपने पुजारी को देखा होगा , क्या आपको लगता है कि एक पुजारी अपने मन्दिर के भक्तों के लिये कुछ कर सकता है ? बिल्कुल नहीं कर सकता ।

मन्दिर का प्रशासन पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है । यदि हम अब भी इस बात को नहीं समझेंगे कि हिन्दू मंदिरों का प्रशासन सरकार के हाथों में होने से , भक्तों की इसमें कोई भूमिका नहीं है , किसी भी सरकारी तंत्र की भाँती मन्दिरों का प्रशासन भी अस्त – व्यस्त और भ्रष्ट है , तो हम अपनी परम्पराओं और अपने जीवन जीने के ढंग को अपने ही सामने मरता हुआ देखेंगे । बिना तकनीकी भाषा का प्रयोग किये मैं आप को समझाने का प्रयास करता हूँ कि यह सब कैसे चलता है ।

गूगल पर या इन्टरनेट पर आजकल कोई भी न्यायपालिका के किसी भी निर्णय को पढ़ सकता है , यह बिल्कुल भी कठिन नहीं है , आपको किसी अधिवक्ता की आवश्यकता नहीं है । मैं आपको कुछ सूचनाएं देता हूँ और आप स्वयं भी पढ़ सकेंगे । १९५४ में उच्चतम न्यायालय का एक प्रसिद्ध  निर्णय आया था , शिरूर मठ के नाम से । दक्षिण कन्नड़ में , उडुपी में एक मठ है और इस मठ के विरुद्ध इतनी कठोर और बर्बर कानूनी प्रक्रियायें की गयीं थीं कि यदि मैं इस मठ का अधिपति होता तो मैं स्वयं से कहता कि इस देश में हिन्दू होना पाप है ।

इसका सीधा सा कारण यह है कि , चलिए मैं आपको विस्तार से बताता हूँ । धर्म से जुड़ी स्वतंत्रता के सम्बन्ध में सरकार के अधिकार संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ में विहित हैं । अनुच्छेद २५ निजी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा और अनुच्छेद २६ सम्प्रदायों की धार्मिक स्वतंत्रता के विषय में है , इसलिये ये संस्थाओं की बात करता है और २५ और २६ परस्पर जुड़े हुए हैं । २५ के अंतर्गत एक रोचक प्रावधान है , २५ (२) (a) , जो कहता है कि जहाँ तक धर्मनिरपेक्ष , आर्थिक , राजनैतिक और इस तरह की गतिविधियों का प्रश्न है , इन सबको लेकर राज्य को अधिकार है कि वह विधान बनाये । ये सभी प्रकार की गतिविधियाँ एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ जुड़ी होती हैं । ऐसा प्रावधान करने के पीछे क्या प्रयोजन है , पहले इसको समझते हैं । समझें कि आशीष एक धार्मिक सज्जन है , उसकी इच्छा है कि वह अपनी सम्पत्ति किसी मन्दिर के नाम कर दे , उसकी इच्छा है कि वह सम्पत्ति केवल उस मन्दिर के उद्धार के लिये प्रयुक्त हो और किसी विषय के लिये नहीं । उसकी सदा यही इच्छा थी ।

यदि कोई मन्दिर प्रशासन का अधिकारी ऐसी इच्छा करता है कि इस सम्पत्ति का बिलकुल ही भिन्न प्रयोग किया जाये तो २५ (२) (a) ही वह प्रावधान है जिसका प्रयोग करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रशासनिक अधिकारी , जिस उद्देश्य के लिये सम्पत्ति दी गयी , उसको छोड़कर किसी अन्य हेतु उस सम्पत्ति का व्यय न कर सके । याने धन और सम्पत्ति जो एक समुदाय के उद्धार के लिये दी गई थी , यदि उसका कोई दुरूपयोग किया जाये तो अनु० २५ (२) (a) उसको रोकने के लिये उपस्थित है । अब देखते हैं कि इसकी वास्तविक  व्याख्या कैसे की गई है , यहाँ अधिवक्ता और उनकी तिकड़मबाज़ी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है ।. न्यायपालिका ने धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को एक ओर रखा और धार्मिक गतिविधियों को दूसरी ओर रखा और कहा कि हम धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं इसलिये हम इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे, परन्तु जो धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है , आर्थिक या राजनैतिक , उसको लेकर कोई भी निर्णय लेने का सरकार को सम्वैधानिक अधिकार प्राप्त है ।

इस तर्क में मूलभूत दोष क्या है , मैं आपको बताता हूँ । आप बिना किसी संसाधन के पूजा कर सकते हैं क्या  ? आप बिना किसी संसाधन के मन्दिर के  परिसर में कोई आयोजन कर सकते हैं क्या ? अन्न दान करना है , पैसा कहाँ से आयेगा ? पूजा करनी है , पैसा कहाँ से आयेगा ? अखंड भजन करना है , पैसा कहाँ से आयेगा ? नाम संकीर्तन करना है , पैसा कहाँ से आयेगा ? धार्मिक अनुष्ठान के लिये पैसा कहाँ से आयेगा ? धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को तो सरकार नियंत्रित करती है , पैसा देना न देना सरकार के हाथ में है । याने धार्मिक अनुष्ठान यदि कठपुतली है तो उसके तार सरकार के हाथ में हैं , वह जैसे चाहे नचाये । धार्मिक अनुष्ठान और परम्पराएं सरकार की  इच्छाओं की दासी बनके रह गयी हैं । यह विभाजन धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिये और धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण बनाये रखने के लिये किया गया था परन्तु चाहें जानकार या अनजाने में , इसका प्रयोग हिन्दू समाज के विरुद्ध किया गया है और इस निष्कर्ष को किसी भी प्रकार नकारा नहीं जा सकता है ।

प्रत्येक गतिविधि , चाहें वो कितनी ही धार्मिक हो , उसका कोई न कोई धर्मनिरपेक्ष पक्ष भी होगा , क्योंकि पैसा कहीं न कहीं होगा ही । और यदि प्रत्येक धर्मनिरपेक्ष पक्ष पूरी तरह सरकार के अधीन है तो आपने धार्मिक गतिविधि को पूरी तरह सरकार के अधीन कर लिया है । और इस तरह आपके हाथ में केवल कागजी अधिकार रह जाते हैं जो कागजों से बाहर निकलकर किसी काम में नहीं आ सकते ।

और इसके क्या परिणाम होते हैं ? कितने लोगों ने वह प्रसिद्ध घटना सुनी है कि जब रामकृष्ण मिशन ने सरकार से अनुरोध किया कि हम एक अल्पसंख्यक संस्था बनना चाहते हैं , बहुसंख्यक बनने का अगर कोई लाभ नहीं है तो अल्पसंख्यक ही बनना  चाहिए और बहुसंख्यक होने से यदि यह सब कष्ट झेलना पड़ता है तो जिस टोली को सभी सुख मिल रहे हैं तो उसी टोली में जाने में समझदारी है । सामान्य मानवीय स्वभाव है , और क्या कर सकते हैं । आपको क्या लगता है , धर्मांतरण क्यों होता है ?  यही मूल कारण है , और चाहे हम कितना भी बोलें कि धर्मांतरण बुरा है जब तक हम कुछ नहीं बोलेंगे, कुछ नहीं बदलेगा.

समाज का सभ्य , पढ़ा – लिखा , उच्च वर्ग आपसे यह कहेगा कि तुम हिन्दुओं ने अपने अलावा दूसरे हिन्दुओं का कभी ध्यान नहीं किया और यदि आज वे धर्मांतरण कर रहे हैं तो तुम्हे समस्या है ? उनकी चर्च उनके लिये कुछ कर रही है , उनकी मस्जिद उनके लिये कुछ कर रही है , क्या तुम्हारा मन्दिर उनके लिये कुछ कर रहा है ? अरे भाई करने दोगे तो करेंगे न , हमारे हाथ तो पूरी तरह से बँधे हुए हैं ।

मेरा यह विशवास है कि अगर हिन्दू समाज को एकजुट होना है , इसलिये नहीं कि हमें किसी से लड़ना है , केवल इसलिये कि हम बिना कोई जातिगत या क्षेत्रगत या भाषागत भेदभाव के एक दूसरे के साथ जुड़ाव महसूस कर सकें ।  और ये मंदिरों के सुधार , मंदिरों के आम हिन्दुओं के हाथ में आए बिना सम्भव नहीं है ।

मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि पुरानी सभी परम्परा सही हैं , कुछ चीजों के साथ हम असहमत हो सकते हैं , लेकिन यह विश्लेषण  करने का अधिकार किसको है ? हमें ही होना चाहिये । यदि बाकी सभी समुदायों को ५०-६० वर्ष दिए गए हैं कि वे धीरे – धीरे प्रगति करें और विकसित हों , तो यही समान अधिकार और स्वतंत्रता हिन्दुओं को क्यों नहीं मिलनी चाहिए । हिन्दुओं ने ही अपने समाज में सरकार द्वारा किये गये सभी हस्तक्षेपों को बिना कोई विरोध किये सहा है । तो आप ऐसा विशवास क्यों नहीं करते हैं कि हिन्दू अपने अन्दर की समस्याओं को स्वयं सुलझा लेंगे ।

जब तक हिन्दुओं की पहचान का केंद्र , हिन्दुओं का मन्दिर , सरकार के नियंत्रण में है , तब तक हिन्दू समाज की समस्याओं का निदान नहीं हो सकता । कभी – कभी मैं सोचता हूँ कि हम एक हिन्दू राष्ट्र में रहते हैं , सरकार को हिन्दुओं के विषय में इतनी रूचि है तो आप हिन्दू राष्ट्र ही तो हो , हमने नहीं माँगा हिन्दू राष्ट्र , आपने बना दिया ना । कर्णाटक सरकार ने मंदिरों से लिये गये पैसे का किस प्रकार से दुरूपयोग किया है , एक बार आप उसको देखिये , और फिर आप स्वयं से पूछेंगे , क्या यह सम्वैधानिक है ? किसी भी परिभाषा से , किसी भी तर्क से क्या इसको सही ठहराया जा सकता है । इसकी विस्तृत सूचना मैं आपको उपलब्ध कराऊँगा ।

हिन्दुओं के मंदिरों से लिया गया पैसा दो चीजों में लगाया गया है , ईसाईयों की जेरूसलम यात्रा और मुसलमानों की हज यात्रा । यह हिन्दुओं के पैसे से हो रहा है । यदि मैं ईसाई या मुसलमान होता तो मैं यह कहता , मैं आहत होता कि हमारे पास क्या पैसा नहीं है ? हमें यह खैरात नहीं चाहिए ? चलिये इसको सम्वैधानिक दृष्टिकोण से देखते हैं , यह गतिविधि पूरी तरह से संविधान के अनुछेध २७ का उल्लंघन , अवमानना और परिभंजन करती है । अनु० २७ पूरी तरह स्पष्ट करता है कि कर या जनता से संग्रहीत कोई भी धनराशी राज्य द्वारा किसी एक सम्प्रदाय विशेष के हित में व्यय नहीं की जा सकती । अनु० २७ राज्य को मन्दिर , चर्च या मस्जिद से बिलकुल पृथक करता है । अतः जब आप हिन्दुओं से लिये गये पैसे को दूसरे सम्प्रदायों के हित में लगाते हो , और यह सब कुछ प्रमाणित है , सब कुछ लिखित में है , तो आप अनु० २७ कि अवज्ञा करते हो  । और ये लोग हमें सम्वैधानिक आदर्शों का ज्ञान देते हैं ।

महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई उच्चन्यायालय के सम्मुख यह स्वीकार किया है कि सिद्धिविनायक मन्दिर से आया कितना ही धन उसने मन्दिर के आलावा अन्य विषयों पर व्यतीत किया है । इसका निर्णय कौन करता है ? मन्दिर को इसका निर्णय करना है । परन्तु मन्दिर के अन्दर , प्रशासनिक अधिकारी बनकर कौन बैठा है ? सरकार का अपना व्यक्ति । तो क्या मन्दिर द्वारा दी गई अपने धन को अन्यत्र प्रयोग करने की अनुमति स्वैच्छिक है ?

राज्य का नियुक्त अधिकारी संस्था में बैठकर संस्था और राज्य के मध्य सेतु का कार्य करता है , और सरकार कि प्रत्येक इच्छा को आज्ञा मानता है  ।  विधि के छात्र बताएं यहाँ मन्दिर की स्वेच्छा से निर्णय लिया जा सकता है क्या ? स्वेच्छा का अधिकार मन्दिर को कागजों में भी नहीं है । उदाहरण के लिये मैं आपको कुछ पढ़के सुनाता हूँ जिससे आप समझ सकेंगे कि हिन्दू संस्थानों को किस सीमा तक स्वतंत्रता से वंचित किया गया है । मैं आपको पढ़कर सुनाता हूँ ।

मेरे अनुसार HRCE सम्बन्धित जितनी भी विधियाँ हैं वे सब इसी प्रपत्र से निकली हैं , पूरे देश में । पहले मैं आपको इसकी पृष्ठभूमि बताता हूँ । तमिल नाडू HRCE विधि नियम का एक कुख्यात अनुभाग है , अनुभाग ४५ जिसमें हिन्दू संस्थाओं में कार्यकारी अधिकारियों की  नियुक्ति का विषय है । ये अधिकारी उस संस्था के प्रशासन में मुख्य होते हैं ।

१९६५ में उच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय लिया , जो तमिल नाडू की एक संस्था के विषय में था । इस निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया कि राज्य किसी भी परिस्थिति में मन्दिर के प्रशासन को सम्पूर्ण रूप से अपने अधिकार में नहीं लेगा , क्यों ? क्योंकि अनु० २५(२)(अ) जो कि राज्य को मन्दिर में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है वह राज्य को धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों तक सीमित करता है , प्रशासन में प्रवेश नहीं देता । याने सरकार एक रूपरेखा दे सकती है किसी निश्चित उद्देश्य के लिये जिससे कोई दुराचार या दुर्व्यवस्था न पनपे , परन्तु मन्दिर से जुड़े समाज को पूरा अधिकार है कि वह अपने लोगों को नियुक्त करे जो उस रूप रेखा को लागू करें , परन्तु राज्य इस रूपरेखा में , इस ढाँचे में प्रवेश नहीं करेगा और ना ही अपने किसी व्यक्ति को बिठाएगा क्योंकि ऐसा करने से मन्दिर के प्रशासन का पूरा अधिकार सरकार को हो जाएगा ।

इस निर्णय में उच्चतम न्यायलय ने , मन्दिर के निरिक्षण और उसके प्रशासन के अधिग्रहण में स्पष्ट भेद किया है । २०१५ में क्षमा कीजिये ६ दिसम्बर २०१४ को उच्चतम न्यायलय ने चिदंबरम मन्दिर के विषय में एक निर्णय दिया , इसमें सुब्रह्मण्यम स्वामी मन्दिर की ओर से अधिवक्ता थे । उच्चतम न्यायलय ने विशेष रूप से अनु० ४५ का और सामान्य रूप से HRCE से जुड़े हुए विधिनियमों का विश्लेषण किया है । उच्चतम न्यायलय कहता है कि यदि सरकार को अनु० २६ के अनुसार धार्मिक सम्प्रदायों को उनकी संस्थाएँ सम्वैधानिक रूप से चलाने के अधिकार का सम्मान करना है तो सरकार को स्वयं को इन संस्थाओं पर थोपना नहीं चाहिये और सरकार की मर्यादा केवल निरिक्षण करने व सुचारू संचालन सुनिश्चित करने तक है , प्रशासन को सर्वथा अधिगृहीत करना उसके लिये अनुचित है ।

तो किस सन्दर्भ में यह आदेश दिया गया था ? १९५४ से लेकर २०१४ तक , जिस दिन तक यह निर्णय आया था , तमिल नाडु के प्रत्येक मन्दिर में , चाहे वह छोटा हो या बड़ा , चाहे उसकी आय मानो एक लाख या दस सहस्र से कम हो , राज्य द्वारा , कार्यकारी अधिकारी नियुक्त थे । कोई  तर्क अथवा स्पीकिंग ऑर्डर भी नहीं दिया गया जो इस प्रश्न का उत्तर दे कि मन्दिर को सरकार द्वारा नियुक्त कार्यकारी अधिकारी के अधीन होना ही क्यों चाहिए ।

yadi koi kaaryakari अधिकारी किसी मन्दिर में नियुक्त किया जाता है , आपके मन में इतना तो होना चाहिए , कि दाल में कुछ काला है , तो वो नियुक्ति लिखित में होनी चाहिए , उसके लिये तर्क दिए जाने चाहिये , ये न्याय का स्वाभाविक सिद्धांत है । जब राज्य किसी निजी संस्था में हस्तक्षेप करने का निर्णय लेता है तो उसे तर्क देना आवश्यक है कि उसका हस्तक्षेप उचित क्यों है । एक भी कारण नहीं दिया गया , उच्चतम न्यायलय के सम्मुख एक भी प्रमाण नहीं रखा गया कि क्यों इतने सारे कार्यकारी अधिकारी पूरे तमिल नाडु राज्य में नियुक्त किये गये , ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि जब ऐसा कोई अधिकारी नियुक्त होता है तो वो केवल उस समय तक अपने पद पर रह सकता है जब तक कि  समस्या का समाधान न हो ।

जैसे ही समस्या अथवा दुराचार ठीक कर लिया जाये , अधिकारी को मन्दिर से बाहर होना ही पड़ेगा । और कोई विकल्प नहीं है , निश्चित रूप से अधिकारी को मन्दिर से निष्कासित होना चाहिये । जबकि सरकार के आदेश काल के सम्बन्ध में मौन हैं याने एक बार बैठ गये तो बैठ गये और उस अधिकारी को बाहर करने का कोई मार्ग नहीं है । सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि अनु० ४५ के अंतर्गत की गई आपकी सभी नियुक्तियाँ जो कि सम्विधान के अनु० २६ का उल्लंघन करती हैं क्योंकि न तो आपने कोई समय सीमा रखी है और न ही वह कारण बताया कि जिस समस्या के निदान के लिये आपने नियुक्ति की ।

तो तमिल नाडु सरकार के विभाग के बाबुओं ने नवम्बर २०१५ में नये नियम बनाए , क्योंकि अनु० ४५ का उपयोग करने के लिये भी सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति के लिये नियम बनाना आवश्यक था , जबकि तमिल नाडु सरकार ने बिना कोई नियम बनाए सबको नियुक्त कर दिया । नियमों के आधार पर ही नियुक्तियाँ होनी थीं , नियम थे नहीं तो उन्होंने नियम बनाये । परन्तु यदि सर्वोच्च न्यायलय कहता है कि आपने संविधान का उल्लंघन किया है और इसलिये इतिहास की आपकी सभी नियुक्तियाँ अवैध हैं , तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं नया नियम बनाता हूँ जो यह कहेगा कि मेरा इतिहास में किया गया काम वैध है । यह कोई गंगोत्री नहीं है जहाँ आप अपने पाप धो लें , परन्तु इस प्रपत्र में तमिल नाडु के बाबुओं ने वही किया ।

(Part – 1 , Part – 3)