सरकारी बाबू कह रहे हैं कि आप मान लीजिये कि हमने जितनी भी नियुक्तियाँ कीं , वो सब वैध थीं , चलो मान लिया , यह कोई विद्यालय में खेला जा रहा खेल है ? एक सम्प्रदाय विशेष की संस्थाओं में आपने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया है , एक निश्चित प्रावधान का बहाना लेकर , जो कहता है कि किसी भी नियुक्ति से पहले , नियुक्ति के नियम बनाने होंगे और चल रही व्यवस्था में दोष अथवा दुराचार दिखाना होगा जो आपको उस संस्था में हस्तक्षेप करने के लिये विवश कर रहा है । आपके पास कोई नियम नहीं है , न ही आप कोई कारण बता पा रहे हैं कि आपने क्यों हस्तक्षेप किया और जब उच्चतम न्यायालय कहता है कि भविष्य कि नियुक्तियों के लिये नियम बनाओ , तो आपने पहले की गई गलतियों को भी साफ़ कर दिया । ये केवल काले को सफ़ेद करने जैसा है । और क्या कर रहे हैं आप ?

और ये सुनिए आप , मैं कुछ भाग ही पढूँगा और ये आपको अचंभित कर देगा । मैं जितना धीरे हो सकता है उतना धीरे पढूँगा । जब आयुक्त स्वयं संज्ञान लेकर या अपने कनिष्ठ अधिकारियों सूचित किये जाने पर आवश्यक समझता है …..इत्यादि इत्यादि….. किसी धार्मिक संस्था के बेहतर और कुशल प्रशासन को सुनिश्चित करने के हित में वो एक कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करेगा । इतना लम्बा – चौड़ा विधान । इसका बहाना लेकर आप कुछ भी कर सकते हैं और आयुक्त के पास कारण है यह मानने के लिये कि किसी धार्मिक संस्था के प्रशासनिक विषय में निरंतर त्रुटियाँ हैं , ठीक है , मैं इससे आपत्ति नहीं करता । अब कोई अनियमितता है , कोई दुराचार है , समझो कि मुक्केबाजी का खेल होता तो मैं कहता कि बेल्ट के नीचे नहीं मार सकते  और फिर मैं कहता कि कहीं भी मार सकते हैं । मैं छः नियम बनाता और शरीर के उन – उन अंगों को चिह्नित करता कि जहाँ प्रहार नहीं कर सकते और इसके बाद एक अन्तिम नियम बनाता कि कोई रोक नहीं है , कहीं भी प्रहार कर सकते हैं , जो करना है कर लो ।

तो इसलिये , जहाँ तक मैं सोचता हूँ , यह कुछ भी नहीं है और श्रीमान रमेश यहाँ पर हैं जिनके साथ मैं काम कर रहा हूँ , ये temple worshipper society के प्रतिनिधि हैं , जब भी हम दोनों ये पढ़ते हैं , चलिए मैं आपका परिचय करवाता हूँ , इन सब गतिविधियों के यही सूत्रधार हैं और मैं चुनौती दे सकता हूँ कि पूरे देश में एक भी ऐसा अधिवक्ता नहीं है जो इन सब विधिनियमों के प्रावधानों को इनसे बेहतर जानता हो । इनके चरणों में बैठकर ही मैंने यह सब सीखा । जिस तरह के तथ्य , जिस तरह की जानकारी , यदि तमिल नाडु में  ये किसी मन्दिर में जाते हैं , तो वहाँ के सरकारी अधिकारी भयभीत होते हैं कि संकट आ रहा है । मैं ये किसलिए कह रहा हूँ कि इन सब विधिनियमों के साथ जो भी अनुचित है वह मैं केवल एक इस प्रपत्र से सिद्ध कर सकता हूँ , इन सब विधिनियमों कि धज्जियाँ उड़ा सकता हूँ । मुझे केवल ये नियम पढ़कर सुनाने होंगे , अन्य किसी विधिनियम का सहयोग भी नहीं लेना पड़ेगा ।

किसी भी तर्कशील निष्पक्ष व्यक्ति कि आत्मा हिल जायेगी । आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आप किसी भी कारण से किसी भी व्यक्ति को नियुक्त करेंगे । कारण बताइए , निश्चित कारण बताइए , एक समय सीमा भी होनी होगी । आयुक्त जांच कराने के बाद अपनी इच्छा अनुसार कुछ निश्चित अवधियों के लिये , जिसमें ५ वर्ष से अधिक की  अवधि नहीं हो सकती । तो पहली ५ वर्ष के लिये नियुक्त करेंगे , फिर पुनः ५ वर्ष के लिये तो यह तो कभी समाप्त ही नहीं होगा । निरंतर पुनः – पुनः नियुक्ति होती रहेगी । तो यदि आप इन सब प्रावधानों को पढ़ें तो यह हिंदू समाज के ऊपर एक करारा चाँटा है और मुझे लगता है कि हिन्दू समाज इसी के लायक है , क्षमा कीजियेगा परन्तु आप बहुत समय से बिना किसी विरोध के मार खाते जा रहे हैं तो आपके साथ ये होना स्वाभाविक है ।

यदि मैं तमिल नाडु में अधिवक्ता होता या इन विधियों तक मेरी पहुँच होती , मैं स्वयं से पूछता कि इससे बेहतर केस मुझे और  क्या चहिये सरकार को न्यायालय में जलते कोयलों पर खींचने के लिये । हम कितने परेशान रहते हैं अपने सवच्छन्द होकर बोलने पर सरकार के अतिक्रमण से क्योंकि वह एक मौलिक अधिकार है । यह भी उतना ही एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह संविधान के भाग ३ में आता है । यदि यह कोई और सम्प्रदाय होता जिसके अधिकारों को इस प्रकार रौंदा जा रहा होता , मुझे लगता है कि प्रतिक्रियाएँ असाधारण रूप से भिन्न होतीं और निश्चित ही संवैधानिक नहीं होतीं । मैं बस एक चीज और पढूँगा और ये वो चीजें हैं जो मैं पढ़ना चाहता हूँ , इसलिए कृपया कुछ और समय के लिये मेरा साथ दें ।

यह कहता है , हाँ , कि धार्मिक संस्थानों के सुचारू प्रशासन के लिये कार्यकारी अधिकारी का दायित्व होगा , इसलिये उसका दायित्व धार्मिक संस्थानों के सुचारू प्रशासन के प्रति होगा न कि न्यासी के प्रति , न कि प्रबंधन के प्रति , न कि न्यासियों कि परिषद्  के प्रति और जो निर्देश वह जारी करे उनका ……….रूप से पालन किया जाये ………..। सभी कर्मचारी और नौकर उस कार्यकारी अधिकारी के सीधे नियंत्रण और अधीक्षण में काम करेंगे । संस्थान का हर नियुक्त व्यक्ति अब राज्य के नियुक्त व्यक्ति के अधीन होगा । अब आप देखिये यह व्यवस्था कैसे काम करती है , मैंने तो धार्मिक पक्ष को नहीं छुआ न , मैंने केवल पंथनिरपेक्ष पक्ष को छुआ है , तो , आपकी समस्या क्या है ? क्योंकि अब , अपने यह सुनिश्चित कर कर दिया है कि जिस व्यक्ति को धार्मिक अनुष्ठान करने हैं , उसे कार्यकारी अधिकारी की आज्ञा माननी पड़ेगी जिसके नियंत्रण मे सब हैं जिसके भी साथ वह संस्थान में काम करता हो और यही वह परोक्ष तरीका है जिससे ये कानून कार्य करते हैं ।

बस एक और बात और फिर मैं आपको बताता हूँ कि किस प्रकार ये  लोग अपने सभी पाप धो लेते हैं । इन नियमों में से कुछ भी उस कार्यकारी अधिकारी की शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा जो इन नियमों के आने से ठीक पहले तक इस पद पर आसीन था । ये है आपका ………., अब सरे पाप धुल गये यहीं पे । ये मात्र तमिल नाडु के सम्बन्ध में ही नहीं है , आन्ध्र प्रदेश के कानून में भी ऐसे प्रावधान हैं जिससे कार्यकारी अधिकारी को सुनिश्चित करने अधिकार दिया हुआ है कि नियमित भजन करते हो , मन्दिर के अन्दर उसे अधिकार है निर्णय लेने का , वह सुनिश्चित करेगा कि नियमित रूप से भजन – कीर्तन होते हैं ।  आपको इसका ठेकेदार कब किसने बना दिया भई ?

एक ओर हम कह रहे हैं कि मुझे एक नास्तिक बनने का अधिकार है , दूसरी ओर इसने अपने कार्यकारी अधिकारी को  यह अधिकार दे दिया है कि वह हमें बलपूर्वक बिठाये और भजन – कीर्तन कराये । इसके हाथ में मंजीरा उसके हाथ में ढोलक , प्रभावकारी रूप से यह ऐसे चलता है । क्या मैं गलत कह रहा हूँ महोदय ? इस प्रकार का प्रावधान है । हम सब …….. जब हमने यह पढ़ा और एक बैठक में हम इसे पढ़ रहे थे । मुझे नहीं समझ आता कि हँसना चाहिए या रोना चाहिए , सच में । मेरी समझ में नहीं आता कि मैं हसूँ या रोऊँ । बात यह है कि ऐसे उदाहरण इस प्रकार के अनेक विधिनियमों में प्रचुरता से पाए जाते हैं । आपने समाचारों में सुना होगा कि महाराष्ट्र सरकार ने सिद्धिविनायक मन्दिर को अपने पास से आधा पैसा चिकित्सालय बनाने के लिये देने के लिये कहा है । नरक को ले जाने वाले इस मार्ग में सत्कामनाओं की कोई कमी नहीं है ।

चिकित्सालय बनाने के लिये धन देने में कोई दोष नहीं है , परन्तु क्या आप उसका श्रेय देंगे मन्दिर को ? कभी नहीं देंगे । हिन्दू संस्थाएँ और हिन्दू संत केवल भ्रष्टाचार , दुराचार , घोटालेबाज़ी , जनता को मूर्ख बनाना , अन्ध विश्वास फैलाना , इन्हीं सब कुकर्मों में लिप्त है ऐसा ही प्रचार किया जाता है । आप हिन्दुओं को इसका भी श्रेय कभी नहीं दोगे कि हिन्दू शांत और सहिष्णु रहे हैं जब उनकी प्रत्येक संस्था राज्य द्वारा हड़प ली गयी । इस बात को समझिये कि यह सब तो धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों के सम्बन्ध में किया जा रहा है । परन्तु अब प्रत्यक्ष धर्म में भी हस्तक्षेप हो रहा है , पता नहीं आने वाले समय में मैं राखी भी मना पाऊँगा या नहीं , पता नहीं कौन सी लाल बिंदी गैंग चिल्लाती हुई आ जाएगी और कहेगी कि यह इसके विरुद्ध है उसके विरुद्ध है । कल सप्तपदी में पुरुष के पीछे चलती महिला शायद लोगों को फेमिनिज्म के विरुद्ध लगे , सब कुछ उल्टा करेंगे ।

सुनियोजित ढंग से , जब हमारी संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष पक्ष पर आघात हो रहा है , तभी धार्मिक पक्षों पर भी निरन्तर प्रहार हो रहे हैं । आपने कहा कि धर्मनिरपेक्ष पक्ष पर मेरा अधिकार बनता है तो मैं ही इसका संचालन करूँगा । धार्मिक पक्ष में हस्तक्षेप करने के लिए भी आपका यही तर्क है क्या ? असमानता , अन्धविश्वास , भेदभाव , आपने हर प्रकार का धूर्त उपाय ढूँढा है जिससे हिन्दुओं की जीवन शैली नियंत्रित और विकृत की जा सके । इस समस्या का समाधान कैसे हो ?

मेरा विनम्र निवेदन है और मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे बारे में पूर्वाग्रह बनाए , कोई बनाता भी है तो बनाए । किसी भी राजनैतिक संगठन में अपनी श्रद्धा मत रखिये क्योंकि कोई भी राजनैतिक संगठन अपनी सत्ता को बचाने के लिये जो उसे उचित लगेगा , करेगा । अपनी स्वयं की एकता , साथ मिलकर चलने की योग्यता और अपने हितों के लिये लड़ने की भावना , इसी में आपको विश्वास करना चाहिये । हम किसी और सम्प्रदाय से लड़ नहीं रहे हैं , हम केवल राज्य को हमारे निजी क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से रोक रहे हैं । हम राज्य से केवल यह कह रहे हैं कि वह सम्विधान कि दी हुई सीमाओं में ही रहे । हम राज्य से कह रहे हैं कि वह सम्विधान के नियमों का पालन करे , हम राज्य से कह रहे हैं कि सम्विधान कि मर्यादा की रक्षा करे । मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ भी अनुचित है । मुझे नहीं लगता कि यह साम्प्रदायिक है या यह हमें हिन्दू तालिबान बनाता है ।

हमारी माँग है कि भारत के गणतान्त्रिक लोकतन्त्र के संविधान की रक्षा हो और हम राज्य से कह रहे हैं कि वह अपनी सीमा में रहे । हमारे निजी क्षेत्र में अतिक्रमण न किया जाये । एक जो बात हमें सीखने की बहुत आवश्यकता है , एक समूह के तौर पर , और शायद दूसरों से सीखने की आवश्यकता है , जैसे कि ये तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले संगठन , वो बात यह है कि इन लोगों ने निरन्तर दबाव बनाने और अपना पक्ष रखने का महत्त्व समझ लिया है । आपको सड़कों पर उतरने की आवश्यकता नहीं है । आपको कोई अपराध करने की आवश्यकता नहीं है । आपको कुछ ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है जो हिंसक हो या असंवैधानिक हो । संविधान में विश्वास रखिये और संविधान द्वारा दिए गये अपने अधिकारों का प्रयोग कीजिये । संविधान में जो भी विकल्प उपलब्ध हैं उनका सब तरह से , पूरी तरह से प्रयोग कीजिए । इसमें अनुचित क्या है ?

राजनैतिक रूप से हो सकता है यह बहुत से लोगों के लिये अहितकर हो ।  परन्तु यदि यह अनुचित नहीं है तो मुझे लगता है कि हमें यह करना चाहिए । एक प्रयास जो हम कर रहे हैं वो यह है कि जनता से इन विषयों में जानकारियाँ एकत्रित करके सबके लिये उपलब्ध करवाएँ और हमारा प्रयास है कि यह आन्दोलन पूरे देश में फैले और हम हर एक सरकार से यह प्रश्न करेंगे , मैं सार्वजनिक रूप से यह कहता हूँ कि सरकार इस प्रकार कैसे हिन्दू संस्थाओं में , उनके अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए , हस्तक्षेप कर सकती है , केवल इसलिये कि हम हिन्दू  हैं ? क्या यही हमारा दुर्भाग्य है ?

आज हमारे पास सूचना का अधिकार है , हमें संसार भर की जानकारी बड़ी सरलता से उपलब्ध है , जो पहले किसी भी पीढ़ी को नहीं थी , हो सकता है भविष्य में और अधिक सरलता हो परन्तु इतिहास में तो निश्चित रूप से नहीं थी । बहुत लोग हैं जो इस काम के लिये अपने संसाधनों का निवेश करने के लिये सज्ज हैं । बल्कि बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता भी नहीं है । हमें केवल निरन्तर प्रयास करते रहना है । कुछ लोग मिलकर यह काम कर सकते हैं । और हम आशा करते हैं कि हम इस काम को भविष्य में करेंगे । एक प्रश्न जो मुझसे बार – बार पूछा जाता है वो यह है कि ये सब तो ठीक है परन्तु यदि आप वर्तमान प्रणाली को उखाड़ फेंकेंगे तो आपके पास विकल्प क्या है ? आप क्या करेंगे ?

एक परिचित शत्रु एक अपिरिचित मित्र से बेहतर है , इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण तर्क दिए जाते हैं । मैं आपको एक सीधा उत्तर देता हूँ । किसी अनुचित बात का , किसी अवैध बात का अस्तित्व केवल इसलिये बचाकर रखना कि आपके पास कोई उचित विकल्प नहीं है , मूर्खतापूर्ण है । आप यह नहीं कह सकते कि एक महिला के साथ दुर्व्यवहार होता रहे केवल इसलिये कि उसके साथ जो विशिष्ट दुर्व्यवहार हो रहा है उसके सम्बन्ध में कोई विधिनियम नहीं है । क्या आप इस विषय में यह उत्तर स्वीकार करेंगे । जब आप इस विषय में वह तर्क स्वीकार नहीं कर सकते , तो आप उस विषय में कैसे करेंगे ? मैं एक धार्मिक व्यक्ति न होकर के एक सांस्कृतिक व्यक्ति हूँ और मेरा इस बात में विश्वास है कि संस्कृति के अनेक पक्ष धर्म से ही निकलते हैं । अतः धर्म को जीवित रखना आवश्यक है क्योंकि संस्कृति को जीवित रखना आवश्यक है ।

बौद्धिक सम्पदा के क्षेत्र में कार्य करने वाले किसी अधिवक्ता को पूछिए । बौद्धिक सम्पदा का एक पक्ष है पारंपरिक ज्ञान , पारंपरिक औषधि , पारंपरिक कृषि या जो भी हो । कुछ भी पारंपरिक कैसे बचेगा यदि परंपरा ही नहीं होगी ? मेरी समझ में नहीं आता । जो कुछ भी पारंपरिक जीवनशैली से प्राप्त है वो पृथक पृथक करके सुरक्षित नहीं किया जा सकता है । किसी वृक्ष के अंगों को जीवित रखने के लिये वृक्ष का जीवित रहना आवश्यक है ।

आप वनवासियों के अधिकारों की बात करना चाहते हैं ? आप अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की बात करना चाहते हैं ? आप उन समुदायों के अधिकारों कि बात करना चाहते हैं जो शिल्पकार हैं बुनकर हैं ? ये वे सब लोग हैं जिनकी आजीविका पारम्परिक विधियों से चलती थी । ये वे लोग हैं जिनका जीवन मन्दिर के चारों ओर ही फला फूला । मूर्तिकार आज भिक्षा मांगने पर विवश हैं क्योंकि उनकी आय का प्रमुख साधन , मन्दिर नष्ट हो रहा है । फूल बेचने वाले । आप किसी भी दक्षिण भारतीय मन्दिर को जाईये और आप अचंभित रह जायेंगे , मन्दिर के चारों ओर होने वाली आर्थिक गतिविधियों को देखकर । हम लक्ष्मी का मन्दिर के भीतर और बाहर दोनों ओर स्वागत करते हैं । लोगों का जीवन इससे चलता है । जहाँ भी लोग आयेंगे कुछ लोग इसका लाभ लेना ही चाहेंगे क्योंकि इससे उनकी आय होगी , जीवन चलेगा । इसलिये जो कोई भी पारंपरिक जीवनशैली को बचाना चाहेगा , उसको मंदिरों को भी बचाना पड़ेगा ।

और एक प्रश्न पूछा जाता है । ये कैसे सुनिश्चित करेंगे कि मन्दिर पुनः जातिवाद से ग्रस्त न हो जायें ? संविधान में इसके लिये प्रावधान है । न्यायालय के पर्याप्त आदेश इस विशेष पर हैं और ये धारणा बिल्कुल अनुचित है कि हिन्दुओं के मन्दिर केवल एक ही जाति के इर्द – गिर्द घूमते हैं । ऐसा नहीं है । दक्षिण भारत में ऐसे अनेकों मन्दिर हैं । एक जाति है जो पंडारा कहलाती है , ये शैव पिल्लई की उपजाति है , और ये शिव की आराधना करने वाली वह जाति है जो शिव कि भक्ति में ब्राह्मणों से भी बढ़कर मानी जाती है । ये लहसुन भी नहीं खाते और भोजन के आचारों को लेकर ब्राह्मणों से भी अधिक दृढ़ हैं ।

अतः स्पष्ट होना चाहिए कि ये केवल ब्राह्मणों की लड़ाई नहीं है , ये पूरे हिन्दू समाज की लड़ाई है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है । हमारे पास एक तो सूचना की कमी है और इच्छा शक्ति की कमी है । अपने आन्दोलान के अंतर्गत हम वे सारे उपकरण और योग्यता उपलब्ध करवाएँगे हर उस  व्यक्ति को जो इन सब विधिनियमों को चुनौती देगा जब और जहाँ वह मंदिरों के अधिकारों का हनन देखे । हम ऐसा करेंगे । हम देश भर में पत्रक प्रचारित करेंगे । हम बहुत से अधिवक्ताओं को इसमें जोड़ेंगे । हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इस विषय पर निरन्तर दबाव बनाए रखने के लिये जो कुछ आवश्यक है वह किया जाए । क्योंकि यदि हमने ऐसा नहीं क्या तो बस ५ वर्षों में ही हमारी आँखों के सामने परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण अंग नष्ट हो जायेगा । जिस गति से सब कुछ बदल रहा है और मैं मानता हूँ कि आजकल ५-६ वर्ष में ही एक पीढ़ी बदल जाती है ।

जहाँ तक मेरी बात है , मैं इस लक्ष्य के लिये समर्पित हूँ और मैं यह जानता हूँ कि रमेश जी और अन्य सज्जन जिन्होंने अपना तन – मन – धन इस सबके लिये समर्पित कर दिया है , हम अपनी पूरी शक्ति से इस कार्य की सफलता के लिये प्रयास करेंगे । किसी भी तरह की सहायता कोई भी करे हम उसका स्वागत करेंगे । आर्थिक सहायता की उतनी आवश्यकता नहीं है । आवश्यकता है सूचना कि , कुछ करने योग्य सूचना की और आवश्यकता है कि लोग अपने कार्य के प्रति सजग हों , आपके पास पर्याप्त तर्क हैं , संविधान के दिए हुए अधिकार हैं कि आप न्यायलय में अपना पक्ष रख सकें । तो यदि आपसे कोई प्रश्न करता है , आप एक समूह के रूप में खड़े होईये , इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है । हम दूसरों का शोषण करके अपने पोषण की बात नहीं कर रहे हैं । हम कुछ विशेष नहीं माँग रहे हैं । हम केवल वही माँग रहे हैं जो संविधान हमें देता है ।

धन्यवाद ।

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