सबसे पहले मैं धन्यवाद करना चाहूँगा सृजन फाउंडेशन का, अभिनव प्रकाश सिंह, राहुल दीवान, आलोक गोविल और पीयूष जैन का भी जिन्होंने मुझे ये अवसर दिया है ।मेरा कुछ परिचय पहले ही दिया जा चुका है और मैं प्रयास करूँगा कि अपने बारे में अधिक न बोलूँ जैसा वकील प्रायः करते हैं , मैं सीधा विषय पर आता हूँ ।

ये बड़ी विडम्बना की विचार है कि बहुसंख्यक समाज के साथ पक्षपात हो , पर भारत में ये बिलकुल भी आश्चर्य की बात नहीं ही । मुझे ये पक्षपात बिलकुल अचंभित नहीं करता न ही मुझे इसमें कोई विरोधाभास लगता है और मुझे लगता है मैं अकेला व्यक्ति नहीं हूँ जो ऐसा अनुभव करता है । सौभाग्य से इस देश में अब बहुत से लोग जाग चुके हैं , उन्होंने आस पास घट रही घटनाओं पर ध्यान देना शुरू किया है । मुझे लगता है एक औसत मध्यवर्गीय व्यक्ति जो केवल जीविका पर ध्यान दे रहा था , वह भी जाग गया है परन्तु यदि वह केवल जीविका पर ही ध्यान देता रहेगा तो भविष्य में बचे रहना भी एक चुनौती हो जायेगा कुछ समय में ।

मुख्य विषय पर आने से पहले मैं एक दूसरी बात से आरम्भ करता हूँ । ऐसे अनगिनत लेख है जो आपको गूगल करने भर से मिल जायेंगे जिनमें मंदिरों पर किये गये अतिक्रमण , अनेकों मंदिरों से छीनी गयीं सम्पत्तियाँ , मंदिरों से चुराये गये हीरे मोती , मंदिरों की भूमि को नाममात्र के किराये पर दूसरों को दिया जाना , इतने सारे विषयों पर भरपूर जानकारी सार्वजनिक उपलब्ध है ।

ऐसा नहीं है कि मुझे कुछ नया कहने की आवश्यकता है पर ये जानकारी पहले से ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होते हुये भी इन विषयों पर कोई कार्यवाही क्यूँ नहीं होती ? ऐसा क्यूँ है कि इन विषयों पर कोई गतिविधि नहीं होती ? ऐसा क्यूँ है कि लोग परेशान नहीं होते जितना कि उन्हें होना चाहिये अपने आस पास की घटनाओं को देखकर ?

हमारा चीजों को देखने का तरीका , ज्ञान और पहल करने की इच्छा , ये ही तीन विषय हैं , इनके अलावा और किसी चीज पर वर्त्तमान स्थिति का दोष नहीं डाला जा सकता । उदासीनता भी एक बड़ा कारण है , जो कुछ हो रहा है उसके केंद्र में उदासीनता है , और इसके परिणाम बड़े स्पष्ट दिखते हैं जब हम मंदिरों को नियंत्रित करनेवाले कुछ राज्यों के कानून देखते हैं । जो व्यक्ति कानूनी शिक्षा से दूर हो , कोई कानूनी योग्यता न हो , कानून को न समझता हो वो भी इस बात को समझेगा ।

ये कानून स्वयं ही सुधरने और निरस्त किये जाने की पुकार दे रहे हैं । शायद दिसंबर २०१५ से मैंने इस विषय पर लिखना आरम्भ किया और इसके पहले मैंने कुछ पढ़ाई कर रहा था और जब मैंने ये कानून पढ़े, तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैंने स्वयं से जो पहला प्रश्न किया वो ये था कि कैसे इतने साल लग गये इन कानूनों को न्यायालय में चुनौती देने में ?

इनमें से कुछ कानून ईस्वी सन १९२७ तक जाते हैं , फिर १९५१ फिर १९५४ । १९२७ का कानून निरस्त किया गया था , फिर १९५१ का कानून आया और १९५४ का कानून जो वर्त्तमान में तमिल नाड़ में लागू है , इन्ही पुराने कानूनों पर आश्रित है । उच्चतम न्यायालय ने इस कानून को १९५४ के शिरूर मठ मुकदमें में निरस्त किया था , और यदि कोई वो कानून जो न्यायालय ने निरस्त किया और जो कानून निरस्तीकरण के बाद आया , दोनों को देखे तो आश्चर्य करेगा कि दोनों में अंतर ही क्या है ? कोई भी अंतर नहीं है ।

किसी ने इतना भी श्रम नहीं किया कि केवल लिखे गये शब्दों की ही तुलना करे दोनों कानूनों के । क्या निरस्त किया गया और आज क्या लागू है , कैसे राज्य विधानपालिका में ये दुस्साहस , ये तर्कशीलता और ये धृष्टता आयी कि जो बात देश के उच्चतम न्यायालय ने मूल रूप से ही असंवैधानिक घोषित की हो उसको पुनः लागू कर दे ?

मुझे लगता है कि इसके पीछे निश्चित और मेरे विचार में सामाजिक-राजनीतिक कारण हैं और इसके पहले कि इस पर बात हो कि हम इसमें क्या कर सकते हैं , पहले बात  करते हैं कि हमें कुछ करना क्यूँ चाहिये ?

क्षमा कीजियेगा पर मंदिरों के लिये संघर्ष को दुर्भाग्य से एक जातिविशेष को ही जोड़ा जाता है । ये विषय एक वर्गविशेष , एक निश्चित समूह या कहिये एक निश्चित जाति से जुड़ा समझा जाता है जो मेरे विचार में मौलिक रूप से एक त्रुटित दृष्टिकोण है जिसको ठीक किया जाना चाहिये , बल्कि सिरे से खारिज किया जाना चाहिये ।

एक मंदिर पर हिन्दू धर्म की प्रत्येक जाति , प्रत्येक वर्ग का अधिकार है , इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिये । इसको लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिये । अतः , जब किसी मंदिर के साथ कुछ अनुचित होता है तो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि इस मंदिर को कौनसा वर्ग या उपवर्ग या कौनसा सम्प्रदाय चला रहा है । दूसरों के साथ जो हो रहा है वो निश्चित रूप से आप के साथ भी होगा क्योंकि वही कार्यवाही जो दूसरों के साथ हो रही है कल विस्तार करके वही सब आपके साथ , आपके मंदिरों के साथ , आपके संगठनों के साथ भी होगी , इससे बचने का कोई मार्ग नहीं है । बिलकुल भी नहीं है ।

अतः , सबसे पहले जो हमें करना है वो ये कि उदासीनता , प्रमाद को त्यागकर स्वयं को पूछें कि हम क्यूँ इतने समय से इस प्रकार ढीले पढ़े हुये हैं अपने अधिकारों को लेकर और मुझे लगता है कि ये मात्र इसलिये है कि अधिकतर वैश्विक या सामाजिक समस्याओं को हम दार्शनिक दृष्टिकोण से देखते हैं । सनातन धर्म है तो सनातन ही रहेगा । चलता रहेगा , चलता रहा है । समय के आघातों को सहकर भी सनातन धर्म बचा रहा है और इसलिये ये आगे भी सहता रहेगा , समय के प्रहार से नष्ट नहीं होगा अधिकांशतः यही कहकर हम स्वयं को समझा लेते हैं ।

मुझे लगता है कि हमारा अपना कायरपन , उदासीनता , जड़ता , दुर्बलता , सामूहिक शक्ति और कर्म का अभाव , निश्चित और सुनियोजित कर्म का अभाव प्रमुख समस्या है । और मेरे विचार से यही पहला चरण है , यही पहली समस्या है जिसका निदान होना चाहिये ।

साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई सम्प्रदाय किसी बड़े धर्म का अंग है , तो अनुच्छेद २६ के अनुसार जो सुरक्षा उस सम्प्रदाय को प्राप्त है वही उस बड़े धर्म को भी प्राप्त है । याने यदि वैष्णवों को संविधान के किसी प्रावधान के अनुसार सुरक्षा या कोई अधिकार प्राप्त है तो पूर्ण रूप से हिन्दू समाज को भी ये प्राप्त है । और इस तरह हिन्दुओं के संस्थान कानून के नाम पर नियंत्रित नहीं किये जा सकते जिससे कि हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन होता है । ये सार है उन सब तर्कों का जो याचिकाकर्त्ताओं ने दिये ।

अब मैं कुछ पढ़कर सुनना चाहूँगा जिसे किसी योग्य दर्शकों के सामने पढने की मेरी तीव्र इच्छा थी क्योंकि कहीं न कहीं यह आजकल के घटनाक्रम के लक्षण बताता है । मुझे लगता है कि कहीं न कहीं यह स्पष्ट करता है कि जिस स्थिति में हम आज हैं , उसमें क्यों हैं । इसलिये मैं आन्ध्र प्रदेश के कानून से सम्बन्धित उच्चतम न्यायालय का १९५६ के एक निर्णय का वर्णन कर रहा हूँ जिसे चुनौती दी गई थी और उच्चतम न्यायालय में यह तर्क दिया गया था कि ऐसा क्यों है कि यह कानून मात्र हिन्दुओं पर ही लागू होते हैं ।

ऐसा क्यों है कि ये विधियाँ केवल  हिन्दू संस्थाओं पर ही क्यों लागू होती हैं ? ऐसी क्या विचित्रता है इसमें? चलिए इसे इस प्रकार देखते हैं l मान लेते हैं कि राहुल कक्षा के प्रधानाचार्य हैं या शिक्षक हैं । उनके पास अधिकार  है कि वे समान रूप से किसी को भी चाँटा मार सकते हैं , परन्तु वे अपनी शक्ति का प्रयोग केवल एक ही बालक पर करते हैं याने कि एक शक्ति है जो उन्हें संस्थागत रूप में दी गई है ताकि वे उसे सभी श्रेणियों , सम्प्रदायों , गुटों पर समान रूप से उपयोग करें ।

परन्तु राहुल अपनी शक्ति केवल एक ही सम्प्रदाय पर केन्द्रित करने का निर्णय लेते हैं और इससे दो – तीन निष्कर्ष निकलते हैं । पहला यह कि उनका मानना है कि वही एक मात्र सम्प्रदाय है या वही एक ऐसा समूह है छात्रों का जिसे विशेष ध्यान की आवश्यकता है क्योंकि वे दुर्बल हैं या उनके व्यक्तित्व में मूलभूत त्रुटि है और इसीलिए उनके व्यक्तित्व को एक प्रकार का हस्तक्षेप चाहिये । यही अवधारणा है और यही वह  सन्देश है जो राहुल देते हैं । और दूसरा यह कि भिन्न लोगों या समान लोगों के साथ अलग प्रकार से व्यवहार करना असमानता है । मैं तो कहूँगा कि ताकत को असमान रूप से प्रयोग करना भी असमानता है ।

यदि आप अपनी शक्ति का उपयोग , प्रयोग किन्हीं वर्गों के साथ न करके एक ही वर्ग को लक्ष्य बनाते हैं तो यही मेरे अनुसार भेद भाव की , पक्षपात की परिभाषा है , इसमें कोई दो राय नहीं है । इस सीधी समझ में आनेवाली बात से सहमत होने के लिये कानूनी विशेषज्ञ या संवैधानिक विषयों का ज्ञाता होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

आइये देखते हैं उच्चतम न्यायालय ने क्या कहा है :

अब मैं ये पढ़कर आपको सुनाता हूँ और यही मुख्य तर्क है जो हिन्दू समाज के अधिकारों में हस्तक्षेप करने के लिये दिया जाता है । कुछ मिनटों तक धैर्यपूर्वक सुनें क्यूँकि इससे आप समझेंगे कि केवल सरकार का ही नहीं , न्यायपालिका का भी क्या दृष्टिकोण है हिन्दू संस्थाओं , हिन्दू समाज को लेकर । अब ये देखना हमारा दायित्व है कि १९६६ का ये दृष्टिकोण किस प्रकार २०१६ तक भी स्थिर है । ध्यान से इसे सुनते हैं और ये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ।

तो , ये तर्क जो याचिकाकर्त्ताओं की ओर से दिया गया , वे याचिकाकर्त्ता जो आन्ध्र प्रदेश के कानून को चुनौती दे रहे थे , उसकी संवैधानिकता को लेकर । ‘याचिकाकर्त्ता के बुद्धिमान् अधिवक्ता के तर्कों में मुख्य यह है कि अनुच्छेद २५ और २६ धार्मिक क्रियाकलापों को व्यवस्थित करने और अपने धर्म का विस्तार , प्रचार करने की स्वतंत्रता सभी नागरिकों को सुनिश्चित करते हैं । हिन्दू इस देश की जनसंख्या में बहुसंख्यक हैं । हिन्दू धर्म सबसे बड़ा धर्म है , मुस्लिम , ईसाई और पारसी नागरिकों को भी संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ के अनुसार सामान अधिकार प्राप्त हैं । मुस्लिम , ईसाई और पारसी सम्प्रदायों की संस्थाओं के संचालन में बिना लेश मात्र भी हस्तक्षेप किये , केवल हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित करना अनुच्छेद १४ और १५ का उल्लंघन है जिसमें सबको समानता का विषय दिया गया है’ , याचिकाकर्त्ताओं ने ये कहा ।

साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई सम्प्रदाय किसी बड़े धर्म का अंग है , तो अनुच्छेद २६ के अनुसार जो सुरक्षा उस सम्प्रदाय को प्राप्त है वही उस बड़े धर्म को भी प्राप्त है । याने यदि वैष्णवों को संविधान के किसी प्रावधान के अनुसार सुरक्षा या कोई अधिकार प्राप्त है तो पूर्ण रूप से हिन्दू समाज को भी ये प्राप्त है । और इस तरह हिन्दुओं के संस्थान कानून के नाम पर नियंत्रित नहीं किये जा सकते जिससे कि हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन होता है । ये सार है उन सब तर्कों का जो याचिकाकर्त्ताओं ने दिये ।

चलिए देखते हैं उच्चतम न्यायालय क्या कहता है और इससे आपको कई तर्क याद आएँगे जो संविधान के अन्य पक्षों को ध्यान में रखकर बनाये गये हैं । पहला प्रश्न है कि क्या यह आवश्यक है कि विधान पालिका को  ऐसा कानून बनाना चाहिए जो सभी धर्मों के मानने वालों द्वारा स्थापित या चलाये  जा रहे धार्मिक या परोपकारी या सामाजिक संस्थानों पर समान रूप से लागू हो, अब यहाँ पर आती है धर्मनिरपेक्ष कथा भारत जैसे बहुलवादी समाज में जहाँ लोग अपने अपने धर्मों, विभिन्न धर्मों या उनकी शाखाओं द्वारा प्रचारित आस्थाओं या सिद्धांतों में श्रद्धा रखते हैं, संविधान बनाते समय संविधान के जन्मदाताओं के सामने भारत के लोगों को एकजुट और संगठित करने, भिन्न आस्थाओं, जातियों इत्यादि के लिये व्यवस्था करने  की समस्या आई । संविधान के निदेशात्मक सिद्धान्त स्वयं विविधता की कल्पना करते हैं और  विभिन्न आस्थाओं के लोगों में समानता को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया । हालाँकि, एक समान विधि अत्यन्त आवश्यक है, हालाँकि उसे एक बार में ही लागू करना शायद देश की एकता और अखंडता के प्रतिकूल हो ।

विधि के नियमों से चलने वाले प्रजातंत्र व्यवस्था में धीमा प्रगतिशील परिवर्तन लाया जाना चाहिये, याने कुछ भावनाएँ दूसरों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । कानून बनाना या किसी कानून में परिवर्तन करना एक धीमी प्रक्रिया है और जहाँ आवश्यकता सबसे अधिक लगती है वहाँ विधान पालिका उसका उपचार करने का प्रयास करती है । इसलिए न्याय पालिका को लगता है कि जब हिन्दू संगठनों कि बात आये तो वह उपचार अत्यावश्यक है । आप देखिये , यही तर्कसंगत है , इसी प्रकार हम अनेकवाद को पारिभाषित करते हैं , इसी प्रकार हम धर्मनिरपेक्षता को पारिभाषित करते हैं , इसी प्रकार हम इस देश के संवैधानिक  आदेशों और आदर्शों को लागू करते हैं ।

हमें जो बात समझनी है वह यह है, यह प्रश्न जो १९९६ से निरन्तर २०१६ में भी महत्त्वपूर्ण बना हुआ है और वह एक प्रश्न जो हम सब पूछने का अधिकार रखते हैं यह है कि क्या आप कहना चाहते हैं कि पिछले ५० वर्षों में दूसरे समाज और दूसरे सम्प्रदाय समान कानून लागू होने के लिये सहज अनुगामी / आज्ञाकारी नहीं बने हैं , ५० वर्ष हो चुके हैं , यह १९९६ कि बात है, हम अब २०१६ में हैं । माना जा सकता है कि सन् १९९६ में स्वतंत्रता के ४९ वर्ष बाद कहें कि आपको लगता है हिन्दू संस्थानों को सबसे अधिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है । क्या आप निर्णय के ५० वर्ष बाद कह रहे हैं कि परिस्थिति अब भी यही कहती है कि केवल हिन्दुओं को ही इसकी आवश्यकता है ।

लोगों को जस्टिस चलकोंदय आयोग का सूचनापत्र अवश्य पढ़ना चाहिए जो कि मूल दस्तावेज है जो सन् १९८७ के कानून का आधार है , जो हिन्दुओं के धार्मिक संस्थानों पर लागू होता है. वह प्रपत्र, मैं  क्षमा के साथ कहना चाहता हूँ, निष्पक्षता के सभी मापदंडों का उल्लंघन करता है, विश्वसनीयता के सभी नियमों का उल्लंघन करता है और बहुसंख्यक समप्रदाय के धीरज को महत्त्व नहीं देता , बहुसंख्यक सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा को महत्त्व नहीं देता, क्योंकि वह प्रपत्र स्पष्ट रूप से कहता है कि जहाँ हिन्दू संस्थान हैं और हिन्दू मन्दिर हैं और हिन्दू धार्मिक शाखाएं हैं वहाँ बहुतायत में भ्रष्टाचार होता है या भ्रष्टाचार के कई उदाहरण हैं और चूंकि यह विषय ८०% जनसंख्या से सम्बन्धित है, यदि आप एक समाज में ८०% जनसंख्या का उपचार करेंगे तो बाकी २०% भी सुधर जायेंगे , यह है वह सुन्दर तर्क जो दिया गया ।

मेरी समझ में नहीं आता कि यह तर्क उस तर्क से किस प्रकार भिन्न है जो पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के लिये लगाया गया था । तीस लाख लोगों को साफ़ कर दो, बाकी तुम्हारी बात सुनेंगे, जनरल खान के निर्देशों में काम करने वाले यही तर्क देते हैं । तो जो तथ्य मैं रखना चाह रहा हूँ वह यह है कि इस व्यवहार पर प्रश्न उठने चाहिये । अब, आप इसपर किस प्रकार प्रश्न उठाएंगे? आप क्या करें? और सबसे पहले, आप ऐसा क्यों करें? आप यह किस प्रकार करें? चलिए एक प्रश्न पूछते हैं ।

विषय है हिन्दू संस्थानों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराना, मैं इसको थोड़ा और परिष्कृत कर  दूँ , एक अधिवक्ता होने के नाते , मुझे इसे कुछ और परिष्कृत करना होगा क्योंकि अधिवक्ता होने के नाते हमें प्रारूप बार बार सुधारने होते हैं । हम राज्य से कुछ असंवैधानिक करने की माँग नहीं कर रहे हैं , यह बात स्पष्ट होनी चाहिये । और ना ही हम ऐसा कुछ करवाना चाह रहे हैं जिसके लिये संविधान में संशोधन करना पड़े , संविधान जैसा आज है , बिना उसको परिवर्तित किये सुधार किये जा सकते हैं ।

सम्विधान को लेकर हमें कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं करना है और हमारा पक्ष यह है कि या तो सबके साथ समान रूप से हस्तक्षेप करो या किसी के भी साथ हस्तक्षेप मत करो । और यदि आप हमारे साथ हस्तक्षेप करते हैं तो आपको सबके साथ हस्तक्षेप करना होगा , उसमें भी आपको केवल उतना ही करने का अधिकार है जितना आपको संविधान अनुमत करता है । अतः आपको यह जानने की आवश्यकता है कि संविधान कितनी अनुमति देता है , पर इससे पहले कि मैं विधि की बात करूँ , मुझे एक दूसरे विषय पर जाना होगा ।

यह समझना बहुत आवश्यक है हमारे लिये , कि क्यों हिन्दू संस्थाओं की ओर ध्यान देने की इतनी गंभीर और त्वरित आवश्यकता है । हमारे मंदिरों की स्थिति देखिये , उनमें होने वाली गतिविधियों को देखिये , जो जातियाँ , जो वर्ग , जो समुदाय , मंदिरों पर निर्भर हैं , उनकी स्थिति देखिये और मैं केवल पुजारियों की बात नहीं कर रहा हूँ । इसके बारे में स्पष्ट होना बहुत आवश्यक है , बात बहुत आगे तक जाती है ।

यहाँ पर कोई केरल से है क्या ? एक जाति होती है अम्बलवासी नाम से । इसमें १८ उपजातियाँ होती हैं और ये सभी जातियाँ मन्दिर से जुड़े हुए किसी न किसी व्यवसाय में लिप्त हैं । अम्बलम् मन्दिर को कहते हैं , क्षमा कीजियेगा यदि मेरी जानकारी गलत है , इस तरह मंदिरों पर निर्भर रहने वालों को अम्बलवासी कहते हैं । इससे क्या पता चलता है ? मन्दिर , हिन्दू समाज के लिये केवल धार्मिक महत्त्व का स्थान न होकर के , सामाजिक महत्त्व का केन्द्र भी रहा है , इसकी अर्थव्यवस्था में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है , यह ध्यान देने योग्य बात है ।

(Part – 2  and Part – 3)

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