बुधवार, नवम्बर 14, 2018
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हिन्दू मन्दिरों की सरकारी नियन्त्रण से मुक्ति — साईं दीपक द्वारा एक व्याख्यान

सबसे पहले मैं धन्यवाद करना चाहूँगा सृजन फाउंडेशन का, अभिनव प्रकाश सिंह, राहुल दीवान, आलोक गोविल और पीयूष जैन का भी जिन्होंने मुझे ये अवसर दिया है ।मेरा कुछ परिचय पहले ही दिया जा चुका है और मैं प्रयास करूँगा कि अपने बारे में अधिक न बोलूँ जैसा वकील प्रायः करते हैं , मैं सीधा विषय पर आता हूँ ।

ये बड़ी विडम्बना की विचार है कि बहुसंख्यक समाज के साथ पक्षपात हो , पर भारत में ये बिलकुल भी आश्चर्य की बात नहीं ही । मुझे ये पक्षपात बिलकुल अचंभित नहीं करता न ही मुझे इसमें कोई विरोधाभास लगता है और मुझे लगता है मैं अकेला व्यक्ति नहीं हूँ जो ऐसा अनुभव करता है । सौभाग्य से इस देश में अब बहुत से लोग जाग चुके हैं , उन्होंने आस पास घट रही घटनाओं पर ध्यान देना शुरू किया है । मुझे लगता है एक औसत मध्यवर्गीय व्यक्ति जो केवल जीविका पर ध्यान दे रहा था , वह भी जाग गया है परन्तु यदि वह केवल जीविका पर ही ध्यान देता रहेगा तो भविष्य में बचे रहना भी एक चुनौती हो जायेगा कुछ समय में ।

मुख्य विषय पर आने से पहले मैं एक दूसरी बात से आरम्भ करता हूँ । ऐसे अनगिनत लेख है जो आपको गूगल करने भर से मिल जायेंगे जिनमें मंदिरों पर किये गये अतिक्रमण , अनेकों मंदिरों से छीनी गयीं सम्पत्तियाँ , मंदिरों से चुराये गये हीरे मोती , मंदिरों की भूमि को नाममात्र के किराये पर दूसरों को दिया जाना , इतने सारे विषयों पर भरपूर जानकारी सार्वजनिक उपलब्ध है ।

ऐसा नहीं है कि मुझे कुछ नया कहने की आवश्यकता है पर ये जानकारी पहले से ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होते हुये भी इन विषयों पर कोई कार्यवाही क्यूँ नहीं होती ? ऐसा क्यूँ है कि इन विषयों पर कोई गतिविधि नहीं होती ? ऐसा क्यूँ है कि लोग परेशान नहीं होते जितना कि उन्हें होना चाहिये अपने आस पास की घटनाओं को देखकर ?

हमारा चीजों को देखने का तरीका , ज्ञान और पहल करने की इच्छा , ये ही तीन विषय हैं , इनके अलावा और किसी चीज पर वर्त्तमान स्थिति का दोष नहीं डाला जा सकता । उदासीनता भी एक बड़ा कारण है , जो कुछ हो रहा है उसके केंद्र में उदासीनता है , और इसके परिणाम बड़े स्पष्ट दिखते हैं जब हम मंदिरों को नियंत्रित करनेवाले कुछ राज्यों के कानून देखते हैं । जो व्यक्ति कानूनी शिक्षा से दूर हो , कोई कानूनी योग्यता न हो , कानून को न समझता हो वो भी इस बात को समझेगा ।

ये कानून स्वयं ही सुधरने और निरस्त किये जाने की पुकार दे रहे हैं । शायद दिसंबर २०१५ से मैंने इस विषय पर लिखना आरम्भ किया और इसके पहले मैंने कुछ पढ़ाई कर रहा था और जब मैंने ये कानून पढ़े, तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैंने स्वयं से जो पहला प्रश्न किया वो ये था कि कैसे इतने साल लग गये इन कानूनों को न्यायालय में चुनौती देने में ?

इनमें से कुछ कानून ईस्वी सन १९२७ तक जाते हैं , फिर १९५१ फिर १९५४ । १९२७ का कानून निरस्त किया गया था , फिर १९५१ का कानून आया और १९५४ का कानून जो वर्त्तमान में तमिल नाड़ में लागू है , इन्ही पुराने कानूनों पर आश्रित है । उच्चतम न्यायालय ने इस कानून को १९५४ के शिरूर मठ मुकदमें में निरस्त किया था , और यदि कोई वो कानून जो न्यायालय ने निरस्त किया और जो कानून निरस्तीकरण के बाद आया , दोनों को देखे तो आश्चर्य करेगा कि दोनों में अंतर ही क्या है ? कोई भी अंतर नहीं है ।

किसी ने इतना भी श्रम नहीं किया कि केवल लिखे गये शब्दों की ही तुलना करे दोनों कानूनों के । क्या निरस्त किया गया और आज क्या लागू है , कैसे राज्य विधानपालिका में ये दुस्साहस , ये तर्कशीलता और ये धृष्टता आयी कि जो बात देश के उच्चतम न्यायालय ने मूल रूप से ही असंवैधानिक घोषित की हो उसको पुनः लागू कर दे ?

मुझे लगता है कि इसके पीछे निश्चित और मेरे विचार में सामाजिक-राजनीतिक कारण हैं और इसके पहले कि इस पर बात हो कि हम इसमें क्या कर सकते हैं , पहले बात  करते हैं कि हमें कुछ करना क्यूँ चाहिये ?

क्षमा कीजियेगा पर मंदिरों के लिये संघर्ष को दुर्भाग्य से एक जातिविशेष को ही जोड़ा जाता है । ये विषय एक वर्गविशेष , एक निश्चित समूह या कहिये एक निश्चित जाति से जुड़ा समझा जाता है जो मेरे विचार में मौलिक रूप से एक त्रुटित दृष्टिकोण है जिसको ठीक किया जाना चाहिये , बल्कि सिरे से खारिज किया जाना चाहिये ।

एक मंदिर पर हिन्दू धर्म की प्रत्येक जाति , प्रत्येक वर्ग का अधिकार है , इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिये । इसको लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिये । अतः , जब किसी मंदिर के साथ कुछ अनुचित होता है तो इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि इस मंदिर को कौनसा वर्ग या उपवर्ग या कौनसा सम्प्रदाय चला रहा है । दूसरों के साथ जो हो रहा है वो निश्चित रूप से आप के साथ भी होगा क्योंकि वही कार्यवाही जो दूसरों के साथ हो रही है कल विस्तार करके वही सब आपके साथ , आपके मंदिरों के साथ , आपके संगठनों के साथ भी होगी , इससे बचने का कोई मार्ग नहीं है । बिलकुल भी नहीं है ।

अतः , सबसे पहले जो हमें करना है वो ये कि उदासीनता , प्रमाद को त्यागकर स्वयं को पूछें कि हम क्यूँ इतने समय से इस प्रकार ढीले पढ़े हुये हैं अपने अधिकारों को लेकर और मुझे लगता है कि ये मात्र इसलिये है कि अधिकतर वैश्विक या सामाजिक समस्याओं को हम दार्शनिक दृष्टिकोण से देखते हैं । सनातन धर्म है तो सनातन ही रहेगा । चलता रहेगा , चलता रहा है । समय के आघातों को सहकर भी सनातन धर्म बचा रहा है और इसलिये ये आगे भी सहता रहेगा , समय के प्रहार से नष्ट नहीं होगा अधिकांशतः यही कहकर हम स्वयं को समझा लेते हैं ।

मुझे लगता है कि हमारा अपना कायरपन , उदासीनता , जड़ता , दुर्बलता , सामूहिक शक्ति और कर्म का अभाव , निश्चित और सुनियोजित कर्म का अभाव प्रमुख समस्या है । और मेरे विचार से यही पहला चरण है , यही पहली समस्या है जिसका निदान होना चाहिये ।

साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई सम्प्रदाय किसी बड़े धर्म का अंग है , तो अनुच्छेद २६ के अनुसार जो सुरक्षा उस सम्प्रदाय को प्राप्त है वही उस बड़े धर्म को भी प्राप्त है । याने यदि वैष्णवों को संविधान के किसी प्रावधान के अनुसार सुरक्षा या कोई अधिकार प्राप्त है तो पूर्ण रूप से हिन्दू समाज को भी ये प्राप्त है । और इस तरह हिन्दुओं के संस्थान कानून के नाम पर नियंत्रित नहीं किये जा सकते जिससे कि हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन होता है । ये सार है उन सब तर्कों का जो याचिकाकर्त्ताओं ने दिये ।

अब मैं कुछ पढ़कर सुनना चाहूँगा जिसे किसी योग्य दर्शकों के सामने पढने की मेरी तीव्र इच्छा थी क्योंकि कहीं न कहीं यह आजकल के घटनाक्रम के लक्षण बताता है । मुझे लगता है कि कहीं न कहीं यह स्पष्ट करता है कि जिस स्थिति में हम आज हैं , उसमें क्यों हैं । इसलिये मैं आन्ध्र प्रदेश के कानून से सम्बन्धित उच्चतम न्यायालय का १९५६ के एक निर्णय का वर्णन कर रहा हूँ जिसे चुनौती दी गई थी और उच्चतम न्यायालय में यह तर्क दिया गया था कि ऐसा क्यों है कि यह कानून मात्र हिन्दुओं पर ही लागू होते हैं ।

ऐसा क्यों है कि ये विधियाँ केवल  हिन्दू संस्थाओं पर ही क्यों लागू होती हैं ? ऐसी क्या विचित्रता है इसमें? चलिए इसे इस प्रकार देखते हैं l मान लेते हैं कि राहुल कक्षा के प्रधानाचार्य हैं या शिक्षक हैं । उनके पास अधिकार  है कि वे समान रूप से किसी को भी चाँटा मार सकते हैं , परन्तु वे अपनी शक्ति का प्रयोग केवल एक ही बालक पर करते हैं याने कि एक शक्ति है जो उन्हें संस्थागत रूप में दी गई है ताकि वे उसे सभी श्रेणियों , सम्प्रदायों , गुटों पर समान रूप से उपयोग करें ।

परन्तु राहुल अपनी शक्ति केवल एक ही सम्प्रदाय पर केन्द्रित करने का निर्णय लेते हैं और इससे दो – तीन निष्कर्ष निकलते हैं । पहला यह कि उनका मानना है कि वही एक मात्र सम्प्रदाय है या वही एक ऐसा समूह है छात्रों का जिसे विशेष ध्यान की आवश्यकता है क्योंकि वे दुर्बल हैं या उनके व्यक्तित्व में मूलभूत त्रुटि है और इसीलिए उनके व्यक्तित्व को एक प्रकार का हस्तक्षेप चाहिये । यही अवधारणा है और यही वह  सन्देश है जो राहुल देते हैं । और दूसरा यह कि भिन्न लोगों या समान लोगों के साथ अलग प्रकार से व्यवहार करना असमानता है । मैं तो कहूँगा कि ताकत को असमान रूप से प्रयोग करना भी असमानता है ।

यदि आप अपनी शक्ति का उपयोग , प्रयोग किन्हीं वर्गों के साथ न करके एक ही वर्ग को लक्ष्य बनाते हैं तो यही मेरे अनुसार भेद भाव की , पक्षपात की परिभाषा है , इसमें कोई दो राय नहीं है । इस सीधी समझ में आनेवाली बात से सहमत होने के लिये कानूनी विशेषज्ञ या संवैधानिक विषयों का ज्ञाता होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

आइये देखते हैं उच्चतम न्यायालय ने क्या कहा है :

अब मैं ये पढ़कर आपको सुनाता हूँ और यही मुख्य तर्क है जो हिन्दू समाज के अधिकारों में हस्तक्षेप करने के लिये दिया जाता है । कुछ मिनटों तक धैर्यपूर्वक सुनें क्यूँकि इससे आप समझेंगे कि केवल सरकार का ही नहीं , न्यायपालिका का भी क्या दृष्टिकोण है हिन्दू संस्थाओं , हिन्दू समाज को लेकर । अब ये देखना हमारा दायित्व है कि १९६६ का ये दृष्टिकोण किस प्रकार २०१६ तक भी स्थिर है । ध्यान से इसे सुनते हैं और ये बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ।

तो , ये तर्क जो याचिकाकर्त्ताओं की ओर से दिया गया , वे याचिकाकर्त्ता जो आन्ध्र प्रदेश के कानून को चुनौती दे रहे थे , उसकी संवैधानिकता को लेकर । ‘याचिकाकर्त्ता के बुद्धिमान् अधिवक्ता के तर्कों में मुख्य यह है कि अनुच्छेद २५ और २६ धार्मिक क्रियाकलापों को व्यवस्थित करने और अपने धर्म का विस्तार , प्रचार करने की स्वतंत्रता सभी नागरिकों को सुनिश्चित करते हैं । हिन्दू इस देश की जनसंख्या में बहुसंख्यक हैं । हिन्दू धर्म सबसे बड़ा धर्म है , मुस्लिम , ईसाई और पारसी नागरिकों को भी संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ के अनुसार सामान अधिकार प्राप्त हैं । मुस्लिम , ईसाई और पारसी सम्प्रदायों की संस्थाओं के संचालन में बिना लेश मात्र भी हस्तक्षेप किये , केवल हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित करना अनुच्छेद १४ और १५ का उल्लंघन है जिसमें सबको समानता का विषय दिया गया है’ , याचिकाकर्त्ताओं ने ये कहा ।

साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई सम्प्रदाय किसी बड़े धर्म का अंग है , तो अनुच्छेद २६ के अनुसार जो सुरक्षा उस सम्प्रदाय को प्राप्त है वही उस बड़े धर्म को भी प्राप्त है । याने यदि वैष्णवों को संविधान के किसी प्रावधान के अनुसार सुरक्षा या कोई अधिकार प्राप्त है तो पूर्ण रूप से हिन्दू समाज को भी ये प्राप्त है । और इस तरह हिन्दुओं के संस्थान कानून के नाम पर नियंत्रित नहीं किये जा सकते जिससे कि हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन होता है । ये सार है उन सब तर्कों का जो याचिकाकर्त्ताओं ने दिये ।

चलिए देखते हैं उच्चतम न्यायालय क्या कहता है और इससे आपको कई तर्क याद आएँगे जो संविधान के अन्य पक्षों को ध्यान में रखकर बनाये गये हैं । पहला प्रश्न है कि क्या यह आवश्यक है कि विधान पालिका को  ऐसा कानून बनाना चाहिए जो सभी धर्मों के मानने वालों द्वारा स्थापित या चलाये  जा रहे धार्मिक या परोपकारी या सामाजिक संस्थानों पर समान रूप से लागू हो, अब यहाँ पर आती है धर्मनिरपेक्ष कथा भारत जैसे बहुलवादी समाज में जहाँ लोग अपने अपने धर्मों, विभिन्न धर्मों या उनकी शाखाओं द्वारा प्रचारित आस्थाओं या सिद्धांतों में श्रद्धा रखते हैं, संविधान बनाते समय संविधान के जन्मदाताओं के सामने भारत के लोगों को एकजुट और संगठित करने, भिन्न आस्थाओं, जातियों इत्यादि के लिये व्यवस्था करने  की समस्या आई । संविधान के निदेशात्मक सिद्धान्त स्वयं विविधता की कल्पना करते हैं और  विभिन्न आस्थाओं के लोगों में समानता को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया । हालाँकि, एक समान विधि अत्यन्त आवश्यक है, हालाँकि उसे एक बार में ही लागू करना शायद देश की एकता और अखंडता के प्रतिकूल हो ।

विधि के नियमों से चलने वाले प्रजातंत्र व्यवस्था में धीमा प्रगतिशील परिवर्तन लाया जाना चाहिये, याने कुछ भावनाएँ दूसरों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । कानून बनाना या किसी कानून में परिवर्तन करना एक धीमी प्रक्रिया है और जहाँ आवश्यकता सबसे अधिक लगती है वहाँ विधान पालिका उसका उपचार करने का प्रयास करती है । इसलिए न्याय पालिका को लगता है कि जब हिन्दू संगठनों कि बात आये तो वह उपचार अत्यावश्यक है । आप देखिये , यही तर्कसंगत है , इसी प्रकार हम अनेकवाद को पारिभाषित करते हैं , इसी प्रकार हम धर्मनिरपेक्षता को पारिभाषित करते हैं , इसी प्रकार हम इस देश के संवैधानिक  आदेशों और आदर्शों को लागू करते हैं ।

हमें जो बात समझनी है वह यह है, यह प्रश्न जो १९९६ से निरन्तर २०१६ में भी महत्त्वपूर्ण बना हुआ है और वह एक प्रश्न जो हम सब पूछने का अधिकार रखते हैं यह है कि क्या आप कहना चाहते हैं कि पिछले ५० वर्षों में दूसरे समाज और दूसरे सम्प्रदाय समान कानून लागू होने के लिये सहज अनुगामी / आज्ञाकारी नहीं बने हैं , ५० वर्ष हो चुके हैं , यह १९९६ कि बात है, हम अब २०१६ में हैं । माना जा सकता है कि सन् १९९६ में स्वतंत्रता के ४९ वर्ष बाद कहें कि आपको लगता है हिन्दू संस्थानों को सबसे अधिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है । क्या आप निर्णय के ५० वर्ष बाद कह रहे हैं कि परिस्थिति अब भी यही कहती है कि केवल हिन्दुओं को ही इसकी आवश्यकता है ।

लोगों को जस्टिस चलकोंदय आयोग का सूचनापत्र अवश्य पढ़ना चाहिए जो कि मूल दस्तावेज है जो सन् १९८७ के कानून का आधार है , जो हिन्दुओं के धार्मिक संस्थानों पर लागू होता है. वह प्रपत्र, मैं  क्षमा के साथ कहना चाहता हूँ, निष्पक्षता के सभी मापदंडों का उल्लंघन करता है, विश्वसनीयता के सभी नियमों का उल्लंघन करता है और बहुसंख्यक समप्रदाय के धीरज को महत्त्व नहीं देता , बहुसंख्यक सम्प्रदाय की प्रतिष्ठा को महत्त्व नहीं देता, क्योंकि वह प्रपत्र स्पष्ट रूप से कहता है कि जहाँ हिन्दू संस्थान हैं और हिन्दू मन्दिर हैं और हिन्दू धार्मिक शाखाएं हैं वहाँ बहुतायत में भ्रष्टाचार होता है या भ्रष्टाचार के कई उदाहरण हैं और चूंकि यह विषय ८०% जनसंख्या से सम्बन्धित है, यदि आप एक समाज में ८०% जनसंख्या का उपचार करेंगे तो बाकी २०% भी सुधर जायेंगे , यह है वह सुन्दर तर्क जो दिया गया ।

मेरी समझ में नहीं आता कि यह तर्क उस तर्क से किस प्रकार भिन्न है जो पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूर्वी पाकिस्तान के लिये लगाया गया था । तीस लाख लोगों को साफ़ कर दो, बाकी तुम्हारी बात सुनेंगे, जनरल खान के निर्देशों में काम करने वाले यही तर्क देते हैं । तो जो तथ्य मैं रखना चाह रहा हूँ वह यह है कि इस व्यवहार पर प्रश्न उठने चाहिये । अब, आप इसपर किस प्रकार प्रश्न उठाएंगे? आप क्या करें? और सबसे पहले, आप ऐसा क्यों करें? आप यह किस प्रकार करें? चलिए एक प्रश्न पूछते हैं ।

विषय है हिन्दू संस्थानों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराना, मैं इसको थोड़ा और परिष्कृत कर  दूँ , एक अधिवक्ता होने के नाते , मुझे इसे कुछ और परिष्कृत करना होगा क्योंकि अधिवक्ता होने के नाते हमें प्रारूप बार बार सुधारने होते हैं । हम राज्य से कुछ असंवैधानिक करने की माँग नहीं कर रहे हैं , यह बात स्पष्ट होनी चाहिये । और ना ही हम ऐसा कुछ करवाना चाह रहे हैं जिसके लिये संविधान में संशोधन करना पड़े , संविधान जैसा आज है , बिना उसको परिवर्तित किये सुधार किये जा सकते हैं ।

सम्विधान को लेकर हमें कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं करना है और हमारा पक्ष यह है कि या तो सबके साथ समान रूप से हस्तक्षेप करो या किसी के भी साथ हस्तक्षेप मत करो । और यदि आप हमारे साथ हस्तक्षेप करते हैं तो आपको सबके साथ हस्तक्षेप करना होगा , उसमें भी आपको केवल उतना ही करने का अधिकार है जितना आपको संविधान अनुमत करता है । अतः आपको यह जानने की आवश्यकता है कि संविधान कितनी अनुमति देता है , पर इससे पहले कि मैं विधि की बात करूँ , मुझे एक दूसरे विषय पर जाना होगा ।

यह समझना बहुत आवश्यक है हमारे लिये , कि क्यों हिन्दू संस्थाओं की ओर ध्यान देने की इतनी गंभीर और त्वरित आवश्यकता है । हमारे मंदिरों की स्थिति देखिये , उनमें होने वाली गतिविधियों को देखिये , जो जातियाँ , जो वर्ग , जो समुदाय , मंदिरों पर निर्भर हैं , उनकी स्थिति देखिये और मैं केवल पुजारियों की बात नहीं कर रहा हूँ । इसके बारे में स्पष्ट होना बहुत आवश्यक है , बात बहुत आगे तक जाती है ।

यहाँ पर कोई केरल से है क्या ? एक जाति होती है अम्बलवासी नाम से । इसमें १८ उपजातियाँ होती हैं और ये सभी जातियाँ मन्दिर से जुड़े हुए किसी न किसी व्यवसाय में लिप्त हैं । अम्बलम् मन्दिर को कहते हैं , क्षमा कीजियेगा यदि मेरी जानकारी गलत है , इस तरह मंदिरों पर निर्भर रहने वालों को अम्बलवासी कहते हैं । इससे क्या पता चलता है ? मन्दिर , हिन्दू समाज के लिये केवल धार्मिक महत्त्व का स्थान न होकर के , सामाजिक महत्त्व का केन्द्र भी रहा है , इसकी अर्थव्यवस्था में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है , यह ध्यान देने योग्य बात है ।

आपने दक्षिण भारत के बहुत ही सुन्दर और भव्य मन्दिर देखे होंगे , उन सबके निर्माण में , शिल्प में , निश्चित विधियाँ , निश्चित सिद्धान्त होते हैं जिनका दायित्व एक बिलकुल ही भिन्न समुदाय निभाता है , विश्वकर्मा या स्थपति इनको कहते हैं । यह समुदाय भी आज नष्ट हो रहा है । अब हमारे पास लोग नहीं हैं जो यह जानते हैं कि पत्थरों पर शिल्पकला किस प्रकार दिखाई जाये , ये लोग अपनी कला को उस स्तर तक लेकर गये हैं जहाँ ये पत्थरों में भी , नर पत्थर और स्त्री पत्थर , इस प्रकार से भेद करना जानते हैं । ये लोग और इनकी तरह और बहुत से वर्ग नष्ट होने की स्थिति में हैं क्योंकि मन्दिर , एक संस्था के तौर पर स्वयं ही नष्ट होने कि स्थिति में है , उसको उसकी जड़ों से विच्छिन्न किया जा रहा है , और यह सुनियोजित तरीके से वर्षों से होता आ रहा है ।

जब अंग्रेजों ने यह दुराचार किया , तो कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि भारतीय संस्थाओं से उन्हें लगाव होने का कोई कारण नहीं , वे बाहरी लोग थे । परन्तु यदि उनकी ही नीतियाँ १९४७ के बाद भी चल रही हैं , तो या तो हम ये मानते हैं कि उनकी नीतियाँ सही थीं , या फिर हम आज भी मानसिक रूप से उनके दास हैं । इसको परिवर्तित करने की आवश्यकता है , और उसमें मूल कारण यह है कि एक आम हिन्दू के लिये , चाहे वह भारत कि किसी भी भाग में हो , मन्दिर ही वह जगह है जहाँ वह आध्यात्मिक शान्ति के लिये जाता है । वो आश्रमों में नहीं जाता , उनकी प्राथमिकता मन्दिर ही है । सत्य तो यह है कि आश्रमों का वैभव एक आम हिन्दू को विकर्षित ही करता है ।

अधिकतर चर्चाओं में , आम हिन्दू जन इस तरह की बातें भी कहते हैं कि समाज के लिये दान करना हिन्दू समाज और हिन्दू संगठनों को अप्रिय है , अपने आप को बुद्धिजीवी दिखने के लिये प्रायः हिन्दू स्वयं ही ऐसी बात करते हैं । हम सिर्फ कमाना जानते हैं , हम दान करना नहीं जानते ।   परन्तु दान शब्द का हिन्दू परम्परा और हिन्दू साहित्य में बड़ा ही महत्त्व है । ज्ञान दान या कैसा भी दान बहुत महान माना जाता है । हमारे नायक दानवीरों के रूप में जाने जाते हैं , ये इस देश की परम्परा है ।

अब ऐसा क्यों है कि हिन्दू संस्थाएँ बढ़-चढ़ कर दान और दान से जुड़ी गतिविधियाँ करने में असमर्थ हैं ? आप अपने आस पड़ोस के किसी चर्च में जायें , या किसी मस्जिद या गुरूद्वारे में जायें , तो देखेंगे कि वे जितना चाहें उतना वे अपनी भानाओं के अनुसार , अपने सम्प्रदाय से जुड़े कार्यों के लिये व्यय करने में समर्थ हैं । फिर हिन्दू संस्थाएं ऐसा क्यों नहीं कर पातीं ? हम में से अधिकाँश लोग इस सरल और अज्ञानतापूर्ण निर्णय पर पहुँचते हैं कि देने कि नीयत ही नहीं है, यह असत्य है , हमारे हाथ बंधे हुए हैं , यह हमें समझने की आवश्यकता है ।

हिन्दू संस्थाएं सरकार के नियंत्रण में हैं , इसलिये उनके पास वैसी स्वतंत्रता नहीं है जैसी दूसरी संस्थाओं या दूसरे सम्प्रदायों के पास है अपनी सम्पत्ति के बारे में निर्णय लेने के लिये , अपनी स्वयं की परम्पराओं का निर्वहन करने के लिये , अपनी स्वयं की परम्पराओं पर व्यय करने के लिये , अपने समुदाय पर व्यय करने के लिये ।

एक पादरी अपनी चर्च में आने वाले लोगों को एकजुट रखने के लिये अपने से ऊपर के अधिकारियों से बात करके व्यय करने में या निर्णय लेने में समर्थ है । आप बताइए मुझे , क्या एक पुजारी के पास यह अधिकार है , आप जिस भी मन्दिर में गये हैं , आपने पुजारी को देखा होगा , क्या आपको लगता है कि एक पुजारी अपने मन्दिर के भक्तों के लिये कुछ कर सकता है ? बिल्कुल नहीं कर सकता ।

मन्दिर का प्रशासन पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है । यदि हम अब भी इस बात को नहीं समझेंगे कि हिन्दू मंदिरों का प्रशासन सरकार के हाथों में होने से , भक्तों की इसमें कोई भूमिका नहीं है , किसी भी सरकारी तंत्र की भाँती मन्दिरों का प्रशासन भी अस्त – व्यस्त और भ्रष्ट है , तो हम अपनी परम्पराओं और अपने जीवन जीने के ढंग को अपने ही सामने मरता हुआ देखेंगे । बिना तकनीकी भाषा का प्रयोग किये मैं आप को समझाने का प्रयास करता हूँ कि यह सब कैसे चलता है ।

गूगल पर या इन्टरनेट पर आजकल कोई भी न्यायपालिका के किसी भी निर्णय को पढ़ सकता है , यह बिल्कुल भी कठिन नहीं है , आपको किसी अधिवक्ता की आवश्यकता नहीं है । मैं आपको कुछ सूचनाएं देता हूँ और आप स्वयं भी पढ़ सकेंगे । १९५४ में उच्चतम न्यायालय का एक प्रसिद्ध  निर्णय आया था , शिरूर मठ के नाम से । दक्षिण कन्नड़ में , उडुपी में एक मठ है और इस मठ के विरुद्ध इतनी कठोर और बर्बर कानूनी प्रक्रियायें की गयीं थीं कि यदि मैं इस मठ का अधिपति होता तो मैं स्वयं से कहता कि इस देश में हिन्दू होना पाप है ।

इसका सीधा सा कारण यह है कि , चलिए मैं आपको विस्तार से बताता हूँ । धर्म से जुड़ी स्वतंत्रता के सम्बन्ध में सरकार के अधिकार संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ में विहित हैं । अनुच्छेद २५ निजी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा और अनुच्छेद २६ सम्प्रदायों की धार्मिक स्वतंत्रता के विषय में है , इसलिये ये संस्थाओं की बात करता है और २५ और २६ परस्पर जुड़े हुए हैं । २५ के अंतर्गत एक रोचक प्रावधान है , २५ (२) (a) , जो कहता है कि जहाँ तक धर्मनिरपेक्ष , आर्थिक , राजनैतिक और इस तरह की गतिविधियों का प्रश्न है , इन सबको लेकर राज्य को अधिकार है कि वह विधान बनाये । ये सभी प्रकार की गतिविधियाँ एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ जुड़ी होती हैं । ऐसा प्रावधान करने के पीछे क्या प्रयोजन है , पहले इसको समझते हैं । समझें कि आशीष एक धार्मिक सज्जन है , उसकी इच्छा है कि वह अपनी सम्पत्ति किसी मन्दिर के नाम कर दे , उसकी इच्छा है कि वह सम्पत्ति केवल उस मन्दिर के उद्धार के लिये प्रयुक्त हो और किसी विषय के लिये नहीं । उसकी सदा यही इच्छा थी ।

यदि कोई मन्दिर प्रशासन का अधिकारी ऐसी इच्छा करता है कि इस सम्पत्ति का बिलकुल ही भिन्न प्रयोग किया जाये तो २५ (२) (a) ही वह प्रावधान है जिसका प्रयोग करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रशासनिक अधिकारी , जिस उद्देश्य के लिये सम्पत्ति दी गयी , उसको छोड़कर किसी अन्य हेतु उस सम्पत्ति का व्यय न कर सके । याने धन और सम्पत्ति जो एक समुदाय के उद्धार के लिये दी गई थी , यदि उसका कोई दुरूपयोग किया जाये तो अनु० २५ (२) (a) उसको रोकने के लिये उपस्थित है । अब देखते हैं कि इसकी वास्तविक  व्याख्या कैसे की गई है , यहाँ अधिवक्ता और उनकी तिकड़मबाज़ी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है ।. न्यायपालिका ने धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को एक ओर रखा और धार्मिक गतिविधियों को दूसरी ओर रखा और कहा कि हम धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं इसलिये हम इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे, परन्तु जो धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है , आर्थिक या राजनैतिक , उसको लेकर कोई भी निर्णय लेने का सरकार को सम्वैधानिक अधिकार प्राप्त है ।

इस तर्क में मूलभूत दोष क्या है , मैं आपको बताता हूँ । आप बिना किसी संसाधन के पूजा कर सकते हैं क्या  ? आप बिना किसी संसाधन के मन्दिर के  परिसर में कोई आयोजन कर सकते हैं क्या ? अन्न दान करना है , पैसा कहाँ से आयेगा ? पूजा करनी है , पैसा कहाँ से आयेगा ? अखंड भजन करना है , पैसा कहाँ से आयेगा ? नाम संकीर्तन करना है , पैसा कहाँ से आयेगा ? धार्मिक अनुष्ठान के लिये पैसा कहाँ से आयेगा ? धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को तो सरकार नियंत्रित करती है , पैसा देना न देना सरकार के हाथ में है । याने धार्मिक अनुष्ठान यदि कठपुतली है तो उसके तार सरकार के हाथ में हैं , वह जैसे चाहे नचाये । धार्मिक अनुष्ठान और परम्पराएं सरकार की  इच्छाओं की दासी बनके रह गयी हैं । यह विभाजन धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिये और धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण बनाये रखने के लिये किया गया था परन्तु चाहें जानकार या अनजाने में , इसका प्रयोग हिन्दू समाज के विरुद्ध किया गया है और इस निष्कर्ष को किसी भी प्रकार नकारा नहीं जा सकता है ।

प्रत्येक गतिविधि , चाहें वो कितनी ही धार्मिक हो , उसका कोई न कोई धर्मनिरपेक्ष पक्ष भी होगा , क्योंकि पैसा कहीं न कहीं होगा ही । और यदि प्रत्येक धर्मनिरपेक्ष पक्ष पूरी तरह सरकार के अधीन है तो आपने धार्मिक गतिविधि को पूरी तरह सरकार के अधीन कर लिया है । और इस तरह आपके हाथ में केवल कागजी अधिकार रह जाते हैं जो कागजों से बाहर निकलकर किसी काम में नहीं आ सकते ।

और इसके क्या परिणाम होते हैं ? कितने लोगों ने वह प्रसिद्ध घटना सुनी है कि जब रामकृष्ण मिशन ने सरकार से अनुरोध किया कि हम एक अल्पसंख्यक संस्था बनना चाहते हैं , बहुसंख्यक बनने का अगर कोई लाभ नहीं है तो अल्पसंख्यक ही बनना  चाहिए और बहुसंख्यक होने से यदि यह सब कष्ट झेलना पड़ता है तो जिस टोली को सभी सुख मिल रहे हैं तो उसी टोली में जाने में समझदारी है । सामान्य मानवीय स्वभाव है , और क्या कर सकते हैं । आपको क्या लगता है , धर्मांतरण क्यों होता है ?  यही मूल कारण है , और चाहे हम कितना भी बोलें कि धर्मांतरण बुरा है जब तक हम कुछ नहीं बोलेंगे, कुछ नहीं बदलेगा.

समाज का सभ्य , पढ़ा – लिखा , उच्च वर्ग आपसे यह कहेगा कि तुम हिन्दुओं ने अपने अलावा दूसरे हिन्दुओं का कभी ध्यान नहीं किया और यदि आज वे धर्मांतरण कर रहे हैं तो तुम्हे समस्या है ? उनकी चर्च उनके लिये कुछ कर रही है , उनकी मस्जिद उनके लिये कुछ कर रही है , क्या तुम्हारा मन्दिर उनके लिये कुछ कर रहा है ? अरे भाई करने दोगे तो करेंगे न , हमारे हाथ तो पूरी तरह से बँधे हुए हैं ।

मेरा यह विशवास है कि अगर हिन्दू समाज को एकजुट होना है , इसलिये नहीं कि हमें किसी से लड़ना है , केवल इसलिये कि हम बिना कोई जातिगत या क्षेत्रगत या भाषागत भेदभाव के एक दूसरे के साथ जुड़ाव महसूस कर सकें ।  और ये मंदिरों के सुधार , मंदिरों के आम हिन्दुओं के हाथ में आए बिना सम्भव नहीं है ।

मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि पुरानी सभी परम्परा सही हैं , कुछ चीजों के साथ हम असहमत हो सकते हैं , लेकिन यह विश्लेषण  करने का अधिकार किसको है ? हमें ही होना चाहिये । यदि बाकी सभी समुदायों को ५०-६० वर्ष दिए गए हैं कि वे धीरे – धीरे प्रगति करें और विकसित हों , तो यही समान अधिकार और स्वतंत्रता हिन्दुओं को क्यों नहीं मिलनी चाहिए । हिन्दुओं ने ही अपने समाज में सरकार द्वारा किये गये सभी हस्तक्षेपों को बिना कोई विरोध किये सहा है । तो आप ऐसा विशवास क्यों नहीं करते हैं कि हिन्दू अपने अन्दर की समस्याओं को स्वयं सुलझा लेंगे ।

जब तक हिन्दुओं की पहचान का केंद्र , हिन्दुओं का मन्दिर , सरकार के नियंत्रण में है , तब तक हिन्दू समाज की समस्याओं का निदान नहीं हो सकता । कभी – कभी मैं सोचता हूँ कि हम एक हिन्दू राष्ट्र में रहते हैं , सरकार को हिन्दुओं के विषय में इतनी रूचि है तो आप हिन्दू राष्ट्र ही तो हो , हमने नहीं माँगा हिन्दू राष्ट्र , आपने बना दिया ना । कर्णाटक सरकार ने मंदिरों से लिये गये पैसे का किस प्रकार से दुरूपयोग किया है , एक बार आप उसको देखिये , और फिर आप स्वयं से पूछेंगे , क्या यह सम्वैधानिक है ? किसी भी परिभाषा से , किसी भी तर्क से क्या इसको सही ठहराया जा सकता है । इसकी विस्तृत सूचना मैं आपको उपलब्ध कराऊँगा ।

हिन्दुओं के मंदिरों से लिया गया पैसा दो चीजों में लगाया गया है , ईसाईयों की जेरूसलम यात्रा और मुसलमानों की हज यात्रा । यह हिन्दुओं के पैसे से हो रहा है । यदि मैं ईसाई या मुसलमान होता तो मैं यह कहता , मैं आहत होता कि हमारे पास क्या पैसा नहीं है ? हमें यह खैरात नहीं चाहिए ? चलिये इसको सम्वैधानिक दृष्टिकोण से देखते हैं , यह गतिविधि पूरी तरह से संविधान के अनुछेध २७ का उल्लंघन , अवमानना और परिभंजन करती है । अनु० २७ पूरी तरह स्पष्ट करता है कि कर या जनता से संग्रहीत कोई भी धनराशी राज्य द्वारा किसी एक सम्प्रदाय विशेष के हित में व्यय नहीं की जा सकती । अनु० २७ राज्य को मन्दिर , चर्च या मस्जिद से बिलकुल पृथक करता है । अतः जब आप हिन्दुओं से लिये गये पैसे को दूसरे सम्प्रदायों के हित में लगाते हो , और यह सब कुछ प्रमाणित है , सब कुछ लिखित में है , तो आप अनु० २७ कि अवज्ञा करते हो  । और ये लोग हमें सम्वैधानिक आदर्शों का ज्ञान देते हैं ।

महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई उच्चन्यायालय के सम्मुख यह स्वीकार किया है कि सिद्धिविनायक मन्दिर से आया कितना ही धन उसने मन्दिर के आलावा अन्य विषयों पर व्यतीत किया है । इसका निर्णय कौन करता है ? मन्दिर को इसका निर्णय करना है । परन्तु मन्दिर के अन्दर , प्रशासनिक अधिकारी बनकर कौन बैठा है ? सरकार का अपना व्यक्ति । तो क्या मन्दिर द्वारा दी गई अपने धन को अन्यत्र प्रयोग करने की अनुमति स्वैच्छिक है ?

राज्य का नियुक्त अधिकारी संस्था में बैठकर संस्था और राज्य के मध्य सेतु का कार्य करता है , और सरकार कि प्रत्येक इच्छा को आज्ञा मानता है  ।  विधि के छात्र बताएं यहाँ मन्दिर की स्वेच्छा से निर्णय लिया जा सकता है क्या ? स्वेच्छा का अधिकार मन्दिर को कागजों में भी नहीं है । उदाहरण के लिये मैं आपको कुछ पढ़के सुनाता हूँ जिससे आप समझ सकेंगे कि हिन्दू संस्थानों को किस सीमा तक स्वतंत्रता से वंचित किया गया है । मैं आपको पढ़कर सुनाता हूँ ।

मेरे अनुसार HRCE सम्बन्धित जितनी भी विधियाँ हैं वे सब इसी प्रपत्र से निकली हैं , पूरे देश में । पहले मैं आपको इसकी पृष्ठभूमि बताता हूँ । तमिल नाडू HRCE विधि नियम का एक कुख्यात अनुभाग है , अनुभाग ४५ जिसमें हिन्दू संस्थाओं में कार्यकारी अधिकारियों की  नियुक्ति का विषय है । ये अधिकारी उस संस्था के प्रशासन में मुख्य होते हैं ।

१९६५ में उच्चतम न्यायालय ने एक निर्णय लिया , जो तमिल नाडू की एक संस्था के विषय में था । इस निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा गया कि राज्य किसी भी परिस्थिति में मन्दिर के प्रशासन को सम्पूर्ण रूप से अपने अधिकार में नहीं लेगा , क्यों ? क्योंकि अनु० २५(२)(अ) जो कि राज्य को मन्दिर में हस्तक्षेप करने का अधिकार देता है वह राज्य को धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों तक सीमित करता है , प्रशासन में प्रवेश नहीं देता । याने सरकार एक रूपरेखा दे सकती है किसी निश्चित उद्देश्य के लिये जिससे कोई दुराचार या दुर्व्यवस्था न पनपे , परन्तु मन्दिर से जुड़े समाज को पूरा अधिकार है कि वह अपने लोगों को नियुक्त करे जो उस रूप रेखा को लागू करें , परन्तु राज्य इस रूपरेखा में , इस ढाँचे में प्रवेश नहीं करेगा और ना ही अपने किसी व्यक्ति को बिठाएगा क्योंकि ऐसा करने से मन्दिर के प्रशासन का पूरा अधिकार सरकार को हो जाएगा ।

इस निर्णय में उच्चतम न्यायलय ने , मन्दिर के निरिक्षण और उसके प्रशासन के अधिग्रहण में स्पष्ट भेद किया है । २०१५ में क्षमा कीजिये ६ दिसम्बर २०१४ को उच्चतम न्यायलय ने चिदंबरम मन्दिर के विषय में एक निर्णय दिया , इसमें सुब्रह्मण्यम स्वामी मन्दिर की ओर से अधिवक्ता थे । उच्चतम न्यायलय ने विशेष रूप से अनु० ४५ का और सामान्य रूप से HRCE से जुड़े हुए विधिनियमों का विश्लेषण किया है । उच्चतम न्यायलय कहता है कि यदि सरकार को अनु० २६ के अनुसार धार्मिक सम्प्रदायों को उनकी संस्थाएँ सम्वैधानिक रूप से चलाने के अधिकार का सम्मान करना है तो सरकार को स्वयं को इन संस्थाओं पर थोपना नहीं चाहिये और सरकार की मर्यादा केवल निरिक्षण करने व सुचारू संचालन सुनिश्चित करने तक है , प्रशासन को सर्वथा अधिगृहीत करना उसके लिये अनुचित है ।

तो किस सन्दर्भ में यह आदेश दिया गया था ? १९५४ से लेकर २०१४ तक , जिस दिन तक यह निर्णय आया था , तमिल नाडु के प्रत्येक मन्दिर में , चाहे वह छोटा हो या बड़ा , चाहे उसकी आय मानो एक लाख या दस सहस्र से कम हो , राज्य द्वारा , कार्यकारी अधिकारी नियुक्त थे । कोई  तर्क अथवा स्पीकिंग ऑर्डर भी नहीं दिया गया जो इस प्रश्न का उत्तर दे कि मन्दिर को सरकार द्वारा नियुक्त कार्यकारी अधिकारी के अधीन होना ही क्यों चाहिए ।

yadi koi kaaryakari अधिकारी किसी मन्दिर में नियुक्त किया जाता है , आपके मन में इतना तो होना चाहिए , कि दाल में कुछ काला है , तो वो नियुक्ति लिखित में होनी चाहिए , उसके लिये तर्क दिए जाने चाहिये , ये न्याय का स्वाभाविक सिद्धांत है । जब राज्य किसी निजी संस्था में हस्तक्षेप करने का निर्णय लेता है तो उसे तर्क देना आवश्यक है कि उसका हस्तक्षेप उचित क्यों है । एक भी कारण नहीं दिया गया , उच्चतम न्यायलय के सम्मुख एक भी प्रमाण नहीं रखा गया कि क्यों इतने सारे कार्यकारी अधिकारी पूरे तमिल नाडु राज्य में नियुक्त किये गये , ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि जब ऐसा कोई अधिकारी नियुक्त होता है तो वो केवल उस समय तक अपने पद पर रह सकता है जब तक कि  समस्या का समाधान न हो ।

जैसे ही समस्या अथवा दुराचार ठीक कर लिया जाये , अधिकारी को मन्दिर से बाहर होना ही पड़ेगा । और कोई विकल्प नहीं है , निश्चित रूप से अधिकारी को मन्दिर से निष्कासित होना चाहिये । जबकि सरकार के आदेश काल के सम्बन्ध में मौन हैं याने एक बार बैठ गये तो बैठ गये और उस अधिकारी को बाहर करने का कोई मार्ग नहीं है । सर्वोच्च न्यायलय ने कहा कि अनु० ४५ के अंतर्गत की गई आपकी सभी नियुक्तियाँ जो कि सम्विधान के अनु० २६ का उल्लंघन करती हैं क्योंकि न तो आपने कोई समय सीमा रखी है और न ही वह कारण बताया कि जिस समस्या के निदान के लिये आपने नियुक्ति की ।

तो तमिल नाडु सरकार के विभाग के बाबुओं ने नवम्बर २०१५ में नये नियम बनाए , क्योंकि अनु० ४५ का उपयोग करने के लिये भी सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति के लिये नियम बनाना आवश्यक था , जबकि तमिल नाडु सरकार ने बिना कोई नियम बनाए सबको नियुक्त कर दिया । नियमों के आधार पर ही नियुक्तियाँ होनी थीं , नियम थे नहीं तो उन्होंने नियम बनाये । परन्तु यदि सर्वोच्च न्यायलय कहता है कि आपने संविधान का उल्लंघन किया है और इसलिये इतिहास की आपकी सभी नियुक्तियाँ अवैध हैं , तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं नया नियम बनाता हूँ जो यह कहेगा कि मेरा इतिहास में किया गया काम वैध है । यह कोई गंगोत्री नहीं है जहाँ आप अपने पाप धो लें , परन्तु इस प्रपत्र में तमिल नाडु के बाबुओं ने वही किया ।

सरकारी बाबू कह रहे हैं कि आप मान लीजिये कि हमने जितनी भी नियुक्तियाँ कीं , वो सब वैध थीं , चलो मान लिया , यह कोई विद्यालय में खेला जा रहा खेल है ? एक सम्प्रदाय विशेष की संस्थाओं में आपने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया है , एक निश्चित प्रावधान का बहाना लेकर , जो कहता है कि किसी भी नियुक्ति से पहले , नियुक्ति के नियम बनाने होंगे और चल रही व्यवस्था में दोष अथवा दुराचार दिखाना होगा जो आपको उस संस्था में हस्तक्षेप करने के लिये विवश कर रहा है । आपके पास कोई नियम नहीं है , न ही आप कोई कारण बता पा रहे हैं कि आपने क्यों हस्तक्षेप किया और जब उच्चतम न्यायालय कहता है कि भविष्य कि नियुक्तियों के लिये नियम बनाओ , तो आपने पहले की गई गलतियों को भी साफ़ कर दिया । ये केवल काले को सफ़ेद करने जैसा है । और क्या कर रहे हैं आप ?

और ये सुनिए आप , मैं कुछ भाग ही पढूँगा और ये आपको अचंभित कर देगा । मैं जितना धीरे हो सकता है उतना धीरे पढूँगा । जब आयुक्त स्वयं संज्ञान लेकर या अपने कनिष्ठ अधिकारियों सूचित किये जाने पर आवश्यक समझता है …..इत्यादि इत्यादि….. किसी धार्मिक संस्था के बेहतर और कुशल प्रशासन को सुनिश्चित करने के हित में वो एक कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करेगा । इतना लम्बा – चौड़ा विधान । इसका बहाना लेकर आप कुछ भी कर सकते हैं और आयुक्त के पास कारण है यह मानने के लिये कि किसी धार्मिक संस्था के प्रशासनिक विषय में निरंतर त्रुटियाँ हैं , ठीक है , मैं इससे आपत्ति नहीं करता । अब कोई अनियमितता है , कोई दुराचार है , समझो कि मुक्केबाजी का खेल होता तो मैं कहता कि बेल्ट के नीचे नहीं मार सकते  और फिर मैं कहता कि कहीं भी मार सकते हैं । मैं छः नियम बनाता और शरीर के उन – उन अंगों को चिह्नित करता कि जहाँ प्रहार नहीं कर सकते और इसके बाद एक अन्तिम नियम बनाता कि कोई रोक नहीं है , कहीं भी प्रहार कर सकते हैं , जो करना है कर लो ।

तो इसलिये , जहाँ तक मैं सोचता हूँ , यह कुछ भी नहीं है और श्रीमान रमेश यहाँ पर हैं जिनके साथ मैं काम कर रहा हूँ , ये temple worshipper society के प्रतिनिधि हैं , जब भी हम दोनों ये पढ़ते हैं , चलिए मैं आपका परिचय करवाता हूँ , इन सब गतिविधियों के यही सूत्रधार हैं और मैं चुनौती दे सकता हूँ कि पूरे देश में एक भी ऐसा अधिवक्ता नहीं है जो इन सब विधिनियमों के प्रावधानों को इनसे बेहतर जानता हो । इनके चरणों में बैठकर ही मैंने यह सब सीखा । जिस तरह के तथ्य , जिस तरह की जानकारी , यदि तमिल नाडु में  ये किसी मन्दिर में जाते हैं , तो वहाँ के सरकारी अधिकारी भयभीत होते हैं कि संकट आ रहा है । मैं ये किसलिए कह रहा हूँ कि इन सब विधिनियमों के साथ जो भी अनुचित है वह मैं केवल एक इस प्रपत्र से सिद्ध कर सकता हूँ , इन सब विधिनियमों कि धज्जियाँ उड़ा सकता हूँ । मुझे केवल ये नियम पढ़कर सुनाने होंगे , अन्य किसी विधिनियम का सहयोग भी नहीं लेना पड़ेगा ।

किसी भी तर्कशील निष्पक्ष व्यक्ति कि आत्मा हिल जायेगी । आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि आप किसी भी कारण से किसी भी व्यक्ति को नियुक्त करेंगे । कारण बताइए , निश्चित कारण बताइए , एक समय सीमा भी होनी होगी । आयुक्त जांच कराने के बाद अपनी इच्छा अनुसार कुछ निश्चित अवधियों के लिये , जिसमें ५ वर्ष से अधिक की  अवधि नहीं हो सकती । तो पहली ५ वर्ष के लिये नियुक्त करेंगे , फिर पुनः ५ वर्ष के लिये तो यह तो कभी समाप्त ही नहीं होगा । निरंतर पुनः – पुनः नियुक्ति होती रहेगी । तो यदि आप इन सब प्रावधानों को पढ़ें तो यह हिंदू समाज के ऊपर एक करारा चाँटा है और मुझे लगता है कि हिन्दू समाज इसी के लायक है , क्षमा कीजियेगा परन्तु आप बहुत समय से बिना किसी विरोध के मार खाते जा रहे हैं तो आपके साथ ये होना स्वाभाविक है ।

यदि मैं तमिल नाडु में अधिवक्ता होता या इन विधियों तक मेरी पहुँच होती , मैं स्वयं से पूछता कि इससे बेहतर केस मुझे और  क्या चहिये सरकार को न्यायालय में जलते कोयलों पर खींचने के लिये । हम कितने परेशान रहते हैं अपने सवच्छन्द होकर बोलने पर सरकार के अतिक्रमण से क्योंकि वह एक मौलिक अधिकार है । यह भी उतना ही एक मौलिक अधिकार है क्योंकि यह संविधान के भाग ३ में आता है । यदि यह कोई और सम्प्रदाय होता जिसके अधिकारों को इस प्रकार रौंदा जा रहा होता , मुझे लगता है कि प्रतिक्रियाएँ असाधारण रूप से भिन्न होतीं और निश्चित ही संवैधानिक नहीं होतीं । मैं बस एक चीज और पढूँगा और ये वो चीजें हैं जो मैं पढ़ना चाहता हूँ , इसलिए कृपया कुछ और समय के लिये मेरा साथ दें ।

यह कहता है , हाँ , कि धार्मिक संस्थानों के सुचारू प्रशासन के लिये कार्यकारी अधिकारी का दायित्व होगा , इसलिये उसका दायित्व धार्मिक संस्थानों के सुचारू प्रशासन के प्रति होगा न कि न्यासी के प्रति , न कि प्रबंधन के प्रति , न कि न्यासियों कि परिषद्  के प्रति और जो निर्देश वह जारी करे उनका ……….रूप से पालन किया जाये ………..। सभी कर्मचारी और नौकर उस कार्यकारी अधिकारी के सीधे नियंत्रण और अधीक्षण में काम करेंगे । संस्थान का हर नियुक्त व्यक्ति अब राज्य के नियुक्त व्यक्ति के अधीन होगा । अब आप देखिये यह व्यवस्था कैसे काम करती है , मैंने तो धार्मिक पक्ष को नहीं छुआ न , मैंने केवल पंथनिरपेक्ष पक्ष को छुआ है , तो , आपकी समस्या क्या है ? क्योंकि अब , अपने यह सुनिश्चित कर कर दिया है कि जिस व्यक्ति को धार्मिक अनुष्ठान करने हैं , उसे कार्यकारी अधिकारी की आज्ञा माननी पड़ेगी जिसके नियंत्रण मे सब हैं जिसके भी साथ वह संस्थान में काम करता हो और यही वह परोक्ष तरीका है जिससे ये कानून कार्य करते हैं ।

बस एक और बात और फिर मैं आपको बताता हूँ कि किस प्रकार ये  लोग अपने सभी पाप धो लेते हैं । इन नियमों में से कुछ भी उस कार्यकारी अधिकारी की शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा जो इन नियमों के आने से ठीक पहले तक इस पद पर आसीन था । ये है आपका ………., अब सरे पाप धुल गये यहीं पे । ये मात्र तमिल नाडु के सम्बन्ध में ही नहीं है , आन्ध्र प्रदेश के कानून में भी ऐसे प्रावधान हैं जिससे कार्यकारी अधिकारी को सुनिश्चित करने अधिकार दिया हुआ है कि नियमित भजन करते हो , मन्दिर के अन्दर उसे अधिकार है निर्णय लेने का , वह सुनिश्चित करेगा कि नियमित रूप से भजन – कीर्तन होते हैं ।  आपको इसका ठेकेदार कब किसने बना दिया भई ?

एक ओर हम कह रहे हैं कि मुझे एक नास्तिक बनने का अधिकार है , दूसरी ओर इसने अपने कार्यकारी अधिकारी को  यह अधिकार दे दिया है कि वह हमें बलपूर्वक बिठाये और भजन – कीर्तन कराये । इसके हाथ में मंजीरा उसके हाथ में ढोलक , प्रभावकारी रूप से यह ऐसे चलता है । क्या मैं गलत कह रहा हूँ महोदय ? इस प्रकार का प्रावधान है । हम सब …….. जब हमने यह पढ़ा और एक बैठक में हम इसे पढ़ रहे थे । मुझे नहीं समझ आता कि हँसना चाहिए या रोना चाहिए , सच में । मेरी समझ में नहीं आता कि मैं हसूँ या रोऊँ । बात यह है कि ऐसे उदाहरण इस प्रकार के अनेक विधिनियमों में प्रचुरता से पाए जाते हैं । आपने समाचारों में सुना होगा कि महाराष्ट्र सरकार ने सिद्धिविनायक मन्दिर को अपने पास से आधा पैसा चिकित्सालय बनाने के लिये देने के लिये कहा है । नरक को ले जाने वाले इस मार्ग में सत्कामनाओं की कोई कमी नहीं है ।

चिकित्सालय बनाने के लिये धन देने में कोई दोष नहीं है , परन्तु क्या आप उसका श्रेय देंगे मन्दिर को ? कभी नहीं देंगे । हिन्दू संस्थाएँ और हिन्दू संत केवल भ्रष्टाचार , दुराचार , घोटालेबाज़ी , जनता को मूर्ख बनाना , अन्ध विश्वास फैलाना , इन्हीं सब कुकर्मों में लिप्त है ऐसा ही प्रचार किया जाता है । आप हिन्दुओं को इसका भी श्रेय कभी नहीं दोगे कि हिन्दू शांत और सहिष्णु रहे हैं जब उनकी प्रत्येक संस्था राज्य द्वारा हड़प ली गयी । इस बात को समझिये कि यह सब तो धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों के सम्बन्ध में किया जा रहा है । परन्तु अब प्रत्यक्ष धर्म में भी हस्तक्षेप हो रहा है , पता नहीं आने वाले समय में मैं राखी भी मना पाऊँगा या नहीं , पता नहीं कौन सी लाल बिंदी गैंग चिल्लाती हुई आ जाएगी और कहेगी कि यह इसके विरुद्ध है उसके विरुद्ध है । कल सप्तपदी में पुरुष के पीछे चलती महिला शायद लोगों को फेमिनिज्म के विरुद्ध लगे , सब कुछ उल्टा करेंगे ।

सुनियोजित ढंग से , जब हमारी संस्थाओं के धर्मनिरपेक्ष पक्ष पर आघात हो रहा है , तभी धार्मिक पक्षों पर भी निरन्तर प्रहार हो रहे हैं । आपने कहा कि धर्मनिरपेक्ष पक्ष पर मेरा अधिकार बनता है तो मैं ही इसका संचालन करूँगा । धार्मिक पक्ष में हस्तक्षेप करने के लिए भी आपका यही तर्क है क्या ? असमानता , अन्धविश्वास , भेदभाव , आपने हर प्रकार का धूर्त उपाय ढूँढा है जिससे हिन्दुओं की जीवन शैली नियंत्रित और विकृत की जा सके । इस समस्या का समाधान कैसे हो ?

मेरा विनम्र निवेदन है और मैं नहीं चाहता कि कोई मेरे बारे में पूर्वाग्रह बनाए , कोई बनाता भी है तो बनाए । किसी भी राजनैतिक संगठन में अपनी श्रद्धा मत रखिये क्योंकि कोई भी राजनैतिक संगठन अपनी सत्ता को बचाने के लिये जो उसे उचित लगेगा , करेगा । अपनी स्वयं की एकता , साथ मिलकर चलने की योग्यता और अपने हितों के लिये लड़ने की भावना , इसी में आपको विश्वास करना चाहिये । हम किसी और सम्प्रदाय से लड़ नहीं रहे हैं , हम केवल राज्य को हमारे निजी क्षेत्र में हस्तक्षेप करने से रोक रहे हैं । हम राज्य से केवल यह कह रहे हैं कि वह सम्विधान कि दी हुई सीमाओं में ही रहे । हम राज्य से कह रहे हैं कि वह सम्विधान के नियमों का पालन करे , हम राज्य से कह रहे हैं कि सम्विधान कि मर्यादा की रक्षा करे । मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ भी अनुचित है । मुझे नहीं लगता कि यह साम्प्रदायिक है या यह हमें हिन्दू तालिबान बनाता है ।

हमारी माँग है कि भारत के गणतान्त्रिक लोकतन्त्र के संविधान की रक्षा हो और हम राज्य से कह रहे हैं कि वह अपनी सीमा में रहे । हमारे निजी क्षेत्र में अतिक्रमण न किया जाये । एक जो बात हमें सीखने की बहुत आवश्यकता है , एक समूह के तौर पर , और शायद दूसरों से सीखने की आवश्यकता है , जैसे कि ये तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले संगठन , वो बात यह है कि इन लोगों ने निरन्तर दबाव बनाने और अपना पक्ष रखने का महत्त्व समझ लिया है । आपको सड़कों पर उतरने की आवश्यकता नहीं है । आपको कोई अपराध करने की आवश्यकता नहीं है । आपको कुछ ऐसा करने की आवश्यकता नहीं है जो हिंसक हो या असंवैधानिक हो । संविधान में विश्वास रखिये और संविधान द्वारा दिए गये अपने अधिकारों का प्रयोग कीजिये । संविधान में जो भी विकल्प उपलब्ध हैं उनका सब तरह से , पूरी तरह से प्रयोग कीजिए । इसमें अनुचित क्या है ?

राजनैतिक रूप से हो सकता है यह बहुत से लोगों के लिये अहितकर हो ।  परन्तु यदि यह अनुचित नहीं है तो मुझे लगता है कि हमें यह करना चाहिए । एक प्रयास जो हम कर रहे हैं वो यह है कि जनता से इन विषयों में जानकारियाँ एकत्रित करके सबके लिये उपलब्ध करवाएँ और हमारा प्रयास है कि यह आन्दोलन पूरे देश में फैले और हम हर एक सरकार से यह प्रश्न करेंगे , मैं सार्वजनिक रूप से यह कहता हूँ कि सरकार इस प्रकार कैसे हिन्दू संस्थाओं में , उनके अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए , हस्तक्षेप कर सकती है , केवल इसलिये कि हम हिन्दू  हैं ? क्या यही हमारा दुर्भाग्य है ?

आज हमारे पास सूचना का अधिकार है , हमें संसार भर की जानकारी बड़ी सरलता से उपलब्ध है , जो पहले किसी भी पीढ़ी को नहीं थी , हो सकता है भविष्य में और अधिक सरलता हो परन्तु इतिहास में तो निश्चित रूप से नहीं थी । बहुत लोग हैं जो इस काम के लिये अपने संसाधनों का निवेश करने के लिये सज्ज हैं । बल्कि बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता भी नहीं है । हमें केवल निरन्तर प्रयास करते रहना है । कुछ लोग मिलकर यह काम कर सकते हैं । और हम आशा करते हैं कि हम इस काम को भविष्य में करेंगे । एक प्रश्न जो मुझसे बार – बार पूछा जाता है वो यह है कि ये सब तो ठीक है परन्तु यदि आप वर्तमान प्रणाली को उखाड़ फेंकेंगे तो आपके पास विकल्प क्या है ? आप क्या करेंगे ?

एक परिचित शत्रु एक अपिरिचित मित्र से बेहतर है , इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण तर्क दिए जाते हैं । मैं आपको एक सीधा उत्तर देता हूँ । किसी अनुचित बात का , किसी अवैध बात का अस्तित्व केवल इसलिये बचाकर रखना कि आपके पास कोई उचित विकल्प नहीं है , मूर्खतापूर्ण है । आप यह नहीं कह सकते कि एक महिला के साथ दुर्व्यवहार होता रहे केवल इसलिये कि उसके साथ जो विशिष्ट दुर्व्यवहार हो रहा है उसके सम्बन्ध में कोई विधिनियम नहीं है । क्या आप इस विषय में यह उत्तर स्वीकार करेंगे । जब आप इस विषय में वह तर्क स्वीकार नहीं कर सकते , तो आप उस विषय में कैसे करेंगे ? मैं एक धार्मिक व्यक्ति न होकर के एक सांस्कृतिक व्यक्ति हूँ और मेरा इस बात में विश्वास है कि संस्कृति के अनेक पक्ष धर्म से ही निकलते हैं । अतः धर्म को जीवित रखना आवश्यक है क्योंकि संस्कृति को जीवित रखना आवश्यक है ।

बौद्धिक सम्पदा के क्षेत्र में कार्य करने वाले किसी अधिवक्ता को पूछिए । बौद्धिक सम्पदा का एक पक्ष है पारंपरिक ज्ञान , पारंपरिक औषधि , पारंपरिक कृषि या जो भी हो । कुछ भी पारंपरिक कैसे बचेगा यदि परंपरा ही नहीं होगी ? मेरी समझ में नहीं आता । जो कुछ भी पारंपरिक जीवनशैली से प्राप्त है वो पृथक पृथक करके सुरक्षित नहीं किया जा सकता है । किसी वृक्ष के अंगों को जीवित रखने के लिये वृक्ष का जीवित रहना आवश्यक है ।

आप वनवासियों के अधिकारों की बात करना चाहते हैं ? आप अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की बात करना चाहते हैं ? आप उन समुदायों के अधिकारों कि बात करना चाहते हैं जो शिल्पकार हैं बुनकर हैं ? ये वे सब लोग हैं जिनकी आजीविका पारम्परिक विधियों से चलती थी । ये वे लोग हैं जिनका जीवन मन्दिर के चारों ओर ही फला फूला । मूर्तिकार आज भिक्षा मांगने पर विवश हैं क्योंकि उनकी आय का प्रमुख साधन , मन्दिर नष्ट हो रहा है । फूल बेचने वाले । आप किसी भी दक्षिण भारतीय मन्दिर को जाईये और आप अचंभित रह जायेंगे , मन्दिर के चारों ओर होने वाली आर्थिक गतिविधियों को देखकर । हम लक्ष्मी का मन्दिर के भीतर और बाहर दोनों ओर स्वागत करते हैं । लोगों का जीवन इससे चलता है । जहाँ भी लोग आयेंगे कुछ लोग इसका लाभ लेना ही चाहेंगे क्योंकि इससे उनकी आय होगी , जीवन चलेगा । इसलिये जो कोई भी पारंपरिक जीवनशैली को बचाना चाहेगा , उसको मंदिरों को भी बचाना पड़ेगा ।

और एक प्रश्न पूछा जाता है । ये कैसे सुनिश्चित करेंगे कि मन्दिर पुनः जातिवाद से ग्रस्त न हो जायें ? संविधान में इसके लिये प्रावधान है । न्यायालय के पर्याप्त आदेश इस विशेष पर हैं और ये धारणा बिल्कुल अनुचित है कि हिन्दुओं के मन्दिर केवल एक ही जाति के इर्द – गिर्द घूमते हैं । ऐसा नहीं है । दक्षिण भारत में ऐसे अनेकों मन्दिर हैं । एक जाति है जो पंडारा कहलाती है , ये शैव पिल्लई की उपजाति है , और ये शिव की आराधना करने वाली वह जाति है जो शिव कि भक्ति में ब्राह्मणों से भी बढ़कर मानी जाती है । ये लहसुन भी नहीं खाते और भोजन के आचारों को लेकर ब्राह्मणों से भी अधिक दृढ़ हैं ।

अतः स्पष्ट होना चाहिए कि ये केवल ब्राह्मणों की लड़ाई नहीं है , ये पूरे हिन्दू समाज की लड़ाई है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है । हमारे पास एक तो सूचना की कमी है और इच्छा शक्ति की कमी है । अपने आन्दोलान के अंतर्गत हम वे सारे उपकरण और योग्यता उपलब्ध करवाएँगे हर उस  व्यक्ति को जो इन सब विधिनियमों को चुनौती देगा जब और जहाँ वह मंदिरों के अधिकारों का हनन देखे । हम ऐसा करेंगे । हम देश भर में पत्रक प्रचारित करेंगे । हम बहुत से अधिवक्ताओं को इसमें जोड़ेंगे । हम यह सुनिश्चित करेंगे कि इस विषय पर निरन्तर दबाव बनाए रखने के लिये जो कुछ आवश्यक है वह किया जाए । क्योंकि यदि हमने ऐसा नहीं क्या तो बस ५ वर्षों में ही हमारी आँखों के सामने परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण अंग नष्ट हो जायेगा । जिस गति से सब कुछ बदल रहा है और मैं मानता हूँ कि आजकल ५-६ वर्ष में ही एक पीढ़ी बदल जाती है ।

जहाँ तक मेरी बात है , मैं इस लक्ष्य के लिये समर्पित हूँ और मैं यह जानता हूँ कि रमेश जी और अन्य सज्जन जिन्होंने अपना तन – मन – धन इस सबके लिये समर्पित कर दिया है , हम अपनी पूरी शक्ति से इस कार्य की सफलता के लिये प्रयास करेंगे । किसी भी तरह की सहायता कोई भी करे हम उसका स्वागत करेंगे । आर्थिक सहायता की उतनी आवश्यकता नहीं है । आवश्यकता है सूचना कि , कुछ करने योग्य सूचना की और आवश्यकता है कि लोग अपने कार्य के प्रति सजग हों , आपके पास पर्याप्त तर्क हैं , संविधान के दिए हुए अधिकार हैं कि आप न्यायलय में अपना पक्ष रख सकें । तो यदि आपसे कोई प्रश्न करता है , आप एक समूह के रूप में खड़े होईये , इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है । हम दूसरों का शोषण करके अपने पोषण की बात नहीं कर रहे हैं । हम कुछ विशेष नहीं माँग रहे हैं । हम केवल वही माँग रहे हैं जो संविधान हमें देता है ।

धन्यवाद ।

3 thoughts on “हिन्दू मन्दिरों की सरकारी नियन्त्रण से मुक्ति — साईं दीपक द्वारा एक व्याख्यान

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