अब कुछ लोग इस बात पर प्रसन्न हो सकते हैं कि मैं बाबर को अपराधमुक्त कर रहा हूँ , राम मन्दिर तोड़ने के अपराध से । परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह बिल्कुल महत्त्वपूर्ण नहीं है , जैसे औरंगज़ेब और उसकी बर्बरता पर चर्चा करना ऊर्जा व्यर्थ करना है । औरंगज़ेब का जो भी चरित्र रहा हो , आवश्यक यह है , ध्यान देने योग्य यह है कि वो एक निश्चित विचारधारा का पालन कर रहा था , उसने उसी विचारधारा को लागू किया और उस व्यक्ति विशेष के स्थान पर हमें उस विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए । एक वक्तव्य , जो कि एलेनोर रूज़वेल्ट का बताया जाता है पर शायद कम से कम सौ वर्ष और पुराना है , वो इस प्रकार है , “महान लोग विचारों पर चर्चा करते हैं , मध्यम लोग घटनाओं की चर्चा करते हैं और निम्न लोग व्यक्तियों की चर्चा करते हैं “। तो मैं औरंगज़ेब के या बाबर के निजी चरित्र की चर्चा , जोकि किसी महत्त्व की नहीं है , से बचता हूँ , परन्तु वो विचार जिनके पीछे ये लोग चले , वे बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे विचार अब भी हैं और लोग अब भी उन विचारों से प्रभावित होते हैं । हम औरंगज़ेब या बाबर के बारे में तो कुछ नहीं कर सकते , परन्तु उन विचारों से लोगों को सावधान कर सकते हैं । १९80 तक भी , उस स्थल पर क्या हुआ इस विषय को लेकर बड़ी सहमति थी । हिमवासी , यूरोपीय यात्री , यूरोपीय उपनिवेशी और हिन्दू भी यही मानते थे कि मस्जिद ने बलपूर्वक एक हिन्दू मन्दिर हटाया है । १८८० में न्यायालय में इसपर एक ब्रिटिश न्यायाधीश ने अन्तिम निर्णय दिया था , बिना किसी सन्देह के उसने कहा ” कि हाँ इस हिमवासी ने बहुत पहले ये हिन्दू मन्दिर तोड़ा , परन्तु क्योंकि ऐसा बहुत पहले हुआ था इसलिये अब बहुत देर हो चुकी है समाधान करने के लिये ” , तो उसने यथास्थिति बनी रहने दी क्योंकि उससे छेड़छाड़ करने पर पता नहीं कौनसी चीज़ से क्या जुड़ा हो और क्या से क्या हो जाये । ब्रिटिश नीति ही थी कि साम्प्रदायिक विवादों में न पड़ा जाए और उसी नीति के अनुसरण में उस न्यायाधीश ने यथास्थिति बनी रहने दी ।

और १९८० के दशक में सेक्युलरवादी भी इसी बात पर स्थिर रह सकते थे , वे बड़ी सरलता से कह सकते थे कि हाँ ४०० वर्ष पहले हिमवासियों ने अनुचित किया था , परन्तु ये कोई कारण नहीं कि अब वही आचरण दूसरी दिशा में दोहराया जाए । परन्तु वे अपनी शक्ति के घमंड में इतने चूर थे कि उन्होंने सदियों से स्थिर मान्यताओं और आपसी समझ को चुनौती देते हुए कहा कि वहाँ कभी कोई मन्दिर ही नहीं था और जब मन्दिर ही नहीं था तो तोड़ने का प्रश्न ही नहीं । तो इससे पहले तक , जैसे उस ब्रिटिश नयायाधीश के सम्मुख प्रश्न था वो ये था कि क्या हिन्दू वहाँ मन्दिर बना सकते हैं , परन्तु अब प्रश्न ये हो गया कि क्या कभी ये स्थान हिन्दुओं का था भी ।

विपरीत प्रमाणों के होने पर भी जोकि और दृढ़ हुए हैं और पहले भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे , साथ ही दूसरे पक्ष के समर्थन में कोई भी प्रमाण का नहीं होना , इन सब बातों से यही लगता है कि हिन्दुओं के लिये उस भूमि कि पवित्रता पर सन्देह करना मूर्खता है । कोई भी यही सोचेगा कि कोई तो ऎसी सत्ता होगी जो इन सेक्युलरवादी इतिहासकारों को इनके दोष दिखाएगी । जैसे कि पश्चिम में , जोकि इनके लिये प्रामाणिक है , कोई ऎसी सत्ता न थी जो हस्तक्षेप करके कहती कि नहीं तुम गलत हो वहाँ मन्दिर था ।
यद्यपि उस स्थान के इतिहास पर बहुत सी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं , जैसे पीटर वान डैर के द्वारा और हान्स बेकर के द्वारा , दोनों ने पृथक पुस्तकों में , पृथक – पृथक उस स्थल के हिन्दू इतिहास को स्थापित किया है । परंतु सहसा ही उन्होंने अपनी स्थिति बदल दी और निश्चित ही उन्होंने भारतीय सेक्युलरवादी इतिहासकारों पर पुनर्विचार करने का दबाव बनाने का कोई प्रयास नहीं किया । तो उनको रोकने वाला कोई नहीं था , वे कुछ भी कह सकते थे , वे झूठ बोलकर बच सकते थे , इसके विपरीत जिन लोगों ने अयोध्या के बारे में सच कहा उनको उसके लिये दण्डित होना पड़ा । और हिन्दुओं में उस स्थल की पवित्र मान्यता जितनी है , उसको देखते हुए , ये बहुत क्रूर और निर्दयी रूप से किया गया हिन्दुओं का अपमान है , क्योंकि किसी और सम्प्रदाय से ये प्रश्न नहीं किया जाता कि बताओ बताओ अमुक स्थल तुम्हारे लिये पवित्र क्यों है , वैटिकन तुम्हारे लिये पवित्र क्यों है ये कोई नहीं पूछता , सेक्युलर सरकार को यह पूछने का कोई अधिकार नहीं है । पहले यह कोई बहुत विवादित विषय नहीं था , परन्तु कुछ मुस्लिम नेता , अरे मैंने कह दिया , मेरा मतलब है कुछ हिमवासी नेताओं ने कुछ समस्याएँ खड़ी कीं परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं था जो कॉन्ग्रेस सरकार सम्हाल नहीं सकती थी और यहाँ ये देखने में आता है , कि राजीव गांधी , प्रधान मंत्री ने अपनी पुरानी नीति का पालन करने का विचार किया , सोचा कि हिमवासियों को उनके पक्ष की बातें करके प्रसन्न कर दो , जैसे सलमान रश्दी की पुस्तक को प्रतिबन्धित कर दो और उसी समय हिन्दुओं को उनका पवित्र स्थल दे दो , ये थोड़ा साम्प्रदायक होगा परन्तु ये भारत में तो बहुत ही सामान्य बात है जोकि कॉन्ग्रेस सफलता पूर्वक कर सकती थी । बल्कि जो पहला राजनेता इस जन्मभूमि के विषय में भागीदार हुआ वह एक बड़ा कॉन्ग्रेसी नेता , गुलजारी लाल नंदा था , जोकि लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात कार्यकारी प्रधान मंत्री भी रहा और एक उत्तर प्रदेश का स्थानीय राजनेता , दाऊ दयाल खन्ना । बात तो यहाँ तक थी कि राजीव गांधी पहला पत्थर स्थापित करेगा । परन्तु कॉन्ग्रेस ने धैर्य खो दिया जैसे ही स्थिति बदली , यानी जब सेक्युलरवादियों ने सहसा पुरानी सहमती और समझ को असत्य ठहराया , और बड़ी ही तीखी ध्वनि से ऐसा कहने लगे कि बाबरी मस्जिद तो मानो भारत में उभरते हिन्दू बर्बरों के विरुद्ध खड़ा सभ्यता का अन्तिम बाँध है ।
तो ये सब कॉन्ग्रेस के लिये भी सम्हालना कठिन था और फिर भाजपा इस सारे विषय को अपनी ओर खींचने में सफल हो गयी , १९८९ के पालमपुर प्रस्ताव से भाजपा ने इस विषय पर अपना अधिकार ज़माना आरम्भ किया और यह विषय भाजपा की पहचान बन गया । १९८९ और १९९१ के चुनाव दोनों में भाजपा को इसका लाभ मिला , चुनाव जीते । और १९९१ में भाजपा मुख्य विपक्ष बन गयी । कुछ ही वर्षों में दो से बढकर सौ सांसद हो गये । खैर , १९९९ के चुनाव के बाद , जब संसद में ५ वर्ष के लिये भाजपा की स्थिति स्थिर थी तब भाजपा ने इस विषय से पल्ला झाड़ लिया । कुछ कठिनाई के साथ भाजपा ने विश्व हिन्दू परिषद् के साथ मिलकर जन्म भूमि पर ही एक बड़ी सभा ६ दिसंबर १९९२ को आयोजित की ।
उस समय तक भारत में साम्प्रदायिक तनाव बहुत बढ़ चुका था और भाजपा उस अवसर का लाभ उठाकर सबको ये दिखाना चाहती थी कि वो जनसमूह को नियंत्रित कर सकती है और हिन्दुओं का आक्रोश जो कि सेक्युलरवादियों के लिये भयकारक था , उसको भाजपा सम्हाल सकती थी । और इस तरह आत्मविश्वास से भाजपा ने नरसिम्हाराव की सरकार को विश्वास दिलाया कि हिमवासियों की पूजास्थली को कोई हानि नहीं होगी । यद्यपि वो स्थल हिन्दुओं के नियंत्रण में था , हिन्दू वहाँ पर पूजा करते थे , परन्तु वो देखने में एक हिमवासी पूजास्थल की तरह ही था ।

और फिर एक छोटा परन्तु सुसज्ज समूह उभरकर आया जिसने कुछ ऐसे स्थल उस ढाँचे में चिन्हित किये जिनको रस्सियों से या कुदालों से विस्थापित करने से पूरा ढाँचा सरलता से भंग किया जा सकता है , जैसा इंजीनियर जानते हैं क्योंकि इतने बड़े ढाँचे को गिराने में यदि केवल बल का प्रयोग किया जाये तो कई लोग पत्थरों के नीचे दबकर मर सकते हैं । खैर , तो भीड़ एकदम से द्वार खुलते ही टूट पड़ी और ढाँचे को गिरा दिया और ईंटों को विजय के प्रतीक के रूप में अपने घर ले गए । भाजपा नेतृत्व शक्तिहीन था , केवल देखता रहा , इस पूरे आंदोलन का बीते वर्षों में नेतृत्व करने वाले आडवाणी बहुत लज्जित हुए , आँसुओं से रोने लगे । अशोक सिंघल , जो कि लम्बे समय से संगठन से जुड़े हुए थे , उन्होंने विध्वंस को रुकवाने का प्रयास किया और फिर कुछ उग्र कार्यकर्ताओं ने उनको उनकी धोती खोलने की धमकी दी तो वे छुप हो गए । संघ की पृष्ठभूमि के नेताओं के लिये ये बहुत ही पीड़ादायक था क्योंकि ये सारा घटनाक्रम संघ के अनुशासन का तिरस्कार था । संघ के नेताओं को जनसमूह अनसुना कर रहा था ।

और फिर आने वाले दिनों में , मुझे अच्छी तरह स्मरण है , संघ परिवार के विरुद्ध कार्यवाहियाँ हुई थीं । मुझे विध्वंस का ब्रुसेल्स में विमान में बैठने से ठीक पहले पता चला और निजी रूप से मुझे लगा कि ये बड़ी प्रसन्नता की बात है और मुझे लगता है कि मेरी बात सही सिद्ध हुई क्योंकि इससे सहस्रों लोगों के प्राण बच गये । इससे पिछले वर्ष में भारी साम्प्रदायिक तनाव रहा था , बहुत से दंगे हुए , विध्वंस के बाद भी कुछ दंगे हुए , परन्तु वे शीघ्र शांत हो गए । मुंबई में बम विस्फोट हुआ , अगले वर्ष मार्च में , परन्तु सब जल्दी शांत हो गया । मेरे विचार से २ -३ सहस्र लोग शायद मारे गए परन्तु हिन्दुओं ने कहा कि अब इसको रुकना होगा । तो उस विध्वंस के कारण बहुत से और जीवन बच गये । कल्पना कीजिये कि वो ढाँचा अब भी वहाँ होता तो हिमवासियों को उस स्थल पर अधिकार करने के लिये सतत उत्साहवर्धन करता , और बहुत से दंगे होते । तो मुझे लगता है कि ये बहुत अच्छा हुआ ।
और जब विमान भारत उतारा , तो सीताराम गोयल के पुत्र , प्रदीप गोयल प्रतीक्षारत थे । वहीं पर मुझे तभी आडवाणी और बहुत से मेरे परिचितों के बंदी बनाए जाने का पता चाला । विमान पर ही मुझे मेरा एक पुराना छात्र अपनी मंगेतर के साथ मिला था । वे लोग भी बहुत प्रभावित हुए थे परन्तु थोड़े नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए कि लोग जेल जा रहे हैं , पता नहीं क्या हो ।

और अगले दिन मुझे सुदर्शन ने निमंत्रित किया जो कि संघ के प्रमुख नेता थे और आगे चलकर सरसंघचालक बने । वो मुझसे बात करना चाहते थे , एक बाहरी व्यक्ति का दृष्टिकोण जानना चाहते थे , वहाँ जाना बड़ा रोमांचक था , पहले मैं एक मोटरसाईकिल पर बैठा जो एक भवन के भूमिगत कक्ष में रुकी , फिर मैं एक कार में बैठा और फिर दूसरी कार में , इस तरह हम अपने विद्रोही नेता के पास पहुँचे और हमने अयोध्या पर चर्चा की । बड़ा ही रोमांचक समय था , बहुत लोग कुछ समय के लिये कारागार गए , ऐसा नहीं था कि सरकार ने इसको गंभीरता से नहीं लिया । भाजपा की ४ राज्य सरकारें गिरा दी गयीं , यानी कॉन्ग्रेस और विशेषकर प्रधानमन्त्री नरसिम्हाराव का विजय हुआ , उन्होंने भाजपा को सबक सिखा दिया और ४ राज्यों में सरकार गिराने से साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ कड़ा व्यवहार करने की छवि भी बना ली ।

यद्यपि ये सब होने देने के लिये उनकी निंदा भी हुई । उन्होंने कुछ केंद्रीय सुरक्षा बल शीघ्र विमान से अयोध्या भेजने का आदेश दिया था , परन्तु वे कोई कार्यवाही करें इसपर बल नहीं दिया और स्थानीय पुलिस बल भी बिना कुछ किये बस देखता रहा । तो प्रश्न ये उठता है कि उनकी इस विध्वंस में कितनी भागीदारी थी । वो एक पारंपरिक ब्राह्मण थे जैसे आजकल कॉन्ग्रेस पार्टी में शायद ही मिलें , परन्तु पहले वे ही पार्टी का आधार थे और उन लोगों में दृढ़ हिन्दू भावनाएँ थीं तो मुझे लगता कि वे विध्वंस से बहुत प्रसन्न थे और यद्यपि उन्होंने दूरदर्शन पर कहा कि वो निश्चित रूप से हिमवासियों का ढाँचा फिर से बनवाएँगे , परन्तु वे इसको लेकर कभी गंभीर नहीं हुए । तो मुझे लगता है उन्होंने राजनीतिक रूप से सही बातें कहीं , परन्तु वे विध्वंस से बहुत प्रसन्न थे ।

लगभग १९५० से अयोध्या को लेकर न्यायालय में वाद चल रहा था , खींचते खींचते २००२ में जाकर अलाहाबाद उच्च न्यायलय ने विवादित स्थल के उत्खनन का आदेश दिया । ये पहला उत्खनन नहीं था , इससे पहला उत्खनन बहुत लघु था । १९७० के दशक में बृज बिहारी लाल , भारतीय पुरातत्व के अध्यक्ष , मन्दिर के आधारों को खोज चुके थे । तो हमें पहले ही पता था कि उन्हें वहाँ क्या मिलने वाला है । लेकिन इस बार बहुत विस्तृत उत्खनन हुआ और सारे सन्देह पूरी तरह निरस्त हो गए । मन्दिर के आधार वहाँ पर थे ही तो हमारे पास वहाँ मन्दिर होने का पर्याप्त प्रमाण मिल गया और अब इसका नकारना बिलकुल भी सम्भव नहीं था । तो अब ये पूरी तरह निर्विवाद है कि सेक्युलरवादी इतिहासकार पराजित हो गए । इसलिये जब उन्हें साक्षी के रूप में न्यायलय में बुलाया गया तो वे चारों खाने चित हो गए । उन्हें ऐसा स्वीकार करना पड़ा कि “मैं पुरातत्वविद नहीं हूँ , मुझे ये सब चीज़ें नहीं आतीं । मैं कभी अयोध्या गया नहीं , ये मेरा कार्यक्षेत्र नहीं है ” , इस तरह एक – एक करके सब धराशायी हो गये । मीनाक्षी जैन की पुस्तक इस पर विस्तार से पढ़ सकते हैं । परन्तु इन सेक्युलरवादी इतिहासकारों को मीडिया ने लज्जित होने से बचाया । यदि आपने न्यायालय में चली सारी गतिविधियों का अध्ययन नहीं किया तो आपको ये पता नहीं चलेगा । पश्चिम के भी सभी विद्वानों ने ऐसा व्यवहार किया कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो । यदि आपने न्यायलय की गातिविधियों का अध्ययन न किया हो और आप इतने बड़े ना रहे हों कि विध्वंस के समय उपस्थित होते तो आपको आज भी यही लगता कि ये मन्दिर नृशंस हिन्दूवादियों की गढ़ना है क्योंकि सभी विद्वान उस समय यही कहते थे । उस समय मैं बहुत अकेला था और मेरी बहुत प्रताड़ना हुई । मेरा करियर नष्ट हो गया , परन्तु अन्ततः अपनी बात सही सिद्ध होने का संतोष प्रसन्नता देता है और अब वे सब लोग अयोध्या के विषय पर मुँह फेर लेते हैं , बात ही नहीं करते ।
६० वर्ष पीछे , ३० सितम्बर २०१० को निर्णय आया , यह एक मिश्रित निर्णय था क्योंकि हिमवासियों को उस पहाड़ी में से थोड़ा अंश तो मिल गया परन्तु स्वयं वो विवादित स्थल निश्चित रूप से हिन्दुओं को मिला और न्यायालय ने भी स्वीकार किया कि वहाँ पर एक हिन्दू मंदिर था और हिन्दुओं को उस स्थल पर न्यायपूर्ण अधिकार मिलेगा । अब सेक्युलरवादी , जो हमेशा ही रक्त के प्यासे हैं , निश्चित रूप से हिन्दुओं से लड़ेंगे जब तक एक भी हिमवासी जीवित होगा और उन्होंने आशा की कि कोई हिमवासी आन्दोलन इसके विरुद्ध हो , परन्तु ऐसा हुआ नहीं क्योंकि हिमवासी सचमुच में अयोध्या में कोई रुचि नहीं लेते । दसियों लाख हिन्दू तीर्थ करने अयोध्या जाते हैं , कोई हिमवासी कभी नहीं जाता । हिमवासी मक्का जाते हैं , और यदि धन न हो तो अजमेर जाते हैं , परन्तु अयोध्या कभी नहीं जाते । हम इस विषय को यहीं छोड़कर मन्दिर बना सकते थे परन्तु तीनों ही पक्ष निर्णय से संतुष्ट नहीं थे , वे उस पूरे स्थल का शत प्रतिशत चाहते थे । इसलिये वे इस विषय को उच्चतम न्यायलय में ले गए जो कि अब अपना सर्वबाध्य निर्णय देगा । यद्यपि सुब्रह्मण्यम स्वामी शीघ्र निर्णय आए ऐसा निवेदन लेकर न्यायलय गए । उच्चतम न्यायलय ने कहा कि सभ्य समाज आपस में ही समझौते से कोई मार्ग निकाले ।

अब हम 80 और ९० के दशक की परिस्थिति पर लौटते हैं जब भारत साम्प्रदायिक दंगों से भरा पड़ा था , क्योंकि वे आपस में किसी समझौते पर नहीं पहुँच सकते , विशेषकर इसलिये क्योंकि हिन्दू स्वयं की रक्षा ठीक से नहीं कर पाते । हिन्दू समझौता करने के लिये ऎसी योजना लेकर जाते हैं कि आधा तुम्हारा और आधा हमारा , इसके विपरीत दूसरा पक्ष पूरे की माँग करता है और फिर कहता है कि चलो ठीक है , हम आधा – आधा करते हैं , तुम्हें तुम्हारे आधे का आधा मिलेगा और बाकी सब हमारा , ये शत्रु की रणनीति है । तो हिन्दू स्वयं को बचाने में सक्षम नहीं है । सौभाग्य से अभी न्याय व्यवस्था है और ये न्यायालय के पक्ष पर पूरी तरह से अपने कर्तव्य से भागने वाली बात है कि वो सारे विवाद को पुनः समाज के हाथ में देदे । न्याय करना न्यायालय का काम है और सौभाग्य से ये निर्णय अन्तिम नहीं है तो अभी हम क्या होगा इसकी प्रतीक्षा में हैं ।
उच्चतम न्यायालय में भाजपा नेतृत्व के विध्वंस में योगदान को लेकर एक और वाद चल रहा है । २५ वर्ष बीत चुके हैं और मुख्य अभियुक्त आडवाणी ८९ वर्ष के हो चुके हैं । बल्कि ऐसा कहा जाता है , मुझे नहीं पता क्या सत्य है , कि भाजपा में मोदी का धड़ा इस सबको प्रोत्साहित कर रहा है जिससे आडवाणी से पीछा छुड़ाया जा सके , पता नहीं , ऐसा वे कहते हैं । तो ये सुनवाई आगे होगी , परन्तु इससे वो प्रश्न फिर खड़ा होता है कि विध्वंस के दिन क्या हुआ । मैंने कहा कि ये अधिकांश तात्कालिक विप्लव था परन्तु पूरी तरह नहीं । तो ऐसा सम्भव है कि एक व्यक्ति इस घटनाक्रम का सूत्रधार हो और उसे पहचाना जा सकता है । अब मुझे कोई समस्या नहीं है वो एक नाम पता करने में जो सभी कार्यकर्ता लेते हैं । परन्तु मैं वो नाम नहीं बताऊँगा क्योंकि ये पत्रकारों का काम है , परन्तु वे दिसम्बर १९९२ में थे कहाँ ? ये उस वर्ष का सबसे बड़ा समाचार हो सकता था , अपने सभी मीडिया प्रतिद्वन्दियों को पराजित करने का साधन हो सकता था , एक शीर्षक देते , एक चित्र , और लिखते कि ये चेहरा विध्वंस का सूत्रधार है । ये सचमुच में बड़ा ही रोमांचकारी समाचार होता । अब ऐसा हुआ नहीं क्योंकि सभी समाचार पत्रों के संपादकों ने अपना दायित्व छोड़कर केवल अपनी राजनीतिक इच्छाओं को पूरा किया और आडवाणी तथा भाजपा पर सारे तीर चलाए । इसलिये २५ वर्ष बाद भी हम नहीं जानते कि वास्तविक सूत्रधार कौन है ।
यदि मैं आडवाणी होता तो मैं अपनी पूरी शक्ति लगा देता कि ये व्यक्ति आगे आ जाए । अब निजी रूप से मैं आडवाणी को या और कोई विचार जो इस विवाद में किया जा सके , बचाना नहीं चाहता । परन्तु मैं सत्य में विश्वास करता हूँ , एक फ्रेंच कहावत है जिसका मतलब है कि सच बोलना लाभकारी है । तो इस विषय में भी , आडवाणी को अपराधी बताना असत्य है , आज ही मेरी प्रफुल्ल गोराड़िया से बात हुई , भाजपा के पूर्व सांसद जो पूरे दिन उस घट्न स्थल पर उपस्थित थे और उन्होंने इस बात की पुष्टि की , ये बात अरुण शौरी ने भी मुझे बताई कि आडवाणी तत्काल रोने लगे थे । वो लज्जित थे और उनको पता नहीं था कि करें क्या और अगले दिन उन्होंने पत्रकारों को भाषण दिया , वो भाषण अरुण शौरी ने लिखा था , अन्तिम घड़ी पर , क्योंकि आडवाणी की स्वयं सोचकर बोलने की स्थिति नहीं थी । तो आडवाणी तो सूत्रधार नहीं थे , उन्हें छोड़ देना चाहिए , उनके छूटने की संभावना कहीं अधिक है यदि वास्तविक सूत्रधार सामने आ जाए । पता नहीं भारत में कैसा है परन्तु मेरे विचार से अच्छा ही होगा यदि सूत्रधार स्वयं सामने आकर भेद खोल दे । और फिर उस स्थल को लेकर क्या होना चाहिये , ये भविष्यवाणी नहीं है , ये परामर्श है , “मन्दिर वहीं बनाएँगे ” । हमें बिल्कुल वहीं मन्दिर बनाना चाहिये , हिन्दुओं को अपनी पवित्र भूमि पर , अपनी पूजास्थली मिले इससे बढ़कर न्यायपूर्ण और स्वाभाविक बात दूसरी हो नहीं सकती । यदि हिमवासी भी वहाँ तीर्थ पर जायेंगे तो शायद कलह हो और यदि परमात्मा की श्रद्धा हो तो शायद दोनों पक्ष समाधान कर सकें । परन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है । ये पूरी तरह हिन्दुओं की भूमि है । इसलिये मेरा प्रस्ताव है कि हम शान्ति स्थापित करें और इस बिना सिर – पैर के विवाद को समाप्त करते हुए हिन्दुओं का स्थल हिन्दुओं को ही दे दें ।
धन्यवाद ।

भाग १