सभापति महोदय , देवियों और सज्जनों , मैं धन्यवाद करता हूँ आपका जो अपने इतने समय तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की । पता नहीं शत्रुओं ने यदि कोई मुझे मारने के लिये भेजा है तो मैं उसका भी स्वागत करता हूँ । अब हम अयोध्या के बारे में बात करेंगे और उससे जुड़े सभी पक्षों की , और एक सरल से समाधान की । जो पुराना पक्ष है उसपर काफी लम्बी चर्चा की आवश्यकता है और जो सरल समाधान है वह काफी सरल है ।
पहला प्रश्न यह है कि क्या राम का जन्म अयोध्या में हुआ था ? क्या राम अयोध्या में रहे थे ? और अगर हम और सूक्ष्म करें तो क्या उसी स्थान पर राम का जन्म हुआ था , यदि हम ये जान लें कि राम वहीं पर या अयोध्या में कहीं जन्मे थे तो भी बात विशेष हो जाती है । दूसरी बात , क्या उस स्थान पर हिन्दुओं ने राम की स्मृति में या राम के जन्म की स्मृति में कोई मन्दिर बनाया था , क्या वे तीर्थ पर वहाँ जाते थे , और अगर ये सब बातें पहले थीं तो आज कैसे लुप्त हो गयीं ।

तीसरा प्रश्न यह है कि अब क्या करना चाहिए । तो क्या यह राम की जन्मभूमि थी ? मुझे लगता है कि राम के जन्म के समय हम में से कोई भी वहाँ था नहीं तो हमें क्या पता । अपितु ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में किसी महत्त्वपूर्ण घटना के लिये जो साक्ष्य स्वीकार किया जाये , जैसे कोई युद्ध , वो किसी के जन्म के विषय में मिलना कठिन है , हर समय ही शिशुओं का जन्म होता रहता है और शायद ही कभी किसी के जन्म से जुड़ी ऐतिहासिक प्रमाण माने जाने योग्य कोई घटना सुनने को मिले ।
इस बारे में हमें निश्चिन्त रहना चाहिए कि कभी कोई ऐसा विश्वसनीय प्रमाण या प्रमाण की ओर संकेत मिलेगा जिससे लगे कि राम के जन्म का कोई विश्वसनीय साक्ष्य या किसी ग्रन्थ में उल्लेख मिलेगा । अयोध्या सूर्यवंश की राजधानी थी , उसी वंश में राम का जन्म हुआ , और वो स्थान (जन्मभूमि) स्वयं ही गौरव का स्थान है , सम्मान का सूचक है , क्योंकि वो पहाड़ी के ऊपर है , लेकिन तब भी इससे एक दृढ़ संभावना ही प्रस्तुत होती है और आपको मानना पड़ेगा कि उनका जन्म वहाँ पर हुआ था । हाँ तो इस प्रकार सेक्युलरवादियों की एक बात सही सिद्ध हुई कि हमारे पार कोई प्रमाण नहीं है कि राम का जन्म वहीं हुआ था । हम नहीं जानते , हिन्दू नहीं जानते , विश्व हिन्दू परिषद् नहीं जानता कि राम का जन्म वहीं हुआ था इसके लिये कोई प्रमाण है या नहीं । ऐसा केवल विश्वास है । परन्तु भारत का सेक्युलर राज्य ग्रन्थों के किए हुए दावे को स्वीकार करता है , कम से कम ऐसा संकेत देता है । जैसे चेन्नई के पास संत थॉमस के बलिदान के स्मारक के तौर पर बनाया गया गिरिजाघर । बड़ी सरलता से प्रमाणित हो जाता है कि ये मनगढ़ंत कल्पना है । संत थॉमस की मृत्यु ही वहां पर नहीं हुई , तब दुष्ट ब्राह्मणों द्वारा उसकी हत्या की बात कितनी सत्य हो सकती है , परन्तु ईसाई ऐसा कहते हैं , और राज्य उस गिरिजाघर को संरक्षण देता है , इस गिरिजाघर में बहुत से ईसाई आते हैं ।
अब जैसे मक्का में काबा की बात है । जैसे अयोध्या की कथा है वैसी ही काबा की भी है , यानि की हमारे पास ग्रन्थों का दिया प्रमाण है कि अमुक स्थान तीर्थ क्यों है । क्योंकि एक पुस्तक कहता है कि आदम एक व्यक्ति था और उसने काबा बनाया और इस लिये काबा विशेष है , इसलिये हमें वहाँ तीर्थ पर जाना चाहिये और भारत सरकार कोई प्रश्न नहीं करती , अपितु काबा की यात्रा सुलभ करती है , उसके लिये धन देती है । परन्तु कोई प्रमाण नहीं है कि आदम ने उसको बनाया था या और कोई विशेष बात होने का कोई प्रमाण नहीं है , इसलिये वर्तमान प्रचलन यह है कि श्रद्धा के अस्तित्व को मान्य किया जाता है । देखो , जब तक किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता तब तक उसका पालन किया जा सकता है । जो जैसा मानता है वो वैसा आचरण कर सकता है ।
अनेकों उत्खननों से ये सिद्ध होता है कि कम से कम १,१०० वर्षों से वहाँ पर वैष्णवों का मन्दिर है और कम से कम ३,१०० वर्षों से वहाँ पर मानवीय सभ्यता है । दूसरा बिंदु संघ परिवार , और अन्य साधू संतों के लिये , जिन्होंने इस आंदोंलन का नेतृत्व किया है , आपत्तिजनक है क्योंकि जैसा वो ग्रन्थों को समझते हैं , राम ३१०० वर्षों से भी बहुत पहले हुए थे । अब अगर आप अयोध्या में कहीं और उत्खनन करेंगे तो आपको कहीं अधिक पुरानी सभ्यता के प्रमाण मिलेंगे परन्तु उस स्थान पर सात सहस्र वर्ष पुराना होने का कोई प्रमाण नहीं है । अन्तिम बार हिन्दू साधू संतों के सम्मुख इस विषय पर चर्चा हुई थी , साधुओं ने विरोध किया और कहा राम लाला ३००० वर्षों से भी बहुत पहले हुए थे , पुरातत्वविदों ने कहा कि हम कौन होते हैं जो आपकी बात काटें , परन्तु मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ , मेरा फावड़ा ऐसा कह रहा है ।
तो यहाँ आप देखिये कि हिन्दुओं के विश्वास के लिये शायद इसमें थोड़ी निराशा हो , परन्तु इससे इतना सुनिश्चित होता है कि पुरातत्वविद् और उनका शोध निष्पक्ष है , वो किसी वैज्ञानिक खोज को छुपा नहीं रहे हैं , वो किसी राजनैतिक विचारधारा का समर्थन नहीं कर रहे हैं । तो फिर मन्दिर लुप्त कैसे हो गया ? यदि हिदुओं को इतना जुड़ाव है , वे तीर्थ पर भी वहाँ जाते हैं , तो ठीक वहीं पर मन्दिर नहीं होना चाहिए क्या ? यह मानने में तो कोई कठिनाई नहीं है कि जब भी मन्दिर जीर्ण हुआ तो हिन्दू उसका उद्धार करते या नया बनवाते । परन्तु तब भी वह वहाँ पर नहीं है , इससे यही सिद्ध होता है कि किसी ने उसको हटा दिया और ये निश्चित किया कि मन्दिर दोबारा न बने , इसके लिये सरल उपाय था वहाँ पर दूसरा कोई ढाँचा बना देना , और ये लोग हैं हिमवासी । अब पता नहीं कितनी देर तक मैं उनको हिमवासी कह पाऊँगा पर मैं सच में पूरा प्रयास करूँगा कि “मु” से आरम्भ होने वाले शब्द का प्रयोग न करूँ , आशा है मैं इसमें सफल रहूँ ।

अलाहाबाद उच्चन्यायालय के तीन में से एक न्यायाधीश ने कहा , ३० सितम्बर २०१० को दिए गये निर्णय में कि हाँ पहले वहाँ एक मन्दिर था और बाद में एक मस्जिद परन्तु दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है , यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि हिमवासियों ने मन्दिर गिराकर मस्जिद बनायी । कुछ लोग ऐसा कहते हैं तो इस मामले में मेरा ये कहना है , कि यह तो और भी अच्छी बात है , यदि हिमवासियों ने मन्दिर नहीं गिराया , तब तो उन्हें निश्चित ही कोई आपत्ति नहीं होगी यदि वो स्थल हिन्दुओं को दे दिया जाए , जो कि सच्चे अर्थ में उसके स्वामी हैं , और वे अपना मन्दिर पुनः बना लें । इसमें तो सबको संतुष्ट होना चाहिए , हिमवासियों को , हिन्दुओं को । इसकी तो हमें प्रशंसा करनी चाहिए । सारे सेक्युलरवादी सही ठहरते हैं , आशा करते हैं कि हिमवादियों ने ऐसा नहीं किया , तो फिर आज वे हिन्दुओं की उस स्थल को लेकर जो योजनाएँ हैं , उससे सहमत होंगे ।
हिमवासियों ने मन्दिर को तोड़ा इसकी पुष्टि पिछली शताब्दियों में उन्होंने स्वयं अनेकदा की है , बस पिछले ही कुछ दशकों से पहले तो कुछ सेक्युलरवादी , उनके पीछे पीछे हिमवासी , कहने लगे हैं कि न केवल मन्दिर का गिराना झूठी बात है , वहाँ कभी कोई मन्दिर था ही नहीं । पर इसके पहले हिमवासियों को कोई आपत्ति नहीं थी ये स्वीकार करने में कि हाँ हमने मन्दिर गिराया । जो हुआ उसको पूरी तरह समझने के लिये आवश्यकता है उस विचारधारा को समझा जाए जो मन्दिर गिराने के लिये प्रेरित करती है , इस विचारधारा को हिमवासियों के मूर्तिभञ्जक या बुतशिकन सिद्धांत के रूप में जाना जाता है । हिमवासियों के जिस आक्रान्ता संत को उस समय राम मन्दिर तोड़ने के लिये दोषी ठहराया जाता है , ये पहला मन्दिर नहीं रहा होगा , उस स्थल पर हिमवासियों की पूजा स्थली निर्माण कराने का आरोप भी उस संत के माथे पर है ।

रोचक बात यह है कि उस संत ने एक दैनन्दिनी रखी थी । पर उससे भी रोचक बात ये है कि उस दैनन्दिनी के कुछ पन्ने शायद चूहे खा गये तो अयोध्या का विवरण होते हुए भी अपूर्ण है , यदि ऐसा न होता तो हमारे पास उसका स्वयं का , प्रत्यक्ष देखा हुआ विवरण होता । हालाँकि हमें पता है कि उसने सारे मन्दिर तोड़े और मंदिरों के तोड़ने को लेकर उसने विस्तृत विवरण दिए हैं । वो अयोध्या का उल्लेख तो करता है पर कोई विस्तृत विवरण नहीं देता , जो कि उसकी दैनन्दिनी में उल्लिखित बाकी घटनाओं से विपरीत है , खैर जो भी हो अयोध्या के विषय में वो दैनन्दिनी किसी काम की नहीं है । सोचने वाली बात यह है कि एक भवन को हटाकर दूसरे को बनाने का यह प्रकरण जो अयोध्या में घटा यह योजनाबद्ध है , और ये योजना भारत में सहस्रों स्थानों पर दोहरायी गई है , न केवल भारत बल्कि अन्य देशों में भी । ऐसा नहीं है कि इसमें हिन्दुओं का कोई दोष है , उन लोगों को ऐसा करने के लिये हिन्दुओं की कोई आवश्यकता नहीं थी , ये तो बुतशिकस्ती या मूर्तिभञ्जन का उनका सिद्धांत ही है ।
ऐसे अनेक पूजा के स्थल हैं जो तोड़े गए हैं जैसे हाल ही में स्पेन में “मेजकीता” को लेकर कुछ विवाद हुआ है जो कि वस्तुतः किसी देवी के लिये बनाया गया रोमन मन्दिर है परन्तु बाद में ईसाइयों ने रोमन मन्दिर को गिराकर गिरिजाघर बना दिया । फिर हिमवासियों ने गिरिजाघर को तोड़ा और बहुत ही भव्य स्थल बनाया अपनी पूजा के लिये जिसको आज मेजकीता कहते हैं । बहुत से बड़े ही सुन्दर सुन्दर स्तम्भ हैं । परन्तु स्पेन के लोगों ने पुनः ये भूमि प्राप्त करके इसको पुनः एक गिरिजाघर बना दिया । ये आज भी गिरिजाघर है , परन्तु स्पेन में वामपंथी लोग इस स्थल को हिमवासियों को लौटाने के लिये आन्दोलन कर रहे हैं , बिना इस बात पर विचार किए कि हिमवासियों ने ही पहले ये स्थल चुराया था । मूर्तिभञ्जन के सिद्धांत को सही ठहराने के लिये जो उदाहरण दिया जाता है वो है काबा का , जहाँ हिमवासियों के सम्प्रदाय के संस्थापक ने स्वयं अपने हाथों से सारी मूर्तियाँ तोड़ दीं और उस स्थल को मस्जिद बना दिया । हाँ मुझे पता है आजकल एक वाद चल रहा है जिसके अनुसार सारा दोष हिन्दुओं का है क्योंकि हिन्दुओं को आदत है मन्दिर तोड़ने की और इसलिये जब हिमावासी यहाँ पर आए तो उन्होंने हिन्दुओं की ये आदत अपना ली ।
अब एक व्यक्ति हैं रिचर्ड ईटन नाम के , अमरीकन हैं , अपने आप को एक साम्यवादी बुद्धिजीवी बताते हैं और कहते हैं , हिन्दुओं ने एक बहुत बड़े स्तर पर मन्दिर तोड़े , यह उनकी प्रवृत्ति थी , परन्तु बहुत प्रयास करने पर भी उन्हें कुछ ही उदाहरण मिलते हैं जिनमें भी हिन्दुओं ने मन्दिर तोड़े नहीं अपितु मूर्तियों को प्राप्त करने के लिये युद्ध किये , कहीं कहीं कोई कोई प्रतिमा बड़ी ही अनमोल होती थी , कला के रूप में या अन्य किसी रूप में , इसलिये उसको प्राप्त करने के लिये राजाओं ने युद्ध किये , और बुरे से बुरा भी ये होता था कि जिस राजा ने आक्रमण किया उसने वो प्रतिमा अपने मन्दिर में स्थापित कर ली और वो मन्दिर जिसमें वह प्रतिमा पहले थी , बिना कोई हानि पहुँचाये जैसे का तैसा छोड़ दिया जाता था , विजित राजा उस मन्दिर में नयी प्रतिमा लगाकर पुनः वही पूजन प्रारंभ कर सकता था ।
तो ये हिमवासियों के मूर्तिभञ्जन से बिलकुल भिन्न था , जिसका उद्देश्य पराजित की संस्कृति को अपमानित करके अन्ततः नष्ट करना था और इस तरह उसके पूजा स्थलों को नष्ट करना इस उद्देश्य से तो बिलकुल नहीं था कि उन प्रतिमाओं को लाकर अपने स्थान पर पूजन करें , कम से कम मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना कि हिमावासी सोमनाथ का मन्दिर तोड़कर वहाँ से शिवलिङ्ग को अपने किसी पूजा स्थल पर ले गए और वहाँ पर शिव का पूजन आरम्भ किया । मुझे नहीं पता शायद आपको ढूँढने से कोई ऐसा विचित्र पूजन स्थल मिल जाये , हिमवासियों का , जहाँ वे एक मूर्ति की पूजा करते हों । पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा हो सकता है । भारत में बुतशिकस्ती या मूर्तिभञ्जन के इतिहास को छिपाया गया है याने कि लगभग पूरी तरह से ढँक किया है । जब अयोध्या का विवाद अपने चरम पर था तो बहुत सारे सेक्युलरवादी मूर्तिभञ्जन के सिद्धांत को ही सिरे से नकार देते थे , ऐसा करने का दुस्साहस बहुत ही कम लोग कर पायेंगे ।

तो आजकल जो कहानी कही जाती है वो यह है कि हाँ कभी इक्का दुक्का ऐसा हुआ होगा , सबसे पहले तो इसके लिये हिन्दू स्वयं दोषी हैं और वैसे भी कभी ज्यादा हुआ नहीं , हालाँकि ज़्यादा की परिभाषा तो हमें खुद देखनी चाहिये । जैसे मूर्तिभञ्जन की एक घटना को तो ईटन स्वीकार करता है , जब मोहम्मद घौरी या उसके सेनानायकों ने ११९४ में वाराणसी पर आक्रमण किया था । और फिर आपको सूक्ष्मता से देखना चाहिए । ये तो मूर्तिभञ्जन की एक घटना है । पर वो स्वयं स्वीकार करता है कि एक सहस्र मन्दिर तोड़े गये थे अकेले वाराणसी में और फिर घौरी के आंकड़ों को आधार मानते हुए भारतीय सेक्युलरवादी आज ऐसा कह दें कि लगभग अस्सी घटनाएँ मंदिरों को तोड़ने की हुई हैं पूरे सहस्र , एक सहस्र वर्षों में । तो अस्सी का अर्थ यहाँ पर अस्सी ही नहीं है क्योंकि एक का अर्थ सहस्र हो सकता है , देखिये मूर्तिभञ्जन की एक घटना याने सहस्र मंदिरों का तोड़ा जाना और तब भी ये बहुत छोटी संख्या है । गिलगिट बल्टिस्तान में जो कि बहुत कम जनघनत्व का क्षेत्र है , अस्सी मन्दिर एक ही दशक में तोड़े जा चुके हैं । तो पूरे भारत की बात करें और वो भी एक सहस्र वर्षों के लिये , ये बहुत अधिक होगा ।

आजकल ऑड्रे ट्रश्क के काम की बहुत चर्चा है , जो कि अमेरीका में प्रोफेसर है और जिसका दावा है कि औरंगज़ेब एक भला आदमी था , और उसका कहना है कि बहुत से अपराध जिनके लिये औरंगजेब का नाम लगाया जाता है वे कभी घटे ही नहीं । वो एक बड़े आन्दोलन का हिस्सा है । तीन साल पहले ज़्युरिक में एक सभा आयोजित की गयी थी , यूरोपियन एसोसियेशन ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज़ के द्वारा , इसमें एक दिन भर का सत्र था औरंगजेब के ऊपर , हिन्दी साहित्य के प्रमाणों /स्रोतों की दृष्टि से औरंगज़ेब , तो जो विशेष बात प्रत्येक वक्ता ने दोहरायी वो ये थी कि औरंगज़ेब की बहुत लोगों ने प्रशंसाएँ की थीं ।
औरंगजेब जैसे शासक के बारे में स्तुतियों से कुछ सिद्ध नहीं होता । स्टालिन की बहुत स्तुतियाँ मिल जाएँगीं , बल्कि अगर आप उसकी स्तुति न करें तो आप समस्या में पड़ सकते हैं । इन स्तुतियों में से एक गुरू गोबिंद सिंह द्वारा दिया गया एक पत्र है , प्रसिद्द जफ़रनामा , विजयपत्र जिसमें यद्यपि विजय उतना है नहीं । देखिये , गुरु गोबिंद सिंह एक ऐसे व्यक्ति से काम निकलवाने का प्रयास कर रहे हैं जो सर्व शक्तिमान है , याने कि औरंगज़ेब , जिसने उनको पराजित किया हुआ है । अब इसमें आपको बहुत बुद्धि लगाने की आवश्यकता नहीं है कि ये कोरी बकवास है । ये एकदम विपरीत बात है , उस स्थिति में गोबिंद सिंह का पक्ष बहुत दुर्बल था , उनके पास कारण थे औरंगजेब के प्रति इस प्रकार विनम्र भाषा का प्रयोग करने के , पर वे सचमुच में क्या सोचते थे ?
सामान्यतः मुझे बहुत कठिनाई होती है यह समझने में कि लोग क्या सोच रहे हैं परन्तु इस बार मैं शत प्रतिशत आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि गोबिंद सिंह जी पूरी दुनिया में सबसे अधिक नफ़रत औरंगज़ेब से ही करते थे । मुझे पक्का पता है क्योंकि औरंगज़ेब ने गोबिंद सिंह जी के पिता और चारों पुत्रों की हत्या की । मुझे नहीं लगता कि मनुष्यों के स्वभाव की मामूली समझ वाला व्यक्ति भी यहाँ कोई गलती कर सकता है और दूसरी ओर तर्क शास्त्र के प्रोफ़ेसर पूरी गंभीरता से कहते हैं कि गोबिंद सिंह जी तो औरंगज़ेब के सदाचार की स्तुति करते थे ।

परन्तु ऑड्रे ट्रश्क की एक बात तो सही है , जो औरंगज़ेब जो पर दोष लगते हैं और उसको एक पिशाच की तरह मानते हैं , वे उसका एक पक्ष नहीं जानते । यदि अपरिग्रह एक अच्छी चीज़ है तो औरंगज़ेब इस मामले में तो भला आदमी था । वो एक बड़ा ही पवित्र और धार्मिक हिमावासी था , उसने अपने पिता शाहजहाँ को एक वैभवशाली जीवन जीने के लिये धिक्कारा था , ताजमहल पर कर से जमा किये हुए पैसे व्यय करने को लेकर धिक्कारा था । परन्तु जिस उद्देश्य से उसने ये सब किया उसी उद्देश्य से उसने एक बहुत बड़े स्तर पर मूर्तियों , मंदिरों को तोड़ा , उसी उद्देश्य से उसने काफ़िरों पर पुनः जज़िया लगाया । जज़िया एक विशेष कर है जो हिमवासियों के आलावा बाकी सबको देना पड़ता है , जिससे वे जीवित रह सकें । वो साधारण जीवन जीता था क्योंकि वो अपने सम्प्रदाय में पूरी श्रद्धा रखता था और उसी श्रद्धा से उसने मंदिरों को तोड़ा , श्रद्धा और अपरिग्रह यदि अच्छी चीज़ हैं तो औरंगज़ेब एक अच्छा आदमी था , परन्तु जिस संप्रदाय में उसने श्रद्धा रखी वहाँ कुछ गड़बड़ है । राजनीतिक बंधनों के कारण लोग विवश हैं हिमवासियों के लिये अच्छी बातें कहने को । पर जब ये राजनीतिक विवशताएँ हट जाती हैं तो सेक्युलरवादी इतिहासकारों की कल्पनाओं पर सब हँसते हैं , पर वे आज भी शक्तिशाली हैं ।

अब यदि ये मन्दिर लुप्त कर दिए गये , तो सही सही हुआ क्या था ? क्या हम इस विध्वंस के बारे में कुछ जानते हैं ? मुझे नहीं लगता कि हमें विस्तार से जानकारी है । पर इतना निश्चित पता है कि राम मन्दिर को बलपूर्वक हटाकर हिमवासियों की पूजा स्थली बनाई गयी । लेकिन ये कब हुआ ? ये एक कठिन प्रश्न है । सबसे पहले सलारमसूद गज़नवी ने १०३० में अयोध्या पर अधिकार किया । वो मोहम्मद गज़नवी का भतीजा था । १०३३ में बहराईच के युद्ध में वो पराजित हुआ , ये एक दुर्लभ अवसर था जब बहुत से हिन्दू राजा संगठित हुए और उन्होंने हिमवासी आक्रान्ता को पराजित किया । हाँ लेकिन बाद में स्थिति गड़बड़ा गयी , क्योंकि उस समय हिमवासियों के अधीन था और इन हिन्दू राजाओं ने लाहौर को मुक्त कराने का प्रयास किया , परन्तु विजय होने पर किसको क्या मिलेगा इसको लेकर एकमत नहीं हो पाए । और डेढ़ सौ वर्ष पीछे लाहौर ही वो स्थल बना जहाँ से मोहम्मद घौरी ने आक्रमण करके गङ्गा की भूमि पर विजय किया ।
जो भी हो मोहम्मद गज़नवी का भतीजा और उसके काम को आगे बढ़ाने वाला होने के कारण स्वाभाविक रूप से उसने अयोध्या के मन्दिर तोड़े ही होंगे । प्रमाण नहीं मिलने पर भी इसकी संभावना बहुत ही प्रबल है । सबसे पहले उसने राम मन्दिर तोड़ा , और उसके बाद एक बड़ा मन्दिर बनाया गया । ये मन्दिर राजपूतों ने बनाया , चालुक्यों ने तो शायद नहीं बनाया होगा , गहदवाल वंश ने बनाया होगा , मन्दिर के विध्वंस की क्षतिपूर्ति करने के लिये । फिर ११९२ से मोहम्मद घौरी और उसके सेना नायकों ने गङ्गा से सिञ्चित सारी ही भूमि पर अधिकार कर लिया , जिसमें अयोध्या भी थी । उन्होंने एक तरफ से सारे मंदिरों का , बौद्धों के मठों का , बौद्धों के विश्वविद्यालयों का नाश किया , उसी समय नालंदा नष्ट हुआ । लम्बे समय तक यह सब चलता रहा , इसी समय वाराणसी के एक सहस्र मन्दिर तोड़े गये । तो ये बहुत विचित्र होगा कि इस सबके मध्य में हिन्दुओं का इतना बड़ा मन्दिर दया का पात्र बने और नष्ट न किया जाये । और कुछ समय बाद ही हिमवासियों की सत्ता दिल्ली सल्तनत के रूप में स्थिर हो गयी , अयोध्या दिल्ली सल्तनत के अधीन एक राजधानी बनी । अब वहाँ पर एक बहुत बड़ा मन्दिर होना , वहाँ के सुलतान के महल के ठीक सामने , बल्कि शायद उस महल से भी बड़ा , और ३०० वर्षों तक उस मन्दिर का टिके रहना , जब तक बाबर नहीं आ गया , मुझे इसपर विश्वास नहीं होता ।

तो जब विश्व हिन्दू परिषत्त् ऐसा कहती है कि बाबर ने राम मन्दिर तोड़ा तो शायद उन्होंने गहराई से सोचा नहीं , कि मन्दिर तोड़े क्यों गये , क्योंकि यदि आपके मूर्तिभञ्जन के सिद्धान्त को समझेंगे तो आप स्वयं जान जायेंगे कि कितना असंभव है अयोध्या के मन्दिर का इन परिस्थितियों में बचे रह जाना । तो मुझे लगता है कि ११९४ के आस पास मन्दिर तोड़ा गया होगा । इसके कुछ समय बाद के जो पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं उनको , सेक्युलरवादी इतिहासकार , कम्युनिस्ट इतिहासकार , इरफ़ान हबीब इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि वहाँ पर एक मस्जिद पहले से थी । लेकिन अगर वहाँ मस्जिद थी तो भी मुझे कोई आपत्ती नहीं क्योंकि ये मूर्तिभञ्जन के सिद्धान्त के प्रति मेरे दृष्टिकोण को पुष्ट करता है । याने कि निश्चित रूप से वे लोग मन्दिर को खड़ा नहीं रहने देते । वहाँ पर वो अपना ढाँचा ही चाहेंगे ।
अब १५२५ में क्या हुआ , दिल्ली सल्तनत बिखर गयी । बाबर अयोध्या में क्या करने आया था पता नहीं , हमारे पास कोई जानकारी नहीं है । उसके पहले के वर्षों में क्या हुआ पता नहीं । इसकी पूरी सम्भावना है कि इस अवसर का हिन्दुओं ने लाभ उठाया , हिन्दू हमेशा ही उस स्थल पर पुनः अधिकार करना चाहते थे , उन्होंने झटपट पूजा करना आरम्भ कर दिया और शायद वैसी ही स्थिति तब रही होगी जैसी १९४९ से १९९२ के दौरान थी , जब हिमवासियों का ढाँचा खड़ा हुआ था परन्तु उसका प्रयोग हिन्दुओं के द्वारा मन्दिर के रूप में किया जा रहा था । पर क्योंकि स्थानीय परंपरा है कि बाबर ने मन्दिर तोड़ा तो हो सकता है कि कोई छोटा – मोटा मन्दिर का बचा हुआ भाग उसने तोड़ा हो या वहाँ से हिन्दुओं की उपस्थिति को नष्ट किया हो , पता नहीं , संभावनाएँ हैं ।
उस ढाँचे के दरवाजों पर बाबर ने स्वयं को उसके निर्माण का श्रेय देते हुए आलेख बनवाया था । पुरातत्वविद् कहते हैं कि ये सही नहीं हो सकता क्योंकि उस ढाँचे का जो प्रकार है वो किसी सन् १३०० के ढाँचे जैसा है । यानि हिमवासियों का यह ढाँचा पहले से उपस्थित था । क्या समस्या है ? तो बाबर ने जो नष्ट किया वो वहाँ पर हिन्दुओं की उपस्थिति थी , वो ढाँचा वहाँ पर जो पहले से था उसने शायद उसमें एक नया दरवाज़ा लगवा दिया होगा , अब जो भी करवाया हो पता नहीं । यद्यपि पुरातत्व इसको नहीं मानता परन्तु फिर भी यह सम्भव है कि बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवायी हो ।
राम का मन्दिर तोड़ा गया , कम से कम दो बार और शायद तीन बार । मैं फिर से दोहराता हूँ जो पहला अज्ञात है वो सलार मसूद गज़नवी का किया विध्वंस है और अब मैं उन हिन्दुओं की प्रशंसा करूँगा जिन्होंने उसको पराजित किया , ये सुहैल देव के नेतृत्व में था , और एक राजा जो हिमावासियों की सेना से लड़ने को तत्पर हुआ वो प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान राजा भोज था , यदि मेरे हाथ में हो तो मैं तुरंत इस घटनाक्रम पर एक सुन्दर सी बॉलीवुड
फिल्म बनाने के लिये पैसा लगा दूँ । इसमें सबकुछ है , देखो , एक बड़ा ही रोचक पात्र राजा भोज का , सभी हिन्दुओं का एकत्र होना , उनको एकता का मार्ग दिखाना और फिर एक शान्ति का खलनायक , और एक सुखद अन्त जिसमें खल्नायक का पराजय होता है । अरे इस पर तो शीघ्र कार्य आरम्भ होना चाहिये , सबकुछ तो उपलब्ध है ।
दूसरा अज्ञात है घौरी के द्वारा किया गया विध्वंस । ११९२ में उसने दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया , उसके सेनानायक कुतुबुद्दीन ऐबक , बख्तियार खिल्जी आदि और भी पूर्व की ओर गए । दोनों ने वाराणसी , नालंदा और अयोध्या के बड़े मन्दिर ध्वस्त किए । इस सबका विस्तृत विवरण भी बनाया गया । मेरे विचार में ये सम्भव नहीं है कि राम मन्दिर बाबर के आने तक बचा होगा , जैसे काशी विश्वानाथ जिसका भी उतना ही ऊँचा मान है , नहीं बचा । तो राम मन्दिर कैसे बच जाएगा ये मेरी समझ में नहीं आता । तो राम मन्दिर को रहने देने के लिये हिमवासियों के पक्ष पर बड़े ही महान धैर्य की अपेक्षा करनी होगी , लेकिन फिर भी निश्चित कुछ नहीं कह सकते , दोनों बातें सम्भव हैं ।
और फिर तीसरा अज्ञात बाबर द्वारा किया गया विध्वंस है । उसने वहाँ पर क्या किया ये निश्चित नहीं पता । ये अज्ञात बातें हैं और मैं इनको ऐसे ही स्वीकार करता हूँ । हम इसको स्वीकार करके अपनी विचारधारा के अनुकूल ही प्रयोग में ले सकते हैं । ये बातें हिमवासियों के द्वारा किए गये राम मन्दिर के विध्वंस को नकारती नहीं हैं । जो पूरी तरह सिद्ध हो चुका है वो ये है कि वहाँ पर एक बड़ा हिन्दू मन्दिर था और जितने भी हिमवासियों के ग्रन्थ या स्रोत हैं , और हिन्दू परम्परा , दोनों इसके लिये हिमवासियों की मूर्तिभन्जन की प्रवृत्ति को उत्तरदायी मानते हैं ।

भाग २