सोमवार, जुलाई 23, 2018
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अयोध्या : पुराना विवाद, सीधा समाधान — कोएंराड एल्स्ट द्वारा एक व्याख्यान

सभापति महोदय , देवियों और सज्जनों , मैं धन्यवाद करता हूँ आपका जो आपने इतने समय तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा की । पता नहीं शत्रुओं ने यदि कोई मुझे मारने के लिये भेजा है तो मैं उसका भी स्वागत करता हूँ । अब हम अयोध्या के बारे में बात करेंगे और उससे जुड़े सभी पक्षों की , और एक सरल से समाधान की । जो पुराना पक्ष है उसपर काफी लम्बी चर्चा की आवश्यकता है और जो सरल समाधान है वह काफी सरल है ।

पहला प्रश्न यह है कि क्या राम का जन्म अयोध्या में हुआ था ? क्या राम अयोध्या में रहे थे ? और अगर हम और सूक्ष्म करें तो क्या उसी स्थान पर राम का जन्म हुआ था , यदि हम ये जान लें कि राम वहीं पर या अयोध्या में कहीं जन्मे थे तो भी बात विशेष हो जाती है । दूसरी बात , क्या उस स्थान पर हिन्दुओं ने राम की स्मृति में या राम के जन्म की स्मृति में कोई मन्दिर बनाया था , क्या वे तीर्थ पर वहाँ जाते थे , और अगर ये सब बातें पहले थीं तो आज कैसे लुप्त हो गयीं ।
तीसरा प्रश्न यह है कि अब क्या करना चाहिए । तो क्या यह राम की जन्मभूमि थी ? मुझे लगता है कि राम के जन्म के समय हम में से कोई भी वहाँ था नहीं तो हमें क्या पता । अपितु ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में किसी महत्त्वपूर्ण घटना के लिये जो साक्ष्य स्वीकार किया जाये , जैसे कोई युद्ध , वो किसी के जन्म के विषय में मिलना कठिन है , हर समय ही शिशुओं का जन्म होता रहता है और शायद ही कभी किसी के जन्म से जुड़ी ऐतिहासिक प्रमाण माने जाने योग्य कोई घटना सुनने को मिले ।

देखिये यहाँ राम नवमी पर राम का जन्म हुआ, यदि इस तरह की कोई कथा बनाई गई होती, तो वही अपने आप में एक चिह्न होता कि उसे भक्तों ने बनाया है, और ये इस प्रकार पर्यटकों से लाभ लेने वालों की उपयोग की बात होती जिससे कि किसी स्थान विशेष को सभी लोगों के आने के लिये आकर्षक बनाया जाता | इस बारे में हमें निश्चिन्त रहना चाहिए कि कभी कोई ऐसा विश्वसनीय प्रमाण या प्रमाण की ओर संकेत मिलेगा जिससे लगे कि राम के जन्म का कोई विश्वसनीय साक्ष्य या किसी ग्रन्थ में उल्लेख मिलेगा । अयोध्या सूर्यवंश की राजधानी थी , उसी वंश में राम का जन्म हुआ , और वो स्थान (जन्मभूमि) स्वयं ही गौरव का स्थान है , सम्मान का सूचक है , क्योंकि वो पहाड़ी के ऊपर है , लेकिन तब भी इससे एक दृढ़ संभावना ही प्रस्तुत होती है  और आपको मानना पड़ेगा कि उनका जन्म वहाँ पर हुआ था । हाँ तो इस प्रकार सेक्युलरवादियों की एक बात सही सिद्ध हुई कि हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है कि राम का जन्म वहीं हुआ था । हम नहीं जानते , हिन्दू नहीं जानते , विश्व हिन्दू परिषद् नहीं जानता कि राम का जन्म वहीं हुआ था इसके लिये कोई प्रमाण है या नहीं । ऐसा केवल विश्वास है । परन्तु भारत का सेक्युलर राज्य ग्रन्थों के किए हुए दावे को स्वीकार करता है , कम से कम ऐसा संकेत देता है । जैसे चेन्नई के पास संत थॉमस के बलिदान के स्मारक के तौर पर बनाया गया गिरिजाघर । बड़ी सरलता से प्रमाणित हो जाता है कि ये मनगढ़ंत कल्पना है । संत थॉमस की मृत्यु ही वहां पर नहीं हुई , तब दुष्ट ब्राह्मणों द्वारा उसकी हत्या की बात कितनी सत्य हो सकती है , परन्तु ईसाई ऐसा कहते हैं , और राज्य उस गिरिजाघर को संरक्षण देता है , इस गिरिजाघर में बहुत से ईसाई आते हैं ।

अब जैसे मक्का में काबा की बात है । जैसे अयोध्या की कथा है वैसी ही काबा की भी है , यानि की हमारे पास ग्रन्थों का दिया प्रमाण है कि अमुक स्थान तीर्थ क्यों है । क्योंकि एक पुस्तक कहता है कि आदम एक व्यक्ति था और उसने काबा बनाया और इस लिये काबा विशेष है , इसलिये हमें वहाँ तीर्थ पर जाना चाहिये और भारत सरकार कोई प्रश्न नहीं करती , अपितु काबा की यात्रा सुलभ करती है , उसके लिये धन देती है । परन्तु कोई प्रमाण नहीं है कि आदम ने उसको बनाया था या और कोई विशेष बात होने का कोई प्रमाण नहीं है , इसलिये वर्तमान प्रचलन यह है कि श्रद्धा के अस्तित्व को मान्य किया जाता है । देखो , जब तक किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता तब तक उसका पालन किया जा सकता है । जो जैसा मानता है वो वैसा आचरण कर सकता है ।

अनेकों उत्खननों से ये सिद्ध होता है कि कम से कम १,१०० वर्षों से वहाँ पर वैष्णवों का मन्दिर है और कम से कम ३,१०० वर्षों से वहाँ पर मानवीय सभ्यता है । दूसरा बिंदु संघ  परिवार , और अन्य साधू संतों के लिये , जिन्होंने इस आंदोंलन का नेतृत्व किया है , आपत्तिजनक है क्योंकि जैसा वो ग्रन्थों को समझते हैं , राम ३१०० वर्षों से भी बहुत पहले हुए थे । अब अगर आप अयोध्या में कहीं और उत्खनन करेंगे तो आपको कहीं अधिक पुरानी सभ्यता के प्रमाण मिलेंगे परन्तु उस स्थान पर सात सहस्र वर्ष पुराना होने का कोई प्रमाण नहीं है । अन्तिम बार हिन्दू साधू संतों के सम्मुख इस विषय पर चर्चा हुई थी , साधुओं ने विरोध किया और कहा राम लाला ३००० वर्षों से भी बहुत पहले हुए थे , पुरातत्वविदों ने कहा  कि हम कौन होते हैं जो आपकी बात काटें , परन्तु मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ , मेरा फावड़ा ऐसा कह रहा है ।

तो यहाँ आप देखिये कि हिन्दुओं के विश्वास के लिये शायद इसमें थोड़ी निराशा हो , परन्तु इससे इतना सुनिश्चित होता है कि पुरातत्वविद् और उनका शोध निष्पक्ष है , वो किसी वैज्ञानिक खोज को छुपा नहीं रहे हैं , वो किसी राजनैतिक विचारधारा का समर्थन नहीं कर रहे हैं । तो फिर मन्दिर लुप्त कैसे हो गया ? यदि हिदुओं को इतना जुड़ाव है , वे तीर्थ पर भी वहाँ जाते हैं , तो ठीक वहीं पर मन्दिर नहीं होना चाहिए क्या ? यह मानने में तो कोई कठिनाई नहीं है कि जब भी मन्दिर जीर्ण हुआ तो हिन्दू उसका उद्धार करते या नया बनवाते । परन्तु तब भी वह वहाँ पर नहीं है , इससे यही सिद्ध होता है कि किसी ने उसको हटा दिया और ये निश्चित किया कि मन्दिर दोबारा न बने , इसके लिये सरल उपाय था वहाँ पर दूसरा कोई ढाँचा बना देना , और ये लोग हैं एस्किमो । अब पता नहीं कितनी देर तक मैं उनको एस्किमो कह पाऊँगा पर मैं सच में पूरा प्रयास करूँगा कि “मु” से आरम्भ होने वाले शब्द का प्रयोग न करूँ , आशा है मैं इसमें सफल रहूँ ।

अलाहाबाद उच्चन्यायालय के तीन में से एक न्यायाधीश ने कहा , ३० सितम्बर २०१० को दिए गये निर्णय में कि हाँ पहले वहाँ एक मन्दिर था और बाद में एक मस्जिद परन्तु दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है , यह सिद्ध नहीं किया जा सकता कि एस्किमोज़ ने मन्दिर गिराकर मस्जिद बनायी । कुछ लोग ऐसा कहते हैं तो इस मामले में मेरा ये कहना है , कि यह तो और भी अच्छी बात है , यदि एस्किमोज़ ने मन्दिर नहीं गिराया , तब तो उन्हें निश्चित ही कोई आपत्ति नहीं होगी यदि वो स्थल हिन्दुओं को दे दिया जाए , जो कि सच्चे अर्थ में उसके स्वामी हैं , और वे अपना मन्दिर पुनः बना लें । इसमें तो सबको संतुष्ट होना चाहिए , एस्किमोज़ को , हिन्दुओं को । इसकी तो हमें प्रशंसा करनी चाहिए । सारे सेक्युलरवादी सही ठहरते हैं , आशा करते हैं कि हिमवादियों ने ऐसा नहीं किया , तो फिर आज वे हिन्दुओं की उस स्थल को लेकर जो योजनाएँ हैं , उससे सहमत होंगे ।

एस्किमोज़ ने मन्दिर को तोड़ा इसकी पुष्टि पिछली शताब्दियों में उन्होंने स्वयं अनेकदा की है , बस पिछले ही कुछ दशकों से पहले तो कुछ सेक्युलरवादी , उनके पीछे पीछे एस्किमो , कहने लगे हैं कि न केवल मन्दिर का गिराना झूठी बात है , वहाँ कभी कोई मन्दिर था ही नहीं । पर इसके पहले एस्किमोज़ को कोई आपत्ति नहीं थी ये स्वीकार करने में कि हाँ हमने मन्दिर गिराया । जो हुआ उसको पूरी तरह समझने के लिये आवश्यकता है उस विचारधारा को समझा जाए जो मन्दिर गिराने के लिये प्रेरित करती है , इस विचारधारा को एस्किमोज़ के मूर्तिभञ्जक या बुतशिकन सिद्धांत के रूप में जाना जाता है । एस्किमोज़ के जिस आक्रान्ता संत को उस समय राम मन्दिर तोड़ने के लिये दोषी ठहराया जाता है , ये पहला मन्दिर नहीं रहा होगा , उस स्थल पर एस्किमोज़ की पूजा स्थली निर्माण कराने का आरोप भी उस संत के माथे पर है ।

रोचक बात यह है कि उस संत ने एक दैनन्दिनी रखी थी । पर उससे भी रोचक बात ये है कि उस दैनन्दिनी के कुछ पन्ने शायद चूहे खा ग सिंह ये तो अयोध्या का विवरण होते हुए भी अपूर्ण है , यदि ऐसा न होता तो हमारे पास उसका स्वयं का , प्रत्यक्ष देखा हुआ विवरण होता । हालाँकि हमें पता है कि उसने सारे मन्दिर तोड़े और मंदिरों के तोड़ने को लेकर उसने विस्तृत विवरण दिए हैं । वो अयोध्या का उल्लेख तो करता है पर कोई विस्तृत विवरण नहीं देता , जो कि उसकी दैनन्दिनी में उल्लिखित बाकी घटनाओं से विपरीत है , खैर जो भी हो अयोध्या के विषय में वो दैनन्दिनी किसी काम की नहीं है । सोचने वाली बात यह है कि एक भवन को हटाकर दूसरे को बनाने का यह प्रकरण जो अयोध्या में घटा यह योजनाबद्ध है , और ये योजना भारत में सहस्रों स्थानों पर दोहरायी गई है , न केवल भारत बल्कि अन्य देशों में भी । ऐसा नहीं है कि इसमें हिन्दुओं का कोई दोष है , उन लोगों को ऐसा करने के लिये हिन्दुओं की कोई आवश्यकता नहीं थी , ये तो बुतशिकस्ती या मूर्तिभञ्जन का उनका सिद्धांत ही है ।

ऐसे अनेक पूजा के स्थल हैं जो तोड़े गए हैं जैसे हाल ही में स्पेन में “मेजकीता” को लेकर कुछ विवाद हुआ है जो कि वस्तुतः किसी देवी के लिये बनाया गया रोमन मन्दिर है परन्तु बाद में ईसाइयों ने रोमन मन्दिर को गिराकर गिरिजाघर बना दिया । फिर एस्किमोज़ ने गिरिजाघर को तोड़ा और बहुत ही भव्य स्थल बनाया अपनी पूजा के लिये जिसको आज मेजकीता कहते हैं । बहुत से बड़े ही सुन्दर सुन्दर स्तम्भ हैं । परन्तु स्पेन के लोगों ने पुनः ये भूमि प्राप्त करके इसको पुनः एक गिरिजाघर बना दिया । ये आज भी गिरिजाघर है , परन्तु स्पेन में वामपंथी लोग इस स्थल को एस्किमोज़ को लौटाने के लिये आन्दोलन कर रहे हैं , बिना इस बात पर विचार किए कि एस्किमोज़ ने ही पहले ये स्थल चुराया था । मूर्तिभञ्जन के सिद्धांत को सही ठहराने के लिये जो उदाहरण दिया जाता है वो है काबा का , जहाँ एस्किमोज़ के सम्प्रदाय के संस्थापक ने स्वयं अपने हाथों से सारी मूर्तियाँ तोड़ दीं और उस स्थल को मस्जिद बना दिया । हाँ मुझे पता है आजकल एक वाद चल रहा है जिसके अनुसार सारा दोष हिन्दुओं का है क्योंकि हिन्दुओं को आदत है मन्दिर तोड़ने की और इसलिये जब हिमावासी यहाँ पर आए तो उन्होंने हिन्दुओं की ये आदत अपना ली ।

अब एक व्यक्ति हैं रिचर्ड ईटन नाम के , अमरीकन हैं , अपने आप को एक साम्यवादी बुद्धिजीवी बताते हैं और कहते हैं , हिन्दुओं ने एक बहुत बड़े स्तर पर मन्दिर तोड़े , यह उनकी प्रवृत्ति थी , परन्तु बहुत प्रयास करने पर भी उन्हें कुछ ही उदाहरण मिलते हैं जिनमें भी हिन्दुओं ने मन्दिर तोड़े नहीं अपितु मूर्तियों को प्राप्त करने के लिये युद्ध किये , कहीं कहीं कोई कोई प्रतिमा बड़ी ही अनमोल होती थी , कला के रूप में या अन्य किसी रूप में , इसलिये उसको प्राप्त करने के लिये राजाओं ने युद्ध किये , और बुरे से बुरा भी ये होता था कि जिस राजा ने आक्रमण किया उसने वो प्रतिमा अपने मन्दिर में स्थापित कर ली और वो मन्दिर जिसमें वह प्रतिमा पहले थी , बिना कोई हानि पहुँचाये जैसे का तैसा छोड़ दिया जाता था , विजित राजा उस मन्दिर में नयी प्रतिमा लगाकर पुनः वही पूजन प्रारंभ कर सकता था ।

तो ये एस्किमोज़ के मूर्तिभञ्जन से बिलकुल भिन्न था , जिसका उद्देश्य पराजित की संस्कृति को अपमानित करके अन्ततः नष्ट करना था और इस तरह उसके पूजा स्थलों को नष्ट करना इस उद्देश्य से तो बिलकुल नहीं था कि उन प्रतिमाओं को लाकर अपने स्थान पर पूजन करें , कम से कम मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना कि हिमावासी सोमनाथ का मन्दिर तोड़कर वहाँ से शिवलिङ्ग को अपने किसी पूजा स्थल पर ले गए और वहाँ पर शिव का पूजन आरम्भ किया । मुझे नहीं पता शायद आपको ढूँढने से कोई ऐसा विचित्र पूजन स्थल मिल जाये , एस्किमोज़ का , जहाँ वे एक मूर्ति की पूजा करते हों । पर मुझे नहीं लगता कि ऐसा हो सकता है । भारत में बुतशिकस्ती या मूर्तिभञ्जन के इतिहास को छिपाया गया है याने कि लगभग पूरी तरह से ढँक किया है । जब अयोध्या का विवाद अपने चरम पर था तो बहुत सारे सेक्युलरवादी मूर्तिभञ्जन के सिद्धांत को ही सिरे से नकार देते थे , ऐसा करने का दुस्साहस बहुत ही कम लोग कर पायेंगे ।
तो आजकल जो कहानी कही जाती है वो यह है कि हाँ कभी इक्का दुक्का ऐसा हुआ होगा , सबसे पहले तो इसके लिये हिन्दू स्वयं दोषी हैं और वैसे भी कभी ज्यादा हुआ नहीं , हालाँकि ज़्यादा की परिभाषा तो हमें खुद देखनी चाहिये ।  जैसे मूर्तिभञ्जन की एक घटना को तो ईटन  स्वीकार करता है , जब मोहम्मद घौरी या उसके सेनानायकों ने ११९४ में वाराणसी पर आक्रमण किया था । और फिर आपको सूक्ष्मता से देखना चाहिए । ये तो मूर्तिभञ्जन की एक घटना है । पर वो स्वयं स्वीकार करता है कि एक सहस्र मन्दिर तोड़े गये थे अकेले वाराणसी में और फिर घौरी के आंकड़ों को आधार मानते हुए भारतीय सेक्युलरवादी आज ऐसा कह दें कि लगभग अस्सी घटनाएँ मंदिरों को तोड़ने की हुई हैं पूरे सहस्र , एक सहस्र वर्षों में । तो अस्सी का अर्थ यहाँ पर अस्सी ही नहीं है क्योंकि एक का अर्थ सहस्र हो सकता है , देखिये मूर्तिभञ्जन की एक घटना याने सहस्र मंदिरों का तोड़ा जाना और तब भी ये बहुत छोटी संख्या है । गिलगिट बल्टिस्तान में जो कि बहुत कम जनघनत्व का क्षेत्र है , अस्सी मन्दिर एक ही दशक में तोड़े जा चुके हैं । तो पूरे भारत की बात करें और वो भी एक सहस्र वर्षों के लिये , ये बहुत अधिक होगा ।

आजकल ऑड्रे ट्रश्क के काम की बहुत चर्चा है , जो कि अमेरीका में प्रोफेसर है और जिसका दावा है कि औरंगज़ेब एक भला आदमी था , और उसका कहना है कि बहुत से अपराध जिनके लिये औरंगजेब का नाम लगाया जाता है वे कभी घटे ही नहीं । वो एक बड़े आन्दोलन का हिस्सा है । तीन साल पहले ज़्युरिक में एक सभा आयोजित की गयी थी , यूरोपियन एसोसियेशन ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज़ के द्वारा , इसमें एक दिन भर का सत्र था औरंगजेब के ऊपर , हिन्दी साहित्य के प्रमाणों /स्रोतों की दृष्टि से औरंगज़ेब , तो जो विशेष बात प्रत्येक वक्ता ने दोहरायी वो ये थी कि औरंगज़ेब की बहुत लोगों ने प्रशंसाएँ की थीं ।

औरंगजेब जैसे शासक के बारे में स्तुतियों से कुछ सिद्ध नहीं होता । स्टालिन की बहुत स्तुतियाँ मिल जाएँगीं , बल्कि अगर आप उसकी स्तुति न करें तो आप समस्या में पड़ सकते हैं । इन स्तुतियों में से एक गुरू गोबिंद सिंह द्वारा दिया गया एक पत्र है , प्रसिद्द जफ़रनामा , विजयपत्र जिसमें यद्यपि विजय उतना है नहीं । देखिये , गुरु गोबिंद सिंह एक ऐसे व्यक्ति से काम निकलवाने का प्रयास कर रहे हैं जो सर्व शक्तिमान है , याने कि औरंगज़ेब , जिसने उनको पराजित किया हुआ है । अब इसमें आपको बहुत बुद्धि लगाने की आवश्यकता नहीं है कि ये कोरी बकवास है । ये एकदम विपरीत बात है , उस स्थिति में गोबिंद सिंह का पक्ष बहुत दुर्बल था , उनके पास कारण थे औरंगजेब के प्रति इस प्रकार विनम्र भाषा का प्रयोग करने के , पर वे सचमुच में क्या सोचते थे ?

सामान्यतः मुझे बहुत कठिनाई होती है यह समझने में कि लोग क्या सोच रहे हैं परन्तु इस बार मैं शत प्रतिशत आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि गोबिंद सिंह जी पूरी दुनिया में सबसे अधिक नफ़रत औरंगज़ेब से ही करते थे । मुझे पक्का पता है क्योंकि औरंगज़ेब ने गोबिंद सिंह जी के पिता और चारों पुत्रों की हत्या की । मुझे नहीं लगता कि मनुष्यों के स्वभाव की मामूली समझ वाला व्यक्ति भी यहाँ कोई गलती कर सकता है और दूसरी ओर तर्क शास्त्र के प्रोफ़ेसर पूरी गंभीरता से कहते हैं कि गोबिंद सिंह जी तो औरंगज़ेब के सदाचार की स्तुति करते थे ।

परन्तु ऑड्रे ट्रश्क की एक बात तो सही है , जो औरंगज़ेब जो पर दोष लगते हैं और उसको एक पिशाच की तरह मानते हैं , वे उसका एक पक्ष नहीं जानते । यदि अपरिग्रह एक अच्छी चीज़ है तो औरंगज़ेब इस मामले में तो भला आदमी था । वो एक बड़ा ही पवित्र और धार्मिक हिमावासी था , उसने अपने पिता शाहजहाँ को एक वैभवशाली जीवन जीने के लिये धिक्कारा था , ताजमहल पर कर से जमा किये हुए पैसे व्यय करने को लेकर धिक्कारा था । परन्तु जिस उद्देश्य से उसने ये सब किया उसी उद्देश्य से उसने एक बहुत बड़े स्तर पर मूर्तियों , मंदिरों को तोड़ा , उसी उद्देश्य से उसने काफ़िरों पर पुनः जज़िया लगाया । जज़िया एक विशेष कर है जो एस्किमोज़ के आलावा बाकी सबको देना पड़ता है , जिससे वे जीवित रह सकें । वो साधारण जीवन जीता था क्योंकि वो अपने सम्प्रदाय में पूरी श्रद्धा रखता था और उसी श्रद्धा से उसने मंदिरों को तोड़ा , श्रद्धा और अपरिग्रह यदि अच्छी चीज़ हैं तो औरंगज़ेब एक अच्छा आदमी था , परन्तु जिस संप्रदाय में उसने श्रद्धा रखी वहाँ कुछ गड़बड़ है । राजनीतिक बंधनों के कारण लोग विवश हैं एस्किमोज़ के लिये अच्छी बातें कहने को । पर जब ये राजनीतिक विवशताएँ हट जाती हैं तो सेक्युलरवादी इतिहासकारों की कल्पनाओं पर सब हँसते हैं , पर वे आज भी शक्तिशाली हैं ।

अब यदि ये मन्दिर लुप्त कर दिए गये , तो सही सही हुआ क्या था ? क्या हम इस विध्वंस के बारे में कुछ जानते हैं ? मुझे नहीं लगता कि हमें विस्तार से जानकारी है । पर इतना निश्चित पता है कि राम मन्दिर को बलपूर्वक हटाकर एस्किमोज़ की पूजा स्थली बनाई गयी । लेकिन ये कब हुआ ? ये एक कठिन  प्रश्न है । सबसे पहले सलारमसूद गज़नवी ने १०३० में अयोध्या पर अधिकार किया । वो मोहम्मद गज़नवी का भतीजा था । १०३३ में बहराईच के युद्ध में वो पराजित हुआ , ये एक दुर्लभ अवसर था जब बहुत से हिन्दू राजा संगठित हुए और उन्होंने एस्किमो आक्रान्ता को पराजित किया । हाँ लेकिन बाद में स्थिति गड़बड़ा गयी , क्योंकि उस समय एस्किमोज़ के अधीन था और इन हिन्दू राजाओं ने लाहौर को मुक्त कराने का प्रयास किया , परन्तु विजय होने पर किसको क्या मिलेगा इसको लेकर एकमत नहीं हो पाए । और डेढ़ सौ वर्ष पीछे लाहौर ही वो स्थल बना जहाँ से मोहम्मद घौरी ने आक्रमण करके गङ्गा की भूमि पर विजय किया ।

जो भी हो मोहम्मद गज़नवी का भतीजा और उसके काम को आगे बढ़ाने  वाला होने के कारण स्वाभाविक रूप से उसने अयोध्या के मन्दिर तोड़े ही होंगे । प्रमाण नहीं मिलने पर भी इसकी संभावना बहुत ही प्रबल है । सबसे पहले उसने राम मन्दिर तोड़ा , और उसके बाद एक बड़ा मन्दिर बनाया गया । ये मन्दिर राजपूतों ने बनाया , चालुक्यों ने तो शायद नहीं बनाया होगा , गहदवाल वंश ने बनाया होगा , मन्दिर के विध्वंस की क्षतिपूर्ति करने के लिये । फिर ११९२ से मोहम्मद घौरी और उसके सेना नायकों ने गङ्गा से सिञ्चित सारी ही भूमि पर अधिकार कर लिया , जिसमें अयोध्या भी थी । उन्होंने एक तरफ से सारे मंदिरों का , बौद्धों के मठों का , बौद्धों के विश्वविद्यालयों का नाश किया , उसी समय नालंदा नष्ट हुआ । लम्बे समय तक यह सब चलता रहा , इसी समय वाराणसी के एक सहस्र मन्दिर तोड़े गये । तो ये बहुत विचित्र होगा कि इस सबके मध्य में हिन्दुओं का इतना बड़ा मन्दिर दया का पात्र बने और नष्ट न किया जाये । और कुछ समय बाद ही एस्किमोज़ की सत्ता दिल्ली सल्तनत के रूप में स्थिर हो गयी , अयोध्या दिल्ली सल्तनत के अधीन एक राजधानी बनी । अब वहाँ पर एक बहुत बड़ा मन्दिर होना , वहाँ के सुलतान के महल के ठीक सामने , बल्कि शायद उस महल से भी बड़ा , और ३०० वर्षों तक उस मन्दिर का टिके रहना , जब तक बाबर नहीं आ गया , मुझे इसपर विश्वास नहीं होता ।

तो जब विश्व हिन्दू परिषत्त् ऐसा कहती है कि बाबर ने राम मन्दिर तोड़ा तो शायद उन्होंने गहराई से सोचा नहीं , कि मन्दिर तोड़े क्यों गये , क्योंकि यदि आपके मूर्तिभञ्जन के सिद्धान्त को समझेंगे तो आप स्वयं जान जायेंगे कि कितना असंभव है अयोध्या के मन्दिर का इन परिस्थितियों में बचे रह जाना । तो मुझे लगता है कि ११९४ के आस पास मन्दिर तोड़ा गया होगा । इसके कुछ समय बाद के जो पुरातात्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं उनको , सेक्युलरवादी इतिहासकार  , कम्युनिस्ट इतिहासकार , इरफ़ान हबीब इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि वहाँ पर एक मस्जिद पहले से थी । लेकिन अगर वहाँ मस्जिद थी तो भी मुझे कोई आपत्ती नहीं क्योंकि ये मूर्तिभञ्जन के सिद्धान्त के प्रति मेरे दृष्टिकोण को पुष्ट करता है । याने कि निश्चित रूप से वे लोग मन्दिर को खड़ा नहीं रहने देते । वहाँ पर वो अपना ढाँचा ही चाहेंगे ।

अब १५२५ में क्या हुआ , दिल्ली सल्तनत बिखर गयी । बाबर अयोध्या में क्या करने आया था पता नहीं , हमारे पास कोई जानकारी नहीं है । उसके पहले के वर्षों में क्या हुआ पता नहीं । इसकी पूरी सम्भावना है कि इस अवसर का हिन्दुओं ने लाभ उठाया , हिन्दू हमेशा ही उस स्थल पर पुनः अधिकार करना चाहते थे , उन्होंने झटपट पूजा करना आरम्भ कर दिया और शायद वैसी ही स्थिति तब रही होगी जैसी १९४९ से १९९२ के दौरान थी , जब एस्किमोज़ का ढाँचा खड़ा हुआ था परन्तु उसका प्रयोग हिन्दुओं के द्वारा मन्दिर के रूप में किया जा रहा था । पर क्योंकि स्थानीय परंपरा है कि बाबर ने मन्दिर तोड़ा तो हो सकता है कि कोई छोटा – मोटा मन्दिर का बचा हुआ भाग उसने तोड़ा हो या वहाँ से हिन्दुओं की उपस्थिति को नष्ट किया हो , पता नहीं , संभावनाएँ हैं ।
उस ढाँचे के दरवाजों पर बाबर ने स्वयं को उसके निर्माण का श्रेय देते हुए आलेख बनवाया था । पुरातत्वविद् कहते हैं कि ये सही नहीं हो सकता क्योंकि उस ढाँचे का जो प्रकार है वो किसी सन् १३०० के ढाँचे जैसा है । यानि एस्किमोज़ का यह ढाँचा पहले से उपस्थित था । क्या समस्या है ? तो बाबर ने जो नष्ट किया वो वहाँ पर हिन्दुओं की उपस्थिति थी , वो ढाँचा वहाँ पर जो पहले से था उसने शायद उसमें एक नया दरवाज़ा लगवा दिया होगा , अब जो भी करवाया हो पता नहीं । यद्यपि पुरातत्व इसको नहीं मानता परन्तु फिर भी यह सम्भव है कि बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवायी हो ।

राम का मन्दिर तोड़ा गया , कम से कम दो बार और शायद तीन बार । मैं फिर से दोहराता हूँ जो पहला अज्ञात है वो सलार मसूद गज़नवी का किया विध्वंस है और अब मैं उन हिन्दुओं की प्रशंसा करूँगा जिन्होंने उसको पराजित किया , ये सुहैल देव के नेतृत्व में था , और एक राजा जो हिमावासियों की  सेना से लड़ने को तत्पर हुआ वो प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान राजा भोज था , यदि मेरे हाथ में हो तो मैं तुरंत इस घटनाक्रम पर एक सुन्दर सी बॉलीवुड

फिल्म बनाने के लिये पैसा लगा दूँ । इसमें सबकुछ है , देखो , एक बड़ा ही रोचक पात्र राजा भोज का , सभी हिन्दुओं का एकत्र होना , उनको एकता का मार्ग दिखाना और फिर एक शान्ति का खलनायक , और एक सुखद अन्त जिसमें खल्नायक का पराजय होता है । अरे इस पर तो शीघ्र कार्य आरम्भ होना चाहिये , सबकुछ तो उपलब्ध है ।

दूसरा अज्ञात है घौरी के द्वारा किया गया विध्वंस । ११९२ में उसने दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान को पराजित किया , उसके सेनानायक कुतुबुद्दीन ऐबक , बख्तियार खिल्जी आदि और भी पूर्व की ओर गए । दोनों ने वाराणसी , नालंदा और अयोध्या के बड़े मन्दिर ध्वस्त किए । इस सबका विस्तृत विवरण भी बनाया गया । मेरे विचार में ये सम्भव नहीं है कि राम मन्दिर बाबर के आने तक बचा होगा , जैसे काशी विश्वानाथ जिसका भी उतना ही ऊँचा मान है , नहीं बचा । तो राम मन्दिर कैसे बच जाएगा ये मेरी समझ में नहीं आता । तो राम मन्दिर को रहने देने के लिये एस्किमोज़ के पक्ष पर बड़े ही महान धैर्य की अपेक्षा करनी होगी , लेकिन फिर भी निश्चित कुछ नहीं कह सकते , दोनों बातें सम्भव हैं ।

और फिर तीसरा अज्ञात बाबर द्वारा किया गया विध्वंस है । उसने वहाँ पर क्या किया ये निश्चित नहीं पता । ये अज्ञात बातें हैं और मैं इनको ऐसे ही स्वीकार करता हूँ । हम इसको स्वीकार करके अपनी विचारधारा के अनुकूल ही प्रयोग में ले सकते हैं । ये बातें एस्किमोज़ के द्वारा किए  गये राम मन्दिर के विध्वंस को नकारती नहीं हैं । जो पूरी तरह सिद्ध हो चुका है वो ये है कि वहाँ पर एक बड़ा हिन्दू मन्दिर था और जितने भी एस्किमोज़ के ग्रन्थ या स्रोत हैं , और हिन्दू परम्परा , दोनों इसके लिये एस्किमोज़ की मूर्तिभन्जन की प्रवृत्ति को उत्तरदायी मानते हैं ।

अब कुछ लोग इस बात पर प्रसन्न हो सकते हैं  कि मैं बाबर को अपराधमुक्त कर रहा हूँ , राम मन्दिर तोड़ने के अपराध से । खैर, मैं आशा करता हूँ बाबर इससे प्रसन्न हो, मुझे उसके आनन्द लेने में आपत्ति नहीं क्यूँकि मैं सोचता हूँ कि व्यक्तियों का निर्दोष या सदोष होना बहुत महत्त्वपूर्ण नहीं है, शायद यदि किसी न्यायाधीश को निर्णय करना हो तब उस समय के लिये वो इसे महत्त्वपूर्ण समझ सकता है । परन्तु ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह बिल्कुल महत्त्वपूर्ण नहीं है , जैसे औरंगज़ेब और उसकी बर्बरता पर चर्चा करना ऊर्जा व्यर्थ करना है । औरंगज़ेब का जो भी चरित्र रहा हो , आवश्यक यह है , ध्यान देने योग्य यह है कि वो एक निश्चित विचारधारा का पालन कर रहा था , उसने उसी विचारधारा को लागू किया और उस व्यक्ति विशेष के स्थान पर हमें  उस विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए । एक वक्तव्य , जो कि एलेनोर रूज़वेल्ट का बताया जाता है पर शायद कम से कम सौ वर्ष और पुराना है , वो इस प्रकार है , “महान लोग विचारों पर चर्चा करते हैं , मध्यम लोग घटनाओं की चर्चा करते हैं और निम्न लोग व्यक्तियों की चर्चा करते हैं “। तो मैं औरंगज़ेब के या बाबर के निजी चरित्र की चर्चा , जोकि किसी महत्त्व की नहीं है , से बचता हूँ , परन्तु वो विचार जिनके पीछे ये लोग चले , वे बहुत महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वे विचार अब भी हैं और लोग अब भी उन विचारों से प्रभावित होते हैं । हम औरंगज़ेब या बाबर के बारे में तो कुछ नहीं कर सकते , परन्तु उन विचारों से लोगों को सावधान कर सकते हैं ।

१९८० तक भी , उस स्थल पर क्या हुआ इस विषय को लेकर बड़ी सहमति थी । एस्किमो , यूरोपीय यात्री , यूरोपीय उपनिवेशी और हिन्दू भी यही मानते थे कि मस्जिद ने बलपूर्वक एक हिन्दू मन्दिर हटाया है । १८८० में न्यायालय में इसपर एक ब्रिटिश न्यायाधीश ने अन्तिम निर्णय दिया था , बिना किसी सन्देह के उसने कहा ” कि हाँ इस एस्किमो ने बहुत पहले ये हिन्दू मन्दिर तोड़ा , परन्तु क्योंकि ऐसा बहुत पहले हुआ था इसलिये अब बहुत देर हो चुकी है समाधान करने के लिये ” , तो उसने यथास्थिति बनी रहने दी क्योंकि उससे छेड़छाड़ करने पर पता नहीं कौनसी चीज़ से क्या जुड़ा हो और क्या से क्या हो जाये । ब्रिटिश नीति ही थी कि साम्प्रदायिक विवादों में न पड़ा जाए और उसी नीति के अनुसरण में उस न्यायाधीश ने यथास्थिति बनी रहने दी ।

और १९८० के दशक में सेक्युलरवादी भी इसी बात पर स्थिर रह सकते थे , वे बड़ी सरलता से कह सकते थे कि हाँ ४०० वर्ष पहले एस्किमोज़ ने अनुचित किया था , परन्तु ये कोई कारण नहीं कि अब वही आचरण दूसरी दिशा में दोहराया जाए । परन्तु वे अपनी शक्ति के घमंड में इतने चूर थे कि उन्होंने सदियों से स्थिर मान्यताओं और आपसी समझ को चुनौती देते हुए कहा कि वहाँ कभी कोई मन्दिर ही नहीं था और जब मन्दिर ही नहीं था तो तोड़ने का प्रश्न ही नहीं । तो इससे पहले तक , जैसे उस ब्रिटिश नयायाधीश के सम्मुख प्रश्न था वो ये था कि क्या हिन्दू वहाँ मन्दिर बना सकते हैं , परन्तु अब प्रश्न ये हो गया कि क्या कभी ये स्थान हिन्दुओं का था भी ।

विपरीत प्रमाणों के होने पर भी जोकि और दृढ़ हुए हैं और पहले भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे , साथ ही दूसरे पक्ष के समर्थन में कोई भी प्रमाण का नहीं होना , इन सब बातों से यही लगता है कि हिन्दुओं के लिये उस भूमि कि पवित्रता पर सन्देह करना मूर्खता है । कोई भी यही सोचेगा कि कोई तो ऎसी सत्ता होगी जो इन सेक्युलरवादी इतिहासकारों को इनके दोष दिखाएगी । जैसे कि पश्चिम में , जोकि इनके लिये प्रामाणिक है , कोई ऎसी सत्ता न थी जो हस्तक्षेप करके कहती कि नहीं तुम गलत हो वहाँ मन्दिर था ।

यद्यपि उस स्थान के इतिहास पर बहुत सी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं , जैसे पीटर वान डैर के द्वारा और हान्स बेकर के द्वारा , दोनों ने पृथक पुस्तकों में , पृथक – पृथक उस स्थल के हिन्दू इतिहास को स्थापित किया है । परंतु सहसा ही उन्होंने अपनी स्थिति बदल दी और निश्चित ही उन्होंने भारतीय सेक्युलरवादी इतिहासकारों पर पुनर्विचार करने का दबाव बनाने का कोई प्रयास नहीं किया । तो उनको रोकने वाला कोई नहीं था , वे कुछ भी कह सकते थे , वे झूठ बोलकर बच सकते थे , इसके विपरीत जिन लोगों ने अयोध्या के बारे में सच कहा उनको उसके लिये दण्डित होना पड़ा । और हिन्दुओं में उस स्थल की पवित्र मान्यता जितनी है , उसको देखते हुए , ये बहुत क्रूर और निर्दयी रूप से किया गया हिन्दुओं का अपमान है , क्योंकि किसी और सम्प्रदाय से ये प्रश्न नहीं किया जाता कि बताओ बताओ अमुक स्थल तुम्हारे लिये पवित्र क्यों है  , वैटिकन तुम्हारे लिये पवित्र क्यों है ये कोई नहीं पूछता , सेक्युलर सरकार को यह पूछने का कोई अधिकार नहीं है ।

पहले यह कोई बहुत विवादित विषय नहीं था , परन्तु कुछ मुस्लिम नेता , अरे मैंने कह दिया , मेरा मतलब है कुछ एस्किमो नेताओं ने कुछ समस्याएँ खड़ी कीं परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं था जो कॉन्ग्रेस सरकार सम्हाल नहीं सकती थी और यहाँ ये देखने में आता है , कि राजीव गांधी , प्रधान मंत्री ने अपनी पुरानी नीति का पालन करने का विचार किया , सोचा कि एस्किमोज़ को उनके पक्ष की बातें करके प्रसन्न कर दो , जैसे सलमान रश्दी की पुस्तक को प्रतिबन्धित कर दो और उसी समय हिन्दुओं को उनका पवित्र स्थल दे दो , ये थोड़ा साम्प्रदायक होगा परन्तु ये भारत में तो बहुत ही सामान्य बात है जोकि कॉन्ग्रेस सफलता पूर्वक कर सकती थी । बल्कि जो पहला राजनेता इस जन्मभूमि के विषय में भागीदार हुआ वह एक बड़ा कॉन्ग्रेसी नेता , गुलजारी लाल नंदा था , जोकि लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात कार्यकारी प्रधान मंत्री भी रहा और एक उत्तर प्रदेश का स्थानीय राजनेता , दाऊ दयाल खन्ना । बात तो यहाँ तक थी कि राजीव गांधी पहला पत्थर स्थापित करेगा । परन्तु कॉन्ग्रेस ने धैर्य खो दिया जैसे ही स्थिति बदली , यानी जब सेक्युलरवादियों ने सहसा पुरानी सहमती और समझ को असत्य ठहराया , और बड़ी ही तीखी ध्वनि से ऐसा कहने लगे कि बाबरी मस्जिद तो मानो भारत में उभरते हिन्दू बर्बरों के विरुद्ध खड़ा सभ्यता का अन्तिम बाँध है ।

तो ये सब कॉन्ग्रेस के लिये भी सम्हालना कठिन था और फिर भाजपा इस सारे विषय को अपनी ओर खींचने में सफल हो गयी , १९८९ के पालमपुर प्रस्ताव से भाजपा ने इस विषय पर अपना अधिकार ज़माना आरम्भ किया और यह विषय भाजपा की पहचान बन गया । १९८९ और १९९१ के चुनाव दोनों में भाजपा को इसका लाभ मिला , चुनाव जीते । और १९९१ में भाजपा मुख्य विपक्ष बन गयी । कुछ ही वर्षों में दो से बढकर सौ सांसद हो गये । खैर , १९९९ के चुनाव के बाद , जब संसद में ५ वर्ष के लिये भाजपा की स्थिति स्थिर थी तब भाजपा ने इस विषय से पल्ला झाड़ लिया । कुछ कठिनाई के साथ भाजपा ने विश्व हिन्दू परिषद् के साथ मिलकर जन्म भूमि पर ही एक बड़ी सभा ६ दिसंबर १९९२ को आयोजित की ।
उस समय तक भारत में साम्प्रदायिक तनाव बहुत बढ़ चुका था और भाजपा उस अवसर का लाभ उठाकर सबको ये दिखाना चाहती थी कि वो जनसमूह को नियंत्रित कर सकती है और हिन्दुओं का आक्रोश जो कि सेक्युलरवादियों के लिये भयकारक था , उसको भाजपा सम्हाल सकती थी । और इस तरह आत्मविश्वास से भाजपा ने नरसिम्हाराव की सरकार को विश्वास दिलाया कि एस्किमोज़ की पूजास्थली को कोई हानि नहीं होगी । यद्यपि वो स्थल हिन्दुओं के नियंत्रण में था , हिन्दू वहाँ पर पूजा करते थे , परन्तु वो देखने में एक एस्किमो पूजास्थल की तरह ही था ।

और फिर एक छोटा परन्तु सुसज्ज समूह उभरकर आया जिसने कुछ ऐसे स्थल उस ढाँचे में चिन्हित किये जिनको रस्सियों से या कुदालों से विस्थापित करने से पूरा ढाँचा सरलता से भंग किया जा सकता है , जैसा इंजीनियर जानते हैं क्योंकि इतने बड़े ढाँचे को गिराने में यदि केवल बल का प्रयोग किया जाये तो कई लोग पत्थरों के नीचे दबकर मर सकते हैं । खैर , तो भीड़ एकदम से द्वार खुलते ही टूट पड़ी और ढाँचे को गिरा दिया और ईंटों को विजय के प्रतीक के रूप में अपने घर ले गए । भाजपा नेतृत्व शक्तिहीन था , केवल देखता रहा , इस पूरे आंदोलन का बीते वर्षों में नेतृत्व करने वाले आडवाणी बहुत लज्जित हुए , आँसुओं से रोने लगे । अशोक सिंघल , जो कि लम्बे समय से संगठन से जुड़े हुए थे , उन्होंने विध्वंस को रुकवाने का प्रयास किया और फिर कुछ उग्र कार्यकर्ताओं ने उनको उनकी धोती खोलने की धमकी दी तो वे छुप हो गए । संघ की पृष्ठभूमि के नेताओं के लिये ये बहुत ही पीड़ादायक था क्योंकि ये सारा घटनाक्रम संघ के अनुशासन का तिरस्कार था । संघ के नेताओं को जनसमूह अनसुना कर रहा था ।

और फिर आने वाले दिनों में , मुझे अच्छी तरह स्मरण है , संघ परिवार के विरुद्ध कार्यवाहियाँ हुई थीं । मुझे विध्वंस का ब्रुसेल्स में विमान में बैठने से ठीक पहले पता चला और निजी रूप से मुझे लगा कि ये बड़ी प्रसन्नता की बात है और मुझे लगता है कि मेरी बात सही सिद्ध हुई क्योंकि इससे सहस्रों लोगों के प्राण बच गये । इससे पिछले वर्ष में भारी साम्प्रदायिक तनाव रहा था , बहुत से दंगे हुए , विध्वंस के बाद भी कुछ दंगे हुए , परन्तु वे शीघ्र शांत हो गए । मुंबई में बम विस्फोट हुआ , अगले वर्ष मार्च में , परन्तु सब जल्दी शांत हो गया । मेरे विचार से २ -३ सहस्र लोग शायद मारे गए परन्तु हिन्दुओं ने कहा कि अब इसको रुकना होगा । तो उस विध्वंस के कारण बहुत से और जीवन बच गये । कल्पना कीजिये कि वो ढाँचा अब भी वहाँ होता तो एस्किमोज़ को उस स्थल पर अधिकार करने के लिये सतत उत्साहवर्धन करता , और बहुत से दंगे होते । तो मुझे लगता है कि ये बहुत अच्छा हुआ ।

और जब विमान भारत उतारा , तो सीताराम गोयल के पुत्र , प्रदीप गोयल प्रतीक्षारत थे । वहीं पर मुझे तभी आडवाणी और बहुत से मेरे परिचितों के बंदी बनाए जाने का पता चाला । विमान पर ही मुझे मेरा एक पुराना छात्र अपनी मंगेतर के साथ मिला था । वे लोग भी बहुत प्रभावित हुए थे परन्तु थोड़े नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए कि लोग जेल जा रहे हैं , पता नहीं क्या हो ।

और अगले दिन मुझे सुदर्शन ने निमंत्रित किया जो कि संघ के प्रमुख नेता थे और आगे चलकर सरसंघचालक बने । वो मुझसे बात करना चाहते थे , एक बाहरी व्यक्ति का दृष्टिकोण जानना चाहते थे , वहाँ जाना बड़ा रोमांचक था , पहले मैं एक मोटरसाईकिल पर बैठा जो एक भवन के भूमिगत कक्ष में रुकी , फिर मैं एक कार में बैठा और फिर दूसरी कार में , इस तरह हम अपने विद्रोही नेता के पास पहुँचे और हमने अयोध्या पर चर्चा की । बड़ा ही रोमांचक समय था , बहुत लोग कुछ समय के लिये कारागार गए , ऐसा नहीं था कि सरकार ने इसको गंभीरता से नहीं लिया । भाजपा की ४ राज्य सरकारें गिरा दी गयीं , यानी कॉन्ग्रेस और विशेषकर प्रधानमन्त्री नरसिम्हाराव का विजय हुआ , उन्होंने भाजपा को सबक सिखा दिया और ४ राज्यों में सरकार गिराने से साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ कड़ा व्यवहार करने की छवि भी बना ली ।

यद्यपि ये सब होने देने के लिये उनकी निंदा भी हुई । उन्होंने कुछ केंद्रीय सुरक्षा बल शीघ्र विमान से अयोध्या भेजने का आदेश दिया था , परन्तु वे कोई कार्यवाही करें इसपर बल नहीं दिया और स्थानीय पुलिस बल भी बिना कुछ किये बस देखता रहा । तो प्रश्न ये उठता है कि उनकी इस विध्वंस में कितनी भागीदारी थी । वो एक पारंपरिक ब्राह्मण थे जैसे आजकल कॉन्ग्रेस पार्टी में शायद ही मिलें , परन्तु पहले वे ही पार्टी का आधार थे और उन लोगों में दृढ़ हिन्दू भावनाएँ थीं तो मुझे लगता कि वे विध्वंस से बहुत प्रसन्न थे और यद्यपि उन्होंने दूरदर्शन पर कहा कि वो निश्चित रूप से एस्किमोज़ का ढाँचा फिर से बनवाएँगे , परन्तु वे इसको लेकर कभी गंभीर नहीं हुए । तो मुझे लगता है उन्होंने राजनीतिक रूप से सही बातें कहीं , परन्तु वे विध्वंस से बहुत प्रसन्न थे ।

लगभग १९५० से अयोध्या को लेकर न्यायालय में वाद चल रहा था , खींचते खींचते २००२ में जाकर अलाहाबाद उच्च न्यायलय ने विवादित स्थल के उत्खनन का आदेश दिया । ये पहला उत्खनन नहीं था , इससे पहला उत्खनन बहुत लघु था । १९७० के दशक में बृज बिहारी लाल , भारतीय पुरातत्व के अध्यक्ष , मन्दिर के आधारों को खोज चुके थे । तो हमें पहले ही पता था कि उन्हें वहाँ क्या मिलने वाला है । लेकिन इस बार बहुत विस्तृत उत्खनन हुआ और सारे सन्देह पूरी तरह निरस्त हो गए । मन्दिर के आधार वहाँ पर थे ही तो हमारे पास वहाँ मन्दिर होने का पर्याप्त प्रमाण मिल गया और अब इसका नकारना बिलकुल भी सम्भव नहीं था । तो अब ये पूरी तरह निर्विवाद है कि सेक्युलरवादी इतिहासकार पराजित हो गए । इसलिये जब उन्हें साक्षी के रूप में न्यायलय में बुलाया गया तो वे चारों खाने चित हो गए । उन्हें ऐसा स्वीकार करना पड़ा कि “मैं पुरातत्वविद नहीं हूँ , मुझे ये सब चीज़ें नहीं आतीं । मैं कभी अयोध्या गया नहीं , ये मेरा कार्यक्षेत्र नहीं है ” , इस तरह एक – एक करके सब धराशायी हो गये । मीनाक्षी जैन की पुस्तक इस पर विस्तार से पढ़ सकते हैं । परन्तु इन सेक्युलरवादी इतिहासकारों को मीडिया ने लज्जित होने से बचाया । यदि आपने न्यायालय में चली सारी गतिविधियों का अध्ययन नहीं किया तो आपको ये पता नहीं चलेगा । पश्चिम के भी सभी विद्वानों ने ऐसा व्यवहार किया कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो । यदि आपने न्यायलय की गातिविधियों का अध्ययन न किया हो और आप इतने बड़े ना रहे हों कि विध्वंस के समय उपस्थित होते तो आपको आज भी यही लगता कि ये मन्दिर नृशंस हिन्दूवादियों की गढ़ना है क्योंकि सभी विद्वान उस समय यही कहते थे । उस समय मैं बहुत अकेला था और मेरी बहुत प्रताड़ना हुई । मेरा करियर नष्ट हो गया , परन्तु अन्ततः अपनी बात सही सिद्ध होने का संतोष प्रसन्नता देता है और अब वे सब लोग अयोध्या के विषय पर मुँह फेर लेते हैं , बात ही नहीं करते ।

६० वर्ष पीछे , ३० सितम्बर २०१० को निर्णय आया , यह एक मिश्रित निर्णय था क्योंकि, दो हिन्दू और एक एस्किमो याचिकाकर्त्ता में से, एस्किमो को उस पहाड़ी में से थोड़ा अंश तो मिल गया परन्तु स्वयं वो विवादित स्थल निश्चित रूप से हिन्दुओं को मिला और न्यायालय ने भी स्वीकार किया कि वहाँ पर एक हिन्दू मंदिर था और हिन्दुओं का उस स्थल पर न्यायपूर्ण अधिकार है । अब सेक्युलरवादी , जो हमेशा ही रक्त के प्यासे हैं , निश्चित रूप से हिन्दुओं से लड़ेंगे जब तक एक भी एस्किमो जीवित होगा और उन्होंने आशा की कि कोई एस्किमो आन्दोलन इसके विरुद्ध हो , परन्तु ऐसा हुआ नहीं क्योंकि एस्किमो सचमुच में अयोध्या में कोई रुचि नहीं लेते । दसियों लाख हिन्दू तीर्थ करने अयोध्या जाते हैं , कोई एस्किमो कभी नहीं जाता । एस्किमो मक्का जाते हैं , और यदि धन न हो तो अजमेर जाते हैं , परन्तु अयोध्या कभी नहीं जाते । तो अब उस स्थल पर जीवन का कोई चिह्न न था, हम इस विषय को यहीं छोड़कर मन्दिर बना सकते थे परन्तु तीनों ही पक्ष निर्णय से संतुष्ट नहीं थे , वे उस पूरे स्थल का शत प्रतिशत चाहते थे । इसलिये वे इस विषय को उच्चतम न्यायलय में ले गए जो कि अब निश्चित निर्णय देगा । यद्यपि सुब्रह्मण्यम स्वामी जो कि एक महान् वादकर्त्ता हैं, शीघ्र निर्णय आए ऐसा निवेदन लेकर न्यायलय गए और इस तरह एक अनंतिम निर्णय में कुछ निश्चित नहीं अभी तक । उच्चतम न्यायलय ने कहा कि सभ्य समाज आपस में ही समझौते से कोई मार्ग निकाले ।

अब हम 80 और ९० के दशक की परिस्थिति की ओर लौटते हैं जब भारत पूरी तरह साम्प्रदायिक दंगों से भरा पड़ा था , क्योंकि आप देखिये वे आपस में किसी समझौते पर नहीं पहुँच सकते , विशेषकर इसलिये क्योंकि हिन्दू स्वयं की रक्षा ठीक से नहीं कर पाते । हिन्दू समझौता करने के लिये ऎसी योजना लेकर जाते हैं कि सामने वाले को आधे के लिये संतुष्ट करेंगे और आधे से स्वयं को , इसके विपरीत दूसरा पक्ष पूरे की माँग करता है और फिर कहता है कि चलो ठीक है , हम आधा – आधा करते हैं , तुम्हें तुम्हारे आधे का आधा मिलेगा और बाकी सब हमारा , ये शत्रु की रणनीति है । तो हिन्दू स्वयं को बचाने में सक्षम नहीं है । सौभाग्य से अभी न्याय व्यवस्था है और हमारे पास न्यायालय हैं निर्णय करने के लिये और ये न्यायालय के पक्ष पर पूरी तरह से अपने कर्तव्य से भागने वाली बात है कि वो सारे विवाद को पुनः समाज के हाथ में देदे । न्याय करना सटीक रूप से न्यायालय का काम है और सौभाग्य से ये निर्णय अन्तिम नहीं है तो अभी हम क्या होगा इसकी प्रतीक्षा में हैं ।

उच्चतम न्यायालय में भाजपा नेतृत्व के विध्वंस में योगदान को लेकर एक और वाद चल रहा है । २५ वर्ष बीत चुके हैं और मुख्य अभियुक्त आडवाणी ८९ वर्ष के हो चुके हैं । बल्कि ऐसा कहा जाता है , मुझे नहीं पता क्या सत्य है , कि भाजपा में मोदी का धड़ा इस सबको प्रोत्साहित कर रहा है जिससे आडवाणी से पीछा छुड़ाया जा सके , पता नहीं , ऐसा वे कहते हैं । तो ये सुनवाई आगे होगी , परन्तु इससे वो प्रश्न फिर खड़ा होता है कि विध्वंस के दिन क्या हुआ । मैंने कहा कि ये अधिकांश तात्कालिक विप्लव था परन्तु पूरी तरह नहीं । तो ऐसा सम्भव है कि एक व्यक्ति इस घटनाक्रम का सूत्रधार हो और उसे पहचाना जा सकता है । अब मुझे कोई समस्या  नहीं है वो एक नाम पता करने में जो सभी कार्यकर्ता लेते हैं । परन्तु मैं वो नाम नहीं बताऊँगा क्योंकि ये पत्रकारों का  काम है , परन्तु वे दिसम्बर १९९२ में थे कहाँ ? ये उस वर्ष का सबसे बड़ा समाचार हो सकता था , अपने सभी मीडिया प्रतिद्वन्दियों को पराजित करने का साधन हो सकता था , एक शीर्षक देते , एक चित्र , और लिखते कि ये चेहरा विध्वंस का सूत्रधार है । ये सचमुच में बड़ा ही रोमांचकारी समाचार होता । अब ऐसा हुआ नहीं क्योंकि सभी समाचार पत्रों के संपादकों ने अपना दायित्व छोड़कर केवल अपनी राजनीतिक इच्छाओं को पूरा किया और आडवाणी तथा भाजपा पर सारे तीर चलाए । इसलिये २५ वर्ष बाद भी हम नहीं जानते कि वास्तविक सूत्रधार कौन है ।
यदि मैं आडवाणी होता तो मैं अपनी पूरी शक्ति लगा देता कि ये व्यक्ति आगे आ जाए । अब निजी रूप से मैं आडवाणी को या और कोई विचार जो इस विवाद में किया जा सके , बचाना नहीं चाहता । परन्तु मैं सत्य में विश्वास करता हूँ , एक फ्रेंच कहावत है जिसका मतलब है कि सच बोलना लाभकारी है । तो इस विषय में भी , आडवाणी को अपराधी बताना असत्य है , आज ही मेरी प्रफुल्ल गोराड़िया से बात हुई , भाजपा के पूर्व सांसद जो पूरे दिन उस घट्न स्थल पर उपस्थित थे और उन्होंने इस बात की पुष्टि की , ये बात अरुण शौरी ने भी मुझे बताई कि आडवाणी तत्काल रोने लगे थे । वो लज्जित थे और उनको पता नहीं था कि करें क्या और अगले दिन उन्होंने पत्रकारों को भाषण दिया , वो भाषण अरुण शौरी ने लिखा था , अन्तिम घड़ी पर , क्योंकि आडवाणी की स्वयं सोचकर बोलने की स्थिति नहीं थी । तो आडवाणी तो सूत्रधार नहीं थे , उन्हें छोड़ देना चाहिए , उनके छूटने की संभावना कहीं अधिक है यदि वास्तविक सूत्रधार सामने आ जाए । पता नहीं भारत में कैसा है परन्तु मेरे विचार से अच्छा ही होगा यदि सूत्रधार स्वयं सामने आकर भेद खोल दे । और फिर उस स्थल को लेकर क्या होना चाहिये , ये भविष्यवाणी नहीं है , ये परामर्श है , “मन्दिर वहीं बनाएँगे ” । हमें बिल्कुल वहीं मन्दिर बनाना चाहिये , हिन्दुओं को अपनी पवित्र भूमि पर , अपनी पूजास्थली मिले इससे बढ़कर न्यायपूर्ण और स्वाभाविक बात दूसरी हो नहीं सकती । यदि एस्किमो भी वहाँ तीर्थ पर जायेंगे तो शायद कलह हो और यदि परमात्मा की श्रद्धा हो तो शायद दोनों पक्ष समाधान कर सकें । परन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है । ये पूरी तरह हिन्दुओं की भूमि है । इसलिये मेरा प्रस्ताव है कि हम शान्ति स्थापित करें और इस बिना सिर – पैर के विवाद को समाप्त करते हुए हिन्दुओं का स्थल हिन्दुओं को ही दे दें ।

धन्यवाद ।

2 thoughts on “अयोध्या : पुराना विवाद, सीधा समाधान — कोएंराड एल्स्ट द्वारा एक व्याख्यान

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