और फिर वामपंथी इतिहासकारों ने एक आन्दोलन किया भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के विरुद्ध । इन लोगों ने न्यायालय में क्या कहा यह बताकर मैं अपनी चर्चा समाप्त करना चाहूँगी क्योंकि जो इन्होंने कहा वो इतना नृशंस था कि ये बड़े आश्चर्य की बात है कि आज भी कोई इनको गम्भीरता से कैसे ले सकता है । इन वामपंथी इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ताओं के मध्य ये समझौता था, ये चार बड़े लोग, याने आर एस शर्मा, डी एन झा, रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब, कि ये स्वयं न्यायालय में प्रस्तुत नहीं होंगे परन्तु अपने सहकर्मी और छात्रों को न्यायालय में वक्तव्य देने भेजेंगे, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि ये कितना निजी समूह था ।

एक व्यक्ति जिसने न्यायालय में वक्तव्य दिया वो थी सुप्रिया वर्मा, उसने अपनी पी एच डी शीरीन रत्नाकर के अधीन की थी और वो भी न्यायालय गयी । सुवीरा जायसवाल का काम आर एस शर्मा के अधीन था जो कि और एक वामपंथी इतिहासकार है । आर ठकरान सूरज भान का छात्र था । सीताराम राय आर एस शर्मा का छात्र था और एस सी मिश्रा ने अपनी पी एच डी डी एन झा के अधीन की । ये के निजी समूह था और आपको बस बताती हूँ कि कितनी हास्यास्पद घटनाएँ न्यायालय में घटीं ।

सुवीरा जायसवाल जो कि जे एन यू में प्रोफ़ेसर थी और उसने न्यायालय में कहा कि वो प्राचीन भारतीय इतिहास में निपुण है और न्यायालय में एक प्राचीन भारतीय इतिहास की विशेषज्ञ के रूप में प्रमाण देने आयी है । उसने कहा कि उसने नहीं पढ़ा कि क्या मुस्लिम शासकों ने मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनायी न उसने इस विषय पर कोई सूचना पढ़ी । उसने कहा कि वो बाबरी मस्जिद के विषय पर शपथ पूर्वक वक्तव्य दे रही थी बिना कोई शोध किये, अपने ज्ञान के आधार पर । उसने कहा, कि वो अपना वक्तव्य अपने दृष्टिकोण के आधार पर दे रही थी न कि ज्ञान के आधार पर, और उसने कहा कि उसने बाबरनामा नहीं पढ़ा है ।

उसकी जानकारी के अनुसार कोई प्रमाण नहीं मिला जो ये दिखा सके कि बाबरी मस्जिद राम मन्दिर को तोड़कर बनायी गयी थी, उसने कहा कि कोई प्रमाण नहीं मिला और वो बोली कि मैंने बाबरी मस्जिद का इतिहास नहीं पढ़ा है, जो भी ज्ञान विवादित स्थल के विषय में मुझे है वो मैंने समाचार पत्रों के आधार पर और दूसरों ने जो बताया उसके आधार पर, प्राप्त किया है , मेरा तात्पर्य ये है कि वामपंथी इतिहासकार देश को सूचना देते हैं और मैंने अपने साथियों के साथ, कृपया ये सुनिए, मैंने अपने साथियों के साथ एक पत्रक प्रकाशित किया, ‘राजनीतिक दुरुपयोग : बाबरी मस्जिद जन्मभूमि विवाद’, मैंने ये पत्रक समाचारपत्रों में छपे समाचारों के आधार पर और मध्यकालीन इतिहास के अपने विभाग के विशेषज्ञों से चर्चा करके सज्ज किया है ।

न्यायालय ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया कि इस विषय में, जितना संवेदनशील ये विषय है, जो लोग स्वयं को विशेषज्ञ बताते हैं, वे बिना सही शोध किये वक्तव्य दे रहे हैं, शोध या अध्ययन, ऐसे कृत्य एक सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने के स्थान पर और अधिक उलझा रहे हैं, विवाद और कलह को जन्म दे रहे हैं, न्यायालय ने ये कहा उसके बारे में । उसने आगे कहा कि ये बात सत्य है जैसा कि उसने अपने पुस्तक में लिखा कि ईसवीं दूसरी शताब्दी तक राम को विष्णु का अवतार माना जाने लगा था, याने विवाद खड़ा होने से पहले, उसने अपने पी एच डी शोध में कहा था कि राम को ईसवीं पहली शताब्दी तक विष्णु का वतार माना जाने लगा था और अब वामपंथी इतिहासकार कह रहे हैं कि राम की पूजा १८वीं – १९वीं शताब्दी का चलन है जो कि उसके स्वयं के शोध से विपरीत था ये बात उसको विवश होकर माननी पड़ी ।

और एक व्यक्ति है एस सी मिश्रा जो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाता है । मुझे पता है इस प्रकार लोगों के नाम लेना अच्छी बात नहीं है पर मुझे लगता है अब समय आ चुका है कि हम सब विषयों पर इतने विनम्र न बने रहें । तो उसने अपना स्नातक और स्नातकोत्तर इलाहबाद विश्वविद्यालय से किया । कला स्नातक में उसके विषय इतिहास, दर्शन, संस्कृत थे और स्नातकोत्तर में प्राचीन इतिहास । उसने कहा कि उसने बाबरी मस्जिद पर गहरा अध्ययन किया है और उसके अध्ययन के अनुसार मस्जिद मेरे बाकी ने बनायी थी और किसी प्रकार का कोई विध्वंस उसके निर्माण के लिये नहीं हुआ था । उसके अध्ययन के अनुसार, बाबरी मस्जिद के नीचे किसी मन्दिर के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं था । उसने कहा कि मैंने राम की जन्मस्थली खोज ली है और वो जन्मस्थली अयोध्या ब्रह्म कुंद और ऋषि मोचन घाट के मध्य है ।

अब उसने अपने ऐतिहासिक ज्ञान का कुछ प्रदर्शन किया । उसने कहा कि पृथ्वीराज चौहान घजनी का राजा था, उसने न्यायालय में कहा कि पृथ्वीराज चौहान घजनी का राजा था और मोहम्मद घोरी समीपस्थ क्षेत्र का राजा था और उसने कहा कि मैंने जजिया के बारे में सुना है पर अभी मैं स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ कि ये क्यूँ लगाया जाता था और मुझे नहीं लगता कि ये केवल हिन्दुओं पर लगाया जाता था, ये न्यायालय में एक अध्यापक कह रहा है जो दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ा रहा है और फिर वो कहता है कि ये कहना अनुचित है कि औरंगज़ेब ने ज्ञानवापी मस्जिद विश्वनाथ मन्दिर को आधा तोड़कर बनाई, यदि कोई वहाँ गया है तो वो आधा भाग हम देखते ही हैं ज्ञानवापी मस्जिद के पीछे मन्दिर है वहाँ, तो वो कहता है कि मैंने बाबरनामा से लेकर १९८९ तक अनेकों पुस्तक पढ़े हैं, मैंने अनेकों पुस्तक पढ़े हैं जबसे बाबरनामा लिखा गया तबसे लेकर १९८९ तक बाबरी मस्जिद के निर्माण के विषय पर, पर मुझे अभी एक भी पुस्तक का नाम स्मरण नहीं, ठीक है, ये उसने कहा, न्यायालय ने क्या कहा ?

न्यायालय ने कहा कि उसके वक्तव्यों पर विश्वास नहीं आता और इनमें निष्पक्ष और स्वतन्त्र विचारों का अभाव है, ये न्यायालय ने कहा । शीरीन मुसवी, उसने अपनी विज्ञान स्नातक और स्नातकोत्तर लखनऊ विश्वविद्यालय से की और बाद में इतिहास में स्नातकोत्तर एक दूरस्थ छात्र के रूप में ए एम् यू से की और वहीं से पी एच डी भी की । उसने कहा कि मेरे अध्ययन के समय में मुझे मध्य काल का कोई ऐसा प्रमाण या साक्ष्य नहीं मिला है जो ये सुझाए कि बाबरी मस्जिद एक मन्दिर को तोड़कर बनी है । एक शिलालेख था, बाबरी मस्जिद तीन भागों में विभक्त थी और ये वो कहती है, और न्यायालय ने कहा कि ये वक्तव्य, ये शिलालेख तीन भागों में था इतने से ही पता चलता है कि उसको बिलकुल कोई ज्ञान नहीं है विषय का और एक बात है जिससे मैं उसको लज्जित करना चाहूँगी ।

फिर हैं सुशील श्रीवास्तव, उन्होंने अपना कला स्नातक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति शास्त्र में किया, उसने अपनी पी एच डी ११ वर्ष में पूरी की ऐसे समय जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री था, आप अपने निष्कर्ष निकाल सकते हैं । तो उसने कहा कि जो शोध मैंने किया है उसके अनुसार मुझे कोई प्रमाण नहीं मिला विवादित स्थल के बारे में जो ये सुझाए कि मन्दिर तोड़कर एक मस्जिद बनायी गयी है, और, कृपया ये सुनिए, न मैं फारसी लिख या पढ़ सकता हूँ, न मैं अरबी लिख या पढ़ सकता हूँ, मुझे संस्कृत का भी ठीक ज्ञान नहीं है, ये सत्य है कि मेरे ससुर ने मेरी सहायता की पढ़ने और में और पुस्तक लिखने में और फारसी भाषा को समझने में और वो कहता है कि मैं कह नहीं सकता कि बाबरी मस्जिद पर जो शिलालेख है वो फारसी में है या अरबी में, मैंने हस्तलेख का विज्ञान नहीं पढ़ा है, मैंने उत्कीर्णन का विज्ञान भी नहीं पढ़ा है और वो कहता है कि मैंने अपने पुस्तक में उन पुस्तकों का उल्लेख किया है जो मैंने सही में पढ़ी नहीं है और आप जानते हैं कि ऐसे लोग हैं सूरज भान जैसे भी, जो कहते हैं कि मैंने संस्कृत भाषा में स्नातकोत्तर किया है, मैं संस्कृत बोल नहीं सकता क्योंकि बहुत समय से मैंने इसका प्रयोग नहीं किया है, मुझे इसको पढ़ने और समझने में कठिनाई होती है, मुझे बस इतना स्मरण है कि प्राचीन भारत और पूर्व मध्यकाल मेरे अध्ययन क्षेत्र में नहीं थे और ये लोग विशेषज्ञ बनकर गये, मैंने ये देखने का प्रयास नहीं किया कि तुलसीदास की रामायण में क्या लिखा है, मैं नहीं बता सकता कि सिंधुघाटी सभ्यता कब खोजी गयी, मैं उत्कीर्णन का और मुद्राओं का विशेषज्ञ नहीं हूँ, मैंने भूविज्ञान नहीं जानता, मैंने इतिहास का छात्र नहीं हूँ, मैंने वास्तुकला नहीं जानता, न शिल्प, उत्कीर्णन मेरा क्षेत्र नहीं है, तो आप देख सकते हैं, मैं और बोल सकती हूँ पर मुझे लगता है, एक अन्तिम और ।

मैंने आपको बस और एक उदाहरण दूँगी, डी मण्डल, ये भी बहुत सक्रिय था, ये कहता है, मैं कभी अयोध्या गया नहीं, न मुझे बाबर के शासन की विशिष्ट जानकारी है, जो भी थोड़ा बहुत ज्ञान मुझे है बाबर के बारे में वो बस यही है कि बाबर एक १६वीं सदी का शासक था, इसके अलावा मुझे बाबर के बारे में कोई ज्ञान नहीं है और फिर वो कहता है कि साम्यवादी दल एक लाल पत्र देती है और वो मेरे पास है, ये सत्य है कि मेरी धर्म में कोई आस्था नहीं है, मेरे पास कोई डिग्री या डिप्लोमा नहीं है पुरातत्त्व विज्ञान में और मैंने दूसरों को देखकर पुरातत्त्व विज्ञान में ज्ञान प्राप्त किया है ।

तो ये चलता रहता है, जो ध्यान देने योग्य बात है वो ये है कि इनमें से कोई भी निपुणता नहीं दिखाता है पर अपने पक्षपात प्रेरित दृष्टिकोण से उन्होंने ऐसे वक्तव्य दिए हैं लोगों के विरुद्ध और वे पूरे आन्दोलन का उपहास करने के लिये किसी भी सीमा तक गये केवल इसलिये कि वे बाबरी के पक्ष को विजयी होते देखना चाहते थे ।

आज जब चीजें आज खड़ी हो जाती हैं, बाकि इतिहासकार उम्मीद कर रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को खत्म कर देगा और मस्जिद के पक्ष में शासन करेगा क्योंकि अब उनकी आखिरी उम्मीद है। लेकिन यह समझना मुश्किल है कि सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय के फैसले को कैसे खत्म कर सकता है क्योंकि एक भी सबूत नहीं है कि हमें पता चल सके कि उस साइट का जारी रखा गया मुस्लिम कब्जा कौन सा है, जबकि सभी साक्ष्य जो हमने दिखाए हैं कि हिन्दू उपस्थिति जारी रखती है। ऐसा कोई सबूत नहीं है जो दिखाता है कि हिंदुओं ने किसी विशेष अवधि के लिए उस स्थल से गुम हो रहे थे।

फिर यह मुद्दा यह है कि मुसलमानों ने कभी भी मामला दर्ज नहीं किया। 1 9 4 9 में, जब मूर्तियों को अंदर रखा गया था और उन्होंने मस्जिद में मूर्तियों की नियुक्ति की 12 वीं वर्षगांठ से 5 दिन पहले मामला दाखिल किया था। यदि उन्होंने 5 दिनों के बाद मामले दायर किए, तो उनके पास कोई मामला नहीं होगा क्योंकि यह समय सीमा है; संपत्ति विवाद 12 साल के भीतर दर्ज किया जाना चाहिए। 12 साल तक उन्होंने मामले को दायर करने से 5 दिन पहले ही चुप किया और सिर्फ 5 दिनों के लिए। इसलिए, वास्तव में उस साइट पर कोई लगाव नहीं है और हम सभी जानते हैं और पूर्व-स्वतंत्र और स्वतंत्र भारत में भी अदालतों ने कहा है कि नमाज कहीं भी पेश किया जा सकता है। मस्जिद एक पवित्र स्थान नहीं है लेकिन हिंदू पूजा पवित्र स्थल और पवित्र स्थान के आसपास केंद्रित है।

अब जब ये सब बातें बाबरी समूह के खिलाफ हो गईं तो वामपंथी इतिहासकारों ने अंतिम जीत कार्ड के साथ आया, यह सबूत था कि राम उस सटीक स्थान पर पैदा हुआ था? वे यह कहने लगे हैं, सबूत क्या है? ब्रिटिश काल से, अदालतों ने, उन्होंने कहा है कि यह न्यायालयों का कर्तव्य नहीं है कि वे लोगों की वैज्ञानिक या न्यायिक जांच के लिए जांच करें या लोगों के विश्वास के अधीन हों। अदालतों को केवल इस तथ्य का ध्यान रखना होगा कि लाखों लोगों को ऐसा मानना ​​है। इसलिए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि हम मंदिर गुंबद के नीचे मंदिर समूह को दे रहे हैं क्योंकि लाखों लोगों का मानना ​​है कि राम का जन्म स्थान है। इसलिए उच्च न्यायालय के फैसले को खत्म करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय क्या कर सकता है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं। लेकिन संबंधित नागरिकों के रूप में, मुझे लगता है कि हम क्या कर सकते हैं बाबरी मामले की कमजोरी को लोकप्रिय बनाने और कुछ शिक्षाविदों ने 20 साल से खेले जाने के कारण किके मुहम्मद वह एएसआई के साथ था और उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी है, हाल ही में उनकी आत्मकथा बाहर आ गई है और वे कहते हैं कि मुसलमानों के बीच एक बहुत ही गंभीर सोच थी कि हम इस साइट को हिंदुओं को सौंप दें क्योंकि इसका मतलब उनके लिए इतना है और इसका मतलब हमारे लिए ज्यादा नहीं है उन्होंने कहा कि फिलहाल छोड़ दिया इतिहासकारों ने मैदान में प्रवेश किया और उन्होंने बाबरी समूह को आश्वस्त किया कि आपके पास एक बहुत मजबूत मामला है और हम आपके केस से लड़ेंगे। और बाजी इतिहासकारों के हस्तक्षेप से बाबरी समूह ने अपना मन बदल दिया और कहा, हम इसे लड़ेंगे।

इसलिए यह बहुत दर्दनाक मामला है जो शिक्षाविदों के बीच समुदायों के बीच शांति, इस देश के सामाजिक कपड़ा और अयोध्या के लिए इस तरह की हानि कर रही है, एक मुद्दा है, जिसने पिछले 2-3 दशकों से समुदायों के बीच इतना तनाव पैदा कर दिया है। इसलिए, मैं केवल यह कहकर समाप्त कर सकता हूं कि शिक्षाविदों को समाज के प्रति उनकी ज़िम्मेदारी से बहुत सचेत होना चाहिए। उनके लिए तथ्य यह पेश करना महत्वपूर्ण है क्योंकि वे जानबूझकर उन्हें बिगाड़ना नहीं चाहते हैं। और अब, जब उनकी हर विरूपण प्रकाश में आ गई है और सिद्ध हो गया है, तो वे देश में कम से कम माफ़ी मांगी हैं।