अब ये बहुत रोचक है क्योंकि पूरे विवाद का प्रत्येक चरण और जन्मभूमि के महन्त तथा बाबरी मस्जिद के अधीक्षक के बीच के संघर्ष का प्रत्येक चरण फैज़ाबाद जिला न्यायलय में लिखा गया है । ये सारे कागज़ हैं और जब अयोध्या, जब अलाहाबाद उच्चन्यायालय ये मामला सुन रहा था तब वहाँ प्रत्यर्पित कर दिए गए थे । तो पहला कागज़ क्या है ? २८ नवम्बर १८५८ की एक प्राथमिकी सूचना जो कि अवध के थानेदार द्वारा लिखी गयी । अवध का थानेदार कहता है कि २५ सिख, निहंग सिख बाबरी मस्जिद में घुस गये हैं और उन्होंने वहाँ पर हवन – पूजा आरम्भ कर दी है ।
दो दिन बाद यानि ३० नवम्बर १८५८ को बाबरी मस्जिद के अधीक्षक ने एक अभियोग पञ्जी कराया । वही अभियोग । वो कहता है कि २५ सिख बाबरी मस्जिद में प्रवेश कर चुके हैं , उन्होंने वहाँ हवन-पूजा आरम्भ कर दी है, और कोयले से सारी दीवारों पर “राम राम” लिख दिया है । वो कहता है मस्जिद के बाहर, परन्तु परिसर के भीतर, जन्मस्थान है, वहाँ पर हिन्दू बहुत समय से आ रहे हैं और पूजा कर रहे हैं । परन्तु अब वे मस्जिद में घुस आए हैं और वहाँ भी पूजा करने लगे हैं ।

तो फिर से अलाहाबाद उच्चन्यायालय ने इस कागज़ को बड़ा महत्त्व दिया क्योंकि ये कहता है, क्योंकि ये कागज़ अब भी है न । थानेदार द्वारा पञ्जी किया गया परिवाद अब भी है और वो अलाहाबाद उच्चन्यायालय के आगे प्रस्तुत किया गया । तो, अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि बड़ा महत्त्वपूर्ण कागज़ है क्योंकि ये पहली व्यक्तिगत ध्वनि है जो हमें अयोध्या से सुनाई दे रही है, और ये कहती है कि हिन्दू परिसर में हैं , मस्जिद में हैं , और पहले वे बाहर थे । यानी एक समय हिन्दुओं को बाबरी मस्जिद पर मुक्त अधिकार था । इसके पश्चात् सिखों को बाबरी मस्जिद के भीतर से बाहर निकालने में थानेदार को कुछ सप्ताह लगे ।

मैं कुछ और उदाहरण आपको देती हूँ जो कि बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । १८६० में अधीक्षक ने एक निवेदन किया है और इस निवेदन में वो कहता है कि जो चबूतरा बाबरी मस्जिद के भीतर बनाया गया है उसे नष्ट कर देना चाहिये । ऐसा निवेदन अंग्रेजों से किया गया है । याने जब चाहें तब हिन्दू वहाँ निर्माण कर रहे थे । फिर वो कहता है कि जब भी मौलवी नमाज़ के लिये आवाज देता है, अजान, तो दूसरा पक्ष शंख बजाने लगता है । तो आप ये तनाव देख सकते हो और ये जानना आवश्यक है क्योंकि वामपंथी इतिहासकारों ने कहा कि अयोध्या में हिन्दू – मुस्लिम तनाव ब्रिटिशों फूट डालो राज करो नीति की देन है । पर यहाँ हम उन लोगों को सुन रहे हैं जो इस सब में भागी थे । यहाँ कोई ब्रिटिश नहीं है । ये बाबरी मस्जिद के अधीक्षकों और महंतों के बीच का कलह है । तो वो कहता है कि ये लोग शंख बजाने लगते हैं याने उनके मन में ये इच्छा प्रबल थी कि हमें ये स्थान वापिस लेना है । तो ये एक उपाय है अपनी बात कहने का जब आप इससे अधिक कुछ कर ही नहीं सकते हो । तो जब वे अजान करते हैं आप शंख बजाते हो ।

फिर १८६६ में और एक परिवाद बाबरी अधीक्षक द्वारा किया गया है जो कहता है कि इन महंतों ने परिसर के भीतर एक कोठरी बना ली है जो कि बहुत ही अवैधानिक है और उस कोठरी का हेतु है ? क्योंकि वे कोठरी का प्रयोग करना चाहते हैं क्योंकि उसमें मूर्तियाँ रखना चाहते हैं । तो वो ब्रिटिशों से कहता है कि तुम्हें हमारी सहायता के लिये अवश्य कुछ करना चाहिये, जैसा है, वो कहता है, क्योंकि बस आपके कारण हम लगातार जन्मस्थान के पुजारियों द्वारा त्रस्त किये जाने पर भी यहाँ पर टिके हुये हैं ।

फिर १८७७ में , और एक परिवाद है और इस बार बाबरी अधीक्षक कहता है कि ५ वर्ष पूर्व, हमने आपसे, याने ब्रिटिशों से, परिवाद किया था कि चरण पादुका यहाँ अवैधानिक रूप से रखे गये हैं , कृपया उन्हें हटाइये और आपने कुछ किया ही नहीं है , क्यूँ ? मैं समझ सकता हूँ कि आप जन्मस्थान के महंतों को समन नहीं दे पा रहे हैं क्यूँकि जब भी आप आनेवाले होते हो वे भूमिगत हो जाते हैं । तो ५ वर्ष से वे यही कहते हैं कि उन्हें ऐसा कोई आदेश मिला ही नहीं और पूजा निरन्तर चालू है और अब इन्होंने एक चूल्हा और लगा लिया है । कहते हैं पहले एक छोटा चूल्हा था पर अब तो एक बड़ा चूल्हा जोड़ लिया है ।

याने अब हमारे पास चबूतरा, कोठरी और चूल्हा, इन तीनों के साक्ष्य हैं । याने लगातार एक संघर्ष चल रहा है । उस स्थान पर कभी कोई शान्ति नहीं है और ये दिखाता है कि हिन्दू समाज कितना दृढ़ था उस स्थान पर अपने अधिकार के समपर्ण को लेकर, और ये वे बातें हैं जो हमें सामान्यतया सुनने को या जानने को नहीं मिलतीं हैं , ये विवरण प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छिपाता है क्योंकि ये सारे साक्ष्य एक ही पक्ष की ओर बहुत अधिक झुके हुये हैं और बहुधा मुझे ऐसा लगता है कि दूसरे पक्ष के पास तो कुछ भी नहीं है । कभी कभी मुझे ऐसा लगता है कि दूसरे के पक्ष में कुछ भी नहीं है ऐसा कैसे परन्तु ऐसा ही है ।

फिर १८७७ में फैजाबाद के उपायुक्त ने न्यायालय को कहा कि मैंने दूसरा मार्ग इसलिये बनवाया है कि राम नवमी को तीर्थयात्री इतने हो जाते हैं कि उस भीड़ को संभालने के लिये हमें एक अतिरिक्त द्वार की आवश्यकता है । याने हिन्दू समाज पीछे हटना या मौन रहना स्वीकार नहीं कर रहा था । वे संकट को जानते हुये भी वहाँ जाकर परिक्रमा और पूजा आदि कर रहे थे । और अगला परिवाद तो बहुत बहुत रोचक है । १८८२ की मिति है । पुनः बाबरी अधीक्षक ब्रिटिशों से परिवाद करता है और वो क्या कहता है ? वो कहता है कि रामनवमी और कार्त्तिक मेले के समय हमारा एक समझौता है कि हम परिसर एक भीतर दुकानें लगने देते हैं जो प्रसाद और पुष्पादि विक्रय करतीं हैं । और नियम ये रहा है कि जो भी आय हो वो महंत और अधीक्षक के मध्य बराबर बँटता है । परन्तु इस बार महंतों ने ये हिसाब बदल दिया है तो आप कृपया पुरानी व्यवस्था पुनः लागू करवायें । तो फैजाबाद जिला न्यायालय कहता है कि हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आपने स्वीकार किया है कि समूचा परिसर आपका नहीं है और इसका तात्पर्य यह भी है कि उन दिनों नमाज भी नहीं पढ़ी जाती थी क्योंकि मेला , रामनवमी का उत्सव और नमाज साथ में नहीं हो सकते । तो ये है ।

और १८५५ में जन्मस्थान के एक महंत ने ब्रिटिशों को पत्र लिखा, वो लिखता है कि ये राम चबूतरा जो मेरे पास है, ये २१ * १७ फीट का है और इसके ऊपर कोई छत नहीं है और वो कहता है कि ये बिलकुल खुले में है और गर्मियों में, वर्षा में, मैं और मेरे साथी महंत बड़ा कष्ट भोगते हैं, क्योंकि हम पूरे समय मौसम की दया पर हैं, कल्पना कीजिये, परन्तु वे हार नहीं मानते । तो वो कहता है, कि क्या हम इस पहले से अपने अधिकार में प्रस्तुत भूमि पर एक छोटा मन्दिर बना सकते हैं ? ये निवेदन ब्रिटिश न्यायव्यवस्था के तीन स्तरों पर सुना गया सबने कहा कि महंत का पक्ष बहुत दृढ़ है , स्थल उसके अधिकार में है और वो सर्वदा प्रकृति के आश्रय पर है । परन्तु वे कहते हैं कि हम इस अत्यन्त संवेदनशील क्षेत्र में निर्माण की अनुमति हम नहीं दे सकते और यथास्थिति को छेड़ नहीं सकते, हिन्दुओं को ३५० वर्ष पूर्व जो चोट लगी वो हम समझते हैं पर हम कुछ नहीं कर सकते ।

अब १८८५ में एक अमीनी, अमीन आयोग का गठन हुआ और इस आयोग ने दिखाया कि सीता रसोई, चबूतरा , जन्मस्थान, छप्पर आदि सब बाबरी की चारदीवारी के भीतर ही स्थित हैं । इस चारदीवारी के ठीक बाहर, चारदीवारी से सटा हुआ एक गहरा गर्त है लगातार जो कि तीर्थयात्रियों के परिक्रमा करने के कारण उनके चरणों से बना है जो इन सदियों में आते रहे हैं । याने ये पूरा परिसर हिन्दुओं के लिये पवित्र भूमि था ।

Leave a Reply

You may also like

इस्लामी आक्रमण मध्यकालीन इतिहास

गुरु गोबिंद सिंह: योद्धा, संत, कवि व दार्शनिक – जिन्होंने भारत के सारे ग्रंथों का निचोड़ दिया | कपिल कपूर

post-image

गुरु गोविन्द सिंह जी के mention के बगैर आप इंडिया की history of ideas कंप्लीट नहीं कर सकते| गुरु गोविंद सिंह जी ने भागवत पुराण को ‘भाखा दियो बनाए’, जो उन्होंने कृष्णावतार लिखा वह उन्होंने पूरे भागवत पुराण को पंजाबी में भाखा में लिखा, रामअवतार लिखा, अकाल स्तुति लिखी, जितना ज्ञान भारत का था उसका जो latest retelling हुआ…retelling… वह सारा वह गुरु गोविंद सिंह जी ने किया| 4 बेटे मरवा दिए, father मरवा दिए, 40 की आयु में मर गए,इतने ग्रंथों की रचना की, इतना social reform किया और धर्म के लिए जान दे दिया, कुर्बानी कर दी| दो बच्चे छोटे- पांच आठ साल के जिंदा दीवार में चुनवा दिए गए और जब उनको खबर मिली तो उनकी आंखों में नमी आई तो किसी ने कहा गुरु जी अगर आप दुख बनाओगे तो…

Read More
क्या आप जानते हैं? प्राचीन इतिहास भारतीय बुद्धि भाषण के अंश

हिन्दू देवी-देवता और संस्कृत जापानी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं – बिनोय के बहल – भारत का भित्तिचित्रण

post-image

हमने जापान में संयोग से इन दोनों वेणुगोपाल को देखा। वहाँ मुझे लगा कि आप यह जानने के लिए उत्सुक हो सकते हैं कि हिन्दू देवी-देवताओं की जापान में उतनी ही पूजा होती है जितनी कि भारत में। आपको वास्तव में यह जानकर आश्चर्य होगा कि यहां जापान में एकमात्र सरस्वती मां के सैकड़ों मंदिर हैं जिसमें 250 फुट ऊंचा मंदिर भी है और सरस्वती मां के मंदिर भारत में देखने को नही मिलते। लक्ष्मी माता की यहां पूजा होती है। बहुत सारे देवी-देवता हैं, इतने सारे शिव हैं, ब्रम्हा हैं, यहां तक की यमराज का मंदिर है।

वास्तिवकता में आपको ये जानकर भी आश्चर्य होगा कि हवन या होमा जिसको जापानी भाषा में “गोमा” कहते है, वो जापान के 1200 से अधिक मंदिरों में हर दिन संस्कृत मंत्रोच्चार द्वारा किया…

Read More
प्राचीन इतिहास भाषण के अंश

आज का वर्तमान ग्रीस अपनी पुरातन सभ्यता और संस्कृति को क्यों नहीं बचा सका?

post-image

ग्रीस जिसे हम यूनान के नाम से भी जानते हैं, 1900 ईसवी में अंततः ग्रीस का फिर से उदय हुआ। यदि हम पुरातन सभ्यताओं की याद करें तो ग्रीस और इजिप्ट का नाम भी याद आता है, परंतु ग्रीस के इतिहास पर नजर डालें तो सबसे पहले ग्रीस पर रोमन साम्राज्य का कब्जा हुआ था। परिणामस्वरूप ग्रीस ईसाई धर्म में परिवर्तित हुआ और अपनी सभ्यता संस्कृति खो बैठा।

रोमन राजा ने ग्रीस के धर्म के सभी ग्रीक देवताओं पर प्रतिबंध लगाया तथा ओलिंपिक खेलों को बंद करा दिया, क्योंकि ग्रीस ओलिंपिक पर बड़ा खर्च करता था। मंदिरों को तोड़ा गया, परम्परायें नष्ट होती चली गई और ग्रीस पूर्णतया ईसाई बन गया।

समय के साथ ग्रीस की पुरातन सभ्यता नष्ट होती चली गई। सवाल ये है कि ग्रीस पुनर्जीवित कैसे हुआ? 18वीं सदी में यूरोप ने ग्रीक ज्ञान का अवतरण किया ताकि अरब देशों के माध्यम से पुरातन यूनानी ज्ञान को प्राप्त…

Read More
इतिहास इस्लामी आक्रमण भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन भाषण के अंश मध्यकालीन इतिहास

गुरु तेग बहादुर का धर्मार्थ प्राण त्यागने से पहले औरंगजेब के साथ संवाद

post-image

गुरुदेव बोले, “300 वर्ष पहले हमारे देश में औरंगजेब नाम का निर्दयी राजा था। उसने अपने भाई को मारा, पिता को बंदी बनाया और स्वयं राजा बन गया। उसके उपरांत उसने निश्चय किया कि वो भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाएगा।”
“क्यों गुरुदेव?”
“क्योंकि उसने सोचा कि यदि दूसरे देशों को इस्लामिक राष्ट्र बनाया जा सकता है, तो भारत को क्यों नहीं जहां पर उस जैसा मुसलमान राजा राज करता है। उसने हिंदुओं पर भारी जजिया टैक्स लगाया और हिंदुओं को अपमानित परिस्थितियों में रहने पर विवश किया, अतः वो हिन्दू धर्म का त्याग कर दें। औरंगजेब ने अपने सैनिकों को प्रत्येक दिन ढेर जनेऊ लाने को कहा और उस ढेर जनेऊ को रोज तराजू में तुलवाता था। ये हिंदुओं का जनेऊ होता था जो या तो इस्लाम स्वीकार कर लेते थे या मार दिए जाते थे। बहुत हिंदुओं ने डर कर इस्लाम स्वीकार किया और बहुत…

Read More
इस्लामी आक्रमण क्या आप जानते हैं? भाषण के अंश मध्यकालीन इतिहास हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस

भारत के उत्तरी भाग में बड़े मंदिर क्यों नहीं हैं, जैसे भारत के दक्षिणी भाग में हैं?

post-image

शीर्ष सिद्धांतकारों में से एक, शॉन लॉन्डर्स ने कहा कि स्मृति हमें बांधती है और हमें परिभाषित करती है। यह धर्म का एक आवश्यक आयाम है और मिलन कुंदेरा ने कहा है कि सत्ता के खिलाफ मनुष्य का संघर्ष वैसे ही है जैसे विस्मृति के खिलाफ स्मृति का संघर्ष। यह बहुत शक्तिशाली बात है। यह एक ऐसी स्मृति है जो हमें विस्मृति से रोकती है। स्मृति मरती नहीं है। स्मृति की यही सुंदरता है। मैं शायद इसके बारे में सीधे शब्दों में अपनी बच्चों से बात भी नहीं कर सकता, लेकिन मुझे पता है कि मेरी संतानें समझ जाएंगी कि मैं क्या संदेश देना चाहता था और वे इसपर चुप्पी साध लेंगे। स्मृति मौन के सहारे आगे बढती है। मुझे लगता है कि आप सभी इस तस्वीर को जानते हैं। है न? ठीक है। मेरे पास इसके बारे में एक कहानी है जिससे शायद पहली बार मुझे समझ में…

Read More
इस्लामी आक्रमण काश्मीर भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन भाषण के अंश मध्यकालीन इतिहास

एक कश्मीरी शरणार्थी शिविर का नाम ‘औरंगज़ेब का स्वप्न’ क्यों रखा गया? – मनोवैज्ञानिक आघात का ऐतिहासिक संदर्भ पढ़ें

post-image

मैं एक कहानी आपसे साझा करूंगा, क्योंकि मुझे लगता है कि कहानी लोगों को यह बताने का सबसे अच्छा तरीका है कि मैं इस तक कैसे पहुंचा। किसी को पता है कि यह क्या है? यह कश्मीरी शरणार्थी शिविर है। मैं वहां काम कर रहा था, और मेरी पत्नी भी यहाँ है, हम दोनों लोगों के आघात पर काम करने के लिए शिविरों में जाते थे और ऐसे शिविर कई सारे थे। हमने अपना काम बांट लिया था। हम शिविर में जाते थे, उन लक्षणों पर चर्चा करते थे जिन्हें लोग महसूस करते थे। उनमें से ज्यादातर सो नहीं पाते थे। उनमें से अधिकांश को बुरे स्वप्न आते थे, उनमें से अधिकांश में ऐसे कई लक्षण थे। हम इस पर चर्चा करते थे, उन्हें व्यायाम, बातचीत द्वारा फिर से ठीक करने और फिर वापस आने में मदद करते थे।

बाहर आते समय एक दिन, एक बूढ़ा कश्मीरी आदमी, एक छोटा…

Read More
अखंड भारत क्या आप जानते हैं? प्राचीन इतिहास भाषण के अंश

भारत का नाम इंडिया कैसे पड़ा?

post-image

‘इंडिया’ शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? शायद यह आपको ज्ञात हो| सबसे पहले ‘सिंधु’ शब्द से ‘हिंदू’ बना। फिर जैसे स्पेनिश में ‘ह’ अक्षर उच्चारण में गौण हो जाता है उसी प्रकार ‘ह’ का उच्चारण लुप्त होकर ‘इंदु’ बना। जब मैं बार्सिलोना में था, मैंने एक रेस्तरां का नाम ‘लो कॉमिडा हिंदू’ पाया। पर इसका उच्चारण वे ‘ह’ को गौण रखकर ‘इंदु’ ही कर रहे थे|  आप हजारों साल पहले भी इस प्रकार का संदर्भ प्राप्त हो सकता है| अलग अलग देश इसे ‘इंड’, ‘इंडिका’, ‘इंडिया’ इत्यादि जैसे नामों से पुकारते हैं|

Read More
प्राचीन इतिहास प्राचीन भारतीय शिक्षा भारत की चर्चा

भारतीय गुरुकुल शिक्षा प्रणाली — मेहुलभाई आचार्य का व्याख्यान

post-image

भारतीय परंपरा में मनुष्य जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मूल्यों में से शिक्षा को सबसे उच्च का स्थान दिया गया है| पुरातन काल से भारतवर्ष समस्त विश्व के लिए ज्ञान का स्रोत रहा है और भारत के ज्ञान का सर्वप्रथम स्रोत हैं हमारे वेद| एक सुसंस्कृत व्यष्टि को समष्टि की नींव मानते हुए एक सुदृढ़ तथा विकसित समाज के निर्माण हेतु शिक्षा की अभूतपूर्व परिकल्पना भारत के ऋषियों, मनीषियों एवं गुरुओं ने ही की थी| इसी चिंतन ने जन्म दिया भारतीय गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को|

क्या थी गुरुकुल शिक्षा प्रणाली? कितनी प्रकार की पद्धतियाँ होती थीं इस प्रणाली में? कहाँ से आरम्भ होती थी शिक्षा? क्या शिक्षा केवल विषय-ज्ञान तक सीमित थी या इसका कोई अलौकिक अभिप्राय भी था? जानिए श्री मेहुल आचार्य के व्याख्यान में|

श्री मेहुल आचार्य जी हमें बताते हैं की मानव व्यक्तित्व के संतुलित व बहुमुखी विकास के लिए तथा विकसित समाज…

Read More
%d bloggers like this: