मराठा – मुगल युद्ध : अनीश गोखले द्वारा एक व्याख्यान

नमस्कार ! सुसायम् ! सबसे पहले मैं धन्यवाद करना चाहूँगा सृजन फाउंडेशन का और इंटैक का भी, साथ ही यहाँ उपस्थित सभी लोगों का जिन्होंने मुझे आमन्त्रित किया । मैं मुगलों और मराठाओं के विषय पर बोलूँगा, विशेषकर के १६८० – १७०७ के बीच के कालखण्ड के बारे में और मैं आशा करता हूँ कि मेरा ये छोटा सा वक्तव्य सभी लोगों के द्वारा पसंद किया जायेगा ।

तो ये तीन या चार भागों के बारे में होगा – एक छत्रपति शिवाजी के बारे में, फिर छत्रपति राजाराम उनके पहले छत्रपति सम्भाजी, और महारानी ताराबाई । मुगलों से एक बहुत लम्बी लड़ाई लड़कर इन चार लोगों ने यह सुनिश्चित किया कि मुगल दक्खन से बाहर ही रहे । जिस युद्ध विशेष की हम चर्चा कर रहे हैं वो एक बहुत लम्बे कालखण्ड में लड़ा गया, जो कि २७ वर्ष जितना था, और २७ वर्ष एक पूरी पीढ़ी होती है । तो लोगों की एक पूरी पीढ़ी केवल एक युद्ध लड़ने में बीत गयी । लाखों लोग, लाखों सिपाही बलिदान हुए, बहुत धन की हानि हुई, और एक पूरा साम्राज्य गिर गया, इस निरन्तर चली लम्बी लड़ाई का यह परिणाम रहा ।

तो अब आते हैं उन कारणों पर कि मराठा क्यों इसके अन्त में विजयी हुए, हमें छत्रपति शिवाजी के समय से आरम्भ करना होगा । छत्रपति शिवाजी का उदय होने से पहले भारत के इतिहास में तीन महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घट चुकी थीं – एक तो पानीपत का दूसरा युद्ध, तालिकोट का युद्ध और देवगिरि यादवों का पतन । इन तीन घटनाओं के घटने से उत्तर भारत में अन्तिम सम्भव हिन्दू राज्य और दक्षिण भारत में अन्तिम हिन्दू राज्य समाप्त हो चुके थे और महाराष्ट्र में, शिवाजी के आने से पहले देवगिरि यादव अन्तिम हिन्दू शक्ति थे ।

तो हमारे लिए यह जानना महत्त्वपूर्ण था कि क्यों ये शक्तियाँ, जो कि बहुत शक्तिशाली थीं, जिनके पास संख्या भी थी, आक्रान्ताओं से पराजित हुए । पानीपत का दूसरा युद्ध मुख्यतः हेमचन्द्र की वीरगति होने से हारा गया । तालिकोट का युद्ध इसलिये हारा क्योंकि जिस तरह की नीतियाँ राज्य में पहले स्थापित की गईं थीं, उनका पालन नहीं किया गया । उत्तराधिकार को लेकर बहुत सी राजनीति चल रही थी । और ये सारी युद्धभूमि व्यक्ति केन्द्रित थी, एक व्यक्ति पर केन्द्रित थी, और फिर जब वह व्यक्ति मरा, बल्कि पकड़ा गया और मारा गया, पूरा युद्ध प्रभावित हुआ, पूरा युद्ध व्यूह बिखर गया । कोई दूसरी योजना थी ही नहीं, बचकर पुनः लड़ने की कोई योजना नहीं थी ।

इस प्रकार हमने उत्तर भारत और दक्षिण भारत में राज्य गँवाए । तीसरी बात, देवगिरि यादवों के अधिकार में उस समय की सबसे धनी नगरी, देवगिरि, जो कि वर्तमान औरंगाबाद के समीप है, थी । इसका दुर्ग बहुत दृढ़ था परन्तु देवगिरि यादवों का पराजय एक शास्त्रीय उदाहरण है कि अपने अधिकार में दुर्ग होने पर किस प्रकार युद्ध नहीं करना चाहिये । अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली से आक्रमण किया और जब तक उसकी १५,००० सिपाहियों की सेना देवगिरि से १५ मील की दूरी तक नहीं पहुँच गयी तब तक इन लोगों को पता ही नहीं था कि एक आक्रमण हो रहा है । क्योंकि उसने सोचा कि ये समस्याएँ उत्तर भारत की हैं और ये लोग दक्षिण की ओर नहीं आने वाले हैं और जिस समय तक ये भीषण सैन्य आया और आकर उस पर्वत शृंखला को पार नहीं किया, सातपुरा पर्वत शृंखला, तब तक उसको कोई अनुमान नहीं हुआ कि क्या हो रहा है ।

इसी समय अलाउद्दीन खिलजी का स्वयं का गुप्तचर विभाग बहुत दृढ़ था । उसने ठीक ठीक जान लिया था कि यही वो समय है जब देवगिरि अपने सर्वश्रेष्ठ सेनाध्यक्षों को और अपने राजकुमार को दक्षिण के अभियान पर भेजेगा और उनका सबसे शक्तिशाली सैन्य राज्य को बचाने के लिये उपलब्ध नहीं होगा । तो उसका गुप्तचर विभाग इतना शक्तिशाली था कि उसने अपने अभियान को अच्छे ढ़ंग से नियोजित किया ।

उन्होंने इस देवगिरि दुर्ग पर आक्रमण किया जिसमें एक ही द्वार था प्रवेश और निकास के हेतु, तो करना केवल इतना था कि उस एक द्वार को बाधित करना था । और वो व्यक्ति, देवगिरि यादव मानता था कि उनके पास अन्न का पर्य्याप्त भण्डार है जो कि ६, ८, १० मास तक चलेगा जब तक उनका सैन्य जो कि दक्षिण भारत में था, लौट आयेगा । परन्तु व्यवस्था इतनी लचर थी कि जब उन्होंने अपने भण्डारगृह खोले तो देखा कि उसमें सैंधा नमक ही था कोई अन्न नहीं । अन्तिम परिणाम ये हुआ कि अलाउद्दीन खिलजी ने बड़ा सरल विजय पाया और उस बिंदु से याने लगभग सन् १२९८ से, महाराष्ट्र में बहुत समय तक कोई हिन्दू शक्ति न थी, जब तक छत्रपति शिवाजी का उदय न हुआ ।

कारण कि मैं ये सब बता रहा हूँ यह है कि इस प्रकार की चुनौतियाँ थीं जिनका छत्रपति शिवाजी को सामना करना पड़ा होगा जब वो सत्ता में आये और हिन्दवी स्वराज्य की वास्तविक परिक्षा यही थी कि वो इन आघातों को सह पाये या नहीं, वो इन प्रमुख व्यक्तियों के अभाव को सह पाये या नहीं, दुर्ग आक्रमण को, एक बड़े स्तर के आक्रमण को, सह पाये या नहीं, और क्या वो एक आनुशासनिक और सैन्य व्यवस्था को स्थिर रख सकता है, जो कि तालिकोट के स्तर की या पानीपत के दूसरे युद्ध के स्तर के आघात को सह सके ।

छत्रपति शिवाजी ने बहुत से प्रशासनिक और सैन्य सुधार किये, जिन्होंने मराठाओं को बाद के समय में दृढ़ रहने में बहुत सहायता की । ये सब रामचंद्र पन्त की लिखी पुस्तक, आज्ञापत्र में दिए गये हैं, इस व्यक्तित्व के बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे । छत्रपति शिवाजी की सरकार में वो एक अमात्य या राजस्व अधिकारी थे । अष्टप्रधान में वे सबसे युवा थे और बाद में मराठा और महाराष्ट्र  की राजनीति में बहुत महत्ता को प्राप्त हुए । लेकिन उस समय छात्रपति शिवाजी ने बहुत से प्रमुख सुधार किये जो कि समय की परीक्षा पार करने में सफल रहे और उनकी अगली पीढ़ियों को लड़ने में सहायक हुए । सबसे पहले जो उन्होंने किया वो ये था कि वतनदारी प्रथा को समाप्त किया । प्रत्येक दुर्ग, उस समय तक प्रत्येक दुर्ग एक जागीरदारी था, वो एक पूरी तरह निर्मित दुर्ग और एक व्यक्ति जो उसको नियंत्रित करता था, प्रत्येक देशमुख, अपने आप में एक राजा था ।

उन्होंने इस भूमि आधारित अनुदान प्रथा को समाप्त किया और एक वृत्ति आधारित सेना का गठन किया । वृत्ति आधारित सैन्य, वे उनको वेतन देते थे जो कि उस समय भारत में सर्वाधिक था । सैन्य अधिकारी सर्वदा अपने समकक्ष नागरिक व्यवस्था संबंधी अधिकारियों से अधिक वृत्ति पाते थे
। तो परिणामस्वरूप, वो इन सब विभिन्न लोगों को, इन सब वतनदारों को अपने सैन्य में ला सके और एक वृत्ति आधारित सैन्य का गठन किया जो कि अपने समय से कम से कम १५० – २०० वर्ष आगे का विचार था । और इसमें हम यह भी देखते हैं कि शिवाजी ने उस समय की प्रचलित व्यवस्था में, मुगल मनसबदारी व्यवस्था में एक दोष पहचाना । ये व्यवस्था दृढ़ थी, दृढ़ रूप से चल रही थी, इसने एक पूरा साम्राज्य खड़ा किया था, कश्मीर से लेकर कल्याण और नर्मदा तक ।

परन्तु शिवाजी ने देखा कि इस मनसबदारी व्यवस्था में एक दोष है । वो दोष ये है कि एक बहुत दृढ़ केंद्रीय व्यक्तित्व अपेक्षित है इन मनसबदारों को यथास्थान स्थिर रखने के लिये, साथ ही ये व्यवस्था श्वान श्वान के पीछे पड़ा रहे, ऎसी थी, प्रत्येक मनसबदार और ऊँची मनसबदारी के लिये यत्नशील था, उनके लिये और कोई प्रेरणा न थी । एक ५०० की मनसबदारी वाला व्यक्ति जाकर युद्ध लड़ता और बदले में एक सहस्र की मनसबदारी की अपेक्षा करता । मुगल साम्राज्य या मुगल पताका के लिये लड़ने की कोई भावना नहीं थी, लोग स्वयं के लिये लड़ते यही स्थिति थी, एक प्रतियोगिता में उतरना और पर्याप्त धन एवं सैन्य लेकर साम्राज्य का विस्तार करना ।

तो शिवाजी ने इस दोष को पहचाना और सबसे पहले वतनदारी प्रथा को समाप्त किया और दूसरा ये कि हिन्दवी स्वराज्य का पूरा सिद्धान्त प्रस्तुत किया । उन्होंने कहा कि हम एक आदर्श के लिये लड़ने जा रहे हैं, ये एक ऐसी बात थी जो पूरी तरह से भिन्न थी उस समय से जब लोग बस केवल राजा के लिये लड़ रहे थे । राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ और सारा युद्धक्षेत्र १८० डिग्री परिवर्त्तित हो जाता, यही पानीपत के दूसरे युद्ध के समय हुआ । एक लक्ष्यहीन बाण हेमचन्द्र को लगा, वो अपने हाथी से गिरे और पूरा युद्धक्षेत्र चारों दिशाओं में भाग निकला । क्यूँ ? क्योंकि कोई आदर्श स्थापित नहीं था, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, यही आदर्श था । तो जैसे ही ये लाठी हेमचन्द्र के हाथ से छूटी, सारा युद्ध हारा गया ।

तो इस भाव को शिवाजी ने नियंत्रित किया हिन्दवी स्वराज्य का सिद्धान्त लाकर । कि आप एक निश्चित आदर्श के लिये लड़ रहे हैं एक निश्चित पताका के लिये लड़ रहे हैं, और ये राज्य मेरे बारे में नहीं है, ‘हे स्वराज्य व्हावे ही श्रींची इच्छा’, ये स्वराज्य परमेश्वर की इच्छा है, ये मेरी इच्छा नहीं है, ये छत्रपति शिवाजी का स्वराज्य नहीं है, ये परमेश्वर की इच्छा है जिसके लिये तुम लड़ रहे हो और यही आदर्श है जो अगले २७ वर्षों तक खड़ा रहा । तो ये उन्होंने वैचारिक स्तर पर किया, अब हम दुर्गों पर आते हैं, जैसा मैंने उल्लेख किया कि कैसे देवगिरि का दुर्ग लड़ा गया या कहें हारा गया । और शिवाजी ने क्या किया कि उन्होंने किस प्रकार दुर्ग बनाये जाएँ इसको लेकर बहुत परिवर्त्तन किये । उन्होंने अनेकों प्रवेश व निकास द्वार बनवाये । यदि आप महाराष्ट्र जाएँ तो देखेंगे कि इनमें से प्रत्येक दुर्ग के अनेक प्रवेश व निकास द्वार हैं ।

जैसे उदाहरण के लिये, ये तोरणा का दुर्ग, झुंजार माची, एक प्रवेश द्वार यहाँ से है और एक और प्रवेश दुर्ग के विपरीत छोर से है, बुढला माची से । तो अनेक प्रवेश द्वार, पुनः उन्होंने वास्तु भी इसी अनुसार किया, उन्होंने दुर्गों की दोहरी भित्तियाँ बनाईं, जैसे राजगढ़ । उन्होंने निश्चित किया कि दुर्ग में पर्याप्त मात्रा में अन्न हो, दुर्गों को स्वावलम्बी बनाया, आप अपना अन्न दुर्ग में ही उगा सकते थे स्वयं, जल की विपुलता थी, उन्होंने बहुत से जलाशय बनवाये और वास्तविकता में दुर्ग स्वयं ही युद्ध करने में सक्षम थे । उदाहरण के लिये, रामसेज का दुर्ग, जो कि नासिक के उत्तर में कहीं है, ये कोई बड़ा दुर्ग नहीं है, शिवाजी के लघु दुर्गों में से है, परन्तु जब औरंगजेब ने आक्रमण किया तो ये एक ही दुर्ग छः वर्षों तक लड़ा, एकाकी । तो इस प्रकार की क्षमताएँ थीं जो छत्रपति शिवाजी की नीतियों ने महाराष्ट्र के दुर्गों में स्थापित कीं । और एक दूसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्त्तन जो वे लाये, जब वे मुगल बन्दीगृह से १६६८ में भागे थे वे जानते थे कि एक दिन मुगल दक्खन आयेंगे, औरंगजेब आयेगा और और प्रयास करेगा कि वो सब मिटा दे जो शिवाजी ने बनाया है, छत्रपति शिवाजी ने इतने वर्षों में जो बनाया है । और इसको ध्यान में रखे हुये, १६७० में , हम देख सकते हैं कि वे कितने दूरद्रष्टा थे कि १६७० में ही उन्होंने कुछ धन आरक्षित किया, १,२५,००० दुर्गों के पुनःस्थापन के लिये, १,७५,००० लोगों को शिक्षित करने और सिपाहियों को सेना में प्रविष्ट करने के लिये जो इन दुर्गों के लिये लड़ें ।

और ये सारा धन दुर्गों में वितरित कर दिया, लगभग ५,००० सिंहगढ़ के लिये, १०,००० तोरणा के लिये, ५,००० रायगढ़ के लिये, ये सब भिन्न भिन्न स्थानों के लिये क्योंकि उन्हें पता था कि जब मुगल सेना आक्रमण करेगी तो हो सकता है कि एक केन्द्रीय स्थल जैसे रायगढ़ के लिये सबकुछ नियंत्रित करना अशक्य हो । दुर्ग एक दूसरे से पृथक् हो जायेंगे और उनके पास वो सामर्थ्य, वो समय या वो धन नहीं होगा कि हर बार रायगढ़ जाकर धन माँगे, सहाय माँगे और पुनः दुर्ग को वापिस लौटे, तब तक तो दुर्ग पराजित हो चुका होगा । इसलिये उन्होंने ये सारा धन इनमें से प्रत्येक दुर्ग को दिया और इसीलिये ये लम्बी कालावधि तक डाले गये घेरों को सह सके क्योंकि उन्हें जीर्णोद्धार व नये सिपाहियों के लिये चिंतित नहीं होना था ।

उन्होंने जोड़ेदार दुर्गों की भी व्यवस्था की, याने यदि एक दुर्ग पराजित होने वाला हो या उसे कुछ आवश्यकता हो तो वो सरलता से निकटके दुर्ग से पूरी की जा सके । इसीलिये हमें दुर्ग जोड़ों में दिखायी देते हैं । पुरन्दरगढ़ और वज्रगढ़ एकसाथ हैं, राजगढ़ और तोरणा एक साथ हैं, रामसेज और त्र्यम्बक एक साथ हैं । त्र्यम्बक के दुर्ग से हो रही वस्तुओं की आपूर्ति के कारण ही रासमेज ६ वर्षों तक निरन्तर युद्ध लड़ता रहा । तो ये स्थिति थी, इस प्रकार का साम्राज्य शिवाजी ने खड़ा किया ।

और ये करने के पश्चात्, राज्याभिषिक्त होने के पश्चात्, छत्रपति शिवाजी दक्षिण भारत के अभियान पर गये और एक ऐसे साम्राज्य का निर्माण किया जो कि जिञ्जी तक विस्तृत था, आप देख सकते हैं कि ये है छत्रपति शिवाजी द्वारा निर्मित मूल राज्य । ये स्वराज्य है, कारवार से नासिक के उत्तर तक विस्तृत, लगभग गुजरात की सीमा तक । परंटी १६७६ में वे दक्षिण भारत के अभियान पर गये अनेक कारणों से, जिनमें से एक ये था कि आदिल शाही राज्य में बहुत सम्पदा थी, आदिल शाही राज्य लगभग यहाँ था, इस भाग में । इस भाग के आस पास क़ुतुब शाही थी । और कुछ अर्ध-स्वतन्त्र हिन्दू राजा थे सुदूर दक्षिण में, तो एक कारण सम्पदा थी । दूसरा वे एक आपदाश्रय चाहते थे स्वराज्य के दक्षिण में, यदि उत्तर से आक्रमण हो तो कहाँ जाएँ ? वे घिरे हुये हैं और इसलिये पीछे लौटने के लिये एक स्थल की आवश्यकता है और इस प्रकार उन्होंने कोपबल, वेल्लोर और

जिञ्जी जैसे स्थान अधिकृत किये ।

तञ्जोर मराठा, दुर्भाग्य से तञ्जोर मराठाओं से उनका एक छोटा कलह भी हुआ जो कि उनके सौतेले बन्धु थे परन्तु अन्त में उनका इस बड़े क्षेत्र पर अधिकार हुआ । ये रोचक बात है कि जिञ्जी का किला, जो कि तमिल नाडु में है, उनको बिना एक गोली चलाये या एक सिपाही को मारे प्राप्त हो गया था । आदिल शाही बीजापुर का एक हबशी या इथियोपियन अधिकारी जिञ्जी में था, उसका नाम अब्दुल मोहमाद सईद था और वो किले के अन्दर था जब छत्रपति शिवाजी ने उस किले को घेरा । इसी बीच, एक व्यक्ति यहाँ से चला, बीजापुर से, जिसका नाम शेर खान लोधी था और शिवाजी इनके बीच में कलह करवाने में सफल हुए और इस कारण उन्हें जिञ्जी का किला प्राप्त हुआ । ये किला बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है, जब छत्रपति राजाराम का समय आता है । तो ये स्थिति शिवाजी ने निर्मित की थी जब तक उनका १६८० में देहांत हुआ । उन्होंने सारी नीतियाँ स्थापित कीं, उन्होंने ये सब विभिन्न क्षेत्र जीते और उस समय जैसे ही युद्ध आरम्भ होने वाला था, १६८० में उनका देहान्त हो गया ।

औरंगज़ेब ने लगभग १६८१ – ८२ में आक्रमण किया । वो एक ऎसी सेना लेकर आया जो कि ४ से ५ लाख सिपाहियों जितनी थी, उसने औरंगाबाद में पड़ाव डाला, औरंगाबाद उस समय पूरी तरह मुगलों के हाथ में था । उसने पड़ाव वहाँ डाला जहाँ आज औरंगाबाद है, पड़ाव की परिधि ३० मील थी और पड़ाव के पीछे चलने वाले और बाक़ी सब लोग मिलाकर लगभग ६ से ७ लाख बनता था । आप इसकी तुलना इस तथ्य से कर सकते हैं कि जब मराठाओं ने अपनी सबसे बड़ी सेना पानीपत में खड़ी की तो वो डेढ़ से दो लाख मात्र थी । तो ये शक्ति थी जिसका सामना किया गया । बल्कि ये माना जाता है, कि ये सेना जो औरंगाबाद में एकत्र हुई थी, मध्य काल में एक स्थान पर एकत्र हुई सबसे बड़ी सेनाओं में से थी ।

औरंगाबाद लगभग यहाँ है और ये वो स्थान हैं जो कि बाद में युद्ध में महत्त्वपूर्ण बन जायेंगे । तो मुगलों के साथ एक लंबा युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले शिवाजी का देहान्त हो गया और वे छत्रपति सम्भाजी द्वारा उत्तराधिकृत हुए, जो कि सिंहासनारूढ होने के समय लगभग २५ वर्ष के थे । छत्रपति शिवाजी के सम्मुख एक विशाल मुगल सैन्य था और उन्होंने कम से कम ६० से ७० युद्ध लड़े । उन्होंने स्वयं निजी रूप से लगभग १० से १५ युद्ध लड़े, परन्तु उनके नेतृत्व में मराठाओं ने लगभग ६० से ७० युद्ध लड़े, जो कि आप ये सब हरे बिन्दु इस चित्र में देख सकते हैं । ये सभी वे युद्ध हैं जो मराठाओं ने मुगलों से लड़े १६८२ से १६८९ के मध्य । ये ७ या ८ वर्ष का निरन्तर युद्ध, इसमें उन्होंने लगभग ७० लड़ाइयाँ लड़ीं और विजयी हुए, या विजयी माने गये, परन्तु सभी ७० युद्धों को झेल गये ।

एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, हम्बीर राव मोहिते नाम का, वई में इनमें से एक युद्ध में लगभग १६८७ में मारे गये । वे छत्रपति शिवाजी के अधीन भी सरनौबत सेनापति थे, छत्रपति सम्भाजी के काल में भी रहे और वे मराठाओं की ओर से प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे जिनका देहान्त हुआ । ये सब लाल बिंदु जो आप देख रहे हैं, ये पुर्तगालियों के विरुद्ध लड़े गये युद्ध हैं । इनमें से अनेक युद्ध छत्रपति सम्भाजी स्वयं लड़ रहे थे और यही वो समय था जब इन्क्विजिशन चल रहा था, पुर्तगाली इन्क्विजिशन, ये कुछ बलपूर्वक गोवा के कोंकण क्षेत्र में था और छत्रपति सम्भाजी को बहुत श्रेय जाता है कि उन्होंने पुर्तगालियों से बहुत से स्थान जीते और स्वराज्य को पूरा गोवा और कोंकण क्षेत्र तक विस्तृत किया ।

नीले बिन्दु वे युद्ध हैं जो छत्रपति सम्भाजी ने जंजीरा के सिद्दी के विरुद्ध लड़े, ये व्यक्ति इथियोपिया या अबीसीनिया से था, जिसने एक छोटा सा टापू मुरुड के तट के सहारे लगभग इस क्षेत्र में अधिकृत किया था । और वो निरन्तर कोंकण क्षेत्र पर आक्रमण करता था । तो सम्भाजी ने उसके साथ भी बहुत से युद्ध लड़े । तो उनका पूरा जीवनकाल, लगभग १० वर्षा मुगलों या पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों के विरुद्ध लड़ते हुए बीता, और युद्ध का पहला चरण जिसमें मुगलों के पास बहुत नवीन सेना थी, उन्होंने उसकी काट की, वो उनसे लड़ने में समर्थ हुए और आप इस चित्र में देख सकते हैं कि वो वास्तविक रूप में पूरे पश्चिमी महाराष्ट्र में लड़ रहे थे ।
पूरा युद्धक्षेत्र छत्रपति सम्भाजी का था और वे मुगल आक्रमण को रोकने में सफल रहे । दुर्भाग्यवश, छत्रपति सम्भाजी १६८९ में फरवरी के महीने में पकड़े गये । वे संगमेश्वर नाम के एक स्थान में पकड़े गये, उनके पकड़े जाने को लेकर थोड़ा विवाद है, परन्तु तथ्य यह है कि वे पकड़े गये और मुगल छावनी, जो कि तुलापुर में थी, को ले जाये गये । छत्रपति सम्भाजी जो कि अपने आप में एक राजा थे, तुलापुर छावनी में भाण्ड के परिधान में, घंटियों वाली टोपी पहनाई गयी उनको, फिर उनको एक गधे पर बिठाया गया और इस तरह औरंगज़ेब के मुगल पड़ाव तक ले जाया गया ।

उनके पकड़े जाने के बाद, उनको शृंखलाओं से बांधा गया, उनको एक यातनागार जैसे वस्तु में रखा गया, जहाँ उनके नेत्र पहले बुझा दिए गये, फिर उनकी जिह्वा काटी गयी, ये सब उनके जीवित रहते और उनके नेत्र नष्ट करने तथा जिह्वा काटने के बाद, उनकी त्वचा उतारी गयी, कोई पानी नहीं दिया गया, कोई भोजन नहीं दिया गया और लगभग ५ से १० दिन बाद, उनका सिर काट कर ह्त्या कर दी गयी और सिर काटने के बाद, बिना आँखों का बिना जिह्वा का ये सिर जो काटा गया था, एक शूल पर रखा गया और औरंगज़ेब का आदेश था कि उसको महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर ले जाया जाये, उस समय के प्रमुख दुर्ग,  जैसे सातारा और पण्हाला, और सिर की प्रदर्शनी की गयी जिससे लोग हतोत्साहित हों । कुछ समय के लिये हतोत्साह था कि इस शत्रु से तुम कैसे लड़ोगे जिसने हमारे छत्रपति को पकड़ लिया, उनका सिर काट दिया, उनके शरीर की सब जगह प्रदर्शनी की और फरवरी से लगभग जून या जुलायी तक मराठाओं के किलों की बहुत बड़ी संख्या मुगलों ने जीत ली ।

मराठाओं के लिये स्पष्टतः एक बड़ी समस्या हो गयी क्योंकि अब उनका कोई राजा न था । राजा मारा जा चुका था, छत्रपति सम्भाजी का एक पुत्र था, जो कि उस समय प्रायः ६ वर्ष का था, वो अपनी माता, जिनका नाम येसुबाई था, के साथ रायगढ़ में था । वो ६ वर्ष का था, वो ही वास्तविक रूप से उत्तराधिकारी था, परन्तु निश्चित रूप से ये समय नहीं था कि ६ वर्ष का व्यक्ति राज्य करना आरम्भ करे । छत्रपति सम्भाजी के एक कनिष्ठ भ्राता थे जिनका नाम राजराम था, जो कि १९ वर्ष के थे और व्यावहारिक रूप से गृहबन्दी थे, उन्होंने कोई राज्य सम्बन्धी दायित्व या कोई प्रशासनिक दायित्व नहीं निभाया था पहले बल्कि अपने पूरे जीवन में नहीं निभाया था । परन्तु उस समय, वही सबसे योग्य व्यक्ति थे अपने आयु के अनुसार । तो छत्रपति शिवाजी के एक सरदार जो अभी तक बचे रहे जिनका नाम येसाजी कनक था, वो उनको रायगढ़ लाये और वो १६८९ में मराठाओं के शासक घोषित हुये । ये मार्च १६८९ की बात है । तो सार ये था कि उन्होंने अपने अधिकांश दुर्ग गँवा दिये थे, उनके छत्रपति की हत्या हो चुकी थी, उनके नये छत्रपति को प्रशासन के बारे में अभी तक कुछ पता नहीं था, उन्होंने वास्तविक रूप से कभी भाग नहीं लिया था, वे जानते थे क्योंकि प्रशिक्षण इसका हुआ था परन्तु उन्होंने किसी प्रकार की सरकार या राज्यव्यवस्था की सेवाओं अभी तक भाग नहीं लिया था और औरंगजेब राजधानी के निकट आ रहा था ।

तो वे सब स्थितियाँ जो कि पानीपत के द्वितीय युद्ध, या तालिकोट के युद्ध के समय या देवगिरि यादवों के पराभव के समय थीं, लगभग पूरी तरह यहाँ भी थीं । तो अब छत्रपति शिवाजी की वास्तविक परीक्षा थी कि क्या उनकी नीतियाँ औरंगजेब के साथ वास्तविक युद्ध में उत्तीर्ण हो पायेंगीं । क्योंकि अब हमारे पास बिना राजा का राज्य है, एक राजधानी जो कि हारी जानेवाली है और सेनानियों का एक समूह, एक सेना जो कि पूरी तरह हतोत्साहित है । ये सब रायगढ़ में हो रहा था तो छत्रपति राजाराम और उनके कुछ परामर्शदाता जैसे रामचन्द्र पन्त और सन्ताजी, पन्त सचिव व अन्य एकत्र हुये और निर्णय किया कि अभी यही करना सर्वोचित है कि रायगढ़ से पलायन किया जाये और सुदूर जिञ्जी में शरण ली जाये, ये बहुत ही महत्त्वाकांक्षी योजना थी क्योंकि ये पूरा क्षेत्र, कुछ छोटे स्थानों को छोड़कर, पूरी तरह मुगलों के हाथों में था । तो वास्तव में मुगल राज्य से निकलकर जाना, जिञ्जी पहुँचने के लिये, इसके पीछे सारा विचार ये था कि युद्ध रद्द हो जाये ।

अभी तक ये पश्चिम महाराष्ट्र के आस पास केन्द्रित था पर ऐसा करके राजाराम मुगल सेना को विभिन्न मोर्चों पर लड़ने हेतु बाँटना चाहते थे, पश्चिम महाराष्ट्र में लड़ना और तमिल नाडु में और एक मोर्चा खोलना जिससे कि वे दो भिन्न – भिन्न स्थानों पर लड़ें और इससे लड़ाई रद्द हो जाये । तो ये मार्ग उन्होंने पलायन हेतु लिया, रायगढ़ से उन्होंने आरम्भ किया, वो पण्हाला नामक एक स्थान को पलायन कर गये, रायगढ़ से पलायन तब किया गया जब जुल्फिकार खान पहले ही दुर्ग को घेर चुका था और लगभग जीतने वाला था, परन्तु एक पिछले द्वार से, गुप्त निकासों में से एक के द्वारा जो कि वाघ दरवाजा नाम से जाना जाता था, राजाराम पलायन करने में सफल हुये और पहले पण्हाला भाग गये, पुनः मुगल सेना पण्हाला आयी तो उन्होंने पुनः सातारा में एक दुर्ग को पलायन करना पड़ा और पुनः और तीन चार अन्य दुर्गों को जाने के पश्चात् वे बळ्ळारी के दक्षिण को चले गये ।

वे एक दूसरे समय तुङ्गभद्रा के टापू पर मुगलों की पकड़ से बचे, यहीं कहीं पर रानी बेड्नूर की रानी चेन्नम्मा ने उन्हें आश्रय दिया और ये अनजानी कथाओं में से एक है जहाँ कर्णाटक में एक रानी, एक कन्नडिगा रानी ने एक मराठा राजा को आश्रय दिया, शिवाजी का योगदान हिन्दवी स्वराज्य को जानते हुये और ये जानते हुये कि वो शिवाजी का पुत्र था । और अन्ततः प्रायः १६८९ के अक्टूबर में राजाराम जिञ्जी के दुर्ग को पहुँचने में सफल रहे । एकदा छत्रपति राजाराम जिञ्जी पहुँचते तो स्पष्टतः एक योजना क्रियान्वित होनी थी परन्तु ऐसी योजना जो कि मुगलों से लड़ने में कारगर हो ।

तो एकदा दो विभाजन किये जा चुके हैं कि कुछ लोग पश्चिम महाराष्ट्र में, हिन्दवी स्वराज्य के मुख्यस्थान पर औरंगजेब से लड़ रहे हैं और मुगलों ने अब जुल्फिकार खान और कुछ सरदार प्रायः २५,००० सिपाहियों के साथ जिञ्जी गये जिससे कि दुर्ग को घेरा जाये और राजाराम को बन्दी बना सके । तो अब राजाराम ने दो लोगों को नियुक्त किया, एक रामचन्द्र पन्त बावड़ेकर, और दूसरा, शंकराजी पन्त सचीव ।

रामचंद्र पन्त बावड़ेकर, जैसा कि मैंने पहले कहा, छत्रपति शिवाजी की सभा में सबसे युवा मंत्री थे । उनको अब “हुकूमत पनाह” की उपाधि दी गयी, इसका सार ये था कि दक्खन में, पश्चिम महाराष्ट्र में जो भी हो रहा था उसका अधीक्षक उनको बना दिया गया, विशेष रूप से दक्षिणी क्षेत्रों का अधीक्षक । उत्तरी क्षेत्रों का अधीक्षक शंकराजी पन्त सचीव को बनाया गया, और इनके अधीन दो बहुत ही कुशल योद्धा, सेना नायक दिए गये, इनके नाम संताजी घोरपड़े और धानाजी धानव थे । ये दो लोग ही कारण हैं कि किस प्रकार मराठा जीते, विशेषकर १६९० से १७०७ के मध्य । वे बहुत कुशल योद्धा थे, संताजी घोरपड़े ने सही समय पर छत्रपति शिवाजी के काल में आरम्भ किया था, जब वे लगभग १८ – १९ वर्ष के थे, वे छत्रपति संभाजी के अधीन भी निरन्तर रहे, ह्म्बीर राव मोहिते के अधीन जो कि उस समय सेनापति थे और जब हम्बीर राव मोहिते का देहान्त हुआ और छत्रपति संभाजी पकड़े जा चुके थे, ये दो लोग जो कि उस समय तक, मेरे विचार से ३० वर्ष के थे, वे मराठा सेना के सरनौबत या सेनापति बने और मिलकर उन्होंने बहुत से युद्ध लड़े जिससे वे मुगलों की काट करने में सक्षम हुए ।

परन्तु पहले, १६९० में, जब राजाराम जिञ्जी के मार्ग पर थे और मराठा सैन्य के लिये बहुत थोड़ी आशा थी और बहुत से मराठा सरदार द्रोह करके मुगल सेना में जाना आरम्भ कर चुके थे । रामचंद्र पन्त को ऐसा कुछ करने का निर्णय लेना था जिससे सेना का उत्साह बढे क्योंकि इस समय पराजय निश्चित दिख रही थी । तो पूरी भूमि को देखते हुए, महाराष्ट्र में ३ – ४ दुर्गों को छोड़कर, जिञ्जी का दुर्ग, वेल्लोर का दुर्ग और संभवतः कोप्पल का एक दुर्ग, शेष सब कुछ कश्मीर से लेकर दक्षिण तक मुगल साम्राज्य का अंग थी । कुछ स्थानों पर वे लोग बहुत शक्तिशाली नहीं थे, कुछ स्थानों पर शक्तिशाली थे, परन्तु सभी स्थान, तकनीकी रूप से, मुगल राज्य के अधीन थे और उस समय मराठाओं के लिये बहुत सरल होता ये कहना कि हमने बहुत युद्ध लड़ लिये कृपया हमें अपने अधीन स्वीकार कर लीजिये, हम अपना हिन्दवी स्वराज्य समाप्त कर रहे हैं ।

परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि रामचंद्र पन्त अमात्य और छत्रपति राजाराम और बहुत से मराठा सेनानी ऐसा मानते थे कि ये एक ऐसा युद्ध है जो लड़ा जा सकता है और जीता जा सकता है । तो पहला काम जो करना था वो उत्साह बढ़ाना था और इसके लिये रामचंद्र पन्त ने एक अभियान आरंभ किया, विशालगढ़ से उत्तर की ओर सातारा में । इसी समय संताजी घोरपड़े ने एक अभियान आरम्भ किया विशालगढ़ से दक्षिण, पण्हाला की ओर और फिर उत्तर में सातारा के दुर्गों की ओर जो कि पश्चिमी घाटों में है । ये रणनीतियाँ मुगलों के अनुमान में नहीं थीं, उनकी आशा थी कि मराठा सिर झुकाकर पराजित हो जायेंगे । परन्तु ये बहुत त्वरित अभियान था, जिसने मराठाओं के लिये न केवल ऐसा क्षेत्र सज्ज किया जहाँ वे आक्रमण कर सकें वरन बहुत से मराठा सिपाहियों में पुनः विशवास जगाया कि वे अब भी लड़ सकते हैं और जीत सकते हैं । इसके अलावा एक बहुत ही साहसी छापा संताजी घोरपड़े ने औरंगजेब के निजी तम्बू पर मारा । इस समय औरंगजेब का तम्बू कोरेगांव में था, जो कि पुणे के समीप है और वे योजना बना रहे थे यहाँ से चाकन के दुर्ग को जीतने की |

उसकी समूची छावनी यहीं पर स्थापित थी, परन्तु संताजी घोरपड़े और उनके गुप्तचरों ने ठीक-ठीक पता लगाया कि छावनी की रूपरेखा क्या है, आप इस कथा की तुलना देवगिरि यादवों के समय में क्या हुआ, उससे कर सकते हैं । वे नहीं जानते थे कि १५ मील दूर क्या हो रहा है, सन्ताजी घोरपड़े ने पूरी छावनी की रूपरेखा जान ली, औरंगजेब का तम्बू कहाँ है ? सभी सिपाही कहाँ हैं ? रात के सन्नाटे में उन्होंने प्रवेश किया और पूरी योजना यह थी कि औरंगजेब के तम्बू तक जाकर उसका सिर काटकर अपने साथ विशालगढ़ लाया जाये, ये योजना थी । उन्होंने स्वयं को औरंगजेब के साथ बताकर प्रवेश प्राप्त ये कहकर कि हम सिपाही मात्र हैं को अमुक मराठा सरदार के अधीन हैं, जो कि औरंगजेब के अधीन काम कर रहा है । तो स्पष्टतः हम उससे मिलने जा रहे हैं । जैसे ही प्रवेश प्राप्त किया, प्रतिहारियों की ह्त्या कर दी । दुर्भाग्य से, उस समय औरंगजेब अपने तम्बू में नहीं था । परन्तु संताजी घोरपड़े ने तम्बू की रस्सियाँ काट दीं, पूरे शाही तम्बू को गिरा दिया, एक ऐसे तम्बू की हम बात कर रहे हैं जो कि कम से कम ५०० मीटर बड़ा था, शाही तम्बू को गिरा दिया, इस तम्बू के शीर्ष पर सोने की छड़ियाँ लगी हुई थीं ये दर्शाने के लिये कि ये औरंगजेब का तम्बू है । संताजी घोरपड़े ने वे छड़ियाँ तोड़ दीं और इसके बाद स्पष्टतः लोग चौकन्ने हो गये क्योंकि पूरा शाही तम्बू नीचे गिर गया ।

वे जीवित भाग निकले, सिंहगढ़ को आये, लगभग कुछ घंटों में घोड़े से, एक किला है जिसको सिंहगढ़ कहते हैं, वे सिंहगढ़ के नीचे ही रहे । वे दुर्ग को चढ़े नहीं, दुर्ग में जाकर नहीं रुके । संताजी घोरपड़े अपने हाथ में वो सोने की छड़ियाँ लेकर सिंहगढ़ के नीचे ही रुके, मुगल सोच रहे थे कि जो कुछ भी वो करने का प्रयास कर रहे थे यही उसका अंत है, वो सिंहगढ़ में है, वो वहीं रहने वाला है । अगली सुबह संताजी घोरपड़े ने पुनः आरम्भ किया, नयी घुड़सवार सेना को लेकर यहाँ से रायगढ़ को गये, जो कि अश्व द्वारा पुनः आधे दिन की यात्रा है ।

जुल्फिकार खान ने उस स्थान को घेरा हुआ था, उन्होंने उस घेराबंदी को आधा सा तोड़ दिया, अनेकों सिपाहियों को मार दिया, वापिस मुड़े और विशालगढ़ को आकर छत्रपति राजाराम को वो सोने की छड़ें भेंट कीं और कहा कि ये मुझे औरंगजेब के तम्बू से मिला है । ये सामान्यतः युद्ध का प्रकार था जो मराठा लड़ रहे थे, २७ सालों तक । बहुत से युद्ध नहीं हुए जैसे कि पेश्वा बाजीराव एवं अन्यों के काल में हुए, जिनमें बहुत सी सेना चलती हो और धीरे-धीरे कुछ कालावधि में घटनाओं का निर्माण हो और एक स्थान पर टकराव हो और पुनः युद्ध हो ।

अन्ततः एक संधि हुई, सभी पक्षों के सरदारों ने निर्णय किया कि ये तुम्हारा है, ये मेरा है । वास्तव में ये युद्ध संघर्षण का युद्ध था, जहाँ मराठा जानते थे कि उनकी संख्या बहुत कम है, उनकी संख्या कम से कम ५ गुना तक कम थी । तो वे मुगलों का मुक्त भूमि पर सामना नहीं कर सकते थे, वो आत्महत्या थी । तो उन्होंने क्या किया, उन्होंने २० मोर्चे खोले, वे २० मोर्चों पर लड़ रहे थे । बहुधा ऐसा होता था, कि संताजी घोरपड़े मुगलों की एक सेना पर आक्रमण करते थे, लड़ते जाते थे, ऎसी स्थिति तक पहुँचते थे जब और लड़ना हानिकारक होता, उस स्थान से वापिस लौटते, जैसे ही मुगल सेनानायक देखता कि मराठा पलायन कर गये हैं, वो औरंगजेब को  पत्र लिखता कि मैंने अमुक मराठा सरदार को पराजित कर दिया है और स्पष्टतः परिणामस्वरूप अनेक उपहारों की आशा करता ।

वही मराठा सेना ऐसे स्थान पर आती जहाँ पर मुगल दुर्बल होते विशेषकर यदि उन्होंने पहले ही उनसे लड़ने के लिये सिपाही एकत्रित किए होते, और वो स्थान औरंगजेब को एक और पत्र लिखता ये कहते हुए कि हमने अमुक-अमुक स्थान हारे हैं । तो इस प्रकार के युद्ध वर्षों तक चल रहे थे । आप देख सकते हैं कि ये युद्ध संताजी घोरपड़े और धानाजी जाधव के द्वारा १६९० से १७०७ तक लड़े जा रहे थे । जैसा कि आप देख सकते हैं, उन्होंने पूरा पश्चिम महाराष्ट्र अधीकृत किया, केवल इतना ही नहीं बल्कि कर्णाटक और तमिल नाडु के क्षेत्र भी । और एक महत्त्वपूर्ण अभियान जिसका नेतृत्व संताजी घोरपड़े ने किया वो था जिञ्जी की घेराबंदी तोड़ना । जैसा कि मैंने पहले बताया छत्रपति राजाराम जिञ्जी में थे, बाहर २०,००० की सेना थी । संताजी घोरपड़े और धानाजी जाधव, दोनों विशालगढ़ से तमिल नाडु तक गये । धानाजी जाधव मदुरई गये जहाँ पर एक मुगल सेनानायक था, उसको पराजित करके बंदी बनाया । इसी समय संताजी घोरपड़े ने एक बहुत शक्तिशाली और बहुत तीव्र आक्रमण जिञ्जी की घेराबंदी पर किया, न केवल उन्होंने एक शक्तिशाली आक्रमण का नेतृत्व किया, उन्होंने २-३ सेनायूथ पृथक करके कर्नाक जाकर वहाँ २-३ युद्ध लड़े, वे पुनः दक्षिण चले गये और जुल्फिकार खान को भिन्न दिशाओं में दौड़ाया, ३ या ४ स्थानों पर इससे पहले की अन्ततः पीछे हटकर वे वापिस कोल्हापुर लौटते जो कि वास्तव में रामचंद्र पन्त के अधीन मराठाओं की राजधानी थी ।

तो इस प्रकार की लड़ाइयाँ लड़ी जा रही थीं, आप ६ से ७ युद्ध ऐसे भी देख सकते हैं जब बेड्नूर की रानी चेन्नम्मा राजाराम की रक्षा कर रही थीं, वास्तव में उन्होंने उन्हें अपने क्षेत्र से जिञ्जी की ओर जाने दिया और औरंगजेब] को इसका पता चल गया और उसने वास्तव में युद्ध की घोषणा कर दी । उसने निश्चय किया कि छोटे से राज्य को समाप्त कर दिया जाये और उसने ३ से ४ सरदार बेड्नूर पर आक्रमण करने के लिये भेजे, क्योंकि उसने छत्रपति राजाराम की सहायता की थी । यद्यपि रानी ने स्वयं औरंगजेब को पत्र लिखे यह कहते हुए, कि मुझे नहीं पता था कि वो मेरे क्षेत्र से जा रहा है और क्या हुआ कि ये ३ या ४ सरदार संताजी घोरपड़े और धानाजी जाधव द्वारा, अपने गंतव्य तक पहुँचने से पूर्व धर लिये गये और औरंगजेब को यहाँ एक और पराजय का समाचार मिला ।

वो बहुत तीव्र थे और किसी भी प्रकार के छावनी – अनुयायी, या कोई भारी तोपखाना आदि लेकर नहीं चलते थे । परिणामस्वरूप वे क्षेत्रों में सरलता से चल सकते थे, पश्चिम महाराष्ट्र में, उत्तरी कर्णाटक में, तमिल नाडु  में । और एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन जो लगभग इस समय किया गया वो था एक सरंजम व्यवस्था को लागू करना ।

छत्रपति राजाराम एक ऐसी व्यवस्था लाये जहाँ उन्हें वतनदारी व्यवस्था लागू करनी पड़ी, जो कि छत्रपति शिवाजी द्वारा नष्ट कर दी गयी थी और उन्होंने निर्णय लिया कि लोगों को भूमि के रूप में आय दी जाये न कि वेतन के रूप में । अब इतिहास को देखकर हम कह सकते हैं कि ये सही था गलत परन्तु उस समय, उनके पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि एक बड़ी संख्या में मराठा सरदार मुगलों की ओर जा रहे थे, इस सीधे से कारण से कि मुगल उन्हें वृत्ति या मनसबदारी दे रहे थे । तो छत्रपति राजाराम ने क्या किया कि अपने हुकूमतपनाह के साथ, उन्होंने कहा कि कृपया हमारे साथ आइये, हम आपको भूमि देंगे और जो कुछ भी आप जीत सकें, वो आपका । केवल ये समस्या थी कि ये भूमि मुगलों के हाथ में थी और इतिहासकार सुरेन्द्रनाथ सेन ने छत्रपति शिवाजी पर बहुत अच्छा पुस्तक लिखा है ।

वो कहते हैं कि ये ऐसा था जैसे कि लोगों से भालू की त्वचा लाने को कहना, चाहें जितनी वे लाना चाहें, केवल ये समस्या थी कि भालू अब भी उस त्वचा के भीतर हो । तो कम से कम कुछ तो लाभ था क्योंकि ये सभी लोग अभी भी हिन्दवी स्वराज्य में श्रद्धा रखते थे, वे वास्तव में मुगलों के लिये लड़ना नहीं चाहते थे, परन्तु कोई विकल्प थे नहीं क्योंकि सबको पेट तो भरना है । तो ये अवसर मिलने पर अनेकों मराठा सरदार आये और छत्रपति राजाराम के साथ हो गये, उनमें मुख्य थे नेमाजी शिन्दे और नागोजी माणे, साथ ही मंकोजी पंढरे । इनमें से, बाद के दो केवल उसी काल के लिये महत्त्वपूर्ण थे । परन्तु नेमाजी शिन्दे बाद में बहुत महत्त्वपूर्ण हुये । वास्तव में वही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने वो परिवार स्थापित किया जो कि बाद में ग्वालियर के सिंधियाओं के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

तो यदि मराठा सेना में कोई नेमाजी शिन्दे न होते तो शायद कोई महाजी शिन्दे न होते, शायद कोई दौलत राव सिंधिया न होते, और शायद उत्तर भारत में कोई मराठा ही न होते । वे जिञ्जी की घेराबन्दी के समय मुगलों के साथ थे और छत्रपति राजाराम की ओर चले गये । पहला काम जो उन्होंने किया वो ये था कि जिञ्जी की घेराबन्दी करने वाली मुगल सेना पर आक्रमण किया और इस नीति के कारण बहुत से सरदार, बहुत से मराठा सरदार जो कि बाद में मराठा साम्राज्य में चमत्कृत हुये, बल्कि मराठा साम्राज्य का निर्माण किया और ख्याति को प्राप्त हुये । एक परसोजी भोंसले थे, जिन्होंने बाद में नागपुर में मराठाओं को स्थापित किया, वे भी इसी समय ख्याति को प्राप्त हुये । एक दामाजी थोरट थे, जो कि १६९० के दशक में प्रमुखता को प्राप्त हुये । एक खांडेराव दाभाड़े थे जिन्होंने बाद में अधिकांश गुजरात पर अधिकार किया और उसको मराठा साम्राज्य से जोड़ा, वे भी १६९० के दशक में प्रमुखता को प्राप्त हुये और कान्होजी आंग्रे थे जिन्होंने तट पर एक बहुत शक्तिशाली मराठा नौसेना का निर्माण किया ।

तो १६९० के दशक में युद्ध का ये प्रभाव था कि मराठा वास्तव में शक्तिशाली सेना बनाने में समर्थ हुये । उन्होंने छापामारी के युद्ध की मारो और भागो की वही नीतियाँ अपनायीं, ये संघर्षण का युद्ध था और बहुत स्थानों पर युद्ध लड़े जाते हैं । इसके परिणामस्वरूप मुगल कोष पूरी तरह रिक्त हुआ जा रहा था । वे प्रतिवर्ष प्रायः १५,००० लोगों को युद्ध में हारते जा रहे थे । शाह जहाँ, जहाँगीर के समय के कोष, सीधे अकबर के समय से, शाह जहाँ, जहाँगीर, वे द्वार जो लाल किले में कभी खोले नहीं गये अब खोले जा रहे थे भुगतान करने के लिये । बहुत स्थानों पर मराठा एक मुगल सेनानायक को पकड़ते, भुगतान के लिये कहते, उसको छोड़ते और लौट जाते । बहुत स्थानों पर वे दुर्गों का विक्रय कर देते, वे लड़ते लड़ते और लड़ते एक दुर्ग के लिये और ऐसा समय जब आता कि लड़ना अशक्य होता तब धन की माँग करते, वो धन लेते, वो दुर्ग मुक्त कर देते, उस धन से सेना खड़ी करते, वापिस लौटते और उस दुर्ग पर अधिकार कर लेते ।

क्योंकि मुगलों ने घेराबन्दी के युद्ध पर विशवास किया, सिवाय एक बार के जो कि बाद में आयेगा जहाँ उन्होंने तोरणा का दुर्ग जीता । वे छापामारी के जैसे आक्रमणों में नहीं पड़े जैसे मराठा करते थे या रात्रि का सहारा नहीं लिया, कम लोगों का उपयोग नहीं किया, वे सदा घेराबन्दी ही करते, और परिणामतः एक दुर्ग जीतने में बहुत समय लगता और शीघ्र उसे हार जाते । और इस समय तक, १६९० के दशक में मुगल सेनानायक, मुगल सरदार वास्तव में पूरे युद्ध की जामिता से त्रस्त थे, क्योंकि वे वहाँ पर १५ साल से थे, शायद लगभग २० वर्षों से, उनको कुछ मिल नहीं रहा था, वे प्रतिदिन युद्ध हार रहे थे और इसलिये मराठाओं के लिये बहुत सरल हो गया था कि उन्हें भगा दें, पराजित कर दें, उनसे धन ले लें और उन्हें छोड़ दें और इस तरह औरंगजेब, लगभग १५, १६, १८ वर्षों तक लड़ने के बाद भी बहुत क्षेत्र जीतने में असमर्थ रहा और जो कुछ भी उसने जीता, फ़टाफ़ट हार गया और उस पर बहुत समय तक अधिकार बनाये रखने में असमर्थ रहा ।

लगभग १६९८ में जब महाराष्ट्र की परिस्थिति थोड़ी उन्नत हुई, छत्रपति राजाराम ने जिञ्जी का त्याग किया, वे उस घेराबंदी से भी भागने में सफल रहे । अब बहुत से विचार हैं कि वे किस प्रकार भागे, छत्रपति राजाराम की ओर से बहुत से कूटनीतिक प्रयास इस विषय में किये गये, जहाँ वे जुल्फिकार खान को संतुष्ट करने में सफल रहे कि उनको मुक्त करना उसके हित में है । औरंगजेब लगभग ९० वर्ष का था, वो लगभग मरने वाला था और दक्षिण भारत में मुगल सरदार और अधिक महत्त्वपूर्ण होने वाले थे, तो ऐसे समय पर मराठा प्रमुख खिलाड़ी होने वाले थे । तो जुल्फिकार खान ने घेराबंदी उतने बल से नहीं की, जैसे उसने करनी चाहिये थी । वो ८ वर्षों से घेराबंदी किये हुए था । तो एक घेराबंदी रामसेज पर ६ वर्षों के लिये, एक घेराबंदी जिञ्जी पर ८ वर्षों के लिये । मुगलों ने दो दुर्गों के लिये १४ वर्ष व्यतीत किये और महाराष्ट्र में लगभग ३०० दुर्ग प्राप्त किये ।

तो छत्रपति राजाराम, १६९८ में महाराष्ट्र को वापस लौटे, और पहला काम जो उन्होंने किया वो उत्तर महाराष्ट्र, उस क्षेत्र में एक अभियान पर निकले । पहले वो पण्हाला पहुँचे, फिर विशालगढ़, फिर सातारा में आधार बनाया, पुनः वहाँ से वे जालना के उत्तर को गये और ये सब स्थान, एक बड़े अभियान को गये, मुगल दुर्गों को जीतने का प्रयास किया, सातारा की ओर पीछे हटे और फिर सिंहगढ़ को । इस अभियान में छत्रपति राजाराम के साथ, धानाजी जाधव थे, खांडेराव दाभाड़े थे, परसोजी भोंसले थे, नेमाजी शिन्दे थे और एक व्यक्ति निम्बालकर भी थे । व्यवहारिक रूप से पूरा मराठा साम्राज्य एक ही समय पर एक ही धुन में आगे बढ़ रहा था । ये सब लोग, इनके वंशजों ने आगे बढ़कर मराठा साम्राज्य का निर्माण किया जो कि अटक से कटक तक विस्तृत था ।

कान्होजी आंग्रे भी इस अभियान का अंग थे, ये एक बहुत साहसी अभियान था और बहुत से मुगल दुर्ग उत्तरी महाराष्ट्र में पुनः प्राप्त कर लिये गये, इसके परिणामस्वरूप । छत्रपति राजाराम ने अपने जीवन में शायद इसी एक अभियान का नेतृत्व किया, क्योंकि वे सिंहगढ़ को वापिस लौटे और इस स्थान पर दिवंगत हुए, जहाँ आप अब भी एक समाधि देख सकते हैं । सामान्यतया ऐसा माना जाता है कि वे एक दुर्बल छत्रपति थे, पर जैसा कि हम देख सकते हैं कि उनके अधीन, मराठा इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अंग घटित हुआ, जहाँ पर मुगल आक्रमणों को रोकने में सफल रहे, इस पूरे क्षेत्र में । उन्होंने उस समय के लिये जो सही थीं, उन नीतियों को लागू किया और मराठाओं को लगभग १० वर्षों तक निरन्तर मुगलों से लड़ने योग्य बनाया ।
वे निश्चित रूप से दूरद्रष्टा थे । बल्कि उन्होंने पत्र भेजे, अपने सेनानायकों को हड़काते हुए, जिन्होंने मन्दिर की संपत्ति लूटी हो, कुछ स्थानों पर, इस विचार से कि मन्दिर की सम्पत्ति का अधिकार उस गाँव को है, उन लोगों को है और उसको स्पर्श भी नहीं करना चाहिए भले ही वो मराठा सेनाओं के निर्माण के लिये हो । तो इस प्रकार के पत्र उनके द्वारा भेजे गये, एक रोचक बात यह है कि राजाराम के द्वारा एक पत्र है जहाँ वे दिल्ली जीतने की बात करते हैं । एक पत्र है जो उन्होंने अपने दो मराठा सरदारों को लिखा है, जहाँ वे कहते हैं कि हम ये ये स्थान जीतेंगे, और ये भुगतान किया जाएगा । हम औरंगाबाद जीतेंगे, हम दक्षिण भारत जीतेंगे, हम गुजरात जीतेंगे और अन्ततः दिल्ली की ओर स्वयं को ले जायेंगे ।

इस समय ये करना वास्तव में कठिन था, पर हम देख सकते हैं कि इस प्रकार का सिद्धांत वहाँ था, कि हमें उत्तर को जाना है और उसे जीतना है, न केवल रोक के रखना बल्कि पूरी तरह उनको हतोत्साहित करना और उनकी सेनाओं को पराजित करना और उनसे अधिकतम सम्पत्ति प्राप्त करना । दुर्भाग्य से, सन् १७०० में छत्रपति राजाराम का देहान्त हुआ और मराठाओं के सम्मुख एक समस्या थी, तीसरी बार, जो कि किसी तरह छत्रपति शिवाजी की १६८० में हुई मृत्यु को सह गयी, छत्रपति संभाजी के द्वारा जो कि केवल २५ वर्ष के थे परन्तु वे मुगलों से दस वर्षों तक लड़ने में सफल रहे । फिर वे पकड़े गये और मारे गये और ये सोचा गया कि मराठाओं का सब कुछ हारा गया, विशेषकर जब उनके स्वयं के राजा को पूरा तमिल नाडु तक पलायन करना पड़ा, परन्तु छत्रपति राजाराम उनको और १० वर्षों तक दूर रखने में सफल हुए और वे जब ३० वर्ष के थे तब उनका देहान्त हुआ । अब मराठाओं के पास केवल एक ही व्यक्ति था जो कि महारानी ताराबाई थीं, जो कि २५ वर्ष की थीं, औरंगजेब का सामना कर रही थीं ।
इस समय जब महारानी ताराबाई प्रायः २५ वर्ष की थीं, औरंगजेब लगभग ८५ या ९० साल का था, वास्तव में ये बड़ी रोचक बात है कि औरंगजेब का आयु छत्रपति संभाजी, राजाराम और ताराबाई के आयुओं का योग था । वो वास्तव में अपने पोतों से लड़ रहा था और इस समय मुगलों ने स्पष्टतः विचार किया होगा कि अब हम किससे लड़ रहे हैं ? एक स्त्री, एक स्त्री जो कि २५ वर्ष की है । और कौन उसके साथ है ? उसका पुत्र ९ वर्ष का है, उसका सौतेला पुत्र ३ वर्ष का है, अब ये केवल कुछ समय की बात थी, कि मराठाओं का जो कुछ भी शेष है, क्योंकि मुगल सेना ने भूमि को पूरी तरह लूट लिया है, पूरी तरह विहीन कर दिया है, लोगों से, सम्पत्ति से, किसी भी वस्तु से क्योंकि युद्ध २० वर्षों से चल रहा था । तो इस समय औरंगजेब ने निर्णय लिया कि मैं अन्तिम अभियान पर जाऊँगा, सभी दुर्गों को जीतूँगा और पश्चिम महाराष्ट्र में मुगल राज्य स्थापित करूँगा और परिणामस्वरूप १७०० में, ८५ वर्ष के आयु में, औरंगजेब अपने जीवन के अन्तिम अभियान पर निकला, ये मुगलों के लिये एक सरल अभियान होना था जहाँ वे सभी दुर्गों को जीतने वाले थे और क्योंकि एक २५ वर्ष की महिला शीर्ष पर थी, मराठाओं की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं होना था ।

वो और दोषपूर्ण नहीं हो सकता था, क्योंकि वो एक दुर्ग को जाता था और लड़ता रहता था परन्तु महारानी ताराबाई स्वयं सेना का नेतृत्व कर रही थी । अनेकों पत्र जो इन लड़ रहे किलेदारों को भेजे गये, कहते हैं कि वे मुगलों से लड़ने का बहुत बढ़िया काम रहे हैं । ये स्थान लगभग एक वर्ष तक लड़े गये, अन्ततः जैसी नीति उन्होंने पहले अपनायी थी, वे उस दुर्ग का मुगलों को विक्रय कर देते, बहुत बहुत ऊँचे मूल्य पर क्योंकि औरंगजेब बिलकुल तुला हुआ था किसी भी तरह उन दुर्गों को धन देकर प्राप्त करने के लिये । तो ये वास्तव में औरंगजेब की अन्तिम क्रय सूची थी । उसने विशालगढ़ पर दो लाख रुपये दिए, उसने सिंहगढ़ के लिये ५० हजार रुपये दिये, उसने शेष दुर्गों के लिये ७० हजार रुपये दिए, उस समय जब ३ या ४ रुपये एक औसत सिपाही की मासिक वृत्ति थी ।

५० हजार एक बड़ी राशि थी, जिसके लिये वे आसानी से एक सेना बढ़ा सकते थे दुर्ग को फिर से जीतने के लिये, जो उन्होंने किया । वास्तव में राजगढ़ में, मुगलों ने उस स्थान की बाहरी सीमाओं को जीतने में सफलता पायी थी पर बालेकिल्ला, जो गढ़ था, जो दुर्ग का मुख्य भाग है उसके बाद १५ दिनों तक निरन्तर लड़ता रहा । और धीरे-धीरे और निश्चित रूप से धन की बड़ी मात्रा देकर, वह इन सब दुर्गों को लेने में सफल रहा, तोरणा के अपवाद को छोड़कर । तोरणा एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ, औरंगजेब की सेना के मराठा सरदारों ने, रस्सों की सीढियाँ डालने में सफल रहे, दुर्ग पर चढ़ने में सफल रहे, जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी के सैनिकों ने किया था और उस दुर्ग पर अधिकार कर लिया ।  बाकी सब स्थानों का क्रय कर लिया गया, मोटी धन राशि देकर और इसलिये  ये समय विभिन्न स्थानों की घेराबन्दी करके उनको जीतने का था । उस समय मराठा उत्तर भारत में अभियान चला रहे थे । नेमाजी शिन्दे ने, १७०३ के इस काल खंड में भोपाल के उत्तर की ओर एक अभियान का नेतृत्व किया, सिरोंज नाम के एक स्थान की ओर, ये मराठाओं का उस समय का सबसे अधिकतम फैलाव था उत्तर की ओर ।

ये सोचना पूरी तरह असंभव था, जब पूरी की पूरी मुगल सेना ५ लाख उनमें से औरंगाबाद आ चुकी थी, कि २५ वर्ष बाद, एक मराठा सरदार होगा सरपट दौड़ता और जीतता हुआ मुगल सैनिकों को सिरोंज में, जो कि भोपाल के पास है । धानव जी जाधव, १७०३ में जब औरंगजेब इन दुर्गों को जीतने में व्यस्त था उत्तर में गुजरात तक गये थे, एक स्थान पर जिसका नाम था रतनपुर, जहाँ एक बड़ी मुगल सेना से उनका सामना हुआ, परन्तु वे गड़गड़ाते हुए उनका बड़ा विध्वंस करने में सफल हुए । गुजरात में मुगल सेना की इस पराजय ने मूल रूप से मुगल सेना को गुजरात से साफ़ कर दिया जो कि अच्छा रहा क्योंकि इसके उपरांत खांडेराव दाभड़े ने स्वयं को पूर्ण रूप से स्थापित कर लिया । मुगलों की ये पराजय गुजरात में इतनी भीषण थी, कि इसने लोगों को राजपुताना और मालवा में लोगों को प्रोत्साहित किया, मुगल साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये ।

अन्ततः औरंगजेब पश्चिमी महाराष्ट्र से पीछे हट गया और वाकिंखेड़ा नाम के एक स्थान पर चला गया, जो कि उत्तरी कर्णाटक में है, जो कि लगभग, इस स्थान के पास है । तो ये स्थान, जहाँ वह व्यक्ति था, पिड़िया नाइक, पिड़िया नाइक वहाँ का स्थानीय शासक था वाकिनखेड़ा का, और उसके नीचे एक जाति या लोग थे बेराड़, कई स्थानों को बराड़ कहा जाता है और कई स्थानों को बिदार ।  वे मुगलों के इतने ही विरुद्ध थे जितना कि संताजी घोरपड़े, छत्रपति राजाराम ।  इन्होंने और इन सब लोगों ने सहायता की विनती की, ऐसे कुछ उदाहरण हैं जहाँ, दक्षिण भारत के कर्णाटक के हिन्दू राजाओं ने, मराठाओं की सहायता की और मराठाओं ने उनकी सहायता की मुगलों के भीषण आक्रमणों को रोकने में, बल्कि, ऐसे में एक व्यापक निर्देश जारी था, एक व्यापक विनती छत्रपति राजाराम द्वारा जब वे जिञ्जी में थे, कि ये सभी हिन्दू राजा जो आदिल शाही और क़ुतुब शाही से मुक्त हो चुके हैं, उन्हें संगठित होना चाहिये और इस मुगल आतंक को खदेड़ देना चाहिये । ये बहुत प्रभावशाली नहीं था, पर उनमें से कुछ जैसे वाकिनखेड़ा के पिड़िया नाइक या पोलिगर जो कि डोड्डरी में था और भी कुछ स्थानों में, उन्होंने बढ़ चढ़ कर मराठाओं का साथ दिया ।

उनमें से कुछ ने मुगलों का साथ देने का निर्णय किया और कुछ निष्पक्ष रहे, परन्तु निश्चित तौर पर कुछ ऐसे उदाहरण थे जहाँ मराठा और कन्नडिगा राजा एक साथ मिले, मुगल साम्राज्य को खदेड़ने के लिये और वाकेंखेड़ा इसी प्रकार का एक स्थान था । तो बेराड़ वास्तव में निशानेबाज या बंदूकधारी थे, वे धानाजी जाधव द्वारा साथ लाये गये और घेराबंदी तोड़ दी गयी, जब तक घेराबंदी चल रही थी, मराठाओं द्वारा तोड़ दी गयी थी, ये सब दुर्ग, जो ले लिये गये थे, ये सभी दुर्ग जो औरंगजेब द्वारा ले लिये गये थे मराठाओं द्वारा पुनः वापिस लिये गये महारानी ताराबाई के नेतृत्व में । तो १७०५ तक, औरंगजेब इस स्थिति में था जब उसने लगभग सभी कुछ गवाँ दिया था, उसे मिलाकर जो कुछ उसने जीता था, अपने अन्तिम अभियान में । वह अहमदनगर को पीछे हट गया, अहमदनगर को पीछे आ गया था, वह सब कुछ गवाँ चुका था जो कुछ भी उसने अब तक जीता था दक्खन में । उत्तर भारत में विद्रोह हो रहे थे, मुगलों के साथ अब कोई भी राजपूताना नहीं था ।

सभी मुगल सरदार, जो द्वितीय और तृतीय श्रेणी के सरदार रहे थे वे अब बहुत शक्तिशाली बन गये थे, क्योंकि अब उन्हें और कुछ नहीं करना था सिवाय काफी लम्बे काल खण्ड से अपने राज्य पर शासन करने के और औरंगजेब के पास सैन्य शक्ति या धन शेष नहीं बचा था अब उनसे लड़ने के लिये । औरंगजेब ने जो किया, जब उसने इन सब स्थानों पर अधिकार किया था, पहला कार्य जो उसने किया वह था इन स्थानों का नाम बदल दिया, जैसा कि आप देख सकते हैं उसने विभिन्न प्रकार के पारसीक और अरबी नाम रखे हैं जिनके विविध अर्थ हैं, जैसे कि ब्रह्मपुरी, ब्रह्मपुरी औरंगजेब की ४ वर्षों तक छावनी थी जिसे उसने दायित्वपूर्वक इस्लामपुरी नाम दे दिया था ।

इन चार वर्षों में उसने, उसका स्वयं का सैन्य बिखर रहा था, उसका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था, उसके सभी सरदार पराजित हो रहे थे, फिर भी उसने जेजुरी के खांडोबा मन्दिर पर आक्रमण करने का समय निकाला, १७०२ में और जो भी उसके नियंत्रण में दक्षिण भारत के क्षेत्र थे उनपर जजिया कर लगा दिया । तो ये सभी स्थान, यदि वो उनके अधिकार में कुछ और लम्बे समय तक रहा होता, उनका नाम बदल दिया गया होता जैसे अजीम तारा, इस्लामपुरी और रहमान बक्श और ये सब । उदाहरण के लिये सिंहगढ़ बक्शिन्दा बक्श हो गया था, उसका नाम अल्लाह का पुरस्कार रख दिया था जो कि बक्शिन्दा बक्श है, परन्तु लगभग मराठाओं के इन दुर्गों को पुनः प्राप्त करने के तुरंत बाद, उनके नाम पुनः उनके मूल नाम ही कर दिए गये थे ।
तो पूरा मुगल साम्राज्य बिखर रहा था और अहमद नगर में, उसकी छावनी स्थापित की गयी थी और इस समय एक रोचक घटना घटी, ये वही औरंगजेब है जो कि एक बड़ी मुगल सेना, ५ लाख की, का नेतृत्व कर रहा था २० वर्ष पूर्व । उसे पता चला कि धानाजी जाधव और नेमाजी शिन्दे और कुछ लोग अहमदनगर में उसकी छावनी पर आक्रमण करने आ रहे थे, उसने अपना ताबीज लिया, उसने कुरान की आयतें पढीं और अपने सेनानायक को दिया, तुम इसे ले लो, ये तुम्हें मराठाओं से लड़ने में सहायता करेगा ।

१७०६ में उसकी छावनी पर आक्रमण हुआ, परन्तु धानाजी जाधव और नेमाजी शिन्दे ने मुगल साम्राज्य को जीवन दान दिया, मेरा मतलब मुगल राजा को, क्यों, क्योंकि इस समय वे लोग इतने शक्तिशाली हो गये थे, वे बड़ी सरलता से उत्तर गुजरात तक, मालवा तक, भोपाल तक जा चुके थे, कि वहाँ पर प्रतीक्षा करना अधिक लाभदायक था, दिल्ली से महाराष्ट्र की ओर जा रहे कोष और धन की प्रतीक्षा करना, उसको बीच में ही अधीकृत कर लेना और अपनी सेनाओं के लिये उसका प्रयोग करना बजाय कि उस व्यक्ति को मार के पूरी समस्या को पुनः आरम्भ करना, क्योंकि ऎसी स्थिति आ चुकी थी कि औरंगजेब को जीवित रखना अधिक लाभदायक था बजाय कि उसको मरे हुए देखना ।
१७०७, ये महारानी ताराबाई की प्रतिमा है कोल्हापुर में, १७०७, औरंगजेब मरा, किसी की रूचि नहीं थी उसका युद्ध लड़ने में । उसके  ४ पुत्र थे, चारों दिल्ली लौट गये । ये सभी सेनाएँ, जो कि दक्खन में लड़ रही थीं, वे सभी जानती थीं कि ये बड़ी सफलता का समय है और युद्ध होने वाला है । वे सभी महाराष्ट्र से लौट गये और ये ७ वर्ष महारानी ताराबाई, जो कि २५ वर्ष की थीं, थीं तरीके से निर्दिष्ट करने में सफल रहीं । वे अब गुजरात के शासक थे, उन्होंने मालवा में जाना आरम्भ कर दिया था, एक ऐसे समय से जब ऎसी स्थिति आ गयी थी जहाँ मराठाओं के पास सह्याद्रि की ४ किलो की छोटी सी पट्टी थी, कोंकण में, दो दुर्ग तमिल नाडु में और शेष सब कुछ औरंगजेब का था, जहाँ पर वो शरिया का विधि स्थापित करना चाहता था ।

वे ऎसी स्थिति पर आ चुके थे जहाँ मराठा साम्राज्य नागपुर में आधा स्थापित हो चुका था, वो मालवा पहुँच चुका था, वो गुजरात पहुँच चुका था, वो पूरा हैदराबाद तक भी पहुँच चुका था, जैसा कि हमने पहले भी देखा तमिल नाडु और कर्णाटक में भी । औरंगजेब मर चुका था, उसका साम्राज्य उसके साथ मर चुका था और हमारे पास चर्चा करने के लिये एक नया साम्राज्य था जो कि मराठा साम्राज्य है । और यहाँ पर इसके साथ मैं अपना चर्चा सत्र समाप्त करता हूँ ।

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1 Response

  1. नवम्बर 27, 2017

    […] (Part 1 पढ़ने के लिए यहां क्लिक करे) […]

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