नमस्कार ! सुसायम् ! सबसे पहले मैं धन्यवाद करना चाहूँगा सृजन फाउंडेशन का और इंटैक का भी, साथ ही यहाँ उपस्थित सभी लोगों का जिन्होंने मुझे आमन्त्रित किया । मैं मुगलों और मराठाओं के विषय पर बोलूँगा, विशेषकर के १६८० – १७०७ के बीच के कालखण्ड के बारे में और मैं आशा करता हूँ कि मेरा ये छोटा सा वक्तव्य सभी लोगों के द्वारा पसंद किया जायेगा ।

तो ये तीन या चार भागों के बारे में होगा – एक छत्रपति शिवाजी के बारे में, फिर छत्रपति राजाराम उनके पहले छत्रपति सम्भाजी, और महारानी ताराबाई । मुगलों से एक बहुत लम्बी लड़ाई लड़कर इन चार लोगों ने यह सुनिश्चित किया कि मुगल दक्खन से बाहर ही रहे । जिस युद्ध विशेष की हम चर्चा कर रहे हैं वो एक बहुत लम्बे कालखण्ड में लड़ा गया, जो कि २७ वर्ष जितना था, और २७ वर्ष एक पूरी पीढ़ी होती है । तो लोगों की एक पूरी पीढ़ी केवल एक युद्ध लड़ने में बीत गयी । लाखों लोग, लाखों सिपाही बलिदान हुए, बहुत धन की हानि हुई, और एक पूरा साम्राज्य गिर गया, इस निरन्तर चली लम्बी लड़ाई का यह परिणाम रहा ।

तो अब आते हैं उन कारणों पर कि मराठा क्यों इसके अन्त में विजयी हुए, हमें छत्रपति शिवाजी के समय से आरम्भ करना होगा । छत्रपति शिवाजी का उदय होने से पहले भारत के इतिहास में तीन महत्त्वपूर्ण घटनाएँ घट चुकी थीं – एक तो पानीपत का दूसरा युद्ध, तालिकोट का युद्ध और देवगिरि यादवों का पतन । इन तीन घटनाओं के घटने से उत्तर भारत में अन्तिम सम्भव हिन्दू राज्य और दक्षिण भारत में अन्तिम हिन्दू राज्य समाप्त हो चुके थे और महाराष्ट्र में, शिवाजी के आने से पहले देवगिरि यादव अन्तिम हिन्दू शक्ति थे ।

तो हमारे लिए यह जानना महत्त्वपूर्ण था कि क्यों ये शक्तियाँ, जो कि बहुत शक्तिशाली थीं, जिनके पास संख्या भी थी, आक्रान्ताओं से पराजित हुए । पानीपत का दूसरा युद्ध मुख्यतः हेमचन्द्र की वीरगति होने से हारा गया । तालिकोट का युद्ध इसलिये हारा क्योंकि जिस तरह की नीतियाँ राज्य में पहले स्थापित की गईं थीं, उनका पालन नहीं किया गया । उत्तराधिकार को लेकर बहुत सी राजनीति चल रही थी । और ये सारी युद्धभूमि व्यक्ति केन्द्रित थी, एक व्यक्ति पर केन्द्रित थी, और फिर जब वह व्यक्ति मरा, बल्कि पकड़ा गया और मारा गया, पूरा युद्ध प्रभावित हुआ, पूरा युद्ध व्यूह बिखर गया । कोई दूसरी योजना थी ही नहीं, बचकर पुनः लड़ने की कोई योजना नहीं थी ।

इस प्रकार हमने उत्तर भारत और दक्षिण भारत में राज्य गँवाए । तीसरी बात, देवगिरि यादवों के अधिकार में उस समय की सबसे धनी नगरी, देवगिरि, जो कि वर्तमान औरंगाबाद के समीप है, थी । इसका दुर्ग बहुत दृढ़ था परन्तु देवगिरि यादवों का पराजय एक शास्त्रीय उदाहरण है कि अपने अधिकार में दुर्ग होने पर किस प्रकार युद्ध नहीं करना चाहिये । अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली से आक्रमण किया और जब तक उसकी १५,००० सिपाहियों की सेना देवगिरि से १५ मील की दूरी तक नहीं पहुँच गयी तब तक इन लोगों को पता ही नहीं था कि एक आक्रमण हो रहा है । क्योंकि उसने सोचा कि ये समस्याएँ उत्तर भारत की हैं और ये लोग दक्षिण की ओर नहीं आने वाले हैं और जिस समय तक ये भीषण सैन्य आया और आकर उस पर्वत शृंखला को पार नहीं किया, सातपुरा पर्वत शृंखला, तब तक उसको कोई अनुमान नहीं हुआ कि क्या हो रहा है ।

इसी समय अलाउद्दीन खिलजी का स्वयं का गुप्तचर विभाग बहुत दृढ़ था । उसने ठीक ठीक जान लिया था कि यही वो समय है जब देवगिरि अपने सर्वश्रेष्ठ सेनाध्यक्षों को और अपने राजकुमार को दक्षिण के अभियान पर भेजेगा और उनका सबसे शक्तिशाली सैन्य राज्य को बचाने के लिये उपलब्ध नहीं होगा । तो उसका गुप्तचर विभाग इतना शक्तिशाली था कि उसने अपने अभियान को अच्छे ढ़ंग से नियोजित किया ।

उन्होंने इस देवगिरि दुर्ग पर आक्रमण किया जिसमें एक ही द्वार था प्रवेश और निकास के हेतु, तो करना केवल इतना था कि उस एक द्वार को बाधित करना था । और वो व्यक्ति, देवगिरि यादव मानता था कि उनके पास अन्न का पर्य्याप्त भण्डार है जो कि ६, ८, १० मास तक चलेगा जब तक उनका सैन्य जो कि दक्षिण भारत में था, लौट आयेगा । परन्तु व्यवस्था इतनी लचर थी कि जब उन्होंने अपने भण्डारगृह खोले तो देखा कि उसमें सैंधा नमक ही था कोई अन्न नहीं । अन्तिम परिणाम ये हुआ कि अलाउद्दीन खिलजी ने बड़ा सरल विजय पाया और उस बिंदु से याने लगभग सन् १२९८ से, महाराष्ट्र में बहुत समय तक कोई हिन्दू शक्ति न थी, जब तक छत्रपति शिवाजी का उदय न हुआ ।

कारण कि मैं ये सब बता रहा हूँ यह है कि इस प्रकार की चुनौतियाँ थीं जिनका छत्रपति शिवाजी को सामना करना पड़ा होगा जब वो सत्ता में आये और हिन्दवी स्वराज्य की वास्तविक परिक्षा यही थी कि वो इन आघातों को सह पाये या नहीं, वो इन प्रमुख व्यक्तियों के अभाव को सह पाये या नहीं, दुर्ग आक्रमण को, एक बड़े स्तर के आक्रमण को, सह पाये या नहीं, और क्या वो एक आनुशासनिक और सैन्य व्यवस्था को स्थिर रख सकता है, जो कि तालिकोट के स्तर की या पानीपत के दूसरे युद्ध के स्तर के आघात को सह सके ।

छत्रपति शिवाजी ने बहुत से प्रशासनिक और सैन्य सुधार किये, जिन्होंने मराठाओं को बाद के समय में दृढ़ रहने में बहुत सहायता की । ये सब रामचंद्र पन्त की लिखी पुस्तक, आज्ञापत्र में दिए गये हैं, इस व्यक्तित्व के बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे । छत्रपति शिवाजी की सरकार में वो एक अमात्य या राजस्व अधिकारी थे । अष्टप्रधान में वे सबसे युवा थे और बाद में मराठा और महाराष्ट्र  की राजनीति में बहुत महत्ता को प्राप्त हुए । लेकिन उस समय छात्रपति शिवाजी ने बहुत से प्रमुख सुधार किये जो कि समय की परीक्षा पार करने में सफल रहे और उनकी अगली पीढ़ियों को लड़ने में सहायक हुए । सबसे पहले जो उन्होंने किया वो ये था कि वतनदारी प्रथा को समाप्त किया । प्रत्येक दुर्ग, उस समय तक प्रत्येक दुर्ग एक जागीरदारी था, वो एक पूरी तरह निर्मित दुर्ग और एक व्यक्ति जो उसको नियंत्रित करता था, प्रत्येक देशमुख, अपने आप में एक राजा था ।

उन्होंने इस भूमि आधारित अनुदान प्रथा को समाप्त किया और एक वृत्ति आधारित सेना का गठन किया । वृत्ति आधारित सैन्य, वे उनको वेतन देते थे जो कि उस समय भारत में सर्वाधिक था । सैन्य अधिकारी सर्वदा अपने समकक्ष नागरिक व्यवस्था संबंधी अधिकारियों से अधिक वृत्ति पाते थे
। तो परिणामस्वरूप, वो इन सब विभिन्न लोगों को, इन सब वतनदारों को अपने सैन्य में ला सके और एक वृत्ति आधारित सैन्य का गठन किया जो कि अपने समय से कम से कम १५० – २०० वर्ष आगे का विचार था । और इसमें हम यह भी देखते हैं कि शिवाजी ने उस समय की प्रचलित व्यवस्था में, मुगल मनसबदारी व्यवस्था में एक दोष पहचाना । ये व्यवस्था दृढ़ थी, दृढ़ रूप से चल रही थी, इसने एक पूरा साम्राज्य खड़ा किया था, कश्मीर से लेकर कल्याण और नर्मदा तक ।

परन्तु शिवाजी ने देखा कि इस मनसबदारी व्यवस्था में एक दोष है । वो दोष ये है कि एक बहुत दृढ़ केंद्रीय व्यक्तित्व अपेक्षित है इन मनसबदारों को यथास्थान स्थिर रखने के लिये, साथ ही ये व्यवस्था श्वान श्वान के पीछे पड़ा रहे, ऎसी थी, प्रत्येक मनसबदार और ऊँची मनसबदारी के लिये यत्नशील था, उनके लिये और कोई प्रेरणा न थी । एक ५०० की मनसबदारी वाला व्यक्ति जाकर युद्ध लड़ता और बदले में एक सहस्र की मनसबदारी की अपेक्षा करता । मुगल साम्राज्य या मुगल पताका के लिये लड़ने की कोई भावना नहीं थी, लोग स्वयं के लिये लड़ते यही स्थिति थी, एक प्रतियोगिता में उतरना और पर्याप्त धन एवं सैन्य लेकर साम्राज्य का विस्तार करना ।

तो शिवाजी ने इस दोष को पहचाना और सबसे पहले वतनदारी प्रथा को समाप्त किया और दूसरा ये कि हिन्दवी स्वराज्य का पूरा सिद्धान्त प्रस्तुत किया । उन्होंने कहा कि हम एक आदर्श के लिये लड़ने जा रहे हैं, ये एक ऐसी बात थी जो पूरी तरह से भिन्न थी उस समय से जब लोग बस केवल राजा के लिये लड़ रहे थे । राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ और सारा युद्धक्षेत्र १८० डिग्री परिवर्त्तित हो जाता, यही पानीपत के दूसरे युद्ध के समय हुआ । एक लक्ष्यहीन बाण हेमचन्द्र को लगा, वो अपने हाथी से गिरे और पूरा युद्धक्षेत्र चारों दिशाओं में भाग निकला । क्यूँ ? क्योंकि कोई आदर्श स्थापित नहीं था, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, यही आदर्श था । तो जैसे ही ये लाठी हेमचन्द्र के हाथ से छूटी, सारा युद्ध हारा गया ।

तो इस भाव को शिवाजी ने नियंत्रित किया हिन्दवी स्वराज्य का सिद्धान्त लाकर । कि आप एक निश्चित आदर्श के लिये लड़ रहे हैं एक निश्चित पताका के लिये लड़ रहे हैं, और ये राज्य मेरे बारे में नहीं है, ‘हे स्वराज्य व्हावे ही श्रींची इच्छा’, ये स्वराज्य परमेश्वर की इच्छा है, ये मेरी इच्छा नहीं है, ये छत्रपति शिवाजी का स्वराज्य नहीं है, ये परमेश्वर की इच्छा है जिसके लिये तुम लड़ रहे हो और यही आदर्श है जो अगले २७ वर्षों तक खड़ा रहा । तो ये उन्होंने वैचारिक स्तर पर किया, अब हम दुर्गों पर आते हैं, जैसा मैंने उल्लेख किया कि कैसे देवगिरि का दुर्ग लड़ा गया या कहें हारा गया । और शिवाजी ने क्या किया कि उन्होंने किस प्रकार दुर्ग बनाये जाएँ इसको लेकर बहुत परिवर्त्तन किये । उन्होंने अनेकों प्रवेश व निकास द्वार बनवाये । यदि आप महाराष्ट्र जाएँ तो देखेंगे कि इनमें से प्रत्येक दुर्ग के अनेक प्रवेश व निकास द्वार हैं ।

जैसे उदाहरण के लिये, ये तोरणा का दुर्ग, झुंजार माची, एक प्रवेश द्वार यहाँ से है और एक और प्रवेश दुर्ग के विपरीत छोर से है, बुढला माची से । तो अनेक प्रवेश द्वार, पुनः उन्होंने वास्तु भी इसी अनुसार किया, उन्होंने दुर्गों की दोहरी भित्तियाँ बनाईं, जैसे राजगढ़ । उन्होंने निश्चित किया कि दुर्ग में पर्याप्त मात्रा में अन्न हो, दुर्गों को स्वावलम्बी बनाया, आप अपना अन्न दुर्ग में ही उगा सकते थे स्वयं, जल की विपुलता थी, उन्होंने बहुत से जलाशय बनवाये और वास्तविकता में दुर्ग स्वयं ही युद्ध करने में सक्षम थे । उदाहरण के लिये, रामसेज का दुर्ग, जो कि नासिक के उत्तर में कहीं है, ये कोई बड़ा दुर्ग नहीं है, शिवाजी के लघु दुर्गों में से है, परन्तु जब औरंगजेब ने आक्रमण किया तो ये एक ही दुर्ग छः वर्षों तक लड़ा, एकाकी । तो इस प्रकार की क्षमताएँ थीं जो छत्रपति शिवाजी की नीतियों ने महाराष्ट्र के दुर्गों में स्थापित कीं । और एक दूसरा महत्त्वपूर्ण परिवर्त्तन जो वे लाये, जब वे मुगल बन्दीगृह से १६६८ में भागे थे वे जानते थे कि एक दिन मुगल दक्खन आयेंगे, औरंगजेब आयेगा और और प्रयास करेगा कि वो सब मिटा दे जो शिवाजी ने बनाया है, छत्रपति शिवाजी ने इतने वर्षों में जो बनाया है । और इसको ध्यान में रखे हुये, १६७० में , हम देख सकते हैं कि वे कितने दूरद्रष्टा थे कि १६७० में ही उन्होंने कुछ धन आरक्षित किया, १,२५,००० दुर्गों के पुनःस्थापन के लिये, १,७५,००० लोगों को शिक्षित करने और सिपाहियों को सेना में प्रविष्ट करने के लिये जो इन दुर्गों के लिये लड़ें ।

और ये सारा धन दुर्गों में वितरित कर दिया, लगभग ५,००० सिंहगढ़ के लिये, १०,००० तोरणा के लिये, ५,००० रायगढ़ के लिये, ये सब भिन्न भिन्न स्थानों के लिये क्योंकि उन्हें पता था कि जब मुगल सेना आक्रमण करेगी तो हो सकता है कि एक केन्द्रीय स्थल जैसे रायगढ़ के लिये सबकुछ नियंत्रित करना अशक्य हो । दुर्ग एक दूसरे से पृथक् हो जायेंगे और उनके पास वो सामर्थ्य, वो समय या वो धन नहीं होगा कि हर बार रायगढ़ जाकर धन माँगे, सहाय माँगे और पुनः दुर्ग को वापिस लौटे, तब तक तो दुर्ग पराजित हो चुका होगा । इसलिये उन्होंने ये सारा धन इनमें से प्रत्येक दुर्ग को दिया और इसीलिये ये लम्बी कालावधि तक डाले गये घेरों को सह सके क्योंकि उन्हें जीर्णोद्धार व नये सिपाहियों के लिये चिंतित नहीं होना था ।

उन्होंने जोड़ेदार दुर्गों की भी व्यवस्था की, याने यदि एक दुर्ग पराजित होने वाला हो या उसे कुछ आवश्यकता हो तो वो सरलता से निकटके दुर्ग से पूरी की जा सके । इसीलिये हमें दुर्ग जोड़ों में दिखायी देते हैं । पुरन्दरगढ़ और वज्रगढ़ एकसाथ हैं, राजगढ़ और तोरणा एक साथ हैं, रामसेज और त्र्यम्बक एक साथ हैं । त्र्यम्बक के दुर्ग से हो रही वस्तुओं की आपूर्ति के कारण ही रासमेज ६ वर्षों तक निरन्तर युद्ध लड़ता रहा । तो ये स्थिति थी, इस प्रकार का साम्राज्य शिवाजी ने खड़ा किया ।

और ये करने के पश्चात्, राज्याभिषिक्त होने के पश्चात्, छत्रपति शिवाजी दक्षिण भारत के अभियान पर गये और एक ऐसे साम्राज्य का निर्माण किया जो कि जिञ्जी तक विस्तृत था, आप देख सकते हैं कि ये है छत्रपति शिवाजी द्वारा निर्मित मूल राज्य । ये स्वराज्य है, कारवार से नासिक के उत्तर तक विस्तृत, लगभग गुजरात की सीमा तक । परंटी १६७६ में वे दक्षिण भारत के अभियान पर गये अनेक कारणों से, जिनमें से एक ये था कि आदिल शाही राज्य में बहुत सम्पदा थी, आदिल शाही राज्य लगभग यहाँ था, इस भाग में । इस भाग के आस पास क़ुतुब शाही थी । और कुछ अर्ध-स्वतन्त्र हिन्दू राजा थे सुदूर दक्षिण में, तो एक कारण सम्पदा थी । दूसरा वे एक आपदाश्रय चाहते थे स्वराज्य के दक्षिण में, यदि उत्तर से आक्रमण हो तो कहाँ जाएँ ? वे घिरे हुये हैं और इसलिये पीछे लौटने के लिये एक स्थल की आवश्यकता है और इस प्रकार उन्होंने कोपबल, वेल्लोर और

जिञ्जी जैसे स्थान अधिकृत किये ।

तञ्जोर मराठा, दुर्भाग्य से तञ्जोर मराठाओं से उनका एक छोटा कलह भी हुआ जो कि उनके सौतेले बन्धु थे परन्तु अन्त में उनका इस बड़े क्षेत्र पर अधिकार हुआ । ये रोचक बात है कि जिञ्जी का किला, जो कि तमिल नाडु में है, उनको बिना एक गोली चलाये या एक सिपाही को मारे प्राप्त हो गया था । आदिल शाही बीजापुर का एक हबशी या इथियोपियन अधिकारी जिञ्जी में था, उसका नाम अब्दुल मोहमाद सईद था और वो किले के अन्दर था जब छत्रपति शिवाजी ने उस किले को घेरा । इसी बीच, एक व्यक्ति यहाँ से चला, बीजापुर से, जिसका नाम शेर खान लोधी था और शिवाजी इनके बीच में कलह करवाने में सफल हुए और इस कारण उन्हें जिञ्जी का किला प्राप्त हुआ । ये किला बहुत महत्त्वपूर्ण बन जाता है, जब छत्रपति राजाराम का समय आता है । तो ये स्थिति शिवाजी ने निर्मित की थी जब तक उनका १६८० में देहांत हुआ । उन्होंने सारी नीतियाँ स्थापित कीं, उन्होंने ये सब विभिन्न क्षेत्र जीते और उस समय जैसे ही युद्ध आरम्भ होने वाला था, १६८० में उनका देहान्त हो गया ।

औरंगज़ेब ने लगभग १६८१ – ८२ में आक्रमण किया । वो एक ऎसी सेना लेकर आया जो कि ४ से ५ लाख सिपाहियों जितनी थी, उसने औरंगाबाद में पड़ाव डाला, औरंगाबाद उस समय पूरी तरह मुगलों के हाथ में था । उसने पड़ाव वहाँ डाला जहाँ आज औरंगाबाद है, पड़ाव की परिधि ३० मील थी और पड़ाव के पीछे चलने वाले और बाक़ी सब लोग मिलाकर लगभग ६ से ७ लाख बनता था । आप इसकी तुलना इस तथ्य से कर सकते हैं कि जब मराठाओं ने अपनी सबसे बड़ी सेना पानीपत में खड़ी की तो वो डेढ़ से दो लाख मात्र थी । तो ये शक्ति थी जिसका सामना किया गया । बल्कि ये माना जाता है, कि ये सेना जो औरंगाबाद में एकत्र हुई थी, मध्य काल में एक स्थान पर एकत्र हुई सबसे बड़ी सेनाओं में से थी ।

औरंगाबाद लगभग यहाँ है और ये वो स्थान हैं जो कि बाद में युद्ध में महत्त्वपूर्ण बन जायेंगे । तो मुगलों के साथ एक लंबा युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले शिवाजी का देहान्त हो गया और वे छत्रपति सम्भाजी द्वारा उत्तराधिकृत हुए, जो कि सिंहासनारूढ होने के समय लगभग २५ वर्ष के थे । छत्रपति शिवाजी के सम्मुख एक विशाल मुगल सैन्य था और उन्होंने कम से कम ६० से ७० युद्ध लड़े । उन्होंने स्वयं निजी रूप से लगभग १० से १५ युद्ध लड़े, परन्तु उनके नेतृत्व में मराठाओं ने लगभग ६० से ७० युद्ध लड़े, जो कि आप ये सब हरे बिन्दु इस चित्र में देख सकते हैं । ये सभी वे युद्ध हैं जो मराठाओं ने मुगलों से लड़े १६८२ से १६८९ के मध्य । ये ७ या ८ वर्ष का निरन्तर युद्ध, इसमें उन्होंने लगभग ७० लड़ाइयाँ लड़ीं और विजयी हुए, या विजयी माने गये, परन्तु सभी ७० युद्धों को झेल गये ।

एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति, हम्बीर राव मोहिते नाम का, वई में इनमें से एक युद्ध में लगभग १६८७ में मारे गये । वे छत्रपति शिवाजी के अधीन भी सरनौबत सेनापति थे, छत्रपति सम्भाजी के काल में भी रहे और वे मराठाओं की ओर से प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे जिनका देहान्त हुआ । ये सब लाल बिंदु जो आप देख रहे हैं, ये पुर्तगालियों के विरुद्ध लड़े गये युद्ध हैं । इनमें से अनेक युद्ध छत्रपति सम्भाजी स्वयं लड़ रहे थे और यही वो समय था जब इन्क्विजिशन चल रहा था, पुर्तगाली इन्क्विजिशन, ये कुछ बलपूर्वक गोवा के कोंकण क्षेत्र में था और छत्रपति सम्भाजी को बहुत श्रेय जाता है कि उन्होंने पुर्तगालियों से बहुत से स्थान जीते और स्वराज्य को पूरा गोवा और कोंकण क्षेत्र तक विस्तृत किया ।

नीले बिन्दु वे युद्ध हैं जो छत्रपति सम्भाजी ने जंजीरा के सिद्दी के विरुद्ध लड़े, ये व्यक्ति इथियोपिया या अबीसीनिया से था, जिसने एक छोटा सा टापू मुरुड के तट के सहारे लगभग इस क्षेत्र में अधिकृत किया था । और वो निरन्तर कोंकण क्षेत्र पर आक्रमण करता था । तो सम्भाजी ने उसके साथ भी बहुत से युद्ध लड़े । तो उनका पूरा जीवनकाल, लगभग १० वर्षा मुगलों या पुर्तगालियों और जंजीरा के सिद्दियों के विरुद्ध लड़ते हुए बीता, और युद्ध का पहला चरण जिसमें मुगलों के पास बहुत नवीन सेना थी, उन्होंने उसकी काट की, वो उनसे लड़ने में समर्थ हुए और आप इस चित्र में देख सकते हैं कि वो वास्तविक रूप में पूरे पश्चिमी महाराष्ट्र में लड़ रहे थे ।
पूरा युद्धक्षेत्र छत्रपति सम्भाजी का था और वे मुगल आक्रमण को रोकने में सफल रहे । दुर्भाग्यवश, छत्रपति सम्भाजी १६८९ में फरवरी के महीने में पकड़े गये । वे संगमेश्वर नाम के एक स्थान में पकड़े गये, उनके पकड़े जाने को लेकर थोड़ा विवाद है, परन्तु तथ्य यह है कि वे पकड़े गये और मुगल छावनी, जो कि तुलापुर में थी, को ले जाये गये । छत्रपति सम्भाजी जो कि अपने आप में एक राजा थे, तुलापुर छावनी में भाण्ड के परिधान में, घंटियों वाली टोपी पहनाई गयी उनको, फिर उनको एक गधे पर बिठाया गया और इस तरह औरंगज़ेब के मुगल पड़ाव तक ले जाया गया ।

उनके पकड़े जाने के बाद, उनको शृंखलाओं से बांधा गया, उनको एक यातनागार जैसे वस्तु में रखा गया, जहाँ उनके नेत्र पहले बुझा दिए गये, फिर उनकी जिह्वा काटी गयी, ये सब उनके जीवित रहते और उनके नेत्र नष्ट करने तथा जिह्वा काटने के बाद, उनकी त्वचा उतारी गयी, कोई पानी नहीं दिया गया, कोई भोजन नहीं दिया गया और लगभग ५ से १० दिन बाद, उनका सिर काट कर ह्त्या कर दी गयी और सिर काटने के बाद, बिना आँखों का बिना जिह्वा का ये सिर जो काटा गया था, एक शूल पर रखा गया और औरंगज़ेब का आदेश था कि उसको महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर ले जाया जाये, उस समय के प्रमुख दुर्ग,  जैसे सातारा और पण्हाला, और सिर की प्रदर्शनी की गयी जिससे लोग हतोत्साहित हों । कुछ समय के लिये हतोत्साह था कि इस शत्रु से तुम कैसे लड़ोगे जिसने हमारे छत्रपति को पकड़ लिया, उनका सिर काट दिया, उनके शरीर की सब जगह प्रदर्शनी की और फरवरी से लगभग जून या जुलायी तक मराठाओं के किलों की बहुत बड़ी संख्या मुगलों ने जीत ली ।

मराठाओं के लिये स्पष्टतः एक बड़ी समस्या हो गयी क्योंकि अब उनका कोई राजा न था । राजा मारा जा चुका था, छत्रपति सम्भाजी का एक पुत्र था, जो कि उस समय प्रायः ६ वर्ष का था, वो अपनी माता, जिनका नाम येसुबाई था, के साथ रायगढ़ में था । वो ६ वर्ष का था, वो ही वास्तविक रूप से उत्तराधिकारी था, परन्तु निश्चित रूप से ये समय नहीं था कि ६ वर्ष का व्यक्ति राज्य करना आरम्भ करे । छत्रपति सम्भाजी के एक कनिष्ठ भ्राता थे जिनका नाम राजराम था, जो कि १९ वर्ष के थे और व्यावहारिक रूप से गृहबन्दी थे, उन्होंने कोई राज्य सम्बन्धी दायित्व या कोई प्रशासनिक दायित्व नहीं निभाया था पहले बल्कि अपने पूरे जीवन में नहीं निभाया था । परन्तु उस समय, वही सबसे योग्य व्यक्ति थे अपने आयु के अनुसार । तो छत्रपति शिवाजी के एक सरदार जो अभी तक बचे रहे जिनका नाम येसाजी कनक था, वो उनको रायगढ़ लाये और वो १६८९ में मराठाओं के शासक घोषित हुये । ये मार्च १६८९ की बात है । तो सार ये था कि उन्होंने अपने अधिकांश दुर्ग गँवा दिये थे, उनके छत्रपति की हत्या हो चुकी थी, उनके नये छत्रपति को प्रशासन के बारे में अभी तक कुछ पता नहीं था, उन्होंने वास्तविक रूप से कभी भाग नहीं लिया था, वे जानते थे क्योंकि प्रशिक्षण इसका हुआ था परन्तु उन्होंने किसी प्रकार की सरकार या राज्यव्यवस्था की सेवाओं अभी तक भाग नहीं लिया था और औरंगजेब राजधानी के निकट आ रहा था ।

तो वे सब स्थितियाँ जो कि पानीपत के द्वितीय युद्ध, या तालिकोट के युद्ध के समय या देवगिरि यादवों के पराभव के समय थीं, लगभग पूरी तरह यहाँ भी थीं । तो अब छत्रपति शिवाजी की वास्तविक परीक्षा थी कि क्या उनकी नीतियाँ औरंगजेब के साथ वास्तविक युद्ध में उत्तीर्ण हो पायेंगीं । क्योंकि अब हमारे पास बिना राजा का राज्य है, एक राजधानी जो कि हारी जानेवाली है और सेनानियों का एक समूह, एक सेना जो कि पूरी तरह हतोत्साहित है । ये सब रायगढ़ में हो रहा था तो छत्रपति राजाराम और उनके कुछ परामर्शदाता जैसे रामचन्द्र पन्त और सन्ताजी, पन्त सचिव व अन्य एकत्र हुये और निर्णय किया कि अभी यही करना सर्वोचित है कि रायगढ़ से पलायन किया जाये और सुदूर जिञ्जी में शरण ली जाये, ये बहुत ही महत्त्वाकांक्षी योजना थी क्योंकि ये पूरा क्षेत्र, कुछ छोटे स्थानों को छोड़कर, पूरी तरह मुगलों के हाथों में था । तो वास्तव में मुगल राज्य से निकलकर जाना, जिञ्जी पहुँचने के लिये, इसके पीछे सारा विचार ये था कि युद्ध रद्द हो जाये ।

अभी तक ये पश्चिम महाराष्ट्र के आस पास केन्द्रित था पर ऐसा करके राजाराम मुगल सेना को विभिन्न मोर्चों पर लड़ने हेतु बाँटना चाहते थे, पश्चिम महाराष्ट्र में लड़ना और तमिल नाडु में और एक मोर्चा खोलना जिससे कि वे दो भिन्न – भिन्न स्थानों पर लड़ें और इससे लड़ाई रद्द हो जाये । तो ये मार्ग उन्होंने पलायन हेतु लिया, रायगढ़ से उन्होंने आरम्भ किया, वो पण्हाला नामक एक स्थान को पलायन कर गये, रायगढ़ से पलायन तब किया गया जब जुल्फिकार खान पहले ही दुर्ग को घेर चुका था और लगभग जीतने वाला था, परन्तु एक पिछले द्वार से, गुप्त निकासों में से एक के द्वारा जो कि वाघ दरवाजा नाम से जाना जाता था, राजाराम पलायन करने में सफल हुये और पहले पण्हाला भाग गये, पुनः मुगल सेना पण्हाला आयी तो उन्होंने पुनः सातारा में एक दुर्ग को पलायन करना पड़ा और पुनः और तीन चार अन्य दुर्गों को जाने के पश्चात् वे बळ्ळारी के दक्षिण को चले गये ।

वे एक दूसरे समय तुङ्गभद्रा के टापू पर मुगलों की पकड़ से बचे, यहीं कहीं पर रानी बेड्नूर की रानी चेन्नम्मा ने उन्हें आश्रय दिया और ये अनजानी कथाओं में से एक है जहाँ कर्णाटक में एक रानी, एक कन्नडिगा रानी ने एक मराठा राजा को आश्रय दिया, शिवाजी का योगदान हिन्दवी स्वराज्य को जानते हुये और ये जानते हुये कि वो शिवाजी का पुत्र था । और अन्ततः प्रायः १६८९ के अक्टूबर में राजाराम जिञ्जी के दुर्ग को पहुँचने में सफल रहे । एकदा छत्रपति राजाराम जिञ्जी पहुँचते तो स्पष्टतः एक योजना क्रियान्वित होनी थी परन्तु ऐसी योजना जो कि मुगलों से लड़ने में कारगर हो ।

तो एकदा दो विभाजन किये जा चुके हैं कि कुछ लोग पश्चिम महाराष्ट्र में, हिन्दवी स्वराज्य के मुख्यस्थान पर औरंगजेब से लड़ रहे हैं और मुगलों ने अब जुल्फिकार खान और कुछ सरदार प्रायः २५,००० सिपाहियों के साथ जिञ्जी गये जिससे कि दुर्ग को घेरा जाये और राजाराम को बन्दी बना सके । तो अब राजाराम ने दो लोगों को नियुक्त किया, एक रामचन्द्र पन्त बावड़ेकर, और दूसरा, शंकराजी पन्त सचीव ।

रामचंद्र पन्त बावड़ेकर, जैसा कि मैंने पहले कहा, छत्रपति शिवाजी की सभा में सबसे युवा मंत्री थे । उनको अब “हुकूमत पनाह” की उपाधि दी गयी, इसका सार ये था कि दक्खन में, पश्चिम महाराष्ट्र में जो भी हो रहा था उसका अधीक्षक उनको बना दिया गया, विशेष रूप से दक्षिणी क्षेत्रों का अधीक्षक । उत्तरी क्षेत्रों का अधीक्षक शंकराजी पन्त सचीव को बनाया गया, और इनके अधीन दो बहुत ही कुशल योद्धा, सेना नायक दिए गये, इनके नाम संताजी घोरपड़े और धानाजी धानव थे । ये दो लोग ही कारण हैं कि किस प्रकार मराठा जीते, विशेषकर १६९० से १७०७ के मध्य । वे बहुत कुशल योद्धा थे, संताजी घोरपड़े ने सही समय पर छत्रपति शिवाजी के काल में आरम्भ किया था, जब वे लगभग १८ – १९ वर्ष के थे, वे छत्रपति संभाजी के अधीन भी निरन्तर रहे, ह्म्बीर राव मोहिते के अधीन जो कि उस समय सेनापति थे और जब हम्बीर राव मोहिते का देहान्त हुआ और छत्रपति संभाजी पकड़े जा चुके थे, ये दो लोग जो कि उस समय तक, मेरे विचार से ३० वर्ष के थे, वे मराठा सेना के सरनौबत या सेनापति बने और मिलकर उन्होंने बहुत से युद्ध लड़े जिससे वे मुगलों की काट करने में सक्षम हुए ।

परन्तु पहले, १६९० में, जब राजाराम जिञ्जी के मार्ग पर थे और मराठा सैन्य के लिये बहुत थोड़ी आशा थी और बहुत से मराठा सरदार द्रोह करके मुगल सेना में जाना आरम्भ कर चुके थे । रामचंद्र पन्त को ऐसा कुछ करने का निर्णय लेना था जिससे सेना का उत्साह बढे क्योंकि इस समय पराजय निश्चित दिख रही थी । तो पूरी भूमि को देखते हुए, महाराष्ट्र में ३ – ४ दुर्गों को छोड़कर, जिञ्जी का दुर्ग, वेल्लोर का दुर्ग और संभवतः कोप्पल का एक दुर्ग, शेष सब कुछ कश्मीर से लेकर दक्षिण तक मुगल साम्राज्य का अंग थी । कुछ स्थानों पर वे लोग बहुत शक्तिशाली नहीं थे, कुछ स्थानों पर शक्तिशाली थे, परन्तु सभी स्थान, तकनीकी रूप से, मुगल राज्य के अधीन थे और उस समय मराठाओं के लिये बहुत सरल होता ये कहना कि हमने बहुत युद्ध लड़ लिये कृपया हमें अपने अधीन स्वीकार कर लीजिये, हम अपना हिन्दवी स्वराज्य समाप्त कर रहे हैं ।

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