छत्रपति शिवाजी ने बहुत से प्रशासनिक और सैन्य सुधार किये, जिन्होंने मराठाओं को बाद के समय में दृढ़ रहने में बहुत सहायता की । ये सब रामचंद्र पन्त की लिखी पुस्तक, आज्ञापत्र में दिए गये हैं, इस व्यक्तित्व के बारे में हम बाद में चर्चा करेंगे । छत्रपति शिवाजी की सरकार में वो एक अमात्य या राजस्व अधिकारी थे । अष्टप्रधान में वे सबसे युवा थे और बाद में मराठा और महाराष्ट्र  की राजनीति में बहुत महत्ता को प्राप्त हुए । लेकिन उस समय छात्रपति शिवाजी ने बहुत से प्रमुख सुधार किये जो कि समय की परीक्षा पार करने में सफल रहे और उनकी अगली पीढ़ियों को लड़ने में सहायक हुए । सबसे पहले जो उन्होंने किया वो ये था कि वतनदारी प्रथा को समाप्त किया । प्रत्येक दुर्ग, उस समय तक प्रत्येक दुर्ग एक जागीरदारी था, वो एक पूरी तरह निर्मित दुर्ग और एक व्यक्ति जो उसको नियंत्रित करता था, प्रत्येक देशमुख, अपने आप में एक राजा था ।

उन्होंने इस भूमि आधारित अनुदान प्रथा को समाप्त किया और एक वृत्ति आधारित सेना का गठन किया । वृत्ति आधारित सैन्य, वे उनको वेतन देते थे जो कि उस समय भारत में सर्वाधिक था । सैन्य अधिकारी सर्वदा अपने समकक्ष नागरिक व्यवस्था संबंधी अधिकारियों से अधिक वृत्ति पाते थे  तो परिणामस्वरूप, वो इन सब विभिन्न लोगों को, इन सब वतनदारों को अपने सैन्य में ला सके और एक वृत्ति आधारित सैन्य का गठन किया जो कि अपने समय से कम से कम १५० – २०० वर्ष आगे का विचार था । और इसमें हम यह भी देखते हैं कि शिवाजी ने उस समय की प्रचलित व्यवस्था में, मुगल मनसबदारी व्यवस्था में एक दोष पहचाना । ये व्यवस्था दृढ़ थी, दृढ़ रूप से चल रही थी, इसने एक पूरा साम्राज्य खड़ा किया था, कश्मीर से लेकर कल्याण और नर्मदा तक ।

परन्तु शिवाजी ने देखा कि इस मनसबदारी व्यवस्था में एक दोष है । वो दोष ये है कि एक बहुत दृढ़ केंद्रीय व्यक्तित्व अपेक्षित है इन मनसबदारों को यथास्थान स्थिर रखने के लिये, साथ ही ये व्यवस्था श्वान श्वान के पीछे पड़ा रहे, ऎसी थी, प्रत्येक मनसबदार और ऊँची मनसबदारी के लिये यत्नशील था, उनके लिये और कोई प्रेरणा न थी । एक ५०० की मनसबदारी वाला व्यक्ति जाकर युद्ध लड़ता और बदले में एक सहस्र की मनसबदारी की अपेक्षा करता । मुगल साम्राज्य या मुगल पताका के लिये लड़ने की कोई भावना नहीं थी, लोग स्वयं के लिये लड़ते यही स्थिति थी, एक प्रतियोगिता में उतरना और पर्याप्त धन एवं सैन्य लेकर साम्राज्य का विस्तार करना ।

तो शिवाजी ने इस दोष को पहचाना और सबसे पहले वतनदारी प्रथा को समाप्त किया और दूसरा ये कि हिन्दवी स्वराज्य का पूरा सिद्धान्त प्रस्तुत किया । उन्होंने कहा कि हम एक आदर्श के लिये लड़ने जा रहे हैं, ये एक ऐसी बात थी जो पूरी तरह से भिन्न थी उस समय से जब लोग बस केवल राजा के लिये लड़ रहे थे । राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ और सारा युद्धक्षेत्र १८० डिग्री परिवर्त्तित हो जाता, यही पानीपत के दूसरे युद्ध के समय हुआ । एक लक्ष्यहीन बाण हेमचन्द्र को लगा, वो अपने हाथी से गिरे और पूरा युद्धक्षेत्र चारों दिशाओं में भाग निकला । क्यूँ ? क्योंकि कोई आदर्श स्थापित नहीं था, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’, यही आदर्श था । तो जैसे ही ये लाठी हेमचन्द्र के हाथ से छूटी, सारा युद्ध हारा गया ।

तो इस भाव को शिवाजी ने नियंत्रित किया हिन्दवी स्वराज्य का सिद्धान्त लाकर । कि आप एक निश्चित आदर्श के लिये लड़ रहे हैं एक निश्चित पताका के लिये लड़ रहे हैं, और ये राज्य मेरे बारे में नहीं है, ‘हे स्वराज्य व्हावे ही श्रींची इच्छा’, ये स्वराज्य परमेश्वर की इच्छा है, ये मेरी इच्छा नहीं है, ये छत्रपति शिवाजी का स्वराज्य नहीं है, ये परमेश्वर की इच्छा है जिसके लिये तुम लड़ रहे हो और यही आदर्श है जो अगले २७ वर्षों तक खड़ा रहा । तो ये उन्होंने वैचारिक स्तर पर किया|