तो इस समय औरंगजेब ने निर्णय लिया कि मैं अन्तिम अभियान पर जाऊँगा, सभी दुर्गों को जीतूँगा और पश्चिम महाराष्ट्र में मुगल राज्य स्थापित करूँगा और परिणामस्वरूप १७०० में, ८५ वर्ष के आयु में, औरंगजेब अपने जीवन के अन्तिम अभियान पर निकला, ये मुगलों के लिये एक सरल अभियान होना था जहाँ वे सभी दुर्गों को जीतने वाले थे और क्योंकि एक २५ वर्ष की महिला शीर्ष पर थी, मराठाओं की ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं होना था । वो और दोषपूर्ण नहीं हो सकता था, क्योंकि वो एक दुर्ग को जाता था और लड़ता रहता था परन्तु महारानी ताराबाई स्वयं सेना का नेतृत्व कर रही थी । अनेकों पत्र जो इन लड़ रहे किलेदारों को भेजे गये, कहते हैं कि वे मुगलों से लड़ने का बहुत बढ़िया काम रहे हैं । ये स्थान लगभग एक वर्ष तक लड़े गये, अन्ततः जैसी नीति उन्होंने पहले अपनायी थी, वे उस दुर्ग का मुगलों को विक्रय कर देते, बहुत बहुत ऊँचे मूल्य पर क्योंकि औरंगजेब बिलकुल तुला हुआ था किसी भी तरह उन दुर्गों को धन देकर प्राप्त करने के लिये । तो ये वास्तव में औरंगजेब की अन्तिम क्रय सूची थी ।

उसने विशालगढ़ पर दो लाख रुपये दिए, उसने सिंहगढ़ के लिये ५० हजार रुपये दिये, उसने शेष दुर्गों के लिये ७० हजार रुपये दिए, उस समय जब ३ या ४ रुपये एक औसत सिपाही की मासिक वृत्ति थी । ५० हजार एक बड़ी राशि थी, जिसके लिये वे आसानी से एक सेना बढ़ा सकते थे दुर्ग को फिर से जीतने के लिये, जो उन्होंने किया । वास्तव में राजगढ़ में, मुगलों ने उस स्थान की बाहरी सीमाओं को जीतने में सफलता पायी थी पर बालेकिल्ला, जो गढ़ था, जो दुर्ग का मुख्य भाग है उसके बाद १५ दिनों तक निरन्तर लड़ता रहा । और धीरे-धीरे और निश्चित रूप से धन की बड़ी मात्रा देकर, वह इन सब दुर्गों को लेने में सफल रहा, तोरणा के अपवाद को छोड़कर । तोरणा एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ, औरंगजेब की सेना के मराठा सरदारों ने, रस्सों की सीढियाँ डालने में सफल रहे, दुर्ग पर चढ़ने में सफल रहे, जिस प्रकार छत्रपति शिवाजी के सैनिकों ने किया था और उस दुर्ग पर अधिकार कर लिया ।  बाकी सब स्थानों का क्रय कर लिया गया, मोटी धन राशि देकर और इसलिये ये समय विभिन्न स्थानों की घेराबन्दी करके उनको जीतने का था ।

धानव जी जाधव, १७०३ में जब औरंगजेब इन दुर्गों को जीतने में व्यस्त था उत्तर में गुजरात तक गये थे, एक स्थान पर जिसका नाम था रतनपुर, जहाँ एक बड़ी मुगल सेना से उनका सामना हुआ, परन्तु वे गड़गड़ाते हुए उनका बड़ा विध्वंस करने में सफल हुए । गुजरात में मुगल सेना की इस पराजय ने मूल रूप से मुगल सेना को गुजरात से साफ़ कर दिया जो कि अच्छा रहा क्योंकि इसके उपरांत खांडेराव दाभड़े ने स्वयं को पूर्ण रूप से स्थापित कर लिया । मुगलों की ये पराजय गुजरात में इतनी भीषण थी, कि इसने लोगों को राजपुताना और मालवा में लोगों को प्रोत्साहित किया, मुगल साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये । अन्ततः औरंगजेब पश्चिमी महाराष्ट्र से पीछे हट गया और वाकिंखेड़ा नाम के एक स्थान पर चला गया, जो कि उत्तरी कर्णाटक में है, जो कि लगभग, इस स्थान के पास है ।

परन्तु निश्चित तौर पर कुछ ऐसे उदाहरण थे जहाँ मराठा और कन्नडिगा राजा एक साथ मिले, मुगल साम्राज्य को खदेड़ने के लिये और वाकेंखेड़ा इसी प्रकार का एक स्थान था । तो बेराड़ वास्तव में निशानेबाज या बंदूकधारी थे, वे धानाजी जाधव द्वारा साथ लाये गये और घेराबंदी तोड़ दी गयी, जब तक घेराबंदी चल रही थी, मराठाओं द्वारा तोड़ दी गयी थी, ये सब दुर्ग, जो ले लिये गये थे, ये सभी दुर्ग जो औरंगजेब द्वारा ले लिये गये थे मराठाओं द्वारा पुनः वापिस लिये गये महारानी ताराबाई के नेतृत्व में । तो १७०५ तक, औरंगजेब इस स्थिति में था जब उसने लगभग सभी कुछ गवाँ दिया था, उसे मिलाकर जो कुछ उसने जीता था, अपने अन्तिम अभियान में । वह अहमदनगर को पीछे हट गया, अहमदनगर को पीछे आ गया था, वह सब कुछ गवाँ चुका था जो कुछ भी उसने अब तक जीता था दक्खन में |

उत्तर भारत में विद्रोह हो रहे थे, मुगलों के साथ अब कोई भी राजपूताना नहीं था । सभी मुगल सरदार, जो द्वितीय और तृतीय श्रेणी के सरदार रहे थे वे अब बहुत शक्तिशाली बन गये थे, क्योंकि अब उन्हें और कुछ नहीं करना था सिवाय काफी लम्बे काल खण्ड से अपने राज्य पर शासन करने के और औरंगजेब के पास सैन्य शक्ति या धन शेष नहीं बचा था अब उनसे लड़ने के लिये । औरंगजेब ने जो किया, जब उसने इन सब स्थानों पर अधिकार किया था, पहला कार्य जो उसने किया वह था इन स्थानों का नाम बदल दिया, जैसा कि आप देख सकते हैं उसने विभिन्न प्रकार के पारसीक और अरबी नाम रखे हैं जिनके विविध अर्थ हैं, जैसे कि ब्रह्मपुरी, ब्रह्मपुरी औरंगजेब की ४ वर्षों तक छावनी थी जिसे उसने दायित्वपूर्वक इस्लामपुरी नाम दे दिया था ।

 

इन चार वर्षों में उसने, उसका स्वयं का सैन्य बिखर रहा था, उसका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था, उसके सभी सरदार पराजित हो रहे थे, फिर भी उसने जेजुरी के खांडोबा मन्दिर पर आक्रमण करने का समय निकाला, १७०२ में और जो भी उसके नियंत्रण में दक्षिण भारत के क्षेत्र थे उनपर जजिया कर लगा दिया । तो ये सभी स्थान, यदि वो उनके अधिकार में कुछ और लम्बे समय तक रहा होता, उनका नाम बदल दिया गया होता जैसे अजीम तारा, इस्लामपुरी और रहमान बक्श और ये सब । उदाहरण के लिये सिंहगढ़ बक्शिन्दा बक्श हो गया था, उसका नाम अल्लाह का पुरस्कार रख दिया था जो कि बक्शिन्दा बक्श है, परन्तु लगभग मराठाओं के इन दुर्गों को पुनः प्राप्त करने के तुरंत बाद, उनके नाम पुनः उनके मूल नाम ही कर दिए गये थे ।
तो पूरा मुगल साम्राज्य बिखर रहा था और अहमद नगर में, उसकी छावनी स्थापित की गयी थी और इस समय एक रोचक घटना घटी, ये वही औरंगजेब है जो कि एक बड़ी मुगल सेना, ५ लाख की, का नेतृत्व कर रहा था २० वर्ष पूर्व । उसे पता चला कि धानाजी जाधव और नेमाजी शिन्दे और कुछ लोग अहमदनगर में उसकी छावनी पर आक्रमण करने आ रहे थे, उसने अपना ताबीज लिया, उसने कुरान की आयतें पढीं और अपने सेनानायक को दिया, तुम इसे ले लो, ये तुम्हें मराठाओं से लड़ने में सहायता करेगा ।

१७०६ में उसकी छावनी पर आक्रमण हुआ, परन्तु धानाजी जाधव और नेमाजी शिन्दे ने मुगल साम्राज्य को जीवन दान दिया, मेरा मतलब मुगल राजा को, क्यों, क्योंकि इस समय वे लोग इतने शक्तिशाली हो गये थे, वे बड़ी सरलता से उत्तर गुजरात तक, मालवा तक, भोपाल तक जा चुके थे, कि वहाँ पर प्रतीक्षा करना अधिक लाभदायक था, दिल्ली से महाराष्ट्र की ओर जा रहे कोष और धन की प्रतीक्षा करना, उसको बीच में ही अधीकृत कर लेना और अपनी सेनाओं के लिये उसका प्रयोग करना बजाय कि उस व्यक्ति को मार के पूरी समस्या को पुनः आरम्भ करना, क्योंकि ऎसी स्थिति आ चुकी थी कि औरंगजेब को जीवित रखना अधिक लाभदायक था बजाय कि उसको मरे हुए देखना ।
१७०७, ये महारानी ताराबाई की प्रतिमा है कोल्हापुर में, १७०७, औरंगजेब मरा, किसी की रूचि नहीं थी उसका युद्ध लड़ने में । उसके  ४ पुत्र थे, चारों दिल्ली लौट गये ।