रविवार, अक्टूबर 24, 2021
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क्यों औरंगजेब मराठाओं से अधिक क्षेत्र हथियाने में असफल रहा

 

तो १६९० के दशक में युद्ध का ये प्रभाव था कि मराठा वास्तव में शक्तिशाली सेना बनाने में समर्थ हुये । उन्होंने छापामारी के युद्ध की मारो और भागो की वही नीतियाँ अपनायीं, ये संघर्षण का युद्ध था और बहुत स्थानों पर युद्ध लड़े जाते हैं । इसके परिणामस्वरूप मुगल कोष पूरी तरह रिक्त हुआ जा रहा था । वे प्रतिवर्ष प्रायः १५,००० लोगों को युद्ध में हारते जा रहे थे । शाह जहाँ, जहाँगीर के समय के कोष, सीधे अकबर के समय से, शाह जहाँ, जहाँगीर, वे द्वार जो लाल किले में कभी खोले नहीं गये अब खोले जा रहे थे भुगतान करने के लिये । बहुत स्थानों पर मराठा एक मुगल सेनानायक को पकड़ते, भुगतान के लिये कहते, उसको छोड़ते और लौट जाते । बहुत स्थानों पर वे दुर्गों का विक्रय कर देते, वे लड़ते लड़ते और लड़ते एक दुर्ग के लिये और ऐसा समय जब आता कि लड़ना अशक्य होता तब धन की माँग करते, वो धन लेते, वो दुर्ग मुक्त कर देते, उस धन से सेना खड़ी करते, वापिस लौटते और उस दुर्ग पर अधिकार कर लेते ।

क्योंकि मुगलों ने घेराबन्दी के युद्ध पर विशवास किया, सिवाय एक बार के जो कि बाद में आयेगा जहाँ उन्होंने तोरणा का दुर्ग जीता । वे छापामारी के जैसे आक्रमणों में नहीं पड़े जैसे मराठा करते थे या रात्रि का सहारा नहीं लिया, कम लोगों का उपयोग नहीं किया, वे सदा घेराबन्दी ही करते, और परिणामतः एक दुर्ग जीतने में बहुत समय लगता और शीघ्र उसे हार जाते । और इस समय तक, १६९० के दशक में मुगल सेनानायक, मुगल सरदार वास्तव में पूरे युद्ध की जामिता से त्रस्त थे, क्योंकि वे वहाँ पर १५ साल से थे, शायद लगभग २० वर्षों से, उनको कुछ मिल नहीं रहा था, वे प्रतिदिन युद्ध हार रहे थे और इसलिये मराठाओं के लिये बहुत सरल हो गया था कि उन्हें भगा दें, पराजित कर दें, उनसे धन ले लें और उन्हें छोड़ दें और इस तरह औरंगजेब, लगभग १५, १६, १८ वर्षों तक लड़ने के बाद भी बहुत क्षेत्र जीतने में असमर्थ रहा और जो कुछ भी उसने जीता, फ़टाफ़ट हार गया और उस पर बहुत समय तक अधिकार बनाये रखने में असमर्थ रहा ।

लगभग १६९८ में जब महाराष्ट्र की परिस्थिति थोड़ी उन्नत हुई, छत्रपति राजाराम ने जिञ्जी का त्याग किया, वे उस घेराबंदी से भी भागने में सफल रहे । अब बहुत से विचार हैं कि वे किस प्रकार भागे, छत्रपति राजाराम की ओर से बहुत से कूटनीतिक प्रयास इस विषय में किये गये, जहाँ वे जुल्फिकार खान को संतुष्ट करने में सफल रहे कि उनको मुक्त करना उसके हित में है । औरंगजेब लगभग ९० वर्ष का था, वो लगभग मरने वाला था और दक्षिण भारत में मुगल सरदार और अधिक महत्त्वपूर्ण होने वाले थे, तो ऐसे समय पर मराठा प्रमुख खिलाड़ी होने वाले थे । तो जुल्फिकार खान ने घेराबंदी उतने बल से नहीं की, जैसे उसने करनी चाहिये थी । वो ८ वर्षों से घेराबंदी किये हुए था । तो एक घेराबंदी रामसेज पर ६ वर्षों के लिये, एक घेराबंदी जिञ्जी पर ८ वर्षों के लिये । मुगलों ने दो दुर्गों के लिये १४ वर्ष व्यतीत किये और महाराष्ट्र में लगभग ३०० दुर्ग प्राप्त किये ।

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