इसके अलावा एक बहुत ही साहसी छापा संताजी घोरपड़े ने औरंगजेब के निजी तम्बू पर मारा । इस समय औरंगजेब का तम्बू कोरेगांव में था, जो कि पुणे के समीप है और वे योजना बना रहे थे यहाँ से चाकन के दुर्ग को जीतने की । उसकी समूची छावनी यहीं पर स्थापित थी, परन्तु संताजी घोरपड़े और उनके गुप्तचरों ने ठीक-ठीक पता लगाया कि छावनी की रूपरेखा क्या है, आप इस कथा की तुलना देवगिरि यादवों के समय में क्या हुआ, उससे कर सकते हैं । वे नहीं जानते थे कि १५ मील दूर क्या हो रहा है, सन्ताजी घोरपड़े ने पूरी छावनी की रूपरेखा जान ली, औरंगजेब का तम्बू कहाँ है ? सभी सिपाही कहाँ हैं ? रात के सन्नाटे में उन्होंने प्रवेश किया, वह एक गार्ड द्वारा रोका गया था |

संथाजी घोरपड़े के साथ करीब 50 सैनिक थे, और पूरी योजना यह थी कि औरंगजेब के तम्बू तक जाकर उसका सिर काटकर अपने साथ विशालगढ़ लाया जाये, ये योजना थी । उन्होंने स्वयं को औरंगजेब के साथ बताकर प्रवेश प्राप्त ये कहकर कि हम सिपाही मात्र हैं को अमुक मराठा सरदार के अधीन हैं, जो कि औरंगजेब के अधीन काम कर रहा है । तो स्पष्टतः हम उससे मिलने जा रहे हैं । जैसे ही प्रवेश प्राप्त किया, प्रतिहारियों की ह्त्या कर दी । दुर्भाग्य से, उस समय औरंगजेब अपने तम्बू में नहीं था । परन्तु संताजी घोरपड़े ने तम्बू की रस्सियाँ काट दीं, पूरे शाही तम्बू को गिरा दिया, एक ऐसे तम्बू की हम बात कर रहे हैं जो कि कम से कम ५०० मीटर बड़ा था, शाही तम्बू को गिरा दिया, इस तम्बू के शीर्ष पर सोने की छड़ियाँ लगी हुई थीं ये दर्शाने के लिये कि ये औरंगजेब का तम्बू है । संताजी घोरपड़े ने वे छड़ियाँ तोड़ दीं और इसके बाद स्पष्टतः लोग चौकन्ने हो गये क्योंकि पूरा शाही तम्बू नीचे गिर गया । वे जीवित भाग निकले, सिंहगढ़ को आये |