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वो जड़ प्रकृति, जड़ स्वभाव पानी के अन्दर है । इसलिये उसको जल कहा जाता है । जल और जड़ में ज्यादा अन्तर नहीं है । ये पानी का धर्म है । पानी को वारि क्यों कहा जाता है ? वृणोति आवृणोति आच्छादयति मेघ के रूप में वो आच्छादित कर लेता है । ये भी पानी का एक धर्म है । इस प्रकार अग्नि को देखो । अग्नि को अग्नि क्यों कहा जाता है ? अग् धातु से निष्पन्न यह शब्द, अग् का मतलब है ऊर्ध्वगमन । अग्नि की जो शिखा है उसका स्वभाव है ऊर्ध्व, ऊपर की ओर जाना । कभी अग्नि की शिखा नीचे नहीं जायेगी । इसलिये अग्र शब्द भी उसी धातु से है । अग्र का मतलब है, जब अग्र आप कहते हैं, सामने देखते हो या ऊपर देखते हो । अग्नि को अनल क्यों कहा जाता है ? अनल का मतलब क्या है ? न अलं से अनल बना है । जैसे न अश्व अनश्व होता है, न अलम् अनल होता है । न अलम् मतलब पर्याप्त नहीं है । अग्नि सर्वदा असन्तुष्ट है । पूरी की पूरी सृष्टि उसके मुख में आ जाये तो भी संतुष्ट नहीं है । अग्नि को कोई शांत नहीं कर पाया । कुछ भी पर्याप्त नहीं है । न अलम् न अलम । यही जब अनुभव हुआ, ये भी अग्नि का एक धर्म है स्वभाव है, तो नाम रखा अनल । तो इस प्रकार हम शब्दों का विश्लेषण करके देखेंगे । तो पानी के लिये अगर ३० शब्द हैं तो यह ३० शब्द पानी के ३० धर्मों के बारों ३० गुणों के बारे में है ३० विशेषताओं के बारे में बताता है । तो एक दृष्टि से हम शब्द ही नहीं सीख रहे हैं, हम पूरा का पूरा विज्ञान ही सीख रहे हैं । एक वैज्ञानिक को क्या चाहिए ? किस ज्ञान है, एक वैज्ञानिक जब पानी को देखता है, एक आम आदमी जब पानी को देखता है, तो उसके अन्दर फर्क क्या होता है ? तो वैज्ञानिक जो – जो तत्त्व निकालता है, आमतौर पर लोग उसको नहीं कर पाते हैं । तो ये जो मुनि ऋषि लोगों का काम ये था, इस प्रकार बनाया इस भाषा को कि पूरा का पूरा विज्ञान इसी में है । हम पढ़ते वक्त अगर अग्नि के ३४ नाम हम जानें, तो अग्नि के ३४ गुणों के बारे में हमको पता होता है । आयुर्वेद के बारे में सोचो । ८००-९०० से ज्यादा पेड़ों का जो द्रव्य गुण हमको मिलता है आयुर्वेद में । हर एक पेड़ का १५-२० गुण जो हैं, उसका स्वभाव और प्रभाव के आधार पर जो शब्द बनाये गये हैं । तो १५ शब्द अगर गुड़चि के लिये हैं, तो गुड़चि का १५ गुण दिखाया गया है जिसके आधार पर औषधियाँ बनता है ।

इस भाषा को अगर इस दृष्टि से देखा जाये, प्रत्येक शब्द अपने इतिहास से सजग है । प्रत्येक शब्द अपने इतिहास से सजग है । शब्द स्वयं ही आपको बता सकता है कि वो क्यूँ एक निश्चित विचार या निश्चित वस्तु का प्रतिनिधित्व क्यूँ करता है । एक वस्तु के लिये व एक विचार के लिये क्यों है ये शब्द । तो वो खुद ही बताता है शब्द । और समस्या है, समस्या का समाधान भी देता है । मैं आपको एक दो उदाहरण यहाँ पर रखना चाहता हूँ । एक मान्त्रिक भाषा जो है, स्वयं विकसित होती है । एक स्वाभाविक रूप से उसका विकास होता है । जैसे पेड़ अपने बीज से फिर मूल बनकर फिर उगता है । इस संस्कृत भाषा की जो उत्पत्ति है, अपने बीजाक्षर से, फिर धातु, मूल धातु, फिर धातु से शब्द, शब्द से फिर बाकी इस प्रकार बना हुआ है । हम कहते हैं कि जब हमको शंका होती है, संशय उत्पन्न होता है, अंग्रेज़ी में हम क्या कहते हैं, doubt doubt. और बताओ सन्देह क्यों होता है ? क्या ‘doubt’ शब्द आपको समझा सकता है कि सन्देह क्यूँ होता है ? सन्देह का स्रोत क्या है ? क्या होता है जब मैं कहता हूँ मैं सन्देह करता हूँ ? एक मानसिक स्तर पर, सही सही क्या अवस्था है सन्देह की या क्या स्रोत है सन्देह का ?

हाँ…. ये कि ये भ्रम होता है । क्यों भ्रम होता है ? क्यों हम सवाल करने बैठते हैं कि सही क्या है गलत क्या है ? उसका निराकरण हम फिर कैसे करेंगे ? अगर हमेशा हमको सन्देह होता रहता है तो उसका स्रोत क्या है ? संस्कृत में शब्द ऐसे नहीं बने हैं । ये भाषा हमेशा हमारी आत्मा के साथ जुड़ी हुई भाषा है । और हमको हमेशा हमारे साथ जोड़ती है । संस्कृत में बहुत सारे शब्द हैं सन्देह के लिये । शंका है, संदिग्धता है, संशय है । एक शब्द मैं लूँगा, सन्देह । सन्देह का मतलब है सन्देह । और इससे मैं आपको दिखाऊँगा समझाऊँगा कि सन्देह का स्रोत क्या है । और इसका निराकरण आप कैसे कर सकते हो । ये अनुभव की बात है । और भाषा को इस प्रकार बनाया गया है । सन्देह में २ उपादान हैं । कौनसे दो उपादान ? ‘सम्’ , जो उपसर्ग है, एक उपसर्ग है, एक कर्मप्रवचनीय है, वो देह । ‘सम्’ उपसर्ग के साथ ‘देह’ शब्द को जोड़ के सन्देह शब्द बना है जिसका अर्थ है सन्देह । अब आप सवाल कर सकते हैं कि क्यों ? इस प्रकार क्यों शब्द बनाया सन्देह के लिये ? सम् का मतलब क्या है ? अंग्रेज़ी में एक शब्द सुना होगा sum. इसका मतलब क्या है ? sum total. ये भी सम् यही है, पूर्णता, कुल योग, पूर्णता, सटीकता, एकत्रता ।

ये हैं सम् की अनुभूतियाँ । अब पहला सन्देह ये होता है कि देह, देह का मतलब क्या है ? शरीर । अब शरीर का सन्देह के साथ क्या सम्बन्ध है ? ये सम् को लेके अच्छा शरीर मतलब सटीक देह । शब्दशः हम उसका अनुवाद करें तो यही हुआ क्योंकि देह का दूसरा अर्थ हमको मालूम ही नहीं । अब यहाँ पे आप सवाल कर सकते हो कि देह को शरीर के लिये देह शब्द का ही प्रयोग क्यों हुआ, फिर देह शब्द का विश्लेषण करते हैं । देह शब्द जिस धातु से आया है, वो है ‘दिह्’, दिह् धातु । दिह् धातु का, धातवः अनेकार्थाः। एक धातु के पीछे अनेक अर्थ हैं, बहुत सारे अर्थ हैं । और ये सारे अर्थ मानव जाति की मौलिक अनुभूतियाँ हैं । ये खाली साधारण इन्द्रिय नहीं हैं । ‘दिह्’ शब्द की जो मौलिक अनुभूति उसके पीछे है वो पहले जो मौलिक है दिह् उपचये । उपचय का मतलब इकठ्ठा करना । इधर-उधर बिखरे चीज़ों को इकट्ठा करना । उपचय । ये पहली अनुभूति है । और भाषा का जो अर्थों का जो अवधारणा है, अर्थों को जैसे सजाया गया है बाद में, तो एक मौलिक विचार जो है, वो दूसरे विचार की ओर ले जाता है । वो पुनः अगले विचारों तक ले जाता है । तो ऐसे कर-करके कर-करके बहुत सारे शब्द, ये सारे सम्बन्धी शब्द हैं । अगर इकठ्ठा करना एक पहली अनुभूति है, तो इकठ्ठा करने का जो अनुभूति है वो कौनसी दूसरी अनुभूति की ओर ले जाता है ? जैसे कि आप लोग वहाँ बैठे हो, मैं यहाँ खड़ा हूँ । और हम लोगों ने तय किया कि हम इकट्ठा करेंगे । क्या इकट्ठा करेंगे ? हम लोगों की रुचि है किताब में । हम सब किताब इकट्ठा करेंगे । यहाँ पे किताब नहीं था । और इकठ्ठा करेंगे, यहाँ सब जमा करेंगे । आपने किताब लाया, मैंने लाया, सब लाके यहाँ पे इकट्ठा किया । तो इकठ्ठा करने से फिर क्या होती है ? यहाँ पे कोई भी किताब नहीं थी, अभी ५०० किताब हो गईं । ० से ५०० हो गयीं ।

क्या है एक्सपीरियंस ? पहले, पहले क्या है कि धातुओं के अर्थ को आप देखेंगे मानसिक स्तर पे, पहले भौतिक अनुभव जो तात्कालिक अनुभव है । अगर यहाँ पे कुछ जमा हो जाता है तो भौतिक अनुभव क्या है ? बढ़ता है । कुछ नहीं था, जीरो से पाँच सौ तक हो गया । बढ़ गया । तो ‘दिह्’ का द्वितीय स्तरीय अर्थ, प्रधान अर्थ एकत्र करने का है, जमा करना, सम्पादित करना, यूथ बनाना, एकत्र करना । अगला विचार इसी अर्थ से आता है, इस मूल (शब्द) का आशय है बढ़ना, वृद्धि होना, विस्तृत होना । जो भी अर्थ हैं उसके । बढ़ना । कुछ नहीं था तो वृद्धि किया । भौतिक रूप से ये बढ़ रहा है । फिर आप के पास मानसिक आशय हैं जैसे विस्तृत होना । फिर वो वृद्धि का भौतिक, अगली भौतिक अनुभूति क्या है ? कुछ अगर वृद्धि कर गया, आप लोग वहाँ बैठे हो मैं यहाँ हूँ और बीच में कुछ वृद्धि कर गया । क्या होता है भौतिक अनुभव ? आप ना तो मुझे देख पा रहे हैं, न मैं आपको देख पा रहा हूँ । क्यों हुआ ? ढकना । ये अवरोधित करता है । कुछ अगर यहाँ पे उगता है, तो दृष्टि अवरुद्ध हो जाता है । तो वृद्धि का भौतिक आशय, तात्कालिक भौतिक अनुभव, ये अवरोधित करता है, ढकता है । फिर उसका मानसिक अर्थ भी जितना है सबको इसके अंतर्गत करा सकते हैं ।

तो इसलिये धातवः अनेकार्थाः । तब ये तीन स्तरों का अर्थ जो है आप ले सकते हो और तार्किक रूप से बता सकते हो शरीर को देह क्यों कहा जाता है ।  पहला स्तर एकत्र करना, इकठ्ठा करना, संजोना, देह एक नहीं है, देह इतने सारे वस्तुओं का संग्रह है । माँस, मज्जा, पञ्च जो महाभूत, ये सारे तत्त्व हैं इसमें । ये एक वस्तु नहीं है, ये इतने सारे वस्तुओं का संग्रह है । प्रथम स्तरीय अर्थ । द्वितीय स्तरीय अर्थ क्या है ? बढ़ना । देह को तनू भी कहा जाता है । ‘तन्’ धातु से आया है । बढ़ना इसका गुण है । हम जितने आकार में पैदा हुए थे, आज उतने आकार में नहीं हैं । वृद्धि कर गया । और भी वृद्धि करेगा । इसकी बढ़ने की प्रवृत्ति है । तृतीय स्तरीय अर्थ क्या है ? ढकना । ये एक गूढ़ अर्थ है कि देह मात्र एक ढकना है जो कि आत्मा को ढकता है । ये तीन ……क्योंकि देह एक ढकना है, एक डिब्बा है । ये तीन स्तरों के अर्थ पे आप देह शब्द को समझा सकते हैं । अब सोचो कि कौन सी ऎसी भाषा है दुनिया में जो इस प्रकार अपने शब्दों को बनाया है । ये संस्कृत की प्रशंसायें गाना नहीं है । ये विज्ञान है । और किस चेतना में रहकर इस भाषा को बनायी । हर एक शब्द का विश्लेषण करके उसका मनन-चिन्तन हम करेंगे, तो वो हमको हमारे साथ खुद के साथ जोड़ती रहती है । अब सन्देह से क्या मतलब होता है ? सम् उपसर्ग से फिर हम देह शब्द जोड़ते हैं । दिह् धातु का जो मुख्य अर्थ बाद में जाकर रहा ‘ढकना’ । तो सन्देह का मतलब ये है सटीक ढकना ।

कैसे है ? जब हमारी चेतना एक आच्छादित अवस्था में रहती है तब संशय उत्पन्न होता है । ये चेतना को आच्छादित कर देता है । यदि चेतना आच्छादित है । तो वास्तविकता आच्छादित है । आप वास्तविकता को नहीं देख पाते हैं । तो चेतना का आच्छादित होना, चेतना का आच्छादित अवस्था में रहना संशय का मूल कारण है । अगर चेतना में स्पष्टता है, संशय कभी उत्पन्न नहीं होगा । नहीं, उस प्रकार हम सारे शब्दों को संशय में भी …… भिन्न है । शंका में भी शंकते ….. वो आच्छादित चेतना में क्या होता है ? संकुचित अवस्था में रहते हैं । संकुचित होना । ये शंका और संकुचित होना उस अवस्था में उसके साथ, ये है संकुचित । खुलना नहीं चाहता । संशय में वही सुप्त अवस्था में रहना चाहता है । जो हमको ऐसे बना देता है । खुलने नहीं देता । ये चेतना की बात है । तो अगर हमको पता है, पता चल जाता है कि चेतना का आच्छादित होना संशय का शंका का सन्देह का मूल कारण है तो उसपर हम काम कर सकते हैं और संशय से मुक्त सन्देह से मुक्त हो सकते हैं ।

तमाम शब्द संस्कृत के आप विश्लेषण करके देखोगे तो ये पूरा का पूरा मानवीय मनोविज्ञान के साथ, मानवता के मौलिक अनुभूतियों के साथ, मानव जाति के मौलिक अनुभूतियों के साथ जुड़ी हुई भाषा है । और हमेशा ये जुड़ाव, ये जोड़ती है । और दो शब्दों का विश्लेषण मैं दूँगा । और अगर इस दृष्टि से हम मनन चिन्तन करके संस्कृत भाषा को अपनायेंगे, और संस्कृत भाषा के पीछे जो शक्ति है, जो चेतना है, उसके साथ हम जुड़े रहेंगे, तो संस्कृत भाषा कठिन नहीं । कोई भी शास्त्र कठिन प्रतीत नहीं होगा । ये भाषा भी आसानी से हम सीख सकते हैं । अब बताओ, कौन सी ऎसी चीज़ है दुनिया में ? वह चीज़ अगर किसी को दिया जाये वो मना नहीं करेगा, कोई भी मना नहीं करेगा । आप पूछो ज्ञान । कई लोग हैं मना करेंगे, मुझे ज्ञान से क्या मतलब । पैसा, शान्ति, कई लोग शान्ति भी मना करेंगे, शान्ति से भी डरते हैं कई लोग । तो कौन सी ऎसी चीज़ है जिसको दुनिया में कोई भी… वो भी मना करेंगे कोई तो । जो बैरागी लोग हैं उनको प्यार क्या चाहिए ।

मोक्ष भी नहीं चाहिए …. हाँ आना है । मोक्ष भी मना करेंगे ।  पर वैश्विक स्तर पर ऎसी कौन सी चीज़ है जिसको कोई भी मना नहीं करेगा ? इन लोगों को नहीं चाहिए क्यों भागे इतना दूर । चलो जितना जल्दी हो सके मुक्ती मिल जाये । और जिसके पीछे हम हमेशा भागते रहते हैं । महोदया ने बोला सुख । आप जिसको भी पूछो सुख चाहिए, कोई मना नहीं करेगा । और एक आश्चर्य की बात ये है, कोई भी मानव सचेत रूप से ऐसा कुछ भी नहीं करता है जिससे उसको दुःख मिले । सचेतन रूप से हम ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जिससे हमको दुःख मिले । हम हमारा सब काम सुख के लिये ही होता है कि मुझे सुख मिले आनन्द मिले । है न ? अब देखो, इतनी तीव्रता से हम सुख को चाहते हैं और ऐसा कुछ भी नहीं करते हैं जिससे हमको दुःख मिले । और जो चीज़ हम तीव्रता से चाहते हैं, वो हमको मिलता है जरूर । मिलता है या नहीं ? तीव्रता से कुछ हम चाहते हैं, चाहेंगे, तो मिलेगा । अब सवाल ये है कि क्या ये विश्व प्रसन्न है ? क्या इस दुनिया में कोई सुखी है ?

मैं मुझे भी सम्मिलित करता हूँ इसमें । कोई भी सुखी नहीं है । क्यों ? इतनी तीव्रता से चाहने पर भी कोई सुखी नहीं है । शास्त्र, मतलब ये फिर जैसे बौद्धसम्प्रदाय में कहा गया है न, जितने आँसू मानवों ने बहाए हैं तो इस सारे आँसुओं को अगर इकठ्ठा कर दिया जाये कि सात समंदर से भी ज़्यादा हो जाये । ये संसार ही दुखमय है । लेकिन शास्त्र हमको कहता है, आनन्दादेव इमानि भूतानि जायन्ते । आनंद से ही ये सृष्टि, सृष्टि की उत्पत्ति आनंद से । आनंद से ही जीवित और आनंद में ही लीन । यहाँ आनंद के सिवा और कुछ नहीं । है न वैपरीत्य ? एक तरफ बोलते हैं कि सब कुछ आनंदमय जो है सर्व आनन्दमय देव, सर्वोच्च वास्तविकता,

सच्चिदानन्द, सच्चिदानन्द ये तीनों अलग अलग शब्द आप नहीं बता सकते । अगर सत् बोलो तो उसमें चित् और आनन्द भी है , चित् बोलो आनंद और सत् है, आनंद खाली बोल दो उसमें सत् और चित् है इसीलिये तैत्तिरीय उपनिषत् में सारे कोशों के बारे में बता के अन्तिम कोष आनंदमय कोष बताया है । आनंद का मतलब है अलग से कोई आनंद नहीं है, ये सच्चिदानन्द ही है, उसमें सत् और चित् समाहित है । तो अगर आनंद से ये सृष्टि आनंद में ही जीवित, आनंद में ही अन्त में जाकर लीन होने वाली है, तो फिर ये दुःख क्या है ? निरानंद क्या है ?

विश्व क्यूँ दुखी है ? ये दुष्टता क्या है ? ये तो दैनंदिन जीवन में हम यही देखते हैं । फिर हम शास्त्र की बात मानें या न मानें । शास्त्र जो कहता है, दैनंदिन जीवन में व्यावहारिक जीवन में हम नहीं देखते । लेकिन शास्त्र गलत नहीं है । शास्त्र गलत नहीं हो सकता । इसको समझाने के लिये मैं फिर दो शब्दों को लेता हूँ । ये दो शब्द क्या हैं ? सुख और दुःख । इसीलिये मैं इतना उदाहरण देता हूँ कि इस भाषा को किस प्रकार बनाई गयी है । क्या दृष्टी थी मुनि ऋषियों का इस भाषा को बनाने के पीछे ? सुख से मतलब क्या है ? दुःख से मतलब क्या है ? साधारण से हम उसको अनुवाद करते हैं कि आनंद और पीड़ा, सुख और दुःख । और आज जैसे हम यही बात बताते आ रहे हैं कि संस्कृत एक अनुवाद-अक्षम भाषा है ।

इसको समझना इतना आसान नहीं है अगर साधारण रूप से हम अनुवाद करते हैं तो । सुख प्रसन्नता नहीं है, दुःख अप्रसन्नता नहीं है । अब सुख और दुःख इन दोनों शब्दों को देखो, दोनों में एक तत्त्व समान है । क्या है ? ख । सु एक उपसर्ग है, उपसर्ग है, दुः भी एक उपसर्ग है, सु का मतलब है जो सरल है, सहज है , दुः का मतलब है जो कठिन है । फिर उसका हम कैसे अनुवाद करेंगे, अच्छा ख और बुरा ख । ख का मतलब क्या है ? अब बोलो क, एक साथ बोलो सब क, फिर बोलो ख, क और ख में क्या अन्तर मिलता है ?

क , ख । क में ये अनुभूति होती है कि ये अन्दर की ओर खींचता है या अन्दर हमको रखता है, ख में सब बाहर निकल आता है । क संकोच की ध्वनि है , जिसमें, जो अल्पप्राण है , अल्पप्राण और महाप्राण दोनों ही अन्तर है , वो अल्पप्राण का मतलब है जिन ध्वनियों को हम कम प्राण के साथ उच्चारण करते हैं वह संकुचित ध्वनि होती है, वह हमको अन्दर रखता है । महाप्राण जो है हमको खोल देता है, विस्तार की ध्वनि, ये जो विस्तार, जो स्वभाव है जो धर्म है जो गुण है, ये ख का एक गुण है इसीलिये अन्तरिक्ष को क्या कहा जाता है ? ख । अन्तरिक्ष को, आकाश को ख क्यूँ कहा जाता है ? पक्षी को खग कहा जाता है, खे गच्छति, खग । ख का मतलब है आकाश, आकाश जो है वो विस्तार है ।

तो भौतिक रूप से भी वर्णमाला की, वर्णमाला में, ख का जो महाप्राण रूप प्रवृत्ति है तो उससे विस्तार जो है, वो अपना गुण है । जब तक, अब इसको समझाने के लिये थोड़ा शास्त्र का भी चर्चा चाहिये । अब जब अर्जुन भगवत् गीता में अपने गांडीव छोड़कर बैठ जाता है, बोलता है युद्ध नहीं करूँगा । तब उसने एक शब्द का इस्तेमाल किया दूसरे अध्याय में, कार्पण्यदोषोपहत स्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ये कार्पण्य दोष क्या है ? कार्पण्य दोष । कृपण का दोष । कृपण कौन है ? कंजूस, कंजूसपन । कंजूस कौन है ? देता नहीं । वो कौन है ? जो देता नहीं उसको हम कंजूस कहते हैं । परन्तु हम भूल जाते हैं हम सब एक बड़े बड़े कंजूस हैं, हम सबमें वह कृपणता है, कृपण का मतलब नहीं है खाली जो बाहरी चीज, पैसा नहीं देता, ये नहीं देता ।

हम अगर हम अन्दर से हमको नहीं खोलते हैं, विकसित नहीं होते हैं तब तक हम कृपण हैं, हम साधारण चेतना में खुदको बाँधके रखना चाहते हैं जब तक तब तक वह दोष कार्पण्य दोष है । यही हाल है हमारी सारी समस्याओं का मूल कारण है । और खुलना पडेगा, इसीलिये छान्दोग्य उपनिषत् कहता है …. हतस्स्वभाव… माने स्वभाव जो है एकदम उपहत उसको इतना बन्द करके रखा है , मुझे खुलने क्यूँ नहीं देता है ? और यही कारण है कि विषाद आता है, तिरस्कार आता है । विषाद की अवस्था में क्या करते हो ? जब विषाद आता है, ऐसा कोई भी नहीं होगा इस सभा में जिसको विषाद नहीं हुआ ।

विषाद की अवस्था में क्या करते हैं हम ? किसी से बात नहीं करना चाहते हैं, चुपचाप बैठना चाहते हैं एक कोने में बैठना चाहते हैं, बाहर नहीं जाना चाहते हैं, ये कार्पण्य दोष है, बन्द करके रखना चाहते हैं । श्री अरविन्द आश्रम के माताजी ने बहुत ही सुन्दर उपाय बताया, तरीका दी है, विषाद से हम कैसे मुक्त हों, बोले जब आप विषाद में हो, स्वयं को एक प्रकोष्ठ के चार कोणों तक सीमित न करो, बाहर आओ, छत पर जाओ, आकाश को देखो, बृहत् विस्तार को अनुभव करो, और कुछ ही पलों में आपका विषाद चला जायेगा । बाहर जाओ , समुन्दर के बारे में सोचो, तब जाके चेतना खुलती है, अर्जुन के साथ यही हुआ । तब ये जो सुख दुःख की बात है, जब हम संकुचित बनकर रहते हैं तब जो आनंद, जिस आनंद से यह सृष्टि, जिस आनंद में जीवित, जिस आनंद में लीन होनेवाली सृष्टि, यह आनंद सदा रहता है, हमेशा के लिये, सर्वव्यापी, एक भी क्षण नहीं है जिसमें जिस क्षण में आनंद नहीं है, परन्तु हम इसे चेतना की समस्या के कारण अनुभव नहीं करते हैं, अपनी चेतना की लघुता के कारण हम आनन्द का अनुभव नहीं करते हैं, तो जब हम चेतना की लघुता में जी रहे होते हैं तो सर्वदा स्थित रहने वाले को, आनन्द जो कि ख है, उसको अनुभव करना कठिन,  दुः, हो जाता है । दुःख का मतलब है, सर्वदा स्थित रहने वाले को अनुभव करना कठिन हो जाना,  आनंद, जो आनंद हमेशा के लिये हमारे साथ है, उस आनंद का हम नहीं अनुभव कर पाते हैं, वह आनंद  उपलब्ध नहीं हो पाती है, कष्ट होता है, दुष्कर है क्योंकि हम चेतना के संकुचित अवस्था में हैं ।

लघु स्तर । यो वै भूमा तत् सुखम् , नाल्पे सुखमस्ति छान्दोग्य उपनिषत् । और जब हम तुलनात्मक रूप से विस्तृत चेतना में जीते हैं, तो आनन्द को अनुभव करना सरल हो जाता है । सुख । सु याने सरल । तो सुख न तो प्रसन्नता है, न ही दुःख अप्रसन्नता है, ये दो मानसिक अवस्थायें हैं, दुःख की स्थिति में, हम उस अवस्था को दुःख कहते हैं जब हम आनन्द का अनुभव नहीं करते हैं । उस अवस्था को हम सुख कहते हैं जब हम तुलनात्मक रूप से विस्तृत चेतना में रहते हैं । करना क्या है फिर हमको ? तो ये सब कौन सिखाती है ? ये संस्कृत भाषा हमको सिखाती है । इस तरीके से शब्दों का बनावट, भाषा को इस तरीके से सजाई गयी जो हमेशा चेतना के साथ जुड़ी हुयी भाषा है, आत्मा के साथ जुड़ी हुयी भाषा है । जो हमको हमारे आत्मा का पहचान कराती है जो हमको हमारी चेतना के साथ जोड़ती है और इस भाषा का सजग प्रयोग से चेतना का विकास होता है, हम विकसित चेतना पर पहुँचते हैं । तो ये है जब हमने सोचा कि संस्कृत को एक आत्मा की भाषा के रूप में हमने सोचा कि लोगों को कुछ बताया जाये तो ये सारे उदाहरण को लेकर मैं यहाँ आया था, बहुत सारी और भी बातें हैं, अब तक आपके मन में कोई प्रश्न है तो आप पूछ सकते हो ।

बात कहनी है, जब मैं आयी तो कल से परसों से विषय पता है तो मैं ये सोच रही थी कि इसमें क्या बोलेंगे, ये आत्मा की भाषा, संस्कृत को आत्मा की भाषा पर ये क्या बोलने, बोला जाएगा लेकिन अब यहाँ बैठकर सुनकर मुझे समझ आया बहुत सुन्दर इन्होंने बोला, बहुत ही सुन्दर बोला, अभी भी मुझे लग रहा है कि ये अभी भी बहुत बोल सकते हैं इस विषय पर । एक एक शब्द का जो निरुक्ति करके, व्युत्पत्ति करके उसकी गहराई से दर्शन और ज्ञान, उसके पीछे छिपे हुये सब बातों को बता रहे हैं तो सचमुच में आत्मा की भाषा है, आत्मा संस्कृत है यही सिद्ध होता है तो मुझे ये इतना अच्छा लगा ये विषय जो था, मेरा दिमाग में था इसमें क्या बोला जायेगा । आत्मा तो कोई बोलती नहीं है तो उसकी भाषा क्या होती है, आत्मा की भाषा । जैसे आत्मा बोल रही हो तो उसकी भाषा लेकिन आपने जो अर्थ व्याख्यात किया, बहुत सुन्दर तरह से व्याख्यात किया, मुझे भी बहुत अच्छा लगा । बहुत मजा आया ।