ओ३म्

जीवने यावदा दानम् , स्यात् प्रदानं ततोधिकम्

इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम् , भगवन् परिपूर्यताम्

त्वमेव माता च पिता त्वमेव , त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव , त्वमेव सर्वं मम देव देव

सर्वे भवन्तु सुखिनः , सर्वे सन्तु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु , मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्

ओं शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः

सर्वेभ्यो नमो नमः

आप सबको नमस्कार

मुझे ये बोला गया था कि संस्कृत भाषा के विषय में आप लोगों को कुछ समझाऊँ , संस्कृत एक ऐसी भाषा है , मैं यहाँ संस्कृत का गुण गान करने , गौरव गान करने नहीं आया हूँ । इस संस्कृत भाषा की उपासना से जो अनुभव मुझे हुआ जिस अनुभव को अपना सामर्थ्य मानकर मैं अपना जीवन निर्वाह कर रहा हूँ , उस अनुभवों को , उन अनुभवों को , आपके सामने मैं रखना चाहता हूँ ।

संस्कृत भाषा का जो विभाव है , हर विभाव को हम विषय के रूप में लें , और दिन ब दिन उस पर व्याख्यान होता रहे , जैसे श्लोक है न , कि अनन्तकाल तक उसको हम व्याख्या करते रहे तो भी उसका कोई समाप्ति नहीं होगा । कुछ अनुभव की बातें कुछ व्यावहारिक पक्ष को लेकर मैं आपके सामने अपना जो विचार है संस्कृत भाषा को लेकर , वो मैं प्रस्तुत करूँगा ।

और विषय हमने रखा है कि संस्कृत हमारी आत्मा की भाषा है , आत्मा की भाषा । ये क्यूँ हमने विषय चुना कि संस्कृत आत्मा की भाषा है , मतलब क्या हुआ ? हम संस्कृत को एक वैश्विक भाषा के रूप में , ग्रहीय भाषा के रूप में , वैज्ञानिक भाषा के रूप में , एक सटीक भाषा के रूप में , योग की भाषा के रूप में, कई विषयों पर हमने सुना । पर ये हमने विषय रखा कि आत्मा की भाषा , आत्मा के साथ इसका क्या सम्बन्ध और इस प्रकार का विषय क्यूँ चुना गया ? हम सब , बचपन से जब बड़े हुए हम को एक विद्यालय को भेजा दिया गया , क्या करने के लिए ? विद्यालय हम क्यूँ जाएँ ? विद्या अर्जन करने के लिये , अब विद्या अर्जन करते करते बचपन से , हम एम् ए , पी एच डी उसके ऊपर कहीं ऊपर तक जाते हैं । क्या सीखते हैं उस में ? जो भी सिखाते हैं वो सीखते हैं । हम को अगर पूछा जाये कि शिक्षा का लक्ष्य क्या है ? हम क्यूँ शिक्षा ग्रहण करते हैं ? शिक्षा का मतलब क्या है ? हम क्यूँ स्कूल जाएँ ? इन विषयों को पढ़ें , एग्जामिनेशन लिखें , फिर उसमें पास फेल की बात , पास हो गये तो ठीक है अच्छे परसेंट से , फेल हो गये तो फिर जो दिक्कतें हैं आपको पता हैं । ये सारा का सारा बोझ हम क्यूँ उठायें ? क्या हम शुरू से शिक्षा का मतलब क्या है उसको अच्छे तरह से समझकर हम शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं ? या जो भी शिक्षादान हमें दिया जा रहा है , तो उस लक्ष्य को , उस महत्तर लक्ष्य को , सिद्ध करने के लिये शिक्षा दी जाती है ? शिक्षा ग्रहण कर हम क्या करेंगे ? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है ? हम क्यूँ आये हैं यहाँ ? बहुत सारे मुनि ऋषियों के बारे में , पुराने मुनि ऋषि भी आजकल के मुनि ऋषि , इन सब के बारे में सुना होगा कि यही सवाल करते थे कि मैं कौन हूँ , क्यूँ आया हूँ ? क्या मेरा काम है , लक्ष्य क्या है ? इस प्रकार का सवाल हम आजकल नहीं करते । अगर कोई किडनैप करके ले जाता है तो हम पूछते हैं कि मुझे क्यूँ यहाँ लाये हो ? ,मेरा क्या काम है ? तब जाके सवाल उठता है लेकिन साधारण स्तर पर हम को ये सवाल मन में पैदा नहीं होता । आप उपनिषत् , वेद , गीता इन तमाम ग्रन्थों के बारे में थोड़ा बहुत सुना होगा । उपनिषदों के आधार पर मैं ये , जो मेरा रिसर्च है उपनिषदों पर , तो उसमें एक मैंने संकलन किया , उस संकलन में क्या है ? कि उपनिषत् युग में जो ऋषि लोग थे , जो सीकर्स थे , वो किस प्रकार के सवालों का जवाब ढूँढ रहे थे । तो तमाम प्रश्नों का संकलन किया सारे उपनिषदों से , करीब ३५० प्रश्न उपनिषदों से लिये गये , इन प्रश्नों का उत्तर , यही प्रश्न लेकर वो शिक्षा के लिये जाते थे, जीवन में हमेशा यही प्रश्नों को , उन प्रश्नों को सामने रखते थे और उसी का जवाब ढूँढते थे । हम शिक्षा प्राप्त करने के लिये जाते हैं तो कोई सवाल मन में लेकर नहीं जाते । हम को बार बार पूछा जाता है ‘कोई प्रश्न’, सब चुप बैठ जाते हैं । कोई सवाल है मन में ? नहीं । सवाल ही नहीं आते मन में , लगता है सारी शंका दूर हो गयी । लेकिन यही प्रश्न अगर पुराने जमाने में किया जाता था कि जीवन का लक्ष्य क्या है ? शिक्षा का लक्ष्य क्या है ? दो ही शब्द में पूरी शिक्षा के लक्ष्य को तय किया गया है । बहुत ही महत्त्वपूर्ण शब्द दिए हैं , दो शब्द , क्या है ? आत्मानं विद्धि । दो ही शब्द में बाँध लिया पूरी शिक्षा का लक्ष्य । आत्मानं विद्धि का मतलब है आत्मा को पहचानो , जानो । जो शिक्षा हमको हमारी आत्मा के साथ नहीं जोड़ सकता  है , जोड़ सकती है , तो वह शिक्षा शिक्षा ही नहीं है ।

आत्मा वा अरे द्रष्टव्यो श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो , जो भी होता था शिक्षा के नाम पर , इस प्रकार के कई उदाहरण आप शास्त्रों में से ले सकते हैं । जो भी होता था वो आत्मा के साथ जुड़ा हुआ होता था , चाहें पाणिनि आपको बहुत ही एक टेक्निकल ग्रन्थ , अष्टाध्यायी , हाइली टेक्निकल , ये एक प्रकार का तन्त्रांश है, जो कि बिना यन्त्रांश बनाके दिया । उस जमाने में कहाँ था हार्डवेयर , तो इतना टेक्निकल ग्रन्थ जो है दिया । आप सोचेंगे उस से मुझे क्या मिलेगा ? मोक्ष कैसे मिलेगा ? हमारे संस्कृति में , हमारी संस्कृति में , जो भी ग्रन्थ आप उठाओ , वेद , उपनिषत् , गीता ये तो आध्यात्मपरक ग्रन्थ हैं , इन ग्रन्थों के अलावा अगर आप व्याकरण के ग्रन्थ उठाओ , वात्स्यायन के कामसूत्र भी उठाओ या फिजिक्स , केमिस्ट्री , मेटलर्जी पर जो भी ग्रन्थ हैं उठाओ । जीवन के इस लक्ष्य को , सृष्टि के इस तत्त्वों को , दर्शन को किसी ने नहीं उठाया । हर शास्त्र मोक्ष शास्त्र है । काव्य शास्त्र , कोई भी शास्त्र हो , हर शास्त्र मोक्ष शास्त्र है । मैं आपके पास एक उदाहरण रखूँगा , इस भाषा को , भाषा के बारे में मैं बाद में आऊँगा , पाणिनि ने लिखा अष्टाध्यायी ग्रन्थ , आप सब परिचित होंगे , इस नाम से भी , और जिन्होंने पढ़ा , पाणिनि के सूत्रों से , शैली से , जो टेक्निक उन्होंने इम्प्लोय किया उस से । इतने टेक्निकल विषय को उपस्थापित करते हुये , इस लक्ष्य को , सृष्टि के तत्त्व को , दर्शन को , पूरी फिलोसोफी ऑफ़ द क्रियेशन को नहीं भूला उन्होंने । क्योंकि यहाँ पर फिलोसफी , टेक्निक सब कुछ एक साथ , एक दूसरे से अलग नहीं , इन्सेपरेबल ।

पाणिनि का एक उदाहरण मैं आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूँ , जब कारक प्रकरण पढ़ाते हैं अथ वा पढ़ते हैं अष्टाध्यायी में, पहला कारक क्या है अष्टाध्यायी में ? अष्टाध्यायी अगर पढ़ा है , जो कारक प्रकरण है , पहले हम कर्त्ता , कर्म्म , करण , सम्प्रदान , अपादान फिर सम्बन्ध आता है , अधिकरण  , इस क्रम में आता है एक से लेकर सात तक , छः को तो कारक नहीं मानते हैं सम्बन्ध है । तो ये जो कर्त्ता , कर्म्म , करण , सम्प्रदान , अपादान और अधिकरण इस क्रम में जब हम प्रक्रिया पढ़ते हैं जानते हैं । पाणिनि ने किस कारक को पहला स्थान दिया ? कर्त्ता को नहीं दिया , कर्म्म को नहीं दिया , करण को नहीं दिया , सम्प्रदान को नहीं दिया , अधिकरण को नहीं दिया , पहला स्थान दिया अपादान । पाणिनी की अष्टाध्यायी में पहला सूत्र आयेगा कारक प्रकरण में ‘अपादान’ । अपादान को क्यूँ रखा ? अब पाणिनि की दृष्टि से , पाणिनि की टेक्निक से उसका जवाब अलग होयेगा । उस पर मैं नहीं जा रहा हूँ , मैं सृष्टि के तत्त्व , जो फिलोसफी आपको वेद में मिलता है , उपनिषदों में मिलता है , उसके आधार पर मैं पाणिनी को जोड़ना चाहता हूँ , अपादान शब्द का अर्थ क्या है ? अपादान शब्द का अर्थ जो पाणिनि ने दिया है , जो परिभाषा है , ध्रुवम् अपायि अपादानम् , ये सूत्र लिखा पाणिनि ने , अपायि अपाय का मतलब जो है वो है विश्लेष , बिछड़ना , ये विच्छेद होने पर , जैसे कि एक पेड़ से पत्ता गिर रहा है , अब विच्छेद किसका हो रहा है ? पेड़ का पत्ते से बिछड़ना और पत्ता का पेड़ से बिछड़ना , दोनों तरफ है सेपरेशन , पर अपादान कौनसा है ? पाणिनि कहते हैं कि ध्रुव , जो फिक्स्ड पार्ट है वही है अपादान । पेड़ से अगर गिर रहा है तो पेड़ अपादान है , इस जगह हम पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग करते हैं । वृक्षात् पत्रं पतति , पूरा का पूरा जो अपादान प्रकरण है , उसमें बिछड़ना , सेपरेशन इस द कीनोट । दूसरे सूत्र में पाणिनि लिखते हैं , भीत्रार्थानां भयहेतुः ,

इसका मतलब उदाहरण अगर हम दें , बाघ से डर रहा है , अगर इसको हम संस्कृत में बोलेंगे बाघ से डर रहा है , भय हेतु का मतलब है जिस से भय उत्पन्न हो रहा है वह अपादान है । बाघ को देखकर डर लगता है , चोर को देखकर डर लगता है , भूत को देखकर डर लगता है , तो जिस से डर आता है वह अपादान है । अब सवाल ये एक मेरे मन में बचपन से था , इसका जवाब कोई टीचर ने मुझे नहीं दे पाया , एम् ए में नहीं दे पाया , एम् फिल में भी, पी एच डी में नहीं दे पाया , जिस को पूछा यह जवाब नहीं दे पाया इस सवाल का । सवाल यह था मन में कि अगर पाणिनि ने ये तय किया कि बिछड़ना , विश्लेष , विच्छेद , विच्छिन होना , अपाय अगर कीनोट है अपादान में , अब बाघ से मिलने पर ही मुझे भय होता है , बाघ की भावना आने पर ही भय होता है , भूत को देख लूँ तब भय होता है , यहाँ पर अपादान कहाँ है ? ये प्रश्न था । इस प्रश्न का उत्तर मुझे तब मिला जब मैं ईशावास्य उपनिषत् पर श्री अरविन्द का भाष्य पढ़ रहा था , उस समय मिला जब मैं बृहदारण्यक उपनिषत् पढ़ रहा था । उस का उस के साथ क्या सम्बन्ध है ? ये जो भय हेतु पाणिनि ने लिखा है , मेरे कहने का मतलब ये है कि जब हमारे ऋषि मुनियों ने हमें कोई शास्त्र दिया है , चाहें कोई भी शास्त्र हो , साइंस रिलेटेड हो कोई भी शास्त्र हो , जो चरम लक्ष्य है , जो चरम तत्त्व है , उस से कभी अलग नहीं कहा । सारे शास्त्र इसी दृष्टि से मोक्ष शास्त्र हैं । बृहदारण्यक उपनिषत् में क्या लिखा है ? भय का मूल कारण क्या है ? क्यूँ भय उत्पन्न होता है ? यहाँ पे भय हेतु जो है , वह बाघ नहीं है , भूत नहीं है , पिशाच नहीं है , चोर नहीं है , भय तब होता है, ये बृहदारण्यक उपनिषत् कहता है ‘द्वितीयाद्वै भयम्’ , जब सेकण्ड एंटिटी रहेगा तब भय आयेगा, जब वो डुआलिटी न रहे, जब हम एकत्व में स्थित हों , तो भय कहाँ से ? चेतना के स्तर में हम अगर एकत्व में , एकत्वं, कः शोकः को मोहः , एकत्व बहुत आवश्यक है । जब एकत्व में हम स्थित होंगे , तो भय ही नहीं । हम सत्ता की सम्पूर्ण अवस्था के अधिकारी हैं । न जुगुप्सति न विजुगुप्सति । भय हेतु जो पाणिनि ने लिखा है ये भय तो बाघ या पिशाच भूत छोर वो नहीं है भय का मूल कारण है अपादान । किससे अपादान ? मूल तत्व से । हम अखंड चेतना में अगर स्थित होंगे तो अखंड चेतना में भय ही  नहीं है । भय दूसरों से आता है । जब दूसरा ही नहीं है, भय कहाँ से आयेगा ? और उसी चेतना में स्थित होकर मुनि ऋषि लोग बाघ के साथ, सिंह के साथ, सबके साथ रहते थे , एक साथ बैठते थे । कुछ नहीं होता था । हमें लगता था, अरे बाघ के साथ बैठा है ये स्वामी जी देखो ! इसके साथ बैठा हुआ है । उस चेतना में स्थित होने पर । ये एक उदाहरण है । तो पाणिनि ने कभी उसको नहीं भूला । जब भी कोई सूत्र लिखते हैं , अब अपादान को क्यों पहला रखा ? क्योंकि ये अपादान ही सृष्टि का कारण है । अगर उसको हम अंग्रेजी में अनूदित करें, पाणिनि के इस सूत्र को , जो सनातन अचल है, ध्रुव, जो अजल अचल अटल अखंड, सनातन अचल जिससे सारी गतियाँ निस्सृत होतीं हैं । जिनसे ये सारा जगत, यत् किञ्च जगत्याञ्जगत्, ये सारे, क्योंकि जगत का मतलब है संसार । चलना, उस सनातन अचल से चलना, इस ध्रुव, ध्रुवम् अपायि । ये अपायि अगर नहीं होता तो सृष्टि नहीं होती । सृष्टि का मूल अपायि है । इस दृष्टि  से पाणिनि ने अपादान को पहला स्थान दिया ।अब पाणिनि की दृष्टि से तकनीक से देखोगे तो अलग जवाब आयेगा । वो सूत्र वहाँ ना रहे तो पूरा शास्त्र ही बिगड़ जाएगा । तो हर कोई सूत्र , पाणिनि के और भी अनेक सूत्र हैं । दूसरे तमाम लोगों ने जो शास्त्र लिखा है , तमाम ऋषि मुनियों ने जो शास्त्र लिखा है । अनेक उदाहरण हम ले सकते हैं कि यहाँ पे दर्शन और प्रस्तुति, तार्किक विचार और अन्तःस्फुरित प्रक्रिया, दोनों एकसाथ हो रहीं थीं । और इस एक जो विराट सत्य को खोज कर पाया , जिस विराट सत्य का उपलब्धि हुई इन ऋषियों को, इस जो उपलब्धि हुई , उस उपलब्धि की अभिव्यक्ति के लिये जो भाषा चाहिए वो भाषा भी उसी चेतना से ही आई । कोई साधारण भाषा उस प्रकार की उपलब्धि को अभिव्यक्त करने के लिये समर्थ नहीं है । वो भाषा कोई एक मान्त्रिक भाषा होनी चाहिये । आप पूछ सकते हैं कि क्या संस्कृत एक ही भाषा है जो मन्त्र की भाषा है ? नहीं , ये भी मैं नहीं कह रहा हूँ । कोई भी भाषा हो वह मान्त्रिक भाषा बन सकती है , कोई भी भाषा । भाषा की अपनी जो जड़ता की स्थिति है उस जड़ता की स्थिति से भाषा को ऊपर लेकर उसके मन्त्रों, एक मान्त्रिक भाषा बनाई जा सकती है । ये उस भाषा के प्रयोक्ताओं पर निर्भर करता है । कौन प्रयोग करता है जैसे स्वामि विवेकानन्द ले लो । रमण महर्षि , श्री अरविन्द , तमाम ऋषि लोग जो आधुनिक समय के हैं विशेषकर के श्री अरविन्द, मैं वहाँ से ही आ रहा हूँ । श्री अरविन्द का अनुगामी हूँ । जब श्री अरविन्द के life divine ग्रन्थ आप पढ़ते हैं या सावित्री ग्रन्थ पढ़ते हैं तब लगता नहीं आप अंग्रेजी पढ़ रहे हैं । उनकी भाषा को बड़े-बड़े अंग्रेजी के प्राध्यापक भी नहीं समझ पाते हैं । उनकी भाषा को जिसने कभी कुछ पढ़ा नहीं वो आसानी से समझ पाता है । ये चेतना की बात है । एक वहाँ पे हमारे बाबाजी महाराज थे । बाबाजी महाराज का शैक्षणिक योग्यता कक्षा पाँच है । पाँच से ऊपर नहीं गये । श्री अरविन्द की जो क्लिष्ट भाषा है, सावित्री जैसे ग्रन्थ, life divine जैसे ग्रन्थ, synthesis of the Yogi जैसे ग्रन्थ, उतनी सरलता से समझाते थे लोगों को, इतनी सरलता से कैसे समझ में आया । वसिष्ठ गणपति मुनि का ना तो सुना होगा ? और नहीं सुना है तो वसिष्ठ गणपति मुनि जो थे भगवान रमण महर्षि जिनका आश्रम तिरुवन्नमलई में है , उनके प्रथम और प्रधान शिष्य थे । भगवन रमण महर्षि को उन्होंने ही ढूँढ निकला था । ये नाम भगवान् रमण महर्षि उन्होंने ही दिया था । उनका सम्बन्ध श्री अरविन्द से भी था, माताजी से भी था । वसिष्ठ गणपति मुनी इतने स्वदेशी थे कि वो अंग्रेज़ी , सूचनापट्ट वगैरह अंग्रेज़ी में लगता था तो वो उनकी तरफ देखते भी नहीं थे । नफ़रत नहीं, उनकी स्वदेशी भावना है । क्योंकि वो तो नफ़रत ये सब से परे थे । लेकिन ये इतना स्वदेशी था अंग्रेजी पढ़ना लिखना देखना कुछ नहीं करते थे । लेकिन श्री अरविन्द के लिखा हुआ secret of the Veda ,The Mother जैसे किताब उसको वो संस्कृत में बड़े आसानी से लिख देते थे । नहीं जानते थे भाषा को । तो श्री अरविन्द को एक बार पूछा गया ये जो मुनि है ये मुनि उनको अंग्रेज़ी का ABCD भी नहीं आता है , लेकिन वो आपके ग्रन्थों को इतनी आसानी से संस्कृत में भाषांतर करके बहुत अच्छी तरह से, श्री अरविन्द ने कभी देखा उनके अनुवाद तो बोला कि ‘मौलिक प्रति से बेहतर दिखता है………………… नहीं वो कठिन है, कठिन हमको लगता है । श्री अरविन्द ने क्या कहा । तो श्री अरविन्द को जब ये पूछा गया  अरविन्द ने जो जवाब दिया था कि जो भी सत्य के लिये खुला है, सत्य के प्रति जो उन्मुख है, सत्य उसको प्राप्त होता है, सत्य उनकी चेतना मे अपने आप जैसे है न विवृणुते तनूं स्वां ।

तो अपने आप वो उसकी चेतना में समाहित हो जाता है । भाषा एक बाधा नहीं है । भाषा एक बंधन नहीं है और वो भाषा के पीछे जो चेतना है उस चेतना के साथ उनका सम्बन्ध हो जाता है । जब ये बन जाता है तो हर भाषा आसान हो जाती है । संस्कृत क्यों कठिन है । सब लोग संस्कृत पढ़ कर भी लोग कहते हैं संस्कृत कठिन है । न बोल पाते हैं, क्यों कठिन है ? क्योंकि संस्कृत एक साधारण भाषा नहीं है । ये एक अवस्थान की भाषा नहीं है । ये एक निरूढ भाषा नहीं है । ये एक चेतना की भाषा है और अन्दर से आप शांत रहो । जैसे माताजी ने कहा एक बार कि यदि तुम एक घंटे के लिये प्रभावशाली रूप से बोलना चाहते हो, दस घंटों के लिये मौन रहो । दस घंटा हम शान्ति से बैठेंगे शांत रहेंगे, तब एक घंटा हम प्रभावशाली बोल पायेंगे, जो प्रभावी होगा । अब वह शान्ति कहाँ है ? संस्कृत को इस तरह से कहाँ पढ़ते हैं हम ? कोई भी शास्त्र पढ़ते हैं ? जो मनन चिन्तन निदिध्यासन दर्शन ये शब्दों का प्रयोग हुआ है, पठन का प्रयोग कम हुआ है । मनन कहाँ करते हैं ? वो चेतना हम अगर हमारी साधारण चेतना से उठकर ऊपर जायेंगे, उच्च चेतना की ओर जायेंगे, संस्कृत भाषा भी अपने आप हमको समझ में आएगी ।

कठिन नहीं है । कठिन उनको लगता है । श्री अरविन्द कठिन उनको लगते हैं जो चेनता से नहीं जुड़े हुए हैं । जो साधारण चेतना में रहते हैं । नहीं तो बाबाजी महाराज जैसे पाँच class वाले लोगों को कैसे सावित्री समझ में आ गया । कबीर दास तो एकदम अनपढ़ ही थे, लेकिन उन्होंने जो कहा वो तो वेद ही है । उनके जमाने में बड़े-बड़े मीमांसक थे, न्यायिक थे, वैशेषिक थे, बहुत बड़े-बड़े विद्वान थे, वेदांती, चतुर्वेदी सब थे । सब आके उनके सामने खड़े होते थे आप ऐसे बोलते हो इसका मतलब क्या है ? अगर ये हुआ तो ये कैसे ? इतना लॉजिक लेकर आते थे कि कबीरदास घबरा जाते थे कि उनको समझ में कुछ नहीं आता था कि क्या बोलना है । और अन्त में एक ही बात कहते थे , तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखन की देखी । तू पढ़ लिया बोल दिया और मैं जो देख रहा हूँ वही कह रहा हूँ । ये देखनेवाली बात है । वो दर्शन कहाँ है जब हम संस्कृत पढ़ते हैं पढ़ाते हैं शिक्षा संस्थानों में । वह दर्शनवाली बात कहाँ है ? इसलिये संस्कृत कठिन प्रतीत होता है और संस्कृत को हम एक चेतना की भाषा और संस्कृत को हम हमारे आत्मा के साथ जोड़ेंगे तो संस्कृत एकदम सरल हो जायेगी ।

और उसका बनावट , इस भाषा का जो बनावट है, जिस ढंग से ये बनायी गयी है, जिस ढंग से इसे साधुओं और द्रष्टाओं द्वारा आकार दिया गया है, बहुत ही लॉजिकल और हमेशा वही चेतना सम्बन्धी है, हरेक शब्द, क्योंकि मैंने जैसा बताया ना कि ये एक अवस्थापन की भाषा नहीं है, ये एक निरूढ भाषा नहीं है, निरूढ भाषा में क्या होता है, निरूढ भाषा आप देखो सब कुछ वस्तु केन्द्रित होता है, ये क्या है अंग्रेजी में ? hand. ये क्या है ? ये क्या है ? बस । हमको किसीने बता दिया , पढ़ा दिया, हमने सीख लिया । पर आपको ये अधिकार नहीं है पूछने के लिये कि इसको hand क्यूँ कहा जाता है ? इसको nose क्यूँ कहा जाता है ? आपको ये प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं है । यदि आप पूछेंगे तो उपहास के पात्र बनेंगे । या, यदि आप उपहास के पात्र नहीं बनते हैं, तो आपको एक सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिलेगा । कभी कभी, हाँ यदि हम भाषा के विकास के इतिहास में जायें, हम कुछ इतिहास खोज सकते हैं, कुछ तथ्य इसके बारे में कि ये क्यों कहा जाता है । पर बहुत हद तक हम उसको बता नहीं पायेंगे कि क्यों । पर संस्कृत में एक ऐसा शब्द नहीं है . कहने का मतलब है तो आप पूछेंगे कि संस्कृत में hand के लिये कोई शब्द नहीं है । nose के लिये नहीं है । chair के लिये नहीं है । table के लिये नहीं है । है , एक नहीं बहुत हैं । एक-एक वास्तु को लेकर भी आपको कभी-कभी सौ से ज़्यादा शब्द मिलेंगे । तो फिर कैसे आप बोलते हैं कि ये वस्तु केन्द्रित नहीं है ! इसलिये कि एक वस्तु के लिये अगर सौ शब्द हैं तो इन सौ शब्दों का अनुशीलन आप करिए । उसको उसका विश्लेषण । उसका संश्लेषण करिए । उस शब्द का धातु क्या है ।

और ये क्यों वाला जो प्रश्न है, आप हमेशा कर सकते हैं संस्कृत में हर शब्द के लिये । क्यों ऐसा है ? और आपको सही जवाब भी मिलेगा । अमरकोष देखा है आपने ? पढ़ा होगा । अमरकोश में हर वस्तु के लिये जितने शब्दों का प्रयोग होता है उसका लिस्ट है सूची बना कर उसको सम्पादित किया गया । जैसे कि अब देखो जल, जल के लिये पानी के लिये तीस शब्द हमको अमरकोश में मिलेंगे । अग्नि के लिये ३४ शब्द हैं । इस प्रकार किसी के लिये ५२ शब्द हैं किसी के लिये ६० शब्द हैं । कई प्रकार । जितने भी शब्द्दों का प्रयोग होता है , एक उसके लिये पूरी की पूरी सूची अमरकोश में है । अंग्रेज़ी में बस एक ही शब्द बोला जाता है पानी के लिये water । उसके अलावा दूसरा शब्द नहीं है । यहाँ पे ३० शब्द हैं । और ये ३० शब्द का मतलब क्या है ? पानी को जल क्यों कहा जाता है ? अब आप प्रश्न कर सकते हैं । और जल सिर्फ पानी ही नहीं है । अब ये जानना पड़ेगा कि पानी को जल क्यों कहा जाता है ? पानी को जल इसलिये कहा जाता है कि पानी का एक धर्म है तरल से ठोस बन जाना । जड़ बन जाना पानी का धर्म है ।

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