मंगलवार, अप्रैल 7, 2020
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रोहिंग्याओं का मूल और क्यूँ वे संजातीय अल्पसंख्यक नहीं हैं

अब, बात ये है कि आज की तारीख में, अवैध आप्रवास की अंगभूत दो समस्याएँ हैं, जिनपर मैं कहना चाहता हूँ | स्पष्टतः, तात्कालिक उत्तेजना तो रोहिंग्या के विषय पर है परन्तु कुछ चीज है जो एक बहुत लम्बे समय से सुलग रही है और पक रही है, कम से कम १९६० के दशक से या ५० के दशक से भी, वो है उत्तरपूर्व में बांग्लादेशियों का आप्रवास | दोनों पर ध्यान देना चाहिये क्योंकि दोनों में एक स्पष्ट नैरन्तर्य है | बहुत अधिक अन्तर नहीं है केवल कौनसी संजाति आ रही है इसको छोड़कर | बल्कि मैं ये कहूँगा कि कोई भी संजातीय अन्तर नहीं है क्योंकि स्पष्ट विद्वत् लेख हैं बर्मा के विद्वानों के लिखे हुये जो कहते हैं कि रोहिंग्या मूलतः चिट्टगोंग के बंगाली मुस्लिम हैं | ब्रिटिशों के औपनिवेशिक उल्लेखों में वे चिट्टगोंग के निवासियों के रूप में दर्ज हैं |

रोहिंग्या एक संजातीय शब्द है जो कि बिना सम्प्रदाय के भेद के अनेक लोगों पर लागू हो सकती है, मेरे विचार में ये तथ्यात्मक और ऐतिहासिक रूप से अनुचित है | रोहिंग्या से हमेशा रोहिंग्या मुस्लिम ही समझा जाता रहा है, और कोई समुदाय नहीं | इस बारे में बहुत स्पष्ट होना चाहिये | वास्तव में, सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख हमारी हस्तक्षेप याचिका में हमने SOAS bulletin of burma research की एक विदुषी का एक २००५ का लेख भी प्रविष्ट किया है (मैं इसे अपने साथ लाया हूँ केवल सन्दर्भ हेतु) |

वो इस संस्था में एक विदुषी हैं जिन्होंने रोहिंग्याओं का मूल खोजा है, उनका ऐतिहासिक उद्गम और रखाइन या आराकान में एक मुस्लिम अन्तःक्षेत्र का विकास,  और फिर विस्तार से समझाया है कि किस समस्या से ये देश जूझ रहा है बिलकुल हमारी तरह १९४८ से | ठीक है, ये तुलनात्मक रूप से नया विषय नहीं है, ये १९४८ से चला आ रहा है |

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