बुधवार, जुलाई 15, 2020
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क्यों रोहिंग्याओं का विषय न्यायव्यवस्था का विशेषाधिकार नहीं है

यदि आप एक लोकतन्त्र हैं, मैं आशा करता हूँ विधि का राज्य आवश्यक सहगामियों में से एक है जो कि लोकतन्त्र के साथ आता है, जो कि लोकतन्त्र और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संगत है और संवैधानिक मूल्यों के साथ भी । अतः मुझे एक न्यायालय के सामने स्वयं से केवल ये पूछने की आवश्यकता है कि क्या मेरी स्थिति अवैध है? क्या मेरी स्थिति विधि में स्थित है? क्या मैं ऐसा कुछ कह रहा हूँ जो कि इस उस नैय्यायिक रूपरेखा के चार कोणों के ढाँचे से बाहर जाता है जो कि इस पर लागू होती है? केवल यही वो प्रश्न है जो कि मुझे सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख रखना चाहिये । इसके अलावा मैं नहीं समझता कि मुझे कहीं भी देखने की आवश्यकता है ।

बल्कि, सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख रोहिंग्या याचिका में एक प्रश्न ये भी है कि – क्या सर्वोच्च न्यायालय इस निश्चित विषय में हस्तक्षेप कर भी सकता है? एक अच्छा कारण है, ये इस प्रकार है । तो संयुक्त राज्य में आप शायद इसे कह सकते थे, राष्ट्रपति का विशेषाधिकार या कार्य्यपालिका का विशेषाधिकार जिसका तात्पर्य्य ये है कि नीति के कुछ पक्ष होते हैं जिनमें कि न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं करती, इस सीधे से कारण से कि इसकी निपुणता नहीं होती और दूसरा ये कि आवश्यक रूप से सब कुछ नैय्यायिक समीक्षा के लिये प्रस्तुत नहीं होता । कुछ विषय नीति के अधीन होते हैं ।

अन्ततः कुछ निश्चित लाभ सत्ता में आने के साथ आते ही हैं और क्यूँकि आप सत्ता में आते हो, आपको अपनी दृष्टि को लागू करने का अधिकार होता है । आप इसको अपनी दृष्टि को बलात् लागू करना भी कह सके तो । मेरा एक स्पष्ट घोषणापात्र है, मेरी एक स्पष्ट कार्य्यसूची है, मैं उस कार्य्यसूची को बढ़ावा दे रहा हूँ । तो ऐसा ही सही, यदि आपको कोई समस्या है, आप उसको २०१९ में निपटा सकते हो । आप उस समय उत्तर देना । तब तक आपको प्रतीक्षा करनी होगी, जबतक आपका अवसर नहीं आता । कृपया प्रतीक्षा कीजिये, आप अब सत्ता में नहीं हो । अतः, यदि किसी कार्य्यसूची को बढ़ावा मिल रहा है तो आप उसको केवल वैधानिक आधारों पर चुनौती दे सकते हो । इसे आगे, आपके पास कोई भी मार्ग नहीं है । आपकी सारी नैतिकतावादी बकवास आवश्यक रूप से कूड़ेदान में ही गिरनी चाहिये ।

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