बल्कि उनकेलिये और भी ऊँचे मानक होने चाहिये । जो भी बात वे कहें, वे उससे पीछे नहीं हट सकते । आप एक बात कहें, आप उसको पूरी तरह विचार कर लें और फिर वो बात कहें । फिर वो क्या करते हैं, तो हमने बिलकुल अभी ‘विदेशी नागरिक विधिनियम’ पर चर्चा की, हमने ‘IMDT विधिनियम’ की चर्चा की । अब आपके पास नागरिकता विधिनियम भी है । नागरिकता विधिनियम ही आपको नागरिकता प्रदान करता है । और कोई भी विधिनियम नहीं हो सकता जो ये करे । तो वे एक प्रावधान लेकर आये, नागरिकता विधिनियम का अनुभाग ६अ जो कि १९८५ की असम सन्धि के बाद जोड़ा गया, ये कहकर कि बच्चे इतना चिल्ला रहे हैं, कुछ तो कर देते यार, इसलिये उन्होंने ये प्रावधान प्रविष्ट किया ।

ये प्राव्धान्न क्यूँ महत्त्वपूर्ण था ? मैं ये समझाता हूँ । आपको तीन समयरेखाओं को देखना होगा, १९४७-१९६६, ६६-७१, ७१-आज तक, ठीक । कोई भी जो कि साधारणतया १९६६ से पूर्व वास्तविक रूप से असम का निवासी रहा है, भारत के नागरिक की भाँति व्यवहृत होगा और अतः असम का नागरिक होगा, और इस तरह वो अवैध आप्रवासी की भाँति व्यवहृत नहीं होगा, ६६ से ७१, नागरिकता विधिनियम के अनुभाग ६अ के अनतर्गत होगा, १९७१ से बाद का कालांश ‘IMDT विधिनियम’ के अन्तर्गत होगा, इसप्रकार ये विभक्त हुआ । अब ‘IMDT विधिनियम’ हो गया, याने १९७१ के बाद के लोगों का प्रत्यर्पण भी विदेशी नागरिक विधिनियम के अन्तर्गत हो गया, ठीक ? अतः, सार ये था कि विदेशी नागरिक विधिनियम अब आपको सभी के पीछे पड़ने की शक्ति देता है । नागरिकता विधिनियम १९६६-७१ के मध्य के लोगों को बचा रहा है । विशेष प्रावधान इसके लिये बनाये गये हैं ।

तो इस निश्चित प्रावधान को चुनौती दी गयी थी, मेरे विचार से २००९ में कभी, मेरे विचार से पहली याचिका २००९ में दायर की गयी, दूसरी याचिका, २०१२ की प्रादेश याचिका थी, दूसरी याचिका असम सन्मिलित महासंघ के द्वारा थी । यही याचिकाकर्त्ता है इस याचिका में । ये निर्णय १७ दिसम्बर २०१४ को आया, केन्द्र में सत्ता परिवर्त्तन के बाद । अब कोई आशा करेगा कि सत्ता में परिवर्त्तन, अपने साथ अन्तरात्मा में परिवर्त्तन भी लायेगा और जहाँ तक ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय की बात है, स्थिति में भी परिवात्तन होगा । दिसम्बर २०१ में सत्ता में बैठी सरकार ने नागरिकता विधिनियम के अनुभाग ६अ का बचाव किया जब तक सर्वोच्च न्यायालय ने इसको निरस्त नहीं किया या निरस्त भले न किया, मूलतः ये कहा कि हम इस निश्चित प्रश्न को देखेंगे कि क्या ये वैध है या नहीं, परन्तु हम निश्चित रूप से ये विचार रखते हैं कि जबसे ये विषय बढ़ा है और राष्ट्रीय संज्ञान में आया है १९६० में, प्रत्यर्पित किये गये लोगों की संख्या बहुत कम है । ये बड़ी कठिनाई से कुछ लाख है और उन आँकड़ों को देखो जो (लोग) हमारे पास हैं । जब न्यायमूर्ति बल्कि जब एस के सिन्हा ने अपनी सूचना केन्द्र को १९९८-९९ में दी, असम में अवैध आप्रवासियों की संख्या, मेरे विचार से लगभग, मेरे विचार से १४ लाख थी, लगभग १४ लाख थी । उस समय अवैध आप्रवासियों की और बंग्लादेशियों की दिल्ली में जनसंख्या ही ३ लाख थी ।

ये १९९८-९९ की बात है, वे पहले ही दिल्ली पहुँच चुके थे, सरकारी आँकड़े आज लगभग ३ करोड़ कहते हैं, २-३ करोड़ और आप सर्वदा और ५०% जोड़ सकते हैं । यदि ये सरकारी आँकड़ा है, तो आप सर्वदा उसको और ५०% से बढ़ा सकते हो । ये आँकड़ा हमारे सम्मुख है । इनमें से एक निर्णय में स्पष्ट उल्लेखे है । तीन  में से एक निर्णय, आकर्षक घटकों में से एक, विकर्षक घटक भी होते हैं, तो बांग्लादेश की तरफ से एक विकर्षक घटक है और भारत की तरफ से एक आकर्षक घटक है । एक निश्चित घटक जो कि निर्णय में उल्लिखित है वो ये है कि इनका एक वोट बैंक की भाँति प्रयोग होता है और राजनैतिक नेताओं द्वारा इनको प्रोत्साहन मिलता है और ये विशिष्ट रूप से उल्लिखित है ।

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