बुधवार, नवम्बर 14, 2018
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रोहिंग्याओं समर्थकों के कृत्रिम तर्क और भारत एक राष्ट्र के रूप में

अब, उससे पहले एक बात है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिये । हम एक राष्ट्र-राज्य में रहते हैं । यदि हम एक राष्ट्र राज्य में रहते हैं, राष्ट्र राज्य के सिद्धान्त के साथ कुछ अनुमान और पूर्वानुमान भी आते हैं, जिसका अर्थ ये है कि मैं अपनी सीमाओं की रक्षा करने के लिये अधिकृत हूँ । तो मेरा कर्त्तव्य भी है और मेरे पास शक्ति भी है कि मैं अपनी सीमाओं की रक्षा करूँ । जैसे वैश्वीकरण ने राष्ट्र राज्य के सिद्धांत को वास्तविक व्यावहारिक दृष्टि से परिवर्त्तित किया, मुझे नहीं लगता, मेरे विचार से सर्वश्रेष्ठ उदाहरण आज के समय में ‘ब्रेक्सिट’ का है । ये सत्य कि आप पहचानों को मिटा नहीं सकते, आप संजातीय पहचानों को नहीं मिटा सकते, या आप साम्प्रदायिक या राष्ट्रीय पहचानों को नहीं मिटा सकते, या राष्ट्रवाद का सिद्धान्त निरस्त नहीं है, राष्ट्रवाद का सिद्धान्त अप्रासंगिक नहीं हुआ है, ये कुछ ऐसी बात है जिसे हमें पहचानना होगा क्योंकि ये पूरे विषय के केन्द्र में है, क्योंकि जो तर्क आपको दूसरे पक्ष से दिया जायेगा वो ये है कि भारत एक देश है जिसका पूरा इतिहास आप्रवास से भरा हुआ है ।

बल्कि, सीधे मेरी ट्विटर समयरेखा पर एक सज्जन ने कहा कि ७०० ईसवीं से १९४७ तक जो भी हुआ, दोनों को मिलाकर, मुस्लिम आक्रमण और ब्रिटिश औपनिवेश समेत, ये उनके अनुसार आप्रवास का उदाहरण है । मुझे समझ नहीं आया कि उस पर दया करूँ या लोटपोट होकर हसूँ । मैंने बस ये सोचा, मूर्ख को अनदेखा करो । ऐसे व्यक्ति के साथ उलझने में कोई लाभ नहीं । यदि आप आक्रमण, आप्रवास, बसाव और उपनिवेश में अन्तर नहीं कर सकते, भगवान् आपको बचाये । बल्कि, मैं सोचता हूँ, हमारी शिक्षा व्यवस्था के साथ कुछ गम्भीर समस्या है, जो कि है ।

तो, इन दोनों विषयों का मिलान करना समस्या है । देखिये, बात ये है, सुकर स्थिति ये है, यदि आप विधि से विरुद्ध हैं और आपकी स्वयं को समर्थन करने की स्थिति स्पष्ट नहीं है जहाँ तक विधि की बात है, वे तुरंत ही दूसरे तर्क पर चले जायेंगे, जो कि सभ्यता और वैश्वीकरण का तर्क है । क्या आप शीत युद्ध के काल में नहीं रह रहे हो ? जहाँ आप अब भी ऐसा सोचते हो कि राष्ट्रीय पहचान ही राष्ट्रीय स्थिति है, एक सिद्धान्त जो अब भी महत्त्व रखता है । निश्चित रूप से इसका महत्त्व है । कैसे इसका महत्त्व नहीं है ? बिल्कुल इसका महत्त्व है । यदि हम कहते हैं कि भारत केवल आप्रवासों की भूमि है और निरन्तर आप्रवासों की लहर आती रही है, क्योंकि ये सब शान्तिपूर्ण रहा । क्यूँ हम अब भी आर्य्यों के आक्रमण के विचार को बढ़ावा देते हैं ? आर्य्यों का आप्रवास का सिद्धान्त ही सही, शायद हम इसे स्वीकार कर भी लें, भले ये थोड़ा अतार्किक भी हो, निराधार हो, वैज्ञानिक रूप से दूषित हो ।

आप एक ओर ये नहीं कह सकते कि आपको इस एक निश्चित संजातीय वर्ग के इस देश पर आक्रमण करने से समस्या है और ये कहना कि उन्होंने द्राविड लोगों पर बहुत अत्याचार किया और फिर आर्य्यों के आक्रमण के सिद्धान्त को एक एजेंडा चलाने को प्रयोग करना और फिर शेष प्रत्येक आक्रमण को आप्रवास कहकर उचित ठहराना । मुझे समझ नहीं आता कि ये दोनों कैसे टिक सकते हैं, कुछ तो बहुत ही गड़बड़ है, और मुझे नाहीं लगता कि १२० या १५० के आईक्यू की आवश्यकता है ये समझने के लिये कि इन दोनों तर्कों में दोष हैं । आप सच में ये नहीं कह सकते कि ये दोनों ही ठीक हैं और दोनों का तार्तम्य हो सकता है, बिलकुल भी सम्भव नहीं है ।

तो हमें ये समझने की आवश्यकता है कि जब तक हम सहमत होकर ये स्वीकार न करें कि राष्ट्र राज्य का सिद्धान्त अभी भी वैध है और इसे वैध रहना होगा, तब तक इसके उपजीवी विषयों पर चर्चा करने का कोई लाभ नहीं है क्योंकि आप देखिये, आप केवल तकनीकी विषयों पर ध्यान दे रहे हैं । आपकी बुद्धि तुरंत हाथ जोड़ लेगी, आप पुराने विश्व में जी रहे हो, आप एक डायनासौर हो, आप आधुनिक नहीं हो, आप धर्मनिरपेक्ष नहीं हो, आप उदारवादी नहीं हो और अतः आपने अन्तःकरण और तत्त्वपूर्वक रूप से वैश्वीकरण के सिद्धान्त को अंगीकार नहीं किया है और इसलिये आप मेरा देश, मेरा क्षेत्र, मेरी सीमा और इस प्रकार की बकवास अलापते रहते हो ।

आप युद्ध क्यूँ करते हो ? युद्ध निःप्रयोजन है । युद्ध हो या और सभी चिन्तायें जो कि आज हमारे सम्मुख हैं, वे राष्ट्र राज्य के सिद्धान्त से भीतर तक जुड़ी हुयी हैं, कम से कम जहाँ तक हमारे बाहरी विषयों की बात है या शायद भीतरी विषयों की भी । चाहें ये भीतर से उग्र स्वभाव हो, चलिये इसे नक्सलवाद या बाहरी उग्रवाद कहते हैं, दोनों ही भारत एक राज्य को चुनौती हैं, भारत एक राष्ट्र राज्य के रूप में, अतः ये आवश्यक है कि सबसे पहले राष्ट्र राज्य के सिद्धान्त की मर्यादा रखी जाये और फिर स्वयं से पूछें कि इस निश्चित विषय से इसका क्या सम्बन्ध है ? जैसा मैंने कहा, अपनी स्वतन्त्र सीमाओं की रक्षा का सिद्धान्त आपके स्वतन्त्र राज्य होने के अधिकार से ही निकलता है ।

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