शुक्रवार, अक्टूबर 19, 2018
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असम – किस प्रकार ट्राइब्यूनल द्वारा अवैध आप्रवासियों का निश्चय (आई.एम्.डी.टी.) अधिनियम ने प्रत्यर्पण बहुत कठिन बना दिया

तो असम की संजातीय पहचान की रक्षा करने का विषय असम के भारतीय संघ में विलय होने के समय से चला आ रहा है और अतः आपके पास सबसे पहले विधिनियमों में से एक है जो कि १९४६ के विदेशी नागरिक अधिनियम के पश्चात् आया, १९५० का आप्रवासी निष्कासन विधिनियम जो कि असम पर लागू किया गया था, इसके बाद लोगों ने अनुभव किया कि कुछ परिणामजनक काम हो नहीं रहा । हम अब भी देख रहे हैं कि हमारी पहचान और हमारा क्षेत्र अधिगृहीत हो रहा है और बड़ी संख्या में लोग इस भूमि पर आ रहे हैं, हमें इसके बारे में कुछ करना होगा । तो, अखिल भारतीय अहोमिया छात्र संगठन ने इसके बारे में हंगामा करना आरम्भ किया और फिर जो समझौता हुआ उसे असम समझौता के नाम से जाना जाता है, जो कि १५ अगस्त १९८५ को सम्पन्न हुआ ।

अब, इससे पहले कुछ हुआ, सरकार ने एक विधिनियम बनाया, जिसको आई.एम्.डी.टी. कहते हैं – १९८५ का ट्राइब्यूनल द्वारा अवैध आप्रवासी निश्चय अधिनियम, जिससे अनुप्राप्त उन्होंने विदेशी नागरिक ट्राइब्यूनल बनाये, अवैध आप्रवासी ट्राइब्यूनल बनाये, मूलतः इन लोगों को प्रत्यर्पित करने के लिये । १९४६ का विदेशी नागरिक अधिनियम है, १९५५ का नागरिकता अधिनियम है, १९८५ का आई.एम्.डी.टी. अधिनियम है, १९८३ का । आपके पास पहले ही एक विदेशी नागरिक अधिनियम है, विदेशियों को निष्कासित करने के लिये, आपको १९८३ में एक दूसरे अधिनियम की क्या आवश्यकता ? स्वयं को पूछिए, आपको एक ही हेतु की प्राप्ति के लिये दो अधिनियम क्यूँ चाहिये ?

विदेशी नागरिक अधिनियम की आवश्यकता विदेशियों के प्रत्यर्पण के लिये ट्राइब्यूनल गठित करने के लिये है, सरकार के पास किसी को भी, जो कि इस देश का नागरिक नहीं है, जो कि अवैध आप्रवासी है, को निकालने की, सम्पूर्ण शक्तियाँ हैं, अमर्यादित शक्तियाँ हैं इस विधिनियम द्वारा दी गयीं हैं । तो क्यूँ आपको एक दूसरा विधिनियम चाहिये ?

अब यहाँ इसका प्रसंग आता है । आई.एम्.डी.टी. विधिनियम ने सरकार पर एक अतिरिक्त भार डाला कि वो सिद्ध करे कि कोई व्यक्ति एक अवैध आप्रवासी है, परिणामतः जो भार विदेशी नागरिक अधिनियम के अन्तर्गत था, बढाया गया और अधिक हो गया, जिससे कि आपके लिये कठिन हो जाये किसी को बाहर निकालना, इस तरह इस निश्चित अधिनियम के हेतु को ही पराजित कर दिया गया । अतः, अखिल भारतीय अहोमिया छात्र संगठन ने राज्य सरकार को लिखना और प्रतिनिधि भेजना जारी रखा, बार बार किया, ये कहते हुये कि क्या आप जानते हो सबसे बड़ी बाधा क्या है प्रत्यर्पण में ? वही विधिनियम जो कि प्रत्यर्पण को सुकर करने के लिये बनाया गया है, वे इसको लिखते रहे जब तक कि एक शिखर तक बात नहीं पहुँची और फिर उन्होंने १९८५ में असम समझौता किया, परन्तु क्या इससे ये अधिनियम वापिस लिया गया ? नहीं, नहीं लिया गया, ये चलता रहा ।

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