भारत को सभी उत्पीड़ित भारतीय समुदायों को शरण देनी चाहिये

मैं ये तर्क नहीं दूँगा कि हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और ये पहले ही अति जनसंख्या वाला देश है तो और अधिक लोगों को यहाँ स्वीकार न किया जाये । क्षमा कीजिये, मैं बिलकुल भी इस स्थिति को स्वीकार नहीं करूँगा, इस कारण से कि मैं उत्पीड़ित भारतीय समुदायों को भारत में शरण देने के पक्ष में हूँ । किस प्रकार ये अनुचित है ? वैसे भी यही स्थिति नागरिकता संशोधन अधिनियम में प्रस्तावित है, जहाँ हम मौलिक रूप से यह कह रहे हैं कि निश्चित उत्पीड़ित अल्पसंख्यक जैसे कि हिन्दू, पारसी, जैन, बौद्ध, ईसाई, चकमा, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंग्लादेश, तीन देश पहचाने गये हैं जिसके आधार पर हमने लम्बी कालावधि के वीजा के लिये अधिसूचनायें दी हैं, उनको इस देश में बसने दिया जाये ।

अन्ततः, हम इतिहास को नहीं भूल सकते, जो कि कहता है कि ये लोग हमेशा से इस निश्चित उपमहाद्वीप के निवासी रहे हैं और इन्हें इस उपमहाद्वीप के कुछ भागों में शरण मिलनी चाहिये और मातृभूमि से बेहतर और कौनसा स्थान होगा, जो कि भारत है और फिर एक वैधानिक तर्क भी यहाँ पर किया जाना चाहिये । मैं केवल उन्हीं लोगों को इस देश में आमन्त्रित करूँगा जो कि मेरे अनुसार मेरे अस्तित्व के लिये संकट नहीं हैं, विधि के अनुसार मुझे इस देश में सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिये । परन्तु जब कोई मेरे देश में घुसने का प्रयास करना है, एक स्वाधीन राष्ट्र के रूप में मेरा अधिकार सर्वोच्च है, जिसका तात्पर्य ये है कि मैं निश्चित करूँगा कि कौन प्रवेश कर सकता है और कौन नहीं, और मैं इसके लिये निश्चित कारण भी दे सकता हूँ । मैं इसके लिये निश्चित तर्क भी दे सकता हूँ ।

अतः, ये कहना अवैधानिक नहीं है, असंवैधानिक नहीं है, कि ये वो लोग हैं जिन्हें हम इस देश में आमन्त्रित करेंगे क्यूँकि हमें लगता है कि ये कोई संकट नहीं बनेंगे । अतः, यदि आपको कोई ये मूर्खतापूर्ण तर्क दे कि तुमने पारसियों को आमन्त्रित किया है, तुमने तिब्बतियों को आमन्त्रित किया है, तुमने इन लोगों को आमन्त्रित किया है, हाँ, क्यूँकि मैं विश्वास करता हूँ कि ये मेरे लिये कोई संकट नहीं हैं । क्या मुझे किसी प्रकार की चिन्ता नहीं होनी चाहिए जब ४०,००० लोग घुस आयें और उनमें से १६,००० लोग भारत के विवादास्पद सुलगते क्षेत्र में हैं, जो कि जम्मू कश्मीर है, और सभी जिहादी संगठन और अलगाववादी संगठन उनके पीछे अपना पूरा जोर लगा रहे हैं । क्या आप सर्वोच्च न्यायालय की बात को वास्तव में सत्यापित नहीं कर रहे कि इसके पीछे राजनैतिक हेतु है ? कि ये सत्य है ।

इसको ध्यान में रखते हुये, हमारे लिये ये उचित है कि हम ये स्थिति लें कि पहचान के आधार पर, भारत के पास ये अधिकार होना चाहिये और शायद है कि वो निर्णय करे कि कौन इस देश में प्रवेश कर सकता है और कौन नहीं, और मैं इस स्थिति को कहाँ से प्राप्त कर रहा हूँ ? मैं इस स्थिति को विदेशी नागरिक अधिनियम से प्राप्त कर रहा हूँ जो कि सर्वोच्च न्यायालय के दो विशिष्ट आदेशों में अनूदित है, एक ‘९१ में जहाँ ये निश्चित रूप से कहती है कि एक अवैध आप्रवासी के निष्कासन में सरकार को अमर्यादित शक्तियाँ प्राप्त हैं । ये इसका ही एकाकी अधिकार है । मैं केवल इसका विपर्याय कह रहा हूँ, सरकार की लोगों को प्रवेश देने की शक्ति भी समान रूप से अमर्यादित है । यदि मैं केवल अपने अधिकार से लोगों को बाहर निकाल सकता हूँ, मैं निश्चित रूप से अपने अधिकार से उनको आमन्त्रित भी कर सकता हूँ । यही विपर्याय है । जेम्स बांड की शब्दावली में कहें तो मारने का अधिकार नहीं मारने के अधिकार के समान है ।

अतः, जहाँ तक मेरा प्रश्न है, विदेशी नागरिक अधिनियम ही एकमात्र विधिनियम है जो कि इस निश्चित विषय पर लागू होता है या कमसेकम सर्वोच्च है क्यूँकि आप संविधान के अनुच्छेद १४ और २१ की बात इसी न्यायादेश में नहीं कह सकते जिसमें न्यायालय जुड़ा था । इन सभी लोगों को निश्चित रूप से संविधान के अनुच्छेद २१ से लाभ हुआ, जिसका तात्पर्य है कि ये सम्मानित व्यक्तियों की भाँति व्यवहृत होंगे । इनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार होगा, ये निश्चित रूप से ऐसा नहीं कहता है कि इन देश में इनको घर दिया जाये, कोई भी व्यक्ति इस देश में आ सकता है और अनुच्छेद २१ और १४ का हवाला देकर उनको निष्कासित करने के विदेशी नागरिक अधिनियम के अंतर्गत सरकार के अधिकारों को निरस्त कर सकता है ।

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