गुरूवार, अक्टूबर 1, 2020
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हरप्पा का विनाश और दक्षिण भारत का विकास

२००० बी सी के करीब विश्व में एक बहुत बड़ा मौसमी परिवर्तन हुआ जिसके सबूत न सिर्फ पराग के सैंपल या अन्य वैज्ञानिक प्रमाणों में पाए गएँ हैं बल्की मेसोपोटामिया के अभिलेख में भी एक भयंकर अकाल का उल्लेख होता हैं I इसी समय सरस्वती नदी जो लगभग अब तक सूख चुकि हैं, अदृश्य हो जाती हैं I सरस्वती के तट पर बसी हुईं बस्तियाँ भी खाली हो जातें हैं I आकस्मात इसी समय मिस्र के पुराने राज्यों का भी पतन हो जाता हैं I लगभग ईसि समय हरप्पा के पुरावशेष जो इन स्थानों में अब तक पायें जातें थे, अब मिलना बंद हो जातें हैं I तात्पर्य यह है की इन जगहों के साथ व्यापारी सम्बन्ध बंद हो रहें थे I

एक और बात, कभी भी हरप्पा में मध्यपूर्वी या माध्यम अशेयाई देशों के पुरावशेष कहीं भी नहीं पाए गएँ हैं I यह आश्चर्यजनक बात हैं की हरप्पा के निवासी सामान और यहाँ तक की मनुष्यों का निर्यात करतें थे परन्तु यह नहीं पता चलता हैं के वे क्या आयात करतें थे I

बेहरहाल, यह बात साफ़ हैं की लोग दक्षिण दिशा की ओर प्रवास कर रहे थे I कुछ लोग नर्मदा के तट की ओर, तो कुछ लोग गंगा के तट की ओर प्रवास कर रहे थे I इन सब जगहों पर हरप्पा की संस्कृति की निरंतरता के प्रमाण पाए गएँ हैं जो आगे चल कर उत्तरकालीन हरप्पा ओर गंगा तटीय संस्कृति के अवशेषों से मेल खातें हैं I मैं उस दिशा में नहीं जाना चाहता क्योकि मेरी रूचि उनकी समुद्री जीवन में हैं I आप सबको इन बातों का, जिनका मैंने अभी ज़िक्र किया, पता होगा I महत्व की बात यह हैं इस समय माध्यम भारत और दक्षिण भारत एकदम से जीवित हो उठते हैं I अबतक के प्रमाणों के आधार पर कहा जाता हैं की अबतक यानी २००० बी सी तक दक्षिण भारत में कान्स का काल नहीं देखा गया हैं I हराप्पन आदि संस्कृतियों का जिनका मैंने ज़िक्र किया, वे सभी कान्स की संस्कृतियाँ के रूप में जानी जातीं हैंI अचानक जब हरप्पा की संकृति का विनाश हो रहा था, लगभग उसी समय दक्षिण भारत में लोहे का काल देखा गया हैं I वे कान्स काल को छोड़ सीधे लोहा काल में पहुँच जातें हैंI

यह बड़े अचम्भे की बात हैं क्योकि यह माना जाता था की जो लोहा काल की सामग्री हैं वे आर्यन आक्रमण के साथ मध्यम्पूर्वी एशिया से आयें थे I निःसंदे लोहा और लोहें की सामग्री और उनका व्यावस्थित उपयोग उत्तर भारत में भी नहीं बल्कि हैदराबाद में पायीं गयीं हैं I वस्तुतः संसार के सबसे प्राचीन लोहे की सामग्री, एक वर्ष पूर्व हैदराबाद विश्वविद्यालय के परिसर में पायें गएँ हैंI

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