शुक्रवार, अगस्त 17, 2018

ओडिया और श्री लंका

 

इसी दौरान पूर्वी दिशा की ओर, जो क्षेत्र आज कल बंगाल और उड़ीसा कहलायें जातें हैं, सामुद्रिक गति-विधियों में अचानक वृद्धि देखने को मिलती हैं I गंगा के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र से लेकर, आज कल जिसे हम हूगली कहतें हैं, चिलिका झील तक के समुद्री किनारे पर सामुद्रिक गति विधियों की बौछार देखने को मिलती हैं I वस्तुतः अभी अभी कुछ हफ़्तों पहले ही एक प्रमुख स्थान जो १५०० वर्ष पुराना हैं भुबनेश्वर के बहार पाया गया हैं I जो एक छोटा नगर हैं, हालाकि बहुत सारे बंदरगाह इस समुद्री तट पर पायें गएँ हैं I

ईसि समय उड़ीसा के लोग समुद्री यात्रा प्रारंभ करते हैं I सबसे पहले वे तट के साथ साथ धीरे धीरे यात्रा करते हैं I इनमे से कुछ ओरिया नाविक और व्यापारी दक्षिण की ओर यात्रा करतें हैं I निःसंदेह ५-६ शतक बी सी तक वे श्री लंका में पहुँच जातें हैं I यह बड़ी दिलचस्ब बात हैं क्योकि यदि आपको लगता हैं की श्री लंका के सबसे पहले का जन समुदाय तमिल या केरल वासियों का होगा…कदाचित यह लोग उत्तर श्री लंका में बसें भी क्योकि वे बहुत पास ही रहतें थे,… मगर सबसे प्राचीन और साफ़ निशानी एक सभ्य समाज की, उन लोगों के साथ देखने को मिलती हैं जो उड़ीसा के तटों से आ रहें हैं I श्री लंका में वेद्डा नाम के लोग पहले से ही निवास कर रहें थे, लेकिन अचानक से एक विशाल जन समुदाय देखने को मिलती हैं जो न सिर्फ दक्षिण की ओर बल्कि उसके विपरीत की ओर दक्षिण पूर्वी एशिया के समुद्री तट की ओर जिसे इस्थामस ऑफ़ क्ऱा कहाँ जाता हैं, वह एक महीन धरती का टुकड़ा हैं जिससे मलेसिया लटक रहा हैं, जो अब थाईलैंड का हिस्सा हैं I उड़ीसा के यह लोग वहां जातें हैं, उसको पार कर गल्फ ऑफ़ थाईलैंड से होकर वियतनाम, साउथर्न वियतनाम, कंबोडिया में पहुँच जातें हैं I हमारे पास अब अभिलेक हैं, मौखिक अभिलेक, कुछ शिलालेख और पौराणिक कथाएँ जो हमें जानकारी देतें हैं की संभवतः उस समय वहां क्या हो रहा था I

वस्तुत श्री लंका के सिन्हालों की बुनियादी कथा राजकुमार विजया की हैं जो अपने आप को एक शेर और राजकुमरी का पोता होने का दावा करते थे I (यह इस कथा का वोह छोटा अंक्श हैं जिसपर मुझे संदेह हैं) मूलतः वे अपने ४०० अनुगामियों के साथ… बेहरहाल उनके पिता ने उन्हें बुरा बर्ताव करने के लिए राज्य से बहिष्कृत किया था… वे दक्षिणी तट के रास्ते श्री लंका पहुँच जातें हैं, और यह बड़ी रोचक बात हैं की यह लोग वहां बसने लागतें हैं और आज भी श्री लंका के अधिकांश लोग अपनी जड़ें इन लोगों के साथ जोड़ते हैं I हालाकि इनके बाद भी बहुत सारें एसे प्रवासन हुए होंगें लेकिन वे अपनी जड़ों को इसी प्रवासन के साथ करते हैं I

और इन लोगों के साथ बहुत सारे एसे रोचक सांस्कृतिक चिन्ह पायें जातें हैं जो आज भी वहां देखने को मिलतें हैं I उदहारण के रूप में आप शेर के सिद्धांत को ही ले लीजिये I अब शेर का चित्र श्री लंका के राष्ट्रीय ध्वज पर पाया जाता हैं, मगर यह शर का विचार आया कहाँ से? अगर आप उड़ीसा में जायेंगे, तो आप उड़ीसा की पुरानी बस्तियों में भगवान् नरसिम्हा के मंदिर पायेंगे I बेहेरहाल एसे मंदिर आपको आंध्र प्रदेश में भी मिलेंगे I यहाँ तक की पूरी का पुराना मंदिर भगवान् जगन्नाथ का नहीं बल्कि भगवान् नरसिम्हा का हैं I आज भी जो भोग भगवान् को चढ़ाया जाता वोह सबसे पहले भगवान् जगन्नाथ को नहीं बल्कि भगवान् नरसिम्हा को चढ़ाया जाता हैं I

तात्पर्य यह हैं की सिंह की किसी न किसी रूप में आराधना की प्रथा उड़ीसा में पायीं जाती हैं, जो बहुत अजीब बात हैं क्योकि उस इलाके में ज़्यादातर बाघ पाए जातें हैं I वस्तुतः यह बात बंगाल में भी पायी जाती हैं क्योकि बंगाल भी बाघों का इलाका हैं, परन्तु आज भी शेर की पूजा किसी न किसी रूप में पायी जाती हैं क्योकि देवी दुर्गा का वाहन शेर हैंI मुझे नहीं मालूम की एसा क्यों हैं, शायद सुपरिचय अवज्ञा को जन्म देतीं हैं, शायद वे बाघ को ज्यादा पसंद नहीं करतें थे, या फिर तब वातावरण शेरों के अनुकूल था, मुझे नहीं मालूम, लेकिन एक बात तो तय हैं कि भूमंडल के इस भाग में शेर की प्रचुर मूर्तियाँ पायी जातीं हैं और यह मूर्तियाँ तब्दील होकर आज भी श्री लंका के राष्ट्रीय ध्वज पर जीवित हैं I

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