सोमवार, दिसम्बर 10, 2018
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क्यूँ सर्वोच्च न्यायालय को अयोध्या मामले में अवश्य एक निश्चित निर्णय देना चाहिये

६० वर्ष पीछे , ३० सितम्बर २०१० को निर्णय आया , यह एक मिश्रित निर्णय था क्योंकि, दो हिन्दू और एक एस्किमो याचिकाकर्त्ता में से, एस्किमो को उस पहाड़ी में से थोड़ा अंश तो मिल गया परन्तु स्वयं वो विवादित स्थल निश्चित रूप से हिन्दुओं को मिला और न्यायालय ने भी स्वीकार किया कि वहाँ पर एक हिन्दू मंदिर था और हिन्दुओं का उस स्थल पर न्यायपूर्ण अधिकार है । अब सेक्युलरवादी , जो हमेशा ही रक्त के प्यासे हैं , निश्चित रूप से हिन्दुओं से लड़ेंगे जब तक एक भी एस्किमो जीवित होगा और उन्होंने आशा की कि कोई एस्किमो आन्दोलन इसके विरुद्ध हो , परन्तु ऐसा हुआ नहीं क्योंकि एस्किमो सचमुच में अयोध्या में कोई रुचि नहीं लेते । दसियों लाख हिन्दू तीर्थ करने अयोध्या जाते हैं , कोई एस्किमो कभी नहीं जाता । एस्किमो मक्का जाते हैं , और यदि धन न हो तो अजमेर जाते हैं , परन्तु अयोध्या कभी नहीं जाते । तो अब उस स्थल पर जीवन का कोई चिह्न न था, हम इस विषय को यहीं छोड़कर मन्दिर बना सकते थे परन्तु तीनों ही पक्ष निर्णय से संतुष्ट नहीं थे , वे उस पूरे स्थल का शत प्रतिशत चाहते थे । इसलिये वे इस विषय को उच्चतम न्यायलय में ले गए जो कि अब निश्चित निर्णय देगा । यद्यपि सुब्रह्मण्यम स्वामी जो कि एक महान् वादकर्त्ता हैं, शीघ्र निर्णय आए ऐसा निवेदन लेकर न्यायलय गए और इस तरह एक अनंतिम निर्णय में कुछ निश्चित नहीं अभी तक । उच्चतम न्यायलय ने कहा कि सभ्य समाज आपस में ही समझौते से कोई मार्ग निकाले ।

अब हम 80 और ९० के दशक की परिस्थिति की ओर लौटते हैं जब भारत पूरी तरह साम्प्रदायिक दंगों से भरा पड़ा था , क्योंकि आप देखिये वे आपस में किसी समझौते पर नहीं पहुँच सकते , विशेषकर इसलिये क्योंकि हिन्दू स्वयं की रक्षा ठीक से नहीं कर पाते । हिन्दू समझौता करने के लिये ऎसी योजना लेकर जाते हैं कि सामने वाले को आधे के लिये संतुष्ट करेंगे और आधे से स्वयं को , इसके विपरीत दूसरा पक्ष पूरे की माँग करता है और फिर कहता है कि चलो ठीक है , हम आधा – आधा करते हैं , तुम्हें तुम्हारे आधे का आधा मिलेगा और बाकी सब हमारा , ये शत्रु की रणनीति है । तो हिन्दू स्वयं को बचाने में सक्षम नहीं है । सौभाग्य से अभी न्याय व्यवस्था है और हमारे पास न्यायालय हैं निर्णय करने के लिये और ये न्यायालय के पक्ष पर पूरी तरह से अपने कर्तव्य से भागने वाली बात है कि वो सारे विवाद को पुनः समाज के हाथ में देदे । न्याय करना सटीक रूप से न्यायालय का काम है और सौभाग्य से ये निर्णय अन्तिम नहीं है तो अभी हम क्या होगा इसकी प्रतीक्षा में हैं ।

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