मंगलवार, अप्रैल 7, 2020
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पश्चिमी धार्मिक विद्वानों ने अपने धार्मिक युगों से औरंगजेब को दोषमुक्त

आजकल ऑड्रे ट्रश्क के काम की बहुत चर्चा है , जो कि अमेरीका में प्रोफेसर है और जिसका दावा है कि औरंगज़ेब एक भला आदमी था , और उसका कहना है कि बहुत से अपराध जिनके लिये औरंगजेब का नाम लगाया जाता है वे कभी घटे ही नहीं । वो एक बड़े आन्दोलन का हिस्सा है । तीन साल पहले ज़्युरिक में एक सभा आयोजित की गयी थी , यूरोपियन एसोसियेशन ऑफ़ साउथ एशियन स्टडीज़ के द्वारा , इसमें एक दिन भर का सत्र था औरंगजेब के ऊपर , हिन्दी साहित्य के प्रमाणों /स्रोतों की दृष्टि से औरंगज़ेब , तो जो विशेष बात प्रत्येक वक्ता ने दोहरायी वो ये थी कि औरंगज़ेब की बहुत लोगों ने प्रशंसाएँ की थीं ।

औरंगजेब जैसे शासक के बारे में स्तुतियों से कुछ सिद्ध नहीं होता । स्टालिन की बहुत स्तुतियाँ मिल जाएँगीं , बल्कि अगर आप उसकी स्तुति न करें तो आप समस्या में पड़ सकते हैं । इन स्तुतियों में से एक गुरू गोबिंद सिंह द्वारा दिया गया एक पत्र है , प्रसिद्द जफ़रनामा , विजयपत्र जिसमें यद्यपि विजय उतना है नहीं । देखिये , गुरु गोबिंद सिंह एक ऐसे व्यक्ति से काम निकलवाने का प्रयास कर रहे हैं जो सर्व शक्तिमान है , याने कि औरंगज़ेब , जिसने उनको पराजित किया हुआ है । अब इसमें आपको बहुत बुद्धि लगाने की आवश्यकता नहीं है कि ये कोरी बकवास है । ये एकदम विपरीत बात है , उस स्थिति में गोबिंद सिंह का पक्ष बहुत दुर्बल था , उनके पास कारण थे औरंगजेब के प्रति इस प्रकार विनम्र भाषा का प्रयोग करने के , पर वे सचमुच में क्या सोचते थे ?

सामान्यतः मुझे बहुत कठिनाई होती है यह समझने में कि लोग क्या सोच रहे हैं परन्तु इस बार मैं शत प्रतिशत आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि गोबिंद सिंह जी पूरी दुनिया में सबसे अधिक नफ़रत औरंगज़ेब से ही करते थे । मुझे पक्का पता है क्योंकि औरंगज़ेब ने गोबिंद सिंह जी के पिता और चारों पुत्रों की हत्या की । मुझे नहीं लगता कि मनुष्यों के स्वभाव की मामूली समझ वाला व्यक्ति भी यहाँ कोई गलती कर सकता है और दूसरी ओर तर्क शास्त्र के प्रोफ़ेसर पूरी गंभीरता से कहते हैं कि गोबिंद सिंह जी तो औरंगज़ेब के सदाचार की स्तुति करते थे ।

परन्तु ऑड्रे ट्रश्क की एक बात तो सही है , जो औरंगज़ेब जो पर दोष लगते हैं और उसको एक पिशाच की तरह मानते हैं , वे उसका एक पक्ष नहीं जानते । यदि अपरिग्रह एक अच्छी चीज़ है तो औरंगज़ेब इस मामले में तो भला आदमी था । वो एक बड़ा ही पवित्र और धार्मिक हिमावासी था , उसने अपने पिता शाहजहाँ को एक वैभवशाली जीवन जीने के लिये धिक्कारा था , ताजमहल पर कर से जमा किये हुए पैसे व्यय करने को लेकर धिक्कारा था । परन्तु जिस उद्देश्य से उसने ये सब किया उसी उद्देश्य से उसने एक बहुत बड़े स्तर पर मूर्तियों , मंदिरों को तोड़ा , उसी उद्देश्य से उसने काफ़िरों पर पुनः जज़िया लगाया । जज़िया एक विशेष कर है जो हिमवासियों के आलावा बाकी सबको देना पड़ता है , जिससे वे जीवित रह सकें । वो साधारण जीवन जीता था क्योंकि वो अपने सम्प्रदाय में पूरी श्रद्धा रखता था और उसी श्रद्धा से उसने मंदिरों को तोड़ा , श्रद्धा और अपरिग्रह यदि अच्छी चीज़ हैं तो औरंगज़ेब एक अच्छा आदमी था , परन्तु जिस संप्रदाय में उसने श्रद्धा रखी वहाँ कुछ गड़बड़ है । राजनीतिक बंधनों के कारण लोग विवश हैं हिमवासियों के लिये अच्छी बातें कहने को । पर जब ये राजनीतिक विवशताएँ हट जाती हैं तो सेक्युलरवादी इतिहासकारों की कल्पनाओं पर सब हँसते हैं

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