शुक्रवार, अगस्त 17, 2018
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भारत की तरफ का प्राचीन व्यापार मार्ग, भारत को व्यापार अधिशेष का लाभ और इसका असर रोमानी अर्थनीति पर

अब ऐसा ही हाल पश्चिम हिंदमहासागर में भी हो रहा था जब भारतीय रोमानी साम्राज्य के साथ व्यापारी सम्बन्ध बढ़ाते हैं और इस रोमन साम्राज्य की जड़ें और उस समय के बारें में हमें पता चलता हैं एक नियमावली से जिसका नाम हैं “डी पेरिप्लुस ऑफ़ डी एर्य्थ्रेअन सी” और यह नियमावली बहुत ही दिलचस्प हैं I वह एक यूनानी नियमावली है, यूनानी मिसरी नियमावली और यह साफ़ साफ़ जानकारी देती हैं कि किस जलमार्ग के सहारें रोमानी व्यापारी भारत में व्यापार के लिए आये I

तो यह कहाँ से शुरू हुआ? इसके दो भाग हैं, आप चाहें तो अलेक्स्ज़न्द्रिया से शुरू कर सकतें हैं या फिर टायर और सिदों से I अगर आप अलेक्स्ज़न्द्रिया से शूरूआत करतें हैं तो आपको दक्षिण में नील नदी के मार्ग से जाकर, वहां एक नाहर हुआ करती थी जो नील नदी के साथ जुडती थी, जो आज कल कायरो कहलाता हैं उससे लेकर आज कल जिसे सुएज कहतें हैं I मतलब यह कि यह सुएज नाहर का पहला वर्णन नहीं हैं, हज़ारों साल पहले भी एक नाहर हुआ करती थी I समस्या यह थी कि वोह एक रेतीला इलाका था और उसे हमेशा साफ़ रखना मुश्किल था, मगर उसे चालू रखने की कई कोशिशें होती रहीं I

एक और मार्ग था यदि आप नाहर के और दक्षिण की तरफ जाएँ, जहाँ पहले एक फूली पड़ता हैं एक और मार्ग भी था बेनीका नमक जगह की तरफ I समुद्री तट पर जाने के लिए पहले आपको ऊंट के सहारे नील नदी से समुद्री तट की ओर जाना पढता I एक और मार्ग था जिसका ज़िक्र मैंने किया जो लेबनान के रास्ते से जिसे आज कल इजराइल कहा जाता हैं, मरुभूमि को पार करते हुए, आज कल कि पेट्रा से होकर, यही कारन हैं कि पेट्रा इतना समृद्ध था, क्योकि वोह एक कारवां का मार्ग था जिसके बाद अकाबा पहुंचा जाता I चाहे जैसे ही क्यों न हो, आप लाल्समुन्दर में पहुँच जाते और फिर आप लाल्समुन्दर के मार्ग से होकर उसकी दोनों संकीर्ण तटों पर व्यापार करते हुए व्यापार दक्षिणी मार्ग पर आना पड़ता I वैसे एर्य्थ्रेअन का मतलब यूनान में लाल होता हैं I

कैसे भी हो वे यमन में पहुँच जातें हैं और एक छोटी यात्रा के बाद सोकोत्रा नमक द्वीप पर पहुँच जाते I अब सोकोत्रा का मतलब क्या हैं ? उसका बीज है द्वीपा सुखादारा – आनंद का द्वीप और यह भारतीयों और अर्बिओं से भरा हुआ करता था और वोह एक प्रमुख व्यापार का केंद्र हुआ करता था, आज भी वहां की कन्दराओं में भारतीय नाविकों द्वारा बनाई भित्ति चित्रण देखने को मिलती हैं I वहां से आपको यमन के उत्तर में जाकर बलोच के सम्दुरीतट से गुजरात पहुँच सकतें थे और फिर वहां से दक्षिण भारत में पहुँच सकते थे I

अब पहले शताब्दी में एक चतुर आदमी जिसका नाम हिप्पलुस था, ने खोजा कि पुरानी घुमाऊदार रास्तों के बदले, मानसूनी हवा के सहारे सीधे केरल की तट तक यात्रा की जा सकती हैं, और बहुत जल्द एक बड़ा बंदरगाह खड़ा हो गया जिसे मुचिरी या फिर मुज़िरिस कहतें हैं, जो आज की उत्तरी कोची में स्थित हैं और पतनम नमक ग्राम में उस समय के बहुत सारे ऐतिहासिक अवशेष पायें गएँ हैं I यह अचानक ही से यकीनन पूर्वकालीन रोमानी या फिर जब रोमानी साम्राज्य सिर्फ एक गणतंत्र था, एक प्रमुख व्यापार केंद्र की स्थापना हो रही थी I यह वोह समय था जब यहूदियों का मंदिर नष्ट हो चूका था, एक महत्वपूर्ण यहूदियों का जनसमुदाय केरल के तटों पर आकर बसने लगा I

तो यह लोग किन चीज़ों का व्यापार किया करतें थे ? पेरिप्लुस के मुताबिक भारतीय दूसरी सामाग्रियों के साथ कपास का निर्यात करते थे, जो उस समय बहुमूल्य हुआ करता था, खासकर गुजरात का कपास, लोहा, इस्पात, जैसा की मैंने पहले भी कहा हैं लोहे का आविष्कार भारतीयों ने ही किया हैं, और बहुत समय तक भारतीय धातू विज्ञान सबसे श्रेष्ठ माना जाता था, तो हर प्रकार के इस्पात और लोहे कि सामग्री और यदि आप मुचिरी इलाके से आते थे तो फिर काली मिर्च और दूसरे मसालों का व्यापार किया करते थे, काली मिर्च विशेषतः मूल्यवान थी लेकिन अधिक मात्रा में आयात किया गया दक्षिणपूर्वी एशियाई मसलों को पहले मुचिरी लाया जाता था और फिर वहां से भारतीय व्यापारी निर्यात करते थे, जो फिर रोमानियों के पास पहुँच जाता था इत्यादि I तो यह हुआ भारतीय व्यापारियों का निर्यात I

अब भारतीय व्यापारी किन चीज़ों का आयात करते थे ? दूरारी सामग्रियों के साथ भारतीय व्यापारी इटली की शराब का और औरतों का आयत करते थे शाही हरम के लिए I तो इससे हम यह महत्त्वपूर्ण निर्णय पर आ सकतें हैं की प्राचीन काल में भी बड़े बड़े दावत दिए जातें थे जिनमे शराब और संगीनियाँ शामिल होतें थे I

इसी दौरान बहुत सारा व्यापार हो रहा था, और यद्यपि भारतीय बहुत मात्रा में शराब और औरतों का आयात कर रहे थे, भारतीय व्यापारी की मुद्रा लेखा में बढौतरी हो रही थीI अब प्राचीन काल में इस प्रकार की बढौतरी का भुक्तान किस प्रकार होता होगा? आवश्यक रूप से आप सोने में भुक्तान करेंगे, और रोमानी इतने लाखों सोने की मुद्रिकाएँ भारत भेज रही थी, अब यह एक बहुत बड़ी समस्या बन गयी, क्योकि यदि आप इतना सारा सोना किसी दूसरे देश भेज देतें हैं, तब आपके अपने देश में सोने की मुद्रिकाओं को बनाने के लिए सोना ही नहीं बचेगा और रोमन साम्राज्य दूसरी सदी में इसी समस्या से जूज रहा था, और रोमन राज्यसभा में प्लिनी जैसे लोग विवाद कर रहें थे की यह गंभीर समस्या हैं, और हमे कुछ करना चाहिए इन भारतीय व्यापारिओं के बारें में I  तो महाराज वेस्पसियन ने शुरू में तय किया कि वे भारत के साथ व्यापार पर किसी प्रकार की रोक लगायेंगे, समस्या दोनों यहूदियों और भारतीयों की थी, दोनों ने तस्करी के रास्तें ढूंढ लिए और वोह रोक असफल हो गया I

तो फिर से व्यापार शुरू हुआ, मगर इस बार रोमानियों ने तय किया की अब उनकी मुद्रिकाओं में कम सोना होगा I तो उन्होंने अपनी मुद्रिका में अपमिश्रण किया I भारतीय व्यापारियों ने क्या प्रतिक्रिया दिखाई ? वे इन खोटे सिक्कों को अपनातें गए, यदि आप भारत के समुद्री तट पर बसे पुरातात्विक जगहों पर जायेंगे तो आपको बहुत सारे सोने के सिक्के मिलेंगे, जिस कालावधि की पुरातात्विक स्थल पर आप गएँ हो उस के हिसाब से आपको इन सिक्कों में सोना घटता दिखाएँ देगा I

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