सोमवार, दिसम्बर 10, 2018
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हिन्दू धर्म और राष्ट्रीयता – शंकर शरण द्वारा एक व्याख्यान

 

समय बदल गया है, समय की मांग बदल गयी है,और जो नयी पीढ़ी आती है वह स्वयं सबकुछ तय नहीं करती; बहुत सी चीजे उसको बनी-बनायीं मिलती है | यह जो कैरियर ओरिएंटेडनेस का आज कासमय है, उसमेपढ़ना-लिखनाएक तरह से कम हो गया है|सबकुछ रेडीमेड, जल्दी, गूगल से मिल जाये, नेट से मिल जाये,उससे कम चल जाये – यह परंपरा बन गयी है और उसी में जो लोग सिद्धहस्त है,उनको ही सफलमाना जाता है |लेकिन जिस तरह के राष्ट्रवादी वातावरण में आपका संस्थानमुझे दिखाई पढ़ता है, और जिस तरह के परम्पराएं इस संस्थान ने बनाई हुई है,उसमे मुझे लगता है की आपको थोड़ी अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए | क्यूंकि भारत एक अनूठा देश है | अपने सभ्यता की दृष्टि से भी अनूठा है,और विश्व में आज भारत का जो स्थान है,अच्छा भी और कठिन भी – वह दोनों ही दृष्टिसेपहले आपको समझ के रखना चाहिए |

आजआप युवा है,काल आप प्रोफेशन में जायेंगे, काम करेंगे, तो आपको यह चेतना होनी चाहिए की इस पुरे एक्सिस्टेंस में विश्व के परिदृश्य में आप, आपका देश, आपका समाज, आपका कर्त्तव्य कहाँ है | और इसीलिए मुझे यह शुरुयाद करने में कठिनाई हो रही है की इतना जनरल विषय – इसमें कौन सी बातेंमैं आपके साथ शेयर करूँ, क्यूंकि आपकी बैकग्राउंड क्या है, आपने अबतक कितना जाना है,उससे मुझे परिचय नहीं है | और यह कठिनाई होती है शिक्षक को – खास करके उच्चशिक्षा में –की जबतक वह विद्यार्थी की बैकग्राउंड जानकारी की उसको – जानकारी नहीं है,तो वह अगली चीज़ को कैसे कनेक्ट करे | इसीलिए मैं अंदाजे से कुछ बातेंआप के सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ,और मुझे आशा है की आप इस परस्वयं विचार करेंगे, स्वयं समझने की कोशिश करेंगे | हमारे देश में – जैसा मैंने आप को कहाँ की भारत एक अनूठी स्थिति में है | सभ्यता के दृष्टि से भारत एक ऐसी अनूठी सभ्यता है जैसी दुनिया में कोई और नहीं | कहने के लिए भी अगर तुलना हो तो सिर्फ एक चीन है या मिशर है जिससे तुलना होती है,जो विद्वान् लोग करते है, एक अर्थ में शयेद वह तुलना भी बिलकुल सठिक नहीं है, क्यूंकि कोई ऐसी सभ्यता नहीं है आज विश्व में जिसका सातत्य, continuity, इतनी unbroken हो जितनी भारत की है | कोई सभ्यता नहीं है ऐसी |

यह विश्व का एकमात्र देश है जहाँ पर आज भी वह साहित्य पढ़ा जाता है जो ढाई हज़ार साल पहले पढ़ा जाता था | आज भी वह भाषायें वह शब्द इस्तेमाल किये जाते है जो ढाई हज़ार साल पहले, तीन हज़ार साल पहले किये जाते थे | आज भी कला की वह रूप, वह शब्द, वह गान उपलब्ध है जो ढाई हज़ार – तीन हज़ार – चार हज़ार साल पहले तक, पहले भी इसी धरती पर गाये जाते थे या पढ़े जाते थे | ऐसी विश्व में कोई सभ्यता नहीं है | और यह continuity इसके बावजूद की पिछले एक हज़ार वर्ष से भारत एक तरह से विदेशियों का गुलाम रहा है | ठीक है, इसपर विवाद होता है की मुघलों के समय में या सुल्तानों के समय में पूरा भारत गुलाम नहीं हुआ; कुछ लोग यहाँ तक कहते है कोई गुलाम ही नहीं था, वह तो स्वदेशी शासन था,और सिर्फ हम विदेशी शासन में– सिर्फ अंग्रेजों के समय से आये; यह विवाद अपनी जगह है, लेकिन एक जनरल consensus है की भारत, भारत के लोग अपनी समझ से, अपने इच्छा से, अपने संस्कार से यहाँ का शासन कम से कम पिछले एक हज़ार सालों से नहीं चला है; कुछ लोग यहाँ तक कहते है की वह अभी तक नहीं हुआ है | और यह बात सिर्फ rhetoric नहीं है, सिर्फ लफाज़ी नहीं है | यह बात सच है की हम लोग पिछले सत्तर सालों से राजनैतिक रूप से स्वतंत्र है |

लेकिन यह भी उतना ही सच है की अभी तक हम लोग सांस्कृतिक रूप से, बौद्धिक रूप से मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए है | और उसका सबसे सुन्दर और प्रत्यक्ष प्रमाण – हमारी भाषा और शिक्षा है | हमारी शिक्षा आज भी वही है जो अंग्रेजों ने बनाई थी – जो डिज़ाइन की थी | हमारी भाषा आज भी वही है – शासकीय, नीतिगत – अंग्रेजों ने बनाई थी | यहाँ तक की हमारा राजनीतिक तंत्र– कानून – वही है जो अंग्रेजों ने बनाया था | और यह आप आसानी से समझ सकते है की अंग्रेज यहाँ शासन करने ही नहीं आये थे, शोषण करने भी आये थे | वह अपने देश के हित में काम करते थे, इंग्लैंड के हित में काम करते थे | और इन्होंने जो यहाँ का तंत्र बनाया था – राजनीतिक तंत्र – वह बिलकुल अलग था | आप देखते होंगे बीबीसी में या सीएनएन में इंग्लैंड का – इउके का प्राइम मिनिस्टर १० जनप – सॉरी – १० डाउनिंग स्ट्रीट से निकलता है तो वह बिलकुल एक सड़क पर एक बिल्डिंग है, बिल्डिंग में दरवाज़ा खुलता है और वह प्रधान मंत्री बाहर आ जाता है | उसके – उसके पचास मीटर सौ मीटर दूर में बस स्टॉप है | तो इंग्लैंड का – भाई इउके का प्राइम मिनिस्टर ऐसी जगा में रहता है जहाँ पर निकलते ही वह सड़क आती है – एक कामकाजी जैसी जगह है | और भारत में उसी – उन्ही अंग्रेजों ने – वाइसराय का घर तो छोड़ दीजिये, एकजिले के कलेक्टर के लिए कम से कम पचास पचास बीघे का उन्होंने बंगला बनवाया | एक पूरी – एक पूरा ऐसा आडंबर खड़ा किया जिसमे शासन के प्रति लोगों में एक सम्मान का, रौब का, दबदबे का भाव पैदा हो |

ब्रिटेन में वह नौकरशाही नहीं है जो उन्होंने यहाँ बनया है | कहने का मतलब के हम आज भी उसी तंत्र को चला रहे है तो यह महसूस करना चाहिए की हम आज भी स्वतंत्र नहीं हुए है, हमने अपना तंत्र नहीं बनाया है | यह हमारी एक कठिनाई है | हम अपनी भाषा में आज भी लिख पढ़ नहीं रहे है, नियम कानून नहीं बना रहे है | हमारी कोर्ट, हमारी पार्लामेंट, हमारे कानून मंत्रालय, हमारेसारे महत्वपूर्ण दस्ताबेज पहले अंग्रेजी में बनते है, फिर उसका जैसे तैसे अनुवाद वगेरह होता है | दुनिया में ऐसा कोई महत्वपूर्ण देश नहीं है जहाँ पर उसका सर्वोच्च व्यक्ति और सबसे निचला व्यक्ति एक भाषा में नहीं काम करता | और इससे जो कठिनाइयाँ होती है आप कभी उस पर सोचने की कोशिश कीजिये, उससे बहुत बड़ा अंतर पैदा होता है | बहुत बड़ा अंतर | रूस में या जापान में या चीन में, अमेरिका में वह राष्ट्रपति हो या फिल्म स्टार या पालिसी मेकर या यूनिवर्सिटी का वाईस चांसलर जो भी बोलता है वह उसी भाषा में बोलता है जो उस समाज का सबसे अंतिम आदमी सीधे सुनता है, सीधे समझता है | यहाँ पर बिलकुल ऐसा नहीं है और यह सिर्फ एकमात्र ऐसा देश है – महत्वपूर्ण देश | छोटे छोटे अफ़्रीकी देश बहुत है जिनको अंग्रेजो ने और फ्रांसीसियों ने इउरोपियों ने उन्होंने गुलाम बनाया, उनकी भाषाएँ पूरी तरह मिट गयी है | वहाँ या तो फ्रांसीसी बोली जाती है या अंग्रेजी बोली जाती है, या पूरे लैटिन अमेरिका में स्पेनिश बोली जाती है | लेकिन उनकी पुराणी भाषा, पुराणी संस्कृति, पुराने लोग, पुराना साहित्य सबकुछ मिट गया | भारत एक ऐसा अनूठा देश है की इसमें वह continuity है जो ऋग्वेद के समय से आज तक आपको मिलेगी| आप ऋग्वेद उलट कर के पढ़े, उपनिषद् उलट कर के पढ़े, ध्यान से थोड़ी देर, और आप को दिखाई पड़ेगा की उसमे ऐसे दृश्य है जो आप को आज भी दिखाई पड़ते है |

उसमे ऐसे शब्द ऐसे मुहावरेहै जो आप आज भी इस्तेमाल करते है | तो ऋग्वेद से लेकर आज तक एकcontinuity, और दूसरी ओर पूरी की पूरी राजनीतिक प्रणाली, पूरी की पूरी शैक्षिक प्रणाली अभी भी उस कोलोनियल माइंडसेट में है जिसका उद्देश्य यहाँ का शोषण करना था, यहाँ के लोगों को क्लर्क और यहाँ के लोगों को अधीन बना के रखना था, यहाँ के लोगों में हीनता भरने की जिस की एक – एक उद्देश्य था – मैं यह नहीं कहूँगा की उनका सारा उद्देश्य यही था – ऐसी स्थिति की जो शिक्षा थी, ऐसी स्थिति की जो राजनीती थी , ऐसी स्थिति का जो कानून था, वह हम आज तक चला रहे है | तो एक अर्थ में हम स्वतंत्र भी है, दूसरी ओर हम परतंत्र भी है और इस परतंत्रता से हमारी मुक्ति अभी नहीं हुई है, इसका सबसे सामान्य उदहारण यह भाषा है | और इस भाषा से भारत जैसे देश में एक दूसरी मुश्किल हुई है | और वह – उस पर आप को ध्यान देना चाहिए –पत्रकार के रूप में विशेष कर , क्यूंकि पत्रकारों को किसी भी चीज़ की सूचना देनी होती है, और सूचना देने से पहले आप को स्वयं समझना होता है की असली बात क्या है | यानि आप अन्वेषण भी करते है, आप चीज़ों को समझते है, फिर आप दूसरों तक पहुचाते है | अब आप देखिये की यहाँ भाषा से कितनी बड़ी समस्याएं  खड़ा हुई है |

पुरे जिन जिन शब्दों का हम इस्तेमाल करते है, यानि आप को कहा है की अफ्रीका में या लैटिन अमेरिका में, अमेरिका में भी – उत्तरी अमेरिका में भी – पुरे अमेरिका में भी, जोवहा मूलनिवासीथे, मूल भाषा थी, मूल परव – त्यौहारथे वह सब ख़तम हो गये| भारत ऐसा है की एक हज़ार वर्ष की गुलामी के बावजूद इसका कुछ भी पूरी तरह ख़तम नहीं हुआ | ऐसे लोग भी आये जिनका पूरा उद्देश्य था की यहाँ की पूरी की पूरी संस्कृति, धर्म, समाज, भाषा को हमें ख़तम कर देना है | इनको कन्वर्ट कर लेना है | किसी को सफलता नहीं मिली | लेकिन इससे हमारे जीवन में एक विकृति भी आई है की हम बहुत सी चीज़े – हम जो बोलते है, जिन शब्दों का हम प्रयोग करते है, उसके अर्थ बदले हुए है | एक तिब्बती विद्वान् है, प्रोफेसर रिन्पोचे , उन्होंने एक बड़ी सुन्दर उपमा दी थी,मैं उसका प्रयोग करके आप को बताना चाहता हूँ की यह भाषाई समस्या हमें कहाँ तक परेशां करती है | उन्होंने कहा था की जैसे शब्दों का हम – जिनजिनशब्दों का – अपने शब्दों का इस्तेमाल करते है उसका वह जो मूल अर्थ हमारी सभ्यता ने दिया है, हमारे समाज ने दिया है वह अर्थ च्युत हो गए है | उसपे हमने यूरोपीय और अंग्रेजी अर्थ भर दिया है | और उसका मूल अर्थ खो गया है | तो वह उपमा देते है की जैसे किसी लोटे में दूध रखा हुआ था, तो किसी – कोई तेल ले कर आया, उसने कहा की आप यह तेल रख लीजिये तो उन्हें कोई और बर्तन नहीं मिला, तो उसने दूध को फेक दिया और उसमे तेल ले लिया | तो वह इस –यह शब्दों की उपमा दे रहे थे, की हमने बहुत सारे शब्दों का, वह उसका मूल अर्थ फेक दिया, और उसमे अंग्रेजी वाला, यूरोपीय वाला या अमेरिका वाला अर्थ रख लिया है |

अब यही लीजिये – धर्म-संस्कृति | हमारे यहाँ संस्कृति अलग से नहीं बोनी जाती, आम तौर पर आप देखिएगा धर्म-संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल – तो संस्कृति हमारीयहाँ धर्म से अलग नहीं रही है | बल्कि धर्म से अलग यहाँ कुछ भी नहीं रहा | तो अब यही धर्म शब्द लीजिये, जो उन्होंने कहा – उदहारण दिया था रिन्पोचे ने | हमारे यहाँ अधिकांश बच्चे, मुझे लगता है की दस में नौ नहीं, सौ में पंचानवे बच्चे, धर्म का अर्थ रिलिजन, रिलिजन का अर्थ धर्म समझते है | जबकि अकेडमिक रूप से भी, theoretically भी, व्यवहारिक रूप से भी – यह दोनों बिलकुल भिन्न धारणा है | धर्म में, हमारे धर्म में विश्वास या पूजा पाठ इसका कोई अर्थ नहीं रहा है | धर्म का मतलब भारत मेंरहा है कर्त्तव्य | सत्कर्म | अबरावण को अधर्मी कहते है लेकिन रावण तो शिवभक्त था | यह महाभारत को धर्मयुद्ध कहते है | मतलब एक पक्ष धर्म का था, दूसरा पक्ष अधर्म का था | तो दोनों तो सारे एक ही देवी देवतायों को पूजने वाले थे, एक ही परिवार के थे, एक ही विश्वास के थे, दोनों के गुरु एक थे, माता – वह पूरा वंश एक था | तो यह धर्मयुद्ध हम क्यूँ कहते है?उसी तरह हमारे यहाँ शब्द है पुत्रधर्म, राजधर्म, मात्रधर्म, गुरु का धर्म,विद्यार्थी धर्म, आप देखिये के रिलिजन से यह सब स्पष्ट नहीं होता | रिलिजन का मतलब है faith| rather उसके लिए,उनके लिए anotherword ही है – faith| आप का faith क्या है?you are मुस्लिम, jew, क्रिस्चियन –तो रिलिजन है faith | और धर्म है – faith आप का कुछ भी हो – आप का आचरण | आचरण से धर्म तय होता है और विश्वास से रिलिजन तय होता है |

यह हार्वर्ड के प्रोफेसर भी जानते है | जो भी, जिन लोगों ने भी indology पर या धर्म पर काम किया वह जानते है की धर्म बिलकुल अलग धारणा है, रिलिजन बिलकुल अलग धारणा है | लेकिन हमारे देश में रिलिजन और धर्म को एक शब्द समझने वाले, एक चीज़ समझने वाले आप को सभी विद्यार्थी मिलेंगे | जो सचेत नहीं है,जिनकी – जिनमे यह अभीप्सा नहीं है की हमें कुछ जानना है या अधिक समझना है, ठीक से समझना है वह दोनों को पर्यायवाचीके रूप में लेते है – डिक्शनरी में वह मिलता है | और यह एक शब्द नहीं है, मैंने सिर्फ उदाहरण के लिया दिया – की धर्म रिलिजन नहीं है और रिलिजन धर्म नहीं है – सिर्फ एक शब्द है | हमारे बहुत सारे ऐसे शब्द है,जैसे संस्कृति भी उनमे एक शब्द है | या लीला, पर्व, तीर्थ सम्पराय, ऋत–इन सबके लिए अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है | इसका यह मतलब नहीं है की अंग्रेजी कोई दुर्बल भाषा है, और हम उससे अधिक सबल है – दोनों सबल भाषा है | कहने का मतलब यह है की जो इस समाज, एक खास समाज, एक – उसका जो एक विशेष इतिहास है, उसकी जो विशेष परंपरा है उसके शब्द उसको व्यक्त करते है | और किसी दुसरे समाज का जो इतिहास है,उसकी जो संस्कृति है, उसका जो अनुभव है वह उसके शब्दों में व्यक्त होता है |

इसलिएहमारे भी बहुत सी – हमारे भी बहुत सी धर्नाये है जिसके लिए अंग्रेजी में शब्द नहीं है या रशियन में शब्द नहीं है, उनकी भी बहुत सारी धारणाये है जिसके लिए हमारे पास शब्द नहीं है | लेकिन क्यूंकि हमारे देश में पूरी शिक्षा मूलतः अंग्रेजी में चल रही है, नीति निर्माण मूलतः अंग्रेजी में चल रहा है इसलिए हमें यह कठिनाई होती है की हम अपने बहुत सारे शब्दों को, अपने बहुतसारे समस्यायों को, अपने बहुत सारे स्थितियों को क्यूंकिअंग्रेजी के माध्यम से जानने की कोशिश करते है इसलिए पूरा का पूरा गडमड हो जाता है | न तो हम उसका वह यूरोपीय, अमेरिकी या रशियन या जर्मन इतिहास हम ठीक से समझ पाते है जिससे उन शब्दों की उत्पत्ति हुई, और न हम अपने इतिहास अपनी संस्कृति अपनी समझ को समझ पाते है क्यूंकि हम अंग्रेजी के कारण हमारा एक व्यवधान खड़ा हो जाता है | तो यह सिर्फ एक उदहारण है की हम जिन समस्यायों इस तरह की सभ्यतागत और दार्शनिक समस्यायों की जब हम चर्चा करते है तो यह भाषा का व्यवधान किस तरह एक हमें मुसीबत में डाल देता है जो आप के जैसे – अलावा – मतलब भारतीयों के अलावा यह समस्या किसी देश में विद्यार्थियों को या उच्चशिक्षार्थियों को नहीं होती | क्यूंकि अपनी भाषा अपनी संस्कृति ख़तम भी नहीं हुई – जैसेमैंने कहा की कुछ देशों में बिलकुल ख़तम हो गयी – ख़तम हो गयी तो ठीक है | एक बार आप रों लीजिये – ख़तम हो गयी – आस्ट्रेलिया में ख़तम हो गयी | लेकिन अब उनके पास नयी भाषा, नयी संस्कृति, नये – नयी शब्दावली, नयीअवधारणायेपूरी तरह – पूरा समाज उसी में जीता है | हमारेयहाँ ऐसा नहीं है | हमारे यहाँ अभी भी बृहत् समाज – बहु संख्यक समाज – बहुत बड़ी संख्या में समाज अपने ही धारणायों में जीता है |  लेकिन उसके ऊपर जो शिक्षा, जो नीति निर्माण, जो हायर स्टडीज़, रिसर्च, मीडिया यह सब आता है वह विदेशी माध्यम के भाषा के माध्यम से आता है, और विदेशी प्रत्यय इस्तेमाल करता है |

इससे कठिनाई यह होती है की हम ठीक ठीक किसी चीज़ को नहीं जानते | अगर हमारेविद्यार्थी, हमारे पत्रकार, हमारे विद्वान् – मैं तो कहूँगा हमारे प्रोफेसर अगर सचेत नहीं है तो वह बोलते कुछ है, उसका अर्थ कुछ और होता है | औरफिर जब वह कम्यूनिकेट होता है विद्यार्थियों तक या पाठकों तक तो उसका अर्थ कुछ और हो जाता है | तो इस भाषाई गड़बड़ी के कारण जो इस तरह की चीज़ें है जिसका ठीक ठीक विमर्श नहीं हो पाता | मैंने सिर्फ उदाहरण के कहा की धर्म और रिलिजन एक नहीं है | फिर हिन्दू धर्म| हिन्दू धर्म – जैसा मैंने कहा की रिलिजन नहीं है – रिलिजन faith होता है | हिन्दू धर्म में आप को – आप को कुछ भी मानने की छुट है | faith इसमें कुछ है ही नहीं | और इसी अर्थ में कुछ जो ऑर्थोडॉक्स मिशनरीज़ होते है, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिस्ट्स होते है वह लोग कहते है की यह लोग तो रिलिजन विहीन लोग है | यह हिन्दू लोग – इनमे कोई faith नहीं है | क्यूंकि न इनकी कोई एक किताब है, न इनका कोई एक God है, न कोई इनका कोई चर्च है, या न कोई इनका कोई प्रिस्ट क्लास है जो इनको आर्डर दे कर के बताये की क्या पूजा करनी है क्या नहीं करनी है – यह तो बिलकुल फ्री फ्लोटिंग समाज है, इनमे कुछ भी निश्चित नहीं है , इसलिए यह लोग irreligious है – नॉन-रिलीजियस है |

इसलिए रिलिजन देने का काम हमें करना है | यह जो सिरियस मिशनरीज़ है बड़े बड़े – कैथोलिक चर्च के – उनकेआप डाक्यूमेंट्स अगर आप देखे इन्टरनेट पर, वेबसाइट पर बड़े आराम से मिल जाते है | अब देखिये की उनमे यह गहरी भावना है की हमें पुरे भारत को क्रिस्चियन बनाना है | क्यूँ? क्यूंकि यह तो अन्धकार में डूबे हुए है | इन तक क्राइस्ट नहीं पंहुचा है, इनको बुक अभी तक नहीं मिली, इनकोGod का मेसेज नहीं मिला, इनके पास कोई मैसेंजर नहीं है, तो और यह ऐसा सोचने वाले कोई पागल लोग नहीं है , वह लुनाटिक फ्रिंज नहीं है, और वह कोई फनाटिक भी नहीं है, वह बड़े सज्जन, शिष्ट, विद्वान् लोग है, जो अपने ह्रदय में यह महसूस करते है और उसके हिसाब से पुरे भारत के लिए – जिले जिले गाँव गाँव तक के लिए उन्होंने योजना बनायीं है की कैसे उनको हम क्रिस्चियन बनाएं | और यह पूरी परियोजना खुले आम चल रही है – आज से नहीं, दो सौ साल से चल रही है, चारसौ साल से चल रही है | लेकिन आज भी वह बहुत सीरियसली इस कम में लगे हुए है | उनको कितनी सफलता मिली है या नहीं मिली है यह दूसरी बात है, हमारे प्रसंग में सिर्फ यह है की किस तरह से वह हमको irreligious या नॉन-रिलीजियस मानते है | या हमें अन्धकार में डूबा हुआ मानते है | इसीलिए क्यूंकि उनकी जो रिलिजन की धारणा है,और हमारी धर्म की धारणा है वह बिलकुल अलग है | हमारे यहाँ अगर कोई बिलकुल जीवनभर पूजापाठ न करे तो भी उसके मातापिता उसका परिवार उसको अपने धर्म या अपने समाज से बहर नहीं मानता | कोई इन संस्कारों में पड़ता है या नहीं पड़ता है उससे उसकोकोई फरक नहीं पड़ता |

उसका आचरण कैसा है उसपर लोगकहते है की यह अधर्मी है, यह पापी है – उसकेकर्म से उसको कहा जाता है | तो ऐसे – ऐसेहिन्दू धर्म की जो स्थिति है विश्व में वह आपको ध्यान से समझनी चाहिए | वह इसलिए की आनेवाले समय में और अभी भी यह संघर्ष बहुत ही विकट हो सकता है | हम क्यूंकि एक बड़े देश के नागरिक है, और बड़े समृद्ध देश के नागरिक है, समृद्ध देश इस अर्थ में की प्रकृति से असलीसमृद्धिप्राकृतिक ही होती है | प्रकृति ने आप को क्या दिया है उसी से समृद्धि होती है और दूसरी समृद्धि फिर human resources है की लोग कितने चतुर है, कितने इंटेलीजेंट है, कितने मेहनती है इससे फिर दूसरी संपत्ति पैदा होती है लेकिन मूल संपत्ति प्राकृतिक संसाधन है | रशिया को देखिये, अमेरिका को देखिये, यह सब, यह दोनों देश मूलतः प्राकृतिक रूप से समृद्ध है | उसके बाद उनका human resources उसमे मिल कर के इन्हें दुनिया का सबसे धनी और सबसे प्रभावी देश बनाता है | भारत भी वैसा ही एक देश है | यह सिर्फ विदेशी शासनों के कारण हम उनसे पिछड़े हुए हो गए, काफी – काफी चीज़ों में– फिरभी आप देखेंगे की सिर्फ सत्तर साल की स्वतंत्रता ने भारत को कहाँ से कहाँ पंहुचा दिया है| १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो दुनिया के देश – जो विकशित देश थे वह बिलकुल निराश थे के यह लोग तो लड़ मर कर ख़तम हो जायेंगे | यह बचने वाले नहीं है, यह बिलकुल गए गुजरे है | लेकिन इसके बावजूद की हमारे राजनीतीमें इतनी समस्या है, इसके बावजूद की इतना भ्रष्टाचार है, इतनी अकर्मण्यता है, इतना – सो, सारी बुराइया है जो हमारे नेतायों के लिए आप लोग – सब – हम सब लोग कहते है |

इसके बावजूद सत्तर सैलून में भारत की जो उन्नति हुई है वह सिर्फ इसलिए हुई है की विदेशी शासन हट गया | इतनी इस देश में क्षमता है, रिसोर्सेज है, लोग है – उद्यमी है,व्यापारी है,और ऐसे देश में रहते हुए हम लोगोको यह पता नहीं चलता है की हम लोग कैसे किस तरह की एक अपवाद किस्म के देश है | औरयहाँ पर धर्म और संस्कृति की बात आती है जिस को आप को मै एक सन्दर्भ देना चाह रहा था | वह यह – कीआप दुनिया में अकेले ऐसे देश है जो रिलिजन की अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा से बिलकुल बाहर है | सरल शब्दों में कहे तो भारत दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश भारत है | नेपाल था, अब उनको भी वह सेक्युलर बनारहे है और कन्वर्ट कर रहे है | ऐसे भी वह छोटा देह है,एक तरह से – ऐतिहासिक रूप से देखा जाये तो वह भारतीय सभ्यता का ही हिस्सा है | तो यह एकमात्र देश होना यह भी सुनिश्चित करता है की हमारे बारे में दूसरों को कितनी गलतफहमिया रहती है | मै आप को उदाहरण देता हूँ पत्रकारिता का –और शयेद आप लोगों ने भी नोट किया होगा –आप अगर सीएनएन, बीबीसी नियमित देखते हो,या अमेरिकी पत्रिकाए है जो अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्द – टाइम्स या न्यूज़वीक – अगर आप रेगुलर देखते हो तो आप नेपाया होगा की उसमे भारत के बारे में कभी भी सकारात्मक समाचार नहीं आते | हमेशा कोई न कोई नकारात्मक – कोई विचित्र चीज़ , कुछ जुगुप्सा पैदा करने वाली, या हेरत पैदा करने वाली – मानो यह जो देश है यह कुछ विचित्र किस्म का है, अनोखा किस्म का है, दैवीय किस्म का है, गड़बड़ किस्म का है – जहा से कोई पॉजिटिव समाचार आ ही नहीं सकता | या वहा के बारे में कोई पॉजिटिव आउटलुक बना ही नहीं सकते है| मैंआप को इस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ की कुछ लोग कहते है की वह लोग दुष्ट है,भारत से जलते है,या भारत के शत्रु है, हमेशा ऐसा नहीं है |

इसके पीछे एक कठिनाई भी है की भारत हिन्दू देश होने के कारण यहाँ की बहुत सी चीज़ों को वह नहीं समझते है|यहाँ की बहुत सी चीज़ों को वह समस्या मानते है जो यहाँ की सिर्फ विशेषता है | जैसे यह डाइवर्सिटी, या यह जो रिलिजन वाली बात है,की हमारे पास कोई faith नाम की चीज़ नहीं है, हम दूसरों को कन्वर्ट नहीं कराते, हम को इससे कोई दिक्कत नहीं होती है की लोग – दुसरे लोग भी यहाँ आये रहे – वह इसको नहीं समझ पाते है | उनकी संस्कृति ने, उनकी सभ्यता ने, उनकेधर्म ने उनको सिखाया है एक खास तरह से देखना | और इसीलिए भारत के बारे में उनके पढ़े लिखे लोग, अच्छे समझदार लोग, नीतिकार लोग भी वह ठीक सही समझ नहीं बना पाते | और इसीलिए आप नोट – आप देखियेगा की वह हमेशा भारत के बारे में एक नकारात्मक छवि लिए हुए है | यह हमारी एक कठिनाई है जिस पर मैं आप को ध्यान दिलाना चाहता हूँ | की आप को दुनिया में – जिसको कहते है की fair consideration – आप को नहीं मिलेगा | उसके पीछे गहरे दुराग्रह है | वह हमें अपने से कम समझते है | अपने से नीचा समझते है | अपने से इतना भिन्न समझते है जिसके साथ कोई सांस्कृतिक सामंजस नहीं हो सकता|इसका दूसरा पक्ष भी है | जो उनके enlightened लोग है,जो सीकर किस्म के लोग है,खोंजी किस्म के लोग है,जो सच्चे विद्वान् किस्म के लोग है,उनमे ठीक उल्टा है | वह एक तरह से भारत के भक्त हो जाते है | वह भारत के प्रति उनमे एक श्रद्धा पैदा हो जाती है | और वह फिर वही हमारी संस्कृति और धर्म से जुड़ता है |

आपने एक छोटा सा उदाहरण है जो बिलकुल आप सामने देख सकते है | भारत के लोग पैसा कमाने के लिए, कैरियर बनानेके लिए अमेरिका जाते है, यूरोप जाते है | आप ने कभी नहीं सुना होगा की कितने भी हम गए गुजरे हो, कितने भी हमारे समस्याएं हो,कोई enlightenment के लिए, seeking के लिए या रिलिजन के लिए याspiritualism के लिए कोईकही जाता हो?कोई भारतीय नहीं जाता | ठीक इसका उल्टा है,पूरी दुनिया से जिनको भी कुछ सिखने की इच्छा होती है जिसकोmaterialism से अधिक, इस – जिसको कहते है कैरियर से अधिक – पैसा, technology इनसे अधिक अगर किसी को भी कुछ चाहिए, सब के सब भारत आते है | वह चाहे बीटल्स वाले लोग हो, या वह apple के संस्थापक हो,या हॉलीवुड की जूलिया रोबर्ट्स हो,या वह यह कौन है वहसात फीट वाला हीरो – माने दर्जनों लोग – स्पोर्ट्स के, संस्कृति के, कल्चर के, फिल्म के,हर तरह के लोग – एक दो नहीं, सैकड़ों हजारों की संख्या में बारहो महीने भारत में आप को मिलेंगे | और एक दो नहीं – मैं श्री अरविन्द आश्रम, और यह विवेकानंद आश्रम, रमण महर्षि का आश्रम,शिवानन्दआश्रम, चिन्मय आश्रम – यह जो, जिसको कहते है की टॉप लीग है,मैं इसको छोड़ देता हूँ,सबसे छोटे छोटे जो बाबा साधू संत है,आप उनके पास देखिये की दर्जनों की संख्या में उनके पास में से विदेशी आते है | वह किस लिए आते है? क्याखोंजने आते है?यह वाही चीज़ है, जिसके प्रति स्वयं हमारे लोग अभी तक सचेत नहीं हुए है | और, जो सचेत होना चाहते है, या हो रहे है, उनको कम्युनल कह कर के cow down किया जाता है |

उनको नीचा ठहराने की कोशिश की जाती है | जबकि यह प्रत्यक्ष प्रमाण आप देखिये –बहुत कम लोग जानते है की even अरब से – मुस्लिम देशों से लोग आते है | शिवानन्द आश्रम में, चिन्मयआश्रम में, विवेकानंद आश्रम में,औरमहीनों रहते है | कुछ तो उनको मिलता है | विज्ञापन का युग है, consumerism का युग है,तो आप उस परिभाषा में – उस भाषा में भी देख सकते है –की यह सिर्फ propaganda नहीं होसकता | यह ठीक है की नकली साधू भी है, नकलीबाबा भी है,but then वह तुलसीदास के समय में भी थे | आप रामचरितमानस पढ़िए, आप को उसमे भी मिलेगा की किस तरह से छली, छद्म, कपटी साधू लोग किस तरह से लोगों को बेवकूफ बनाते है और उनके – उनकेअंधविश्वास का शोषण करते है, वह अपनी जगह है | लेकिन genuine, सच्चे गुरु,सच्चे विद्वान्, सच्चे मनीषी – वह आज भी है, और पूरी दुनिया से लोग यही आते है | तो यह भारत का एक अनूठापन है | की हम, और दुर्भाग्य यह है की हमारी शिक्षा ने हमें ठीक उन चीज़ों से अलग कर दिया है | मैंने आप को कहा की अगर आप वेड को पढ़िए, ऋग्वेद को पढ़िए – ऐसे भी पढ़ सकते है –दुनिया की पहली किताब मानी जाती है, सबसे पुरानी existing किताब का उसको यूनाइटेड नेशंस ने भी दर्जा दिया हुआ है की जो उपलब्ध सबसे पुरानी पुस्तक मानवता के पास है वह ऋग्वेद है | आप उसको पढ़िए आप को आज की चीज़ दिखाई पढेगी | अगर आप महाभारत पढ़िए तो आप को लगेगा की आप आज के हरियाणामें या पाटलिपुत्र में घूम रहे है | आप को यह दोनों जीवन मिलता जुलता दिखाई पड़ेगा | रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसपर लिखा है | तो यह जो – यह जो continuity है,और यह जो हमारी दार्शनिक परंपरा है,हमारी जो अध्यात्मिक समृद्धि है,वह इतनी अखंड है की विदेशी लोग आते है और हम से सिख कर के जाते है, लेकिन यह हमारी एक कठिनाई भी हो जाती है की हम स्वयं अपने आप को दुनिया के सिस्टम के बीच में अभी तक फिट नहीं कर पा रहे है |

राजनीतिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है, आर्थिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है,even सांस्कृतिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है | क्यूंकि हमारी शिक्षा दीक्षा ऐसी होती है की जो ठीक हमारी सबसे अमूल्य निधि है,हमारी संस्कृति की,वाही हमारे शिक्षा से बाहर है |हमारे – हमारे स्कॉलर, हमारे सबसे अच्छे विद्यार्थी जो टॉप करते है, गोल्ड मेडलिस्ट है,सोशियोलॉजी में है, उनको यह पता नहीं है की दुनिया की सबसे पहली सोशियोलॉजी की बुक – technically – वह भारतीय है | और वह कौन सी किताब है उसकावह नाम तक नहीं जानते है|जिस उपनिषद् की चर्चा आज से नहीं, ग्रीक थिन्केर्स के समय से – प्लेटो-अरिस्तु की समय से आप को उपनिषद् शब्द, और उपनिषद् की बातेंcontinuous – मुझे लगता है की इंटरनेटकी कृपा से सबकुछ उपलब्ध होता है – आप उसमे कभी आप चेक कर के देखे – indophile – indophile – एक शब्द है,मतलब इण्डिया से प्रेम करने वाले – इण्डिया से प्रेम रखने वाले और उसमे उसने – किसी ने जमा करके सारे उदाहरण दिए है, दुनियाके बड़े बड़े दार्शनिकों, विद्वानों के – और उनमे सब एक से एक विद्वान् है|Voltaire, शोपेन्हौयेर, प्लेटो,अरिस्तु,यह रूसो – मतलब, उसकी गिनती नहीं है, मुझे लगता है कम से कम पचास ऐसे बड़े थिंकर पिछले ढाई हजार साल से दुनिया के, उनके आप को उसमे नाम मिल जायेंगे की उन्होंने भारतीय सभ्यता या भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में क्या कहा है |

तो कुछ लोग कहते है की वह लोग indophile है मतलब  इतनी उनको – इतना उनको भारत से प्रेम है की वह हर चीज़ भारत में देखते है | लेकिनइसको अगर आप तटस्थ दृष्टि से भी देखिये, journalistic दृष्टि से या अभीप्सु की दृष्टि से –अन्वेषक की दृष्टि से तोआप देखेंगे की इतनी बड़ी जो ज्ञान परंपरा  का स्रोत है, ठीक उससे हमारी शिक्षा कटी हुई है | हम एबीसी से शुरू करते है, यह स्थिति अंग्रेजोंके समय में तक नहीं थी, अंग्रेजों के समय ऐसा था की लोग अपनी भाषा में शिक्षा शुरू करते थे और बाद में अंग्रेजी भी उनकी शिक्षा में जुड़ जाती थी | और उनमे जो एक बड़े बड़े विद्वान् हुए थे वह अपनी भाषा को भी उतनी गहरे से जानते थे अंग्रेजी को भी जानते थे – अंग्रेजीसाहित्य को जानते थे | यह स्वतंत्र भारत में ही उल्टा हुआ की हम अपनी भाषा, अपनी साहित्य से कट गए है | हिंदी प्रदेश के आप को – कथित हिंदी प्रदेश जिसको कहते है,उसमे बच्चे आप को ऐसे मिलेंगे जो अज्ञेय का नाम नहीं जानते | जो दिनकर का नाम नहीं जानते, जजों बच्चन का नाम नहीं जानते| और यह स्थिति चालीस साल पहले तक यहाँ नहीं थी | क्यूँ? क्यूंकि हमारी शिक्षा मूलतःअपनी भाषा में होती थी,अंग्रेजी बाद में – छठे क्लास से या आठवे क्लास से, चौथे क्लास से – जैसा स्कुल और जैसा स्टार और जैसा वह परिवेश था उससे जुडती थी |

अब आज बिलकुल बचपन से एबीसीडी की पढाई शुरू हो गयी है और यह गायों गायों तकपहुंच गयी है |इसका जो हानिकारक पक्ष है वह यह – की ठीक वह चीज़ जिससे भारतीय सभ्यता बनी है,ठीक वह चीज़ जिससे आज भी भारत का मूल्य है, ठीक वह चीज़ जो सिखने के लिए लोग आज भी भारत आते है,हम अपने ही बच्चों को उससे परिचय तक नहीं करा रहे है, वह नाम तक नहीं जानते है, उसकोपढ़ना तो दूर रहा |JNU – JNU में एक विद्यार्थी पढ़ रहा है, topperहै, वह उनसे एक दिन भेंट हुई,उनसे मैंने पूछा – कोई बहस हो रही थी तो उपनिषद् शब्द आया – तो उसके मुह पर मैंने देखा की कुछ व्यंग का भाव आया | मैंने कहा क्यूँ,तुमने उपनिषद् पढ़ा है क्या? बोला, नहीं – पढने की ज़रूरत क्या है?उसमेक्या होगा?मैंने कहा की क्यूँ,बोला वह तो ऐसे रिलीजियस बुक्स है | मैंने कहा तुमने उलट के देखा है?उसने कहा नहीं | मैंने कहा तुमको यह आईडिया है की वह कोई हजार पन्ने की किताब है या दस पन्ने की किताब है?बोला नहीं!तो, और यह मै उसकी बात कर रहा हूँ जो सचमुच एक genuineस्टूडेंट है | topper है | बढ़िया पेपर लिखता है | बढ़िया भाषण देता है | उसने उपनिषद् को देखा तक नहीं है | और उसको वह रूचि भी नहीं है | जैसे उसको कोई कहे रहा है की भाई तुम्हे जानना चाहिए तुम सोशियोलॉजी के विद्यार्थी हो,तुम्हे मालूम होना चाहिए की उसमे क्या है | पूरा सोशल description है | बोला, अच्छा?मुझे तो पता थाकी वह तो रिलीजियस बुक है |

तो इस स्थिति में हमने अपने देश को लाया हुआ है की हमारे नयी पीढ़ी बिलकुल एक अर्थ में अज्ञानी बन रही है | तो ऐसी स्थिति में आप को इन सब टर्म्स को समझना है | सधर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद| और इसीलिए मैंने कहा की यह एक कठिनाई है, क्यूंकि बैकग्राउंड जानकारी हमारे पास न यूरोप की है,न अपनी है | यह हमारी एक विचित्र स्थिति यूरोप का विद्यार्थी अपनी संस्कृति, अपनीभाषा, अपने साहित्य से उतना कटा हुआ नहीं है जितना एक भारतीय विद्यार्थी है | वह यहाँ के विद्यार्थी – प्रोफ़ेसर है वह अंग्रेजी के – अपने JNU से रिटायर्ड हुए बहुत बड़े विद्वान् – जो भी हो – वहकहे रहे थे की हमारे विद्यार्थी जब वहा जाते है तो वहा से फ़ोन कोरके पूछते है – की सर इसमें क्या है उसमे क्या है – क्यूंकि यहाँ तो उन्होंने पढ़ा नहीं, यहाँ पर तो वाही मार्क्स, फूकोपढ़कर जाते है, तो जो की उनकी अपनी चीज़ है | वहा वाले जानना चाहते है की आप मनुस्मृति के बारे में क्या जानते है, नारद स्मृति के बारे में क्या जानते है | और हमारे बच्चे जानते ही नहीं है | जब वहा जाते है तब उनको पता चलता है की इन सब चीज़ों की, जो हम लोग उपेक्षा किये वह खुद उपेक्षा नहीं करते है | वह उसको अध्ययन करते है | और हमारे यहाँ मनुस्मृति जलाई जाती है | जिसका स्थान वेदों के समकक्ष है | तो इस कठिनाई में इन टर्म्स को समझना, इन समस्यायों को समझनाएक कठिन काम हो जाता है | क्यूंकि हर चीज़ ऐसी नहीं है की जो कैप्सूल के रूप में या सूत्र के रूप में जल्दी जल्दी दी जा सकती है |

अभी यह राष्ट्रवाद ही ले लीजिये , जैसे मैंने कहा – धर्म रिलिजन नहीं है,उसी तरह हमारे यहाँ राष्ट्रवाद – यह राष्ट्रवाद nationalism का सिर्फ हिंदी ट्रांसलेशन, हिंदी प्रतिशब्द है |और सच पूछिए तो nationalism, nation, nation-makingयह स्वयं यूरोप के लिए दो सौ ढाई सौ साल पुराना है | अब यह ऐसे – देखिये कैसी विडम्बना है –यह एक ऐसी सभ्यता है जो चार हज़ार वर्षों से अक्षुण चल रही है | उसको एक ऐसी विदेशी टर्म से हम समझने की कोशिश करते है जो स्वयं यूरोप के लिए ढाई सौ साल पुराना है | इतना ही नहीं,स्वयं यूरोप में nationalism के अर्थ पर कोई सहमति नहीं है | एक विद्वान् ने – बल्कि कई विद्वानों ने जो nationalism पर अध्ययन किया है,उन्होंने पाया है,की nation और nationalismकी कोई एक परिभाषा होती ही नहीं है | रशियन लोग उसका एक अर्थ करेंगे, सर्बियन लोग उसका एक अर्थ करेंगे, चेचेन लोग अलग करेंगे, क्रोट्सअलग करेंगे,इउके को ही देख लीजिये तो स्कॉट् लोग एक बात बोलेंगे, इंग्लिश लोग दूसरी बात बोलेंगे,वेल्श तीसरी बात बोलेंगे उनमे कोई सहमति नहीं है | तो एक ऐसी धारणा, जो जिसके यूरोप में भी कोई निश्चित अर्थ नहीं है,उस धारणा से हम अपने देश की समस्यायों, अपनी देश की अभीप्सा, अपने देश की – जिसको कहे जनभावना –उसको जब हम अभिव्यक्त करने की कोशिश करते है,तो यह बड़ी बेढंग स्थिति हो जाती है | सच पूछिए तो राष्ट्रवाद या nationalismभारतीय सच्चाई को, भारतीय स्थिति को, हमारी समस्यायों को, हमारी विशेषतायों को अभिव्यक्तकरने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं है|जैसे मैंने कहा की वहा भी इसके बारे में कोई स्पष्टता नहीं है | एक ही अर्थ प्रमाणिक है,के अगर कोई एक खास समूह – वह छोटा हो या बड़ाहो –अगर वह अपने आप को एक मानता है,तो वह एक है |

अगर वह नहीं मानता है, तो आप तर्क करके आप उनको कुछ नहीं समझा सकते | उदाहरण के लिए चेचेन– चेचेन है रशिया का पार्ट –लेकिन अगर आप टॉलस्टॉय का उपन्यास पढ़िए, जिन्होंने डेढ़ सौ साल – पौने दो सौ साल पहले लिखा था, उसमेभीदेखिएगा की चेचेन लोग और जो मूल रशियन लोग है,उन लोगों में झगड़ा होता था और भयंकरझगड़ा होता था | युद्ध होता था | आज भी चेचेनिया उनका पार्ट है | तो आप को लगता है की कोई राष्ट्रवाद की ऐसी परिभाषा है जिसको रशियन और चेचेन दोनों मानते हो?वाही हल इउके का है | स्कॉटलैंड, इंग्लैंड और यह तीसरा आयरलैंड – तीनों का इतिहास एक दुसरे से झगडे का युद्ध का भी है | तो ऐसा भी होता है की एक व्यक्ति जो आइरिश लोगों के लिए हीरो है,इंग्लिश लोगों के लिए विलन है | कौनसा राष्ट्रवाद? राष्ट्रवाद की परिभाषा वहा ही निश्चित नहीं है | और यहाँ? जो एक पूरी की पूरी सभ्यता है,जहा पर उनकी जो परिभाषाएं है,उस परिभाषा में देखिये तो कह सकते है, जैसा कम्युनिस्ट लोग कहते थे, मार्क्सिस्ट लोग कहते थे,की यह भारत तो एक कंट्री है ही नहीं –एक नेशन है ही नहीं |

यह तो बहुत सारी nationalities का समूह है जिसको अंग्रेजों ने ज़बरदस्ती इकट्ठा रखा था | और इसीलिए १९४७ से पहेले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उसराष्ट्रिय्तायों के आत्मनिर्णय का अधिकार करके एक थीसिस दी थी, जिसमे उन्होंने कहा था की भारत में तो १७ राष्ट्रियातायें है,इसलिए इस देश का १७ टुकड़े होने चाहिए, दोही क्यूँ हो रहे है?लीजिये! अगर आप को जिन्नाह की राष्ट्र की परिभाषा पढ़िए तो उन्होंने कहा था की हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र है,और उन्होंने पुरे डिटेल में कहा था की क्यूँ मुसलमान एक राष्ट्र है,क्यूँ? क्यूँकी उनको अपना पाकिस्तान आन्दोलन के लिए एक बौद्धिक construct वह बना रहे थे | तो उन्होंने कहा की हिन्दू एक राष्ट्र है, मुस्लिम एक राष्ट्र है | गांधीजी की परिभाषा कुछ और थी | मार्क्सिस्टों की परिभाषा कुछ और थी,आर्य समाज की परिभाषा कुछ और थी \ तो यह जो हमारी सभ्यता है,इस – इसको सच पूछिए तो आप सभ्यता ही कह सकते है | इसको nationalism में और एक विदेशी टर्म के अन्दर डालना – इसमें पचास समस्याएं खड़ी होती है |

यहाँ तो इतनी विविधताएँ है, और इतने तरह के इतनी भाषाएँ है,इतनी भिन्नताएं है, की अगर आप वह यूरोपीय परिभाषा डालने की कोशिश कीजियेगा तो उसमे से आप को लगेगा की यहाँ तो एक-आध हजार देश बन्ने चाहिए, एक-आध हजार नेशन है | लेकिन, इसके विपरीत यह भी एक तथ्य है, की यह देश , यह सभ्यता,वैदिक काल से आज तक कुछ चीज़ों को एक आत्मसात किये हुए है, पता नहीं चलता है की उसकी – उसमे वह एकता का सूत्र कहा है,लेकिन वह एकता का सूत्र है | और इसीलिए जब आप देखिये की उदाहरण के लिए यह जो वन्देमातरम पर जब भी विवाद होता है,और यह विवाद आज से नहीं है,वन्देमातरम पर विवाद स्वाधीनता से पूर्व है | शयेद आप को मालूम होगा अगर आप में से किसी ने उसका अध्ययन किया हो तो १९४७ से पूर्व कम से कम पिछलेचालीस साल से यह वन्देमातरम ही हमारा राष्ट्रीय गीत था | और यह इतना decided था , fixed था की इसमे कोई असहमति की गुंजाईश नहीं थी | यह एक विडम्बना हुई की यह राष्ट्रगीत नहीं बना, लेकिन यह वन्देमातरम में भाव क्या है?यह गीत एक उपन्यास से लिया गया है,बंकिमचंद्र के आनंदमठ का – अगर आप आनंदमठ को पढ़िए – तो, और यह बंगला में है – मजे की बात यह भी है की यह हिंदी का गान नहीं है – वन्देमातरम–वैसेजन गण मन भी हिंदी का नहीं है,दोनों बंगला के है | लेकिन क्यूंकि देवनागरीमें लिखी होती है तो हमें लगता है की यह हिंदी है |

यह हमारी भाषाई विविधता और भाषाई एकता – दोनों का इसमें सूत्र मिलता है | के अगर आप देवनागरी में लिख दे तो भारत की कम से कम एक दर्जन भाषाएँ हैजो आप को हिंदी ही लगेंगी | लेकिन वह अलग लिपि में लिखी जाती है इसलिए पता नहीं चलता है| तो हमारी विविधता और हमारी एकता  एक दुसरे से अभिन्न है – और यह जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई पढ़ती है | जो मुहावरे, जो कहानियां, जो पुराण हम उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर तक सुनते है वह आपको केरल तक दिखाई पड़ती है | तो निर्मल वर्मा हमारे हिंदी के बड़े लेखक हुए थे, उन्होंने कहा था की हमलोग कहते है की हमारी दो महाकाव्य है|रामायण और महाभारत | वहकहते थे की एक तीसरा महाकाव्य भी है | वह यह भारतीय समाज है, जो अदृश्य रूप से उसमे एक ऐसी भावना है जो… तो होती है, लेकिन उसे कोई concretize नहीं कर सकता आप कोई उसको नाम नहीं दे सकते|तो रामायण और महाभारत के भी पात्रऔर उसकी कहानिया पुरे देश के कोने कोने में अपने अपने तरह सेन केवल मौजूद है, बल्किआज भी जीवंत है |हिमाचल –यह – उत्तराखंड में कहते है की महाभारत के जितने पात्र है,सब के एरिया बटे हुए है |लोग मानते है की हम उन्हीके वन्ग्श्जहै और यह उन्ही की जगह है |  और उसको आज भीजीवंतरूप में उनका मेला लगता है | यहाँ तक की लोग यह कहते है की उनपर वह आते है – किसी परभीम आते है, किसी पर युधिष्ठिर आते है | और आपको इस तरह की परंपरा आप को कर्णाटक तक दिखाई पड़ेगी| तो यह जो चीज़ है, जो इस पुरे देश को जोड़ती है वह क्या है? धर्म और संस्कृति का यह अर्थ जो भारत के लोगों को एक दुसरे से जोड़ता है और उनमे हजार तरह की विविधताएँ है, अलगाव भी है और यह अलगाव भी दिखाई पड़ते है – राजनीती में, भाषा में, व्यवहार में – बहुत चीज़ों में अलगाव भी दिखाई पड़ता है, लेकिन कुछ लोग अलगाव को अधिक महत्वा देते है और एकता को कम कर देते है |लेकिन उसमे जो एकता का तत्त्व है,शयेद वह इसलिए महत्वपूर्ण है की उसने प्रमाणित किया हुआ है की यह हजारों वर्षों से वह चीज़ है जो भारत के लोगों को एक करती है | और वन्देमातरम एक सूत्र है सिर्फ – एक उदाहरण है, की जब भी इस पर controversy होती है तो आप ने शयेद नोट किया होगा या आप करेंगे क्यूंकि यह ख़तम नहीं हुआ है , आप देखेंगे की पुरे भारत से उसके प्रति एक रेस्पोंसे आता है |

मतलब लोग indifferent नहीं रहते है | यह शयेद ९७ या ९८ में वह आया था – ए आर रहमान का गीत – वन्दे – माँ तुझे सलाम – उसमे भी वन्देमातरम है | और उस समय भी फतवे आये थे और बहुत विवाद हुआ था और उस समय भी उसके प्रति उसी तरह से पुरे देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई थी | मतलब पॉजिटिव प्रतिक्रिया – इन favour ऑफ़ वन्देमातरम | तो यह जो भावना है की भारत हमारी धरती है आसेतुहिमालय– हिमालय से ले कर के यह सेतुबंध रामेश्वरम तक – यह पूरा भारत एक है, इसको आप राष्ट्रवाद की जो पश्चिमी परिभाषाएं है या जो अकेडमिक terminologies है उनसे आप नहीं समझ सकते | दुर्भाग्य वही है की क्यूंकि हम लोग अपने शास्त्रों से कटगए है – शास्त्रों नहीं, अपनी ज्ञान-परंपरा से कट गए है – अन्यथा यह कठिनाई नहीं होती | जिन बातों को हमें मेहनत कर के अकेडमिक भाषा में समझण और समझाना पड़ता है वह स्वतः स्पष्ट हो जाता | लेकिन क्यूंकि ऐसा नहीं है इसलिए हमें यह कहने की ज़रूरत पड़ती है की भारत की जो  स्थितियां है उसको – उसकेलिए nationalismसही शब्द नहीं है | civilisation या civilisational स्टेट यह शयेद कुछ हद तक ठीक हो सकता है | एक चीन के विद्वान् है झांग व्हेइव्हेइ उन्होंने पांच साल पहले एक किताब लिखी थी “द चाइना वेव” |

उसमे वह तर्क करते है की – वह चाइना के लिए तर्क करते है की चीन को एक कंट्री या एक नेशन नहीं कहना चाहिए, यह एक civilaisationहै| हालाकीउन्होंने उसमे भारत की भी चर्चा की है, लेकिन नेगेटिव रूप में | उनका कहना है की नहीं भारत civilisation नहीं है, हम है | चाइना civilisation है | लेकिन अगर जो तर्क उन्होंने चीन के सभ्यता होने के लिए दिए है,सच पूछिए तो वह भारत पर अधिक लागु होते है | भारत को civilisational स्टेट या civilisation कहना चाहिए | और यह था भी, जैसा मैंने आप को कहा की अगर आप वह उस पर indophile वाला सर्च करे तो आप को ग्रीक थिंकर के समय से, प्लेटो के समय से आज तक आप को दुनिया के टॉप विद्वान् मिलेंगे जिनका यह सुनिश्चित मत है और इन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से कहा है कीहमारे पास सारेज्ञान का स्रोत हमें इस गंगा के किनारे से मिला है | पूरा दर्शन, पूरा ज्ञान, पूरा – पूरी संस्कृति, पूरी समझ, philology, भाषा यह सब इसकी सब भारत से ही पूरी दुनिया में गयी है ऐसा कहने वाले सीरियस विद्वान्, topmost विद्वान् एक नहीं, अनंत हुए है | इस थ्रेड को, इस सूत्र को समझना सबसे अधिक हमारी जिम्मेदारी थी लेकिन हम इससे अलग हो गए | और इसलिए मैं आप को कहना चाहता हूँ की राष्ट्रवाद को हमें अपने ही सन्दर्भ में समझने की कोशिश करनी चाहिए की हमारी अपनी परंपरा से यह जो अर्थ हमें मिला है,और उसका सबसे यह एक व्यवहारिक सूत्र है की यह हमारी मातृभूमि है, रामायण में भी है – राम कहते है कीभाई सब कुछ तो ठीकहै लेकिन “जननी जन्मभूमिश्च…”|

तो यह जो हमारी मातृभूमि है और यह जो हमारा जो भूगोल है – हिमालय से लेके समुद्र तक – इसके प्रति सम्पूर्ण भारतवर्ष में  एक अव्यक्त किस्म की श्रद्धा या व्यक्त किस्म की श्रद्धा रही है और इसके बहुत सारे उदाहरण है | तो इस राष्ट्रवाद को हमें इस अपने terminology में या अपने परंपरा में अगर हम समझने की कोशिश करे,तभी शयेद इसके समस्यायों को भी ठीक से समझ सकेंगे | अन्यथा हम लोग एक – मैं कहूँगा की गलत सिद्धांतों या गलत मुहावरों के चक्कर में फंस जाते है, फिर उसमे उलझते चले जाते है | हम कोशिश करते है – एकउसके पीछे एक हीन भावनाभी है हमारे बहुत सारे लोगों की जो पिछले  डेढ़ सौसालों से चल रही है जब से अंग्रेजी शिक्षा ने हमें अपने जड़ों से काटना शुरू किया, हमारे लोगों में एक हीन भावना भरने लगी | की जब तक कोई चीज़ विदेशों से सर्टिफाइड हो के न आ जाये तब तक हम उसको लो ग्रेड का मानते है | जैसे योग | योगा योगाआजसारी दुनिया में है लेकिन बहुत कम लोग सिर्फ सत्तर अस्सी साल पहले इसको कोई नहीं जानता था,यद्यपि विवेकानंद ने इसको पूरी दुनिया में  सौ साल पहले एक  झलक उसकी दिखला दी थी, लेकिन फिर वह डूब गया | हम उस समय परतंत्र थे, और विवेकानंद जल्द चले गए, उनका काम रुक गया, फिर दुसरे किस्म के लीडर आये और दुसरे तरह के लोग आ गए और वह काम रुक गया| लेकिन योग के प्रतिइसको मैंने नेहरु जी के जीवनी में यह पढ़ा, नेहरु जी योग करते थे, और वहा उसके जीवनीकार लिखता है, की यह कुछ मोर्निंग में उठ कर के एक्रोबेटिक्स करते है |

तो योग को उसके नाम से भी नहीं पुकारा जाता था | लेकिन पिछले पचास सालों में जो उसका विकास हुआहै आज योग दिवस भी है और पूरी दुनिया योग जानती है, और यह योग हमारे पूरी ज्ञान परंपरा का एक छोटा सा अंश है | खास कर के यह जो प्रैक्टिकल योग – योगाभ्यास जिसको – उसी परउन्होंने सीमित कर दिया है,जब की वह नहीं है , वह एक पूरा योग दृष्टि है समझने की, विश्लेषण पद्धति है, पतंजलि योगसूत्र एक प्योर साइंस है | और यह अभ्यास तो उसका सिर्फ एक प्रारंभिक अंग है | लेकिन इस प्राम्भिक अंग ने ही दुनिया को इतना चमत्कृत किया, तो आप यह कल्पना कर सकते है की जिन फिलोसोफेर्स ने यह कहा है की पूरी हमारे सोचने समझने की जो टर्मिनोलॉजी है,conceptual कॉन्सेप्ट्स है,वह सब हमें यह भारतीय ज्ञान परंपरा से मिले है | और इस परंपरा को, इस पूरी इतिहास को हम इन जो विदेशी मुहावरों में, विदेशीphrase में विदेशी construct में फिट करने की कोशिश करते है,तो वास्तव में हमें सफलता नहीं मिलती है | और इसीलिए हमारी समस्याएं भी कुछ दुसरे किस्म की है | जैसा मैंने आप को शुरू में एक संकेत करने की कोशिश की थी,की क्यूंकि भारत दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश है, इसीलिए इसके प्रति दूसरों को समझने में कठिनाई होती है | और हमें स्वयं भी उनको समझाने में कठिनाई होती है | बहुत लोग कहते है की भारत इतनी शानदार सभ्यता थी, इतनी सशक्त सभ्यता थी, इतनीधनी सभ्यता थी, और वीरता में भी पीछे नहीं थी तो ऐसा क्या हुआ की इनको छोटे छोटे गिरों आ कर के इनको जित लेते थे और इन पर शासन करते थे – तो कुछ हद तक इन लोगों को लगता है की बड़ा जटिल सवाल है |

सच पूछिए तो मेरे पास भी या किसी के पास भी इसका कोई प्रमाणिक उत्तर नहीं है, लेकिन उसका एक उत्तर है | और वह भी कुछ लोगों ने देखा है कीक्यूंकि हमारी दृष्टि मानवता को देखने की, हमारीउपनिषदिक दृष्टि यह झगडे की दृष्टि नहीं है, dominance की दृष्टि नहीं है, सामंजस की दृष्टि है, प्रकृति के साथ, प्राणिमात्र के प्रति सद्भाव की दृष्टि है | इसीलिए हम बाहर से आने वाले वैसे आक्रमणकारियों,जो संगठित होते थे और ideologically हमें कन्वर्टऔरनष्ट करना चाहते थे, इस दृष्टि के लोगों को हम समय रहते पहचान तक नहीं सके और यह स्थिति आज भी है | आज भी आप देखिये की जो डोमिनेंट डिस्कशन है मिडिया में, मिशनरीज के बारे में जब भी होता है तो आप देखेंगे की एक उसमे खास एंटी-हिन्दू slant होता है | जैसे ही कोई लोग कहेंगे की नहीं नहीं यह धर्मान्तरण का धंदा है, यह मिशनरीज यह कन्वर्शन हो रहा है तो कहंगे नहीं नहीं नहीं नहीं यह माइनॉरिटीज को सताया जा रहा है यह communalism है | अब देखिये की आज भी इस बात को हमारा पढ़ा लिखा समझदार वर्ग – ठीक है उसमे कुछ लोग है जो धूर्त है, जो पोलिटिकल है, जो जानबूझ के यह सब करते है, लेकिन अधिकांश ऐसे है जो सचमुच इस बात को नहीं समझते है | सचमुच मिशनरियों की जो योजना है भारत को कन्वर्ट करने की और उनका जो स्ट्रक्चर है उसको नोटिस तक नहीं लेते | क्यूँ नहीं लेते ? क्युन्किवः इस बात से अपरिचित है की दुनिया में ऐसे रिलिजन भी है जो दुसरे का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करते | और हम अपनी ओर से मान लेते है की सर्वधर्म समभाव, सभी धर्म समान है, सभी धर्म अच्छे है, सभी धर्म भगवान के ओर ले जाते है |

यह बात उपनिषद् की दृष्टि से और हमारे अपनी ज्ञान परंपरा की दृष्टि से बिलकुल ठीक है, लेकिन क्या जिसे हम धरम कहते है क्या रिलिजन वही धर्म है?क्या इस्लाम वही धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी वही धर्म है?क्या उसमे वही मूल्य मान्यताएं है जिन मान्यतायों को हम मानते है? तब हम जब ऐसा कहते है की सभी धर्म में एक ही बात है,सभी धर्म एक ही दिशा में ले जाते है, और सब ठीक है, कोई फरक नहीं है,अगर कन्वर्ट भी कर ले रहा है तो क्या प्रॉब्लम है आप को? आप ही तो कहते है –ऐसा बच्चे तर्क देते है | के अगर कोई कन्वर्ट हो रहा है या कन्वर्ट कराया जा रहा है तो तर्क देते है – की आप ही ने तो कहा था की सभी धर्म एक है तो क्या फरक पद गया वह मुस्लमान बन गया क्रिस्चियन बन गया –अब देखिये | तो यह जो अज्ञान है,वह दो तरफ़ा है | दुनिया के लोग भी भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति, भारतीय धर्म को ठीक से नहीं जानते और इसीलिए इसके प्रति एक नकारात्मक और विचित्र, जैसे यह गोपूजा – कार्ल मार्क्स ने लिखा था की यह कैसे इतने गए गुजरे कौनलोग हो सकते है जो गे और बन्दर की पूजा करते है?माने यह उनके लिए कार्ल मार्क्स जैसे विद्वान् के लिए यह प्रमाण था की जो गे को पूजता है उससे गया गुजरा और बिलकुल पशुवत कम्युनिटी और हो ही कौन सकती है?अब जहा इतना बड़ा अंतर है,चेतना में,की वह हमारी गोपूजा को, हमारी वृक्ष पूजा को वह नहीं समझ पाते, उसी तरह हमारे लिए भी समस्या है की हम भी जो उनके जो कन्वर्शन प्रोजेक्ट है,हम उसको नहीं समझ पाते | उनके जो, उनके जो प्लान है भारत के बारे में, और जो सफल हुए है,आज भारत वाही नहीं है जो सौ साल पहले था – सौ साल पहले का छोड़िये अस्सी साल पहले भारत का आप नक्शा देखिये– और आज के भारत का आप नक्शा देखिये, उसके बाद उसकी डेमोग्राफी देखिये – जो बचा हुआ भारत है उसकी डेमोग्राफी भी देखिये, वह सिकुड़ रही है | तो यह कहना एक अर्थ में ठीक है की हम इतने समय से रहे है तो आगे भी रहेंगे लेकिन यह कोई गारंटी नहीं है |

अगर आप अपने राष्ट्र, आप उसको नेशन कह लीजिये, सभ्यता कह लीजिये, भारतवर्ष कह लीजिये, भारतमाता कह लीजिये– अगर आप इसके रक्षा के प्रति सचेत नहीं हुए तो जो आज तक नहीं हुआ है वह आगे भी नहीं होगा– सो असंभव –  यह नहीं सोचना चाहिए |जैसा मैंने कहा की निर्मल जी – निर्मल वर्मा या जितने भी बड़े साहित्यकार थे – तीन पीढ़ी,दोपीढ़ी एक पीढ़ीपहले तक– वह कहते थे,जिन्होंनेब्रिटिश समय भी देखा था वह कहते थे की ब्रिटिश शासन में भारतीय भाषा और संस्कृति और चेतना पर इतना बड़ा खतरा नहीं था जितना स्वतंत्र भारत में हो गया| क्यूंकि हम अपनी भाषा से ही कट रहे है – ख़तम हो रही है हमारी भाषा | और भाषा में ही सारी संस्कृति निवास करती है | भाषा से अलग संस्कृति नहीं होती | अगर आप किसी ऐसे दिन की कल्पना करे, बल्कि कल्पना करने की जरुरत नहीं है, आप लैटिन अमेरिका चले जाये, ऑस्ट्रेलिया चले जाये – जहा पूरी की पूरी भाषा एक विदेशी भाषा हो गयी – वहा की पूरी पुराणी संस्कृति भी ख़तम हो गयी | और यह भारत में भी यह खतरा है |

इसीलिए जब हम कहते है की – जब मैं कहता हु की भारत की समस्यायों को nationalism के टर्मिनोलॉजी में पूरी पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता,तो इसे उसी प्रसंग में समझने की कोशिश करनी चाहिए , की हमारी बहुत सी समस्याएं ऐसी है जो दुसरे किसी देश को नहीं है | भारत, जैसा मैंने कहा भारत एकमात्र हिन्दू देश है,इसीलिए दोनों जो दुनिया की सबसे बड़े रिलिजन है,जिनका कन्वर्शन एक ऑफिसियल एजेंडा है,जो वह कहते भी है,यहाँ सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कहा है,२००३ में ओडिशा का कोई केस था कन्वर्शन का, तो उसमे सुप्रीम कोर्ट ने जो क्रिस्चियन पार्टी थी उसने यह तर्क दिया की भाई आप कन्वर्ट नहीं कराते हैयह आप की प्रॉब्लम है | हिन्दुलोग कन्वर्ट नहीं कराते है यह आप की प्रॉब्लम है | हम उसको क्यूँ माने?हमारे रिलिजन का पार्ट है कन्वर्ट कराना | इसलिएby hook by crook by any way अगर हम कन्वर्ट कराते है,थिस इस पार्ट ऑफ़ आवर फंडामेंटल राईट | उसने भारतीय संविधान का हवाला दे कर के हिंदुयों को कन्वर्ट कर के क्रिस्चियन बनाने का कोइस यह कहके defend किया की यह हमारे रिलिजन का पार्ट है | के हम दूसरों को कन्वर्ट करा के क्रिस्चियन बनाये | अब एक कॉमन भारतीय के लिए, एक कॉमन हिन्दू के लिए जो उतना सचेत नहीं है,उसके लिए यह समझना कठिन है |

उसको कहिये तो इसा मसीह की भी एक मूर्ति यहाँ लगा देगा | उसको कोई दिक्कत नहीं है, भारतीय को | लेकिन उलटी तरफ यह नहीं है | तो कहने का मतलब यह है के हमारी बहुत सारे समस्याएं ऐसी है – कन्वर्शन सिर्फ एक issue है –यह जिस तरह से दलितों को या विभिन्न समूहों को  अलग करने की कोशिश की जाती है, सबको या तो रिजर्वेशन के नाम पर या ऑपरेशन के नाम पर, मैन्युफैक्चर्ड जिसको कहते है की यह atrocity literature – वास्तविक प्रोग्रेस जो हुई है पिछले सौ साल में वह न दिखा कर के सिर्फ जो बुराइया है उसको दिखाना, और उसके हिसाब से भारत के लोगों को अलग अलग हिस्सों में काटना, तोड़ना,उनको अलग दिखाना , उनको हिन्दू धर्म से, संप्रदाय से अलग करना , सिखों को दूर करना , बौद्धों को दूर करना – और इनमे जो ऐतिहासिक परंपरा है उसको पूरी तरह उसपर चादर डाल देना, जैसे यह कुछ नहीं था | तो यह सब जैसीसमस्याएंहम अगर राष्ट्रवाद के टर्मिनोलॉजी में रखने की कोशिश करेंगे तो वह फोर्मुलाते ही नहीं होंगी | यह जो प्रोब्लेम्स मैं आप को बता रहा हूँ,वह आप भी जानते है, आप इसको नेशनल nationalism के टर्म में आप नहीं रख सकते | जिस तरह से dravidistan – अब वह ठंडा पद गया – लेकिन एक ज़माने में उस द्रविड़ आइडियोलॉजी को बहुत मजबूती से खड़ा किया गया था और अभी तक है |

वह जो दोनों डोमिनेंट पार्टियाँ है तमिलनाडु में,दोनों द्रविड़ है | DMK और AIADMK| अब वह वह भाषा नहीं बोलती | लेकिन जो द्रविड़ फिलोसोफी या थ्योरी दी गयी,यह मिशनरीयों ने दी थी | एक भी उसमे तमिल नहीं है जिसने यह theorization किया था | की यह द्रविड़ जो है वह अलग है | और यह आर्य है यह अलग है | और आर्य ने इन पर कब्ज़ा कर लिया था | अब इनको मुक्त हो जाना चाहिए | यही स्थिति नार्थ ईस्ट में है और बहुत जगहों में है | तो इस तरह के समस्यायों को आप इस nationalism के टर्मिनोलॉजी में समझ भी नहीं सकते है इसका समाधान करना तो दूर का| इसीलिए मुझे लगता है की इन चीज़ों को आप अगर आप रिपोर्टिंग करे या आप लिखे या आप इसपर सोचे तो आप को कुछ न कुछ मूल में जाने की कोशिश करनी चाहिए | ऐसे भी रिपोर्टर का पहला काम है फैक्ट ढूँढना | और उस फैक्ट को फिर ट्रांसमिट करना | फिर उसको एक्सप्लेन करना |तो यह फैक्ट क्या है?हमारे देश का फैक्ट – कास्ट ले लीजिये | क्या कारण है? की हर तरह के लोग, जो otherwise हमारे शत्रु रहे है, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है – सब के सब कास्ट और कास्टिस्म के खिलाफ खड़े होते है | क्या कास्टिस्म और कास्ट एक चीज़ है?क्या कास्ट और वर्ण व्यवस्था एक ही चीज़ है? क्या वर्ना का वह अर्थ जो अकादमी में या यूनिवर्सिटी में पढाया जाता है या मीडिया में आता है वाही है जो मनुस्मृति में है?मनुस्मृति में शूद्रों के बारे में जो कहा जाता है,कहा गया है,ऑथेंटिक लिखा हुआ है,और जो वास्तव में आज विमर्श में आता है क्या एक ही चीज़ है?आप देखेंगे की बहुत बड़ा भेद है | तो सबसे पहले अगर जिन चीज़ों इस तरह के टर्म्स जब आते है तो आप को कुछ न कुछ ओरिजिनल स्वयं पढने की कोशिश करनी चाहिए | औरspecialization की बात होती है, मैं कहूँगा specializationword सही नहीं है |

किसी न किसी चीज़ का आप को स्वयं गहरा अध्ययन करने की कोशिश करनी चाहिए और गहरा अध्ययन का यह मतलब नहीं है की कोई आप को सौ पचास किताबे पढनी है | मैं कहता हूँ कभी कभी सिर्फ एक छोटी सी किताब पढ़नी भी – गंभीरता से –काफी होती है उस चीज़ को समझने के लिए | जैसे आज का जो विषय है – राष्ट्रवाद| विवेकानंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर , श्री अरविंद, दयानंद, श्रद्धानंद, इस तरह के लोगों की जो अपनी रचनाएँ है,उनके बारे में नहीं, जो किसी प्रोफेसर ने बुकलेट या पेपर लिख दिया है या even ऑक्सफ़ोर्ड से भी क्यूँ न छपी हो,पेंगुइन से भी क्यूँ न छपी हो,उसको आप सेकेंडरी माने | मूल पढ़े | विवेकानंद का जो वह भाषण है – भाषण संग्रह – जब वह अमेरिका और यूरोप में तीन चार बरस काम कर के आये थे उसके बाद उनका एक उन्होंने कोलोंबो आये थे सबसे पहले – कोलोंबो से अल्मोड़ा तक | उनके जो भाषणों का संग्रह है शयेद १५ -१६ भाषण है आप उसको पढ़िए | आप देखिये भाषण की मैंने भाषण का रिफरेन्स इसलिए दिया के भाषण कम्युनिकेबल होते है | वह अकेडमिक वर्क नहीं है |

वह आम लोगों को दिए जाते है | और वह विवेकानंद ने सौ साल से भी पहले दिए थे | १८९७ में शयेद आये थे वह और १८९७ से १९०१ तक –तीन चार वर्ष के बीच के वह उनके महत्वपूर्ण भाषण है | आप उसको पढ़िए | आप को उसमे राष्ट्र , संस्कृति, भाषा, राजनीती, उपनिषद्, वेदांत,और अपने देश की समस्यायों का मूल – और उसके समाधान की दिशा – सब आप को उसमे स्पष्ट मिलेगी | क्लियर कट | अगर आप उसको सेंसिब्ली पढ़ रहे है,ध्यान से पढ़ रहे है की यह कहना क्या चाह रहे है |  और आप को कठिनाई नहीं होगी,क्यूंकि मैंने आप को कहा की वह भाषण है| विवेकानंद भाषण दे रहे थे , जैसे मैं दे रहा हूँ | तो मैं कोशिश कर रहा हूँ की आप तक बात पहुंचे | तो आप यह इमेजिन कीजिये की विवेकानंद ने भी उसी भाषा में वह कहा है | आप उसको मूल में पढ़िए | आप को यह दिखाई पढ़ेगा की हम जिन समस्यायों की आज चर्चा करते है,उन्ही समस्यायों की उन्होंने भी चर्चा की है | ऐसा नहीं है की वह चीज़ें arcane पुराणी हो गयी या पांच पीढ़ी पहले की बात है सौ साल पहले की बात है, आज दुनिया बहुत बदल गयी –कुछ भी नहीं बदला |

दुनिया में रोज परिवर्तन होते है | और दुनिया रोज वैसी की वैसी ही रहती है | यह दोनों चीज़ें है | तो हमारी बहुत सी समस्याएं – भाषा, संस्कृति, राष्ट्र, dominance,स्वतंत्रता, धर्म से जुडी हुई बहुत सारी समस्याएं हमारे पास आज हुबहू उसी शब्द में आप देखेंगे – अगर आप अज्ञेय को पढ़े, निराला को पढ़े,टैगोर को पढ़े, श्रद्धानंद को पढ़े – आप को दिखाई पढ़ेगा की वह हुबहू उन्ही समस्यायों से उलझ रहे है | तो technology बदलती है , आर्थिक सम्बन्ध, आर्थिक वातावरण बदलता है कपडे लट्टे कुछ और चीज़ें बदलती है लेकिनबहुत सी चीज़ें मूलतः वाही की वाही रहती है | इसीलिए मेरा आप से अनुरोध है,की आप, इनमे से जो आप को सूट करे, यह भी नहीं है की कोई prescriptive है,मैंने आप को कहा की भारत एक मात्रा दुनिया में ऐसी सभ्यता है जिसकीशास्त्र परंपरा ज्ञान परंपरा इतने समृद्ध है और इतनी तरह से वह कही गयी है की आप इस तरह के जितने भी महा ज्ञानी हुए है, या ऐसी जो महत्वपूर्ण क्क्लासिक पुस्तकें है,उसमे जो आप को रुचिकर लगे,आप को विवेकानंद रुचिकर लगे विवेकानंद को पढ़िए,आप को श्री अरविंद रुचिकर लगे वह पढ़िए |

टैगोर को कवी के रूप में प्रसिद्धि मिली है जो बिलकुल सही है,लेकिन टैगोर ने जो लेख लिखे है,सामाजिक लेख, उनकी संख्या सैकड़ों में है | जो शैक्षिक लेख लिखे है, वह असंख्य है | आप को मालूम है उन्होंने स्कूल खोला था बाद में वह विश्वविद्यालय बना,उसके लिए उन्होंने वर्णमाला से ले कर के, बच्चों की पुस्तक तक उन्होंने बहुत सी चीज़ें लिखी है | तो उन्होंने सामाजिक समस्यायों पर भी लिखा है | वह आप पढ़िए | किसी भी चीज़ को आप मूल में पढ़िए, मैं आप को दावे के साथ कहता हूँ,के आज अभी जो आप की इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी है,अभी जो आप की भाषाई कैपेसिटी है,लैंग्वेज,वह आप की अपने आप बहुत ऊँची हो जाएगी | बहुत अच्छी हो जाएगी | और पत्रकारिता में , खास कर के भाषा का बहुत महत्व है | आप अंग्रेजी में काम करे या हिंदी में काम करे – आप कोशिश करे की इन भाषायों के मूल में जो सबसे क्लासिक और सबसे महत्वपूर्ण – सबसे अच्छे लेखकों और कवियों के जो ग्रन्थ है या किताबें है – छोटी छोटी भी – आप उसको अपनी रूचि से आप थोडा बहुत पढ़ते रहे |

आप को यह सब समस्यायों इन सब स्थितियों की आप की अपनी समझ बननी शुरू हो जाएँगी | और जब आप की अपनी समझ बननी शुरू हो जाएँगी , तब आप इस चीज़ को realise कर सकेंगे की किसी बात पर वह रामचंद्र गुह जो बोल रहे है वह सही है या राम माधव जो बोल रहे है वह सही है | या दोनों की बातों में कमी कहा है |  और वाही आप का ऑब्जेक्ट होना चाहिए | आप देखिये की विवेकानंद ने, श्री अरविंद ने , टैगोरने – आप मार्क कीजिये की उस समय भारत आज की तुलना में , भारत के लोग आज की तुलना में पचास गुना अधिक गरीब थे | आज की तुलना में अधिक दीन अवस्था में थे | लेकिन आप नोट कीजिये – और वह सभी लोग सारी दुनिया को जानते थे | उन्होंने कभी गरीबी की चर्चा नहीं की | उन्होंने कभी आर्थिक परिवर्तन की चर्चा नहीं की | उन्होंने कभी यह डाटा और जीडीपी और रोजगार की चर्चा नहीं की | इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है की वह इन सब समस्यायों को जानते थे | recognize करते थे | लेकिन इसके बावजूद यह भी जानते थे की इसका समाधान सिर्फ वह ही नहीं है | वह इसके समाधान के लिए एक सीडी ऊपर से वह काम करना चाहते थे | वह हमारी चेतना, हमारी समझ,हमारी स्वतंत्रता,हमारा आत्मविश्वास,- उसके स्रोत तक हमें पहुँचाना चाहते थे | जैसा उपनिषद् में कहा गया है की वह कौन सी चीज़ है जिसको जानने के बाद आप सबकुछ को जन जाओगे|  वही विवेकानंद का, कहना चाहिए स्टाइल था | या उनका कंसर्न था | वही टैगोर का या श्री अरविंद का या श्रद्धानन्द का या दयानंद का कंसर्न था | के आप को, हमारे देश के लोगों को वह चीज़ मिलनी चाहिए, वह शक्ति मिलनी चाहिए जिससे वह बाकि सब चीज़ों को स्वयं समझना और सुलझाना शुरू कर दे सकते है | इसीलिए उन्होंने आजकी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था |

विकास, डेवलपमेंट, पूल, बिजली, सड़क, रोजगार, बेरोज़गारी,इसकी चर्चा वह लोग नहीं करते थे, जब यह समस्याएं आज से कई गुना ज्यादा थी उस समय|वह इसकी चर्चा करते है की हम मानसिक रूप से, बौद्धिक रूप से स्वतंत्र हो | हम इस पूरी अस्तित्व को – हमारे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, अध्यात्मिकसभी चीज़ों को दुनिया के सन्दर्भ में – दुनिया में हम कहा खड़े है और हम स्वयं अपने जीवन में कहा खड़े है – इसको हम समझने योग्य बने | जब हम इन चीज़ों को समझने योग्य हो जाते है,तो आप निश्चित रूप से फिर जब आप चाहे वह दैनिक रिपोर्टिंग कर रहे है या एनालिसिस कर रहे है,या रिसर्च कर रहे है,उसमे आप का काम तुलनात्मक रूप से थोडा आसान हो जायेगा | इसी लिए मैं आप से यही आग्रह करता हूँ की इस तरह की चीज़ों के प्रति आप यह भाव न रखे की यह हमारे काम की चीज़े नहीं है | आप भारत की जो क्लासिक ज्ञान परंपरा है – उपनिषद् से ले कर के लेटेस्ट – मैं तो कहूँगा सद्गुरु जग्गी वासुदेव तक आप देखेंगे की सब लोग उन्ही कुछ सत्यों को नयी नयी भाषा में हमारे सामने रखने की कोशिश करते रहे है और यह प्रैक्टिकल चीज़ें है |

यह थ्योरेटिकल नहीं है, कुछ लोग लोग कहते है यह सब फिलोसोफी है | अगर यह फिलोसोफी होती, अगर यह हमारी जीवन से जुडी हुई नहीं होती,अगर यह हमें आज भी सलूशन नहीं दे रही होती तो यह टिकी नहीं होती | आप देखिये जिन चीज़ों की उपयोगिता ख़तम हो जाती है,वह बिलकुल बाहर हो जाते है | आप उसका प्रचल – जैसे आज आप कितना भी प्रचार करे कोई टाइपराइटर नहीं खरीदेगा | यह उसी तरह की चीज़ है | इसका converse भी सही है | की आप कितना भी  दुष्ट विचार करें, मनुस्मृति या उपनिषद् की महत्व  ख़तम नहीं होगी| क्यूँ? क्यूंकि उससे रियल सलूशन्स मिलते है | और इसीलिए मेरा आप से यह आग्रह है की जिस भी भाषा में आप पत्रकारिता करें,आप कुछ न कुछ स्वाध्याय करने की एक आदत डालें | मैं यह नहीं कहता हूँ के आप मोटे मोटे ग्रन्थ पड़े, लेकिन जो पड़े ओरिजिनल पड़े | बेस्ट पड़े, क्लासिक पड़े | और थोडा थोडा पड़े |

अगर आप की रूचि है तो, नहीं रूचि है तो वह भी कोई चिंता की बात नहीं है – तब इस तरह के कैप्सूल और विडियो वगैरह आते रहते है उससे आप का कम चल जायेगा | लेकिन जिनको पढने में रूचि है,वह कुछ न कुछ हमारे जोमहापुरुष हुए है, जोज्ञानी हुए है, मैंनेजिनका नाम लिया उन तक लिमिट मत कीजियेगा – मैंने उनका नाम इसलिए लिया है के मैंने उनको पढ़ा है और मैंने यह पाया है की वह बिलकुल उपयोगी है, परफेक्ट है | और वह आप को यह सब सलूशन की दिशा में ले जाने के लिए सक्षम है | इसलिए मैंने उनका नाम लिया | दक्षिण भारत के बहुत सारे ज्ञानियों का हम नाम भी नहीं जानते क्यूंकि अंग्रेजी के कारण हम फसें रह जाते है और अपने ही देश के शास्त्र, अपने ही देश के ज्ञानियों का नाम तक हम नहीं जानते | लेकिन अगर यह एक आदत आप अपने में डालें,तो मुझे लगता है के आप को अपने कैरियर में, अपने जीवन में और अपनी समझ में हर जगह आप को लाभ होगा | मुझे लगता है मेरा समय से कुछ ज्यादा ही हो गया औरमुझे यह भी नहीं पता है की जो विषय देने वालों का मंतव्य था वह कितना पूरा हुआ लेकिन फ़िलहाल…

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