अल्पसंख्यकवाद और राजनीति अवैध आप्रवासन मुख्य चुनौतियाँ

नोन रीफाउलमेंट के सिद्धान्त का केवल ये तात्पर्य नहीं ‘शरणार्थियों को निमंत्रित करो, उनको भारत में स्थापित और यहीं उनका पुनर्वास करो’

जब मेरे पास ये उदाहरण है, जिसको देश के सर्वोच्च न्यायालय से सम्मति मिली है, तीन सतत निर्णयों में, तब मैं ये समझना चाहता हूँ कि मैं ऐसा क्या कह रहा हूँ जो तथ्य व विधि द्वारा समर्थित नहीं है ? अब वे कहते हैं, नहीं नहीं, यदि भारत में ऐसा कोई विधि है ही नहीं जो शरणार्थियों पर लागू होता हो, तो भी औपचारिक अन्तर्राष्ट्रीय विधि निश्चित रूप से है जो कि उन सभी देशों पर लागू होता है जो कि सभ्य राष्ट्रों की समिति का अंग हैं, और हम सभी को उसका सम्मान करना चाहिये ।

मैंने कहा थी है, हमें बताओ वो कौनसा सिद्धान्त है अन्तर्राष्ट्रीय विधि का जिसको आप आधार बना रहे हो अपनी स्थिति को समर्थित करने के लिये कि इन लोगों को निश्चित ही शरणार्थी की भाँति व्यवहृत किया जाना चाहिये । वे कह रहे हैं कि एक सिद्धान्त है जिसे ‘नोन रीफाउलमेंट का सिद्धान्त’ के नाम से जाना जाता है । इसका मतलब क्या है ? ये बस इतना है कि मान लीजिये कोई महिला पाकिस्तान से भारत आती है कहती हुयी कि उसकी धार्मिक धारणाओं के कारण उसका उत्पीड़न हो रहा है और वो उस निश्चित वातावरण में सहज नहीं है, आप उसे पाकिस्तान वापिस जाने के लिये बाध्य नहीं कर सकते, ये ‘नोन रीफाउलमेंट का सिद्धान्त’ है । भाई जिस आग से बचने की कोशिश कर रहे हैं, आप उनको वापिस नहीं धकेल सकते, बस ये साधारण सा बिन्दु है ।

याने वो कौनसा उत्पीड़न है या कौनसा स्थान है जहाँ उत्पीड़न हो रहा है जहाँ तक रोहिंग्याओं का प्रश्न है ? म्यांमार, क्या वो सीधा म्यांमार से भारत आ रहा है ? बांग्लादेश में तो इनका इतना बड़ा तम्बू है, तो यदि मैं इनको बांग्लादेश वापिस भेज दूँ, क्या मं इनको वापिस वहाँ भेज रहा हूँ जहाँ इनका उत्पीड़न हो रहा है ? अतः, किस प्रकार ‘नोन रीफाउलमेंट’ के सिद्धान्त का उल्लंघन हो रहा है ?

दूसरा, क्या आपका ये पक्ष है कि यदि, एक क्षण के लिये मान लें कि उत्पीड़न हुआ है, वो हुआ है, और वो एक सत्य विषय है या ये एक अस्तित्व का विषय है जहाँ तक इस समुदाय की बात है । क्या आप ये कह रहे हैं कि कि निश्चित राज्य को संयुक्त राष्ट्र की दृष्टि के अधीन रखना और कुछ पड़ोसी राष्ट्रों द्वारा ये कहना कि ये अब केवल आपकी समस्या नहीं है, आपकी समस्या मेरे क्षेत्र में बिखर रही है, ठीक यही इन्दिरा गाँधी ने १९७१-७२ में किया था, सम्भव नहीं है । मूलतः उन्होंने, उनकी स्थिति अमरीका के प्रति ये थी कि कृपया ऐसा न सोचें कि मैंने पाकिस्तान को विभक्त करने में वाकई में रुचि रखती हूँ, समस्या ये है कि ये सब लोग फैल रहे हैं और लाखों लोग हमारे राष्ट्र में फैल रहे हैं और मेरे सामने एक वास्तविक मानवीय संकट है और शायद जानसांख्यिकी का संकट भी आज है और ठीक यही स्थिति हम आज भी रखना चाहते हैं । तो क्या अनुचित है ? अन्ततः, वो एक सम्माननीय चरित्र हैं कुछ वर्गों के लिये ।

यदि वो इतनी निर्दोष हैं, तो ये स्थिति सहसा सदोष कैसे हो सकती है ? केवल इसलिये कि कोई और ये कहता है ? भूल जाइए कौन कहता है, स्वयं को निष्पक्ष होकर पूछिए कि इस स्थिति के साथ क्या अनुचित है ? अब, ‘नोन रीफाउलमेंट’ के सिद्धान्त के अनेकों अनुवाद हैं, इसका मतलब ये है, शरणार्थियों की भलाई के लिये अगर आप कुछ कर सकते हैं, कृपया कुछ कीजिये, ये ही इसका योग और तत्त्व है । तो आप १० चीजें कर सकते हैं, जो कि – सहायता सामग्री भेजना, उनको सहाय करना, आर्थिक सहाय, मानवीय सहाय, निश्चित करना कि शरणार्थियों के लिये आश्रयस्थल, जहाँ भी जिस भी देश में वे रहें वहाँ हों, अच्छी स्थिति में हों, स्वच्छ स्थिति में हों, मानवीय स्थिति में हों, ये सब करें । क्यूँ ये सब निश्चित रूप से एक ही विकल्प में परिणत होना चाहिये ? जो कि उनको आमन्त्रित करना, उनको स्थापित करना, उनको पुनर्वास देना इस देश में, है ?

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