शुक्रवार, अगस्त 17, 2018
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आन्ध्र प्रदेश सरकार के एक विधिनियम के विरुद्ध एक याचिका में क्या तर्क दिया गया

तो , ये तर्क जो याचिका कर्त्ताओं की ओर से दिया गया, वे याचिका कर्त्ता जो आन्ध्र प्रदेश के कानून को चुनौती दे रहे थे, उसकी संवैधानिकता को लेकर। ‘याचिका कर्त्ता के बुद्धिमान् अधिवक्ता के तर्कों में मुख्य यह है कि अनुच्छेद २५ और २६ धार्मिक क्रिया कलापों को व्यवस्थित करने और अपने धर्म का विस्तार , प्रचार करने की स्वतंत्रता सभी नागरिकों को सुनिश्चित करते हैं। हिन्दू इस देश की जनसंख्या में बहुसंख्यक हैं। हिन्दू धर्म सबसे बड़ा धर्म है, मुस्लिम, ईसाई और पारसी नागरिकों को भी संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ के अनुसार सामान अधिकार प्राप्त हैं। मुस्लिम, ईसाई और पारसी सम्प्रदायों की संस्थाओं के संचालन में बिना लेश मात्र भी हस्तक्षेप किये , केवल हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित करना अनुच्छेद १४ और १५ काउल्लंघन है जिसमें सबको समानता का विषय दिया गया है’ , याचिकाकर्त्ताओं ने ये कहा।

साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई सम्प्रदाय किसी बड़े धर्म का अंग है , तो अनुच्छेद २६ केअनुसार जो सुरक्षा उस सम्प्रदाय को प्राप्त है वही उस बड़े धर्म को भी प्राप्त है।याने यदि वैष्णवों को संविधान के किसी प्रावधान के अनुसार सुरक्षा या कोई अधिकार प्राप्त है तो पूर्णरूप से हिन्दू समाज को भी ये प्राप्त है। और इस तरह हिन्दुओं के संस्थान कानून के नाम पर नियंत्रित नहीं कि ये जा सकते जिससे कि हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों का हनन होता है। ये सार है उन सब तर्कों का जो याचिका कर्त्ताओं ने दिये।

चलिए देखते हैं उच्चतम न्यायालय क्या कहता है और इससे आपको कई तर्क याद आएँगे जो संविधान के अन्य पक्षों को ध्यान में रखकर बनाये गये हैं। पहला प्रश्न है कि क्या यह आवश्यक है कि विधानपालिका को ऐसा कानून बनाना चाहिए जो सभी धर्मों के माननेवालों द्वारा स्थापित या चलाये जा रहे धार्मिक या परोपकारी या सामाजिक संस्थानों पर समानरूप से लागू हो, अब यहाँ पर आती है धर्मनिरपेक्षक था भारत जैसे बहुलवादी समाज में जहाँ लोग अपने अपने धर्मों, विभिन्न धर्मों या उनकी शाखाओं द्वारा प्रचारित आस्थाओं या सिद्धांतों में श्रद्धा रखते हैं, संविधान बनाते समय संविधान के जन्मदाताओं के सामने भारत के लोगों को एक जुट और संगठित करने, भिन्न आस्था ओं, जातियों इत्यादि के लिये व्यवस्था करने की समस्या आई। संविधान के निदेशात्मक सिद्धान्त स्वयं विविधता की कल्पना करते हैं और विभिन्न आस्थाओं के लोगों में समानता को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया । हालाँकि, एक समान विधि अत्यन्त आवश्यक है, हालाँकि उसे एक बार में ही लागू करना शायद देश की एकता और अखंडता के प्रतिकूल हो।

विधि के नियमों से चलनेवाले प्रजातंत्र व्यवस्था में धीमा प्रगतिशील परिवर्तन लाया जाना चाहिये, याने कुछ भावनाएँ दूसरों से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। कानून बनाना या किसी कानून में परिवर्तन करना एक धीमी प्रक्रिया है और जहाँ आवश्यकता सबसे अधिक लगती है वहाँ विधानपालिका उसका उपचार करने का प्रयास करती है। इसलिए न्यायपालिका को लगता है कि जब हिन्दू संगठनों कि बात आये तो वह उपचार अत्यावश्यक है। आप देखिये, यही तर्क संगत है,  इसी प्रकार हम अनेक वाद को पारिभाषित करते हैं, इसी प्रकार हम धर्मनिरपेक्षता को पारिभाषित करते हैं, इसी प्रकार हम इस देश के संवैधानिक आदेशों और आदर्शों को लागू करते हैं।

हमें जो बात समझनी है वह यह है, यह प्रश्न जो १९९६ से निरन्तर २०१६ में भी महत्त्वपूर्ण बना हुआ है और वह एक प्रश्न जो हम सब पूछने का अधिकार रखते हैं यह है कि क्या आप कहना चाहते हैं कि पिछले ५० वर्षों में दूसरे समाज और दूसरे सम्प्रदाय समान कानून लागू होने के लिये सहज अनुगामी / आज्ञाकारी नहीं बने हैं, ५० वर्ष हो चुके हैं, यह १९९६ कि बात है, हम अब २०१६ में हैं। माना जा सकता है कि सन् १९९६ में स्वतंत्रता के ४९ वर्ष बाद कहें कि आपको लगता है हिन्दू संस्थानों को सबसे अधिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। क्या आप निर्णय के ५० वर्ष बाद कह रहे हैं कि परिस्थिति अब भी यही कहती है कि केवल हिन्दुओं को ही इसकी आवश्यकता है।

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