गुरूवार, अगस्त 16, 2018
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हिन्दू धर्म के अनुसार मानव व्यक्तित्व की पांच क्यारियाँ

आजकल, लगभद हमारे सारी, हमारा सारा ज्ञान आधुनिक विज्ञान के माध्यम से ही आता हैं I हम कहतें तो हैं कि हमारा विशेष प्राकृतिक शारीर हैं लेकिन अपने मन का एक स्वाधीन अस्तित्व होने को नकारतें है I वे कहतें हैं कि दिमागी गतिविधि ही सोचने-समझाने की शक्ति हैं, हिन्दू धर्म में हम मन को इस प्रकार से नहीं देखतें I हमारे रिशिओं ने, हमारे अतीत के वैज्ञानिकों ने हमारे अस्तित्व को, मानव शारीर को इस दृष्टिकोणसे नहीं देखाI यहाँ तक कि आयुर्वेद ने भी इसे नहीं माना हैं I हम जिसको स्वीकार करतें हैं वोह हैं मानव व्यक्तित्व की पांच क्यारियाँ I मैं मात्र एक प्राकृतिक शरीर ही नहीं हूँ I मेरा एक महत्त्वपूर्ण प्राणिक शरीर भी हैं, मेरा अपना मस्तिष्क हैं, मानसा, मनोमयाकोषा और एक विग्ननामयाकोषा, और एक अनंदामयाकोषा बुद्धि का आवरण, परमानन्द का आवरण I

यह अनूवाद, यह सही अर्थ नहीं सूचित करता लेकिन मेरा थोडा साथ दीजिये, जो महत्त्वपूर्ण हैं हमारे दिनचर्या के लिए वोह हैं यह तीन आवरण – अन्नामयाकोषा, शारीरिक जीव, अति महत्त्वपूर्ण प्रनामयाकोषा, ऊर्जा की परत, प्राणशक्ति, जिसे हम श्वास लेना कहतें हैं, वह प्राण हैं I हमारे पास श्वसन से उत्तम पारिभाषिक पद हैं I हम सिर्फ वायु ही नहीं लेतें I वायु एक मृत शरीर में भी प्रवेश करता हैं, मगर वोह जीवित नहीं माना जाता, सही हैं न ? और फिर उस वायु में, उस वायु कि पीछे कुछ हैं, जिसके कारन कोई जीवित माना जाता हैं, कोई मृत, हैं ना ? तो उसे ही प्रानाधारण ऊर्जा कहतें हैं, वही प्राण हैं, हैं ना ? तो यह था प्राणमय कोष, और फिर हैं मनोमया कोष, चित, विचार, मति, और अन्य समस्त प्रक्रिया I

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