बुधवार, सितम्बर 26, 2018
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हिन्दू धर्मं को बचाने के लिए संविधान को बदलिए

एक और महत्त्वपूर्ण भारतीय परिस्थिति, मैं कहता हूँ, मैं एक स्वामी हूँ जो अहिंसा के प्रति प्रतिबद्ध हूँ I एक संयाशी कि प्रतिज्ञा होती हैं अहिंसा I वो केवल अहिंसा ही हैंI सर्वबुठेभ्याहाभायाम्दाथ्वा, मैं यह सन्यास ग्रहण कर रहां हूँ, संपूर्ण शरण सब….मतलब संपूर्ण … सभी जीवों, जंतु, मनुष्य, यहाँ तक कि देवताओं को भी, कि मैं आपका प्रतिद्वन्धी नहीं हूँ I मैं आपमें से किसी को भी हानि नहीं पहुँचाऊँगा – कर्येनावाचानामानासा, यह संन्यास हैं I मैं अभिज्ञ हूँ इस बात से, मैं सन्यासी हूँ I

मैं ऋषिकेश में बैठा हूँ और, यह दो लोग मेरे पास आतें हैं, एक इसाई पादरी और एक मौलवी, दोनों मेरे पास आतें हैं I मैं उन्हें निमंत्रित करता हूँ, वे धार्मिक लोग हैं, वे प्रतिबद्ध लोग हैं I मैं उनका सम्मान करता हूँ, मैं उनका सम्मान करता हूँ, आसन ग्रहण करने को कहता हूँ I मुझ से किसी विषय पर वाद-विवाद करने लगे, सच पूछिए तो मुझे उनसे विवाद नहीं करना था, क्योकि तर्क उनसे किया जाता हैं जिनको आप मना सकतें हैं I मैं उन लोगों से तर्क नहीं करता जो केवल मुझे ही समझाने का प्रयास करतें हैं, मुझे उसमे कोई रूचि नहीं और इसीलिए….तो मैंने उनसे विवाद नहीं किया, मैंने उनके साथ का आनद उठाया और फिर मैं उनके साथ बैठा वार्तालाप करने के लिए, उन्होंने मुझेसे बहस छेड़ी और फिर वे मुझे मारने लगे, यह सिर्फ ब्रह्म हैं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था I

वहां पर एक थानेदार खड़ा था, जब वे मुझे मार-पीट रहे थे, उन दोनों से और थानेदार से, मैं थानेदार से विनती करता हूँ, ‘सुनिए ! कृपया इन्हें रोकिये, मैं उनसे मार-पीट नहीं कर सकता, मैं अहिंसा के लिए प्रतिबध्ह हूँ, मैं पलटकर वार नहीं करना चाहता, आप ही कुछ कीजिये’, मैं आग्रह करता हूँ I वोह कहतें हैं यह धार्मिक लोगों के मध्य कि बात हैं, मैं धर्मनिरपेक्ष हूँ, मुझेसे अपेक्षा कि जाती हैं कि मैं इसमें दखल ने दूं, दो बार, तीन बार मैंने उनसे अनुरोध किया फिर भी उसने कोई भी सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई I

तब मैंने सोचा कि मुझे अपनी रक्षा स्वयं ही करनी चाहिए, यद्यपि मैं अहिंसा के प्रति प्रतिबध्ह हूँ, मेरा शास्त्र मुझे क्षमा करेगा, मैं स्वयं कि रक्षा कर सकता हूँ और इसीलिए मैंने सोचा कि मैं अपना ध्यान रख सकता हूँ I मैं कोई कमज़ोर व्यक्ति नहीं हूँ, मेरे पास भिक्षा से प्राप्त हुई यथेष्ट शक्ति हैं और इसी कारन मैं इन दोनों को संभाल सकता हूँ, शायद एक को दुसरे कि अपेक्षा से कुछ अधिक ही, और इसीलिए मैंने अपनी रक्षा कि I यहाँ रक्षा का मतलब हैं आक्रमण, और कोई मार्ग है ही नहीं, कभी कभी अपनी सुरक्षा का सबसे अच्छा मार्ग होता हैं आक्रमण, यही हर पति भी करता हैं और इसीलिए आप अपनी रक्षा करतें हो और बीच में यह आके कहतें हैं, यह अल्पसंख्यक हैं, उनकी सुरक्षा अनिवार्य हैं I आपको उनसे लड़ना नहीं चाहिए I अरे पापी ! तुझे मेरी रक्षा करनी चाहिए I तुम सरकार हो, तुम राष्ट्र हो, तुम्हे मेरी रक्षा करनी चाहिए, ऐसे नहीं I आपको यह पूरी व्यवस्था ही बदलनी होगी I यदि इसके लिए संविधान को बदलने कि आवश्यकता हैं तो, उसे हमेशा के लिए बदल दो I मेरा धर्म….

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