संविधान का अनुच्छेद २५ २(अ) और क्यूँ इसकी व्याख्या मौलिक रूप से सदोष है

धर्म से जुड़ीस्वतंत्रता के सम्बन्ध में सरकार के अधिकार संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ में विहित हैं। अनुच्छेद २५ निजी व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा और अनुच्छेद २६ सम्प्रदायों की धार्मिक स्वतंत्रता के विषय में है, इसलिये ये संस्थाओं की बात करता है और २५ और २६ परस्पर जुड़े हुए हैं। २५ के अंतर्गत एक रोचक प्रावधान है, २५ (२) (a), जो कहता है कि जहाँ तक धर्मनिरपेक्ष, आर्थिक , राजनैतिक और इस तरह की गतिविधियों का प्रश्न है, इन सबको लेकर राज्य को अधिकार है कि वह विधान बनाये। ये सभी प्रकार की गतिविधियाँ एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ जुड़ी होती हैं। ऐसा प्रावधान करने के पीछे क्या प्रयोजन है, पहले इसको समझते हैं। समझें किआशीष एक धार्मिक सज्जन है, उसकी इच्छा है कि वह अपनी सम्पत्ति किसी मन्दिर के नामकर दे, उसकी इच्छा है कि वह सम्पत्ति केवल उस मन्दिर के उद्धार के लिये प्रयुक्त हो और किसी विषय के लिये नहीं। उसकी सदा यही इच्छा थी।

यदि कोई मन्दिर प्रशासन का अधिकारी ऐसी इच्छा करता है कि इस सम्पत्ति का बिलकुल ही भिन्नप्रयोग किया जाये तो २५ (२) (a) ही वह प्रावधान है जिसका प्रयोग करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रशासनिक अधिकारी, जिस उद्देश्य के लिये सम्पत्ति दी गयी, उसको छोड़कर किसी अन्य हेतु उस सम्पत्ति का व्ययन कर सके। याने धन और सम्पत्ति जो एक समुदाय के उद्धार के लिये दी गई थी, यदि उसका कोई दुरूपयोग किया जाये तो अनु ०२५ (२) (a) उसको रोकने के लिये उपस्थित है। अब देखते हैं कि इसकी वास्तविक व्याख्या कैसे की गई है, यहाँ अधिवक्ता और उनकी तिकड़मबाज़ी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।. न्यायपालिका ने धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को एक ओर रखा और धार्मिक गतिविधियों को दूसरी ओर रखा और कहा कि हम धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं इसलिये हम इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे, परन्तु जो धर्म निरपेक्ष गतिविधि है, आर्थिक या राजनैतिक, उसको लेकर कोई भी निर्णय लेने का सरकार को सम्वैधानिक अधिकार प्राप्त है।

इस तर्क में मूलभूत दोष क्या है, मैं आपको बताता हूँ । आप बिना किसी संसाधन के पूजा कर सकते हैं क्या ? आप बिना किसी संसाधन के मन्दिर के परिसर में कोई आयोजन कर सकते हैं क्या? अन्नदान करना है, पैसा कहाँ से आयेगा? पूजा करनी है, पैसा कहाँ से आयेगा? अखंड भजन करना है, पैसा कहाँ से आयेगा? नामसंकीर्तन करना है, पैसा कहाँ से आयेगा? धार्मिक अनुष्ठान के लिये पैसा कहाँ से आयेगा? धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को तो सरकार नियंत्रित करती है, पैसा देना न देना सरकार के हाथ में है । याने धार्मिक अनुष्ठान यदि कठपुतली है तो उसके तार सरकार के हाथ में हैं, वह जैसे चाहे न चाये । धार्मिक अनुष्ठान और परम्पराएं सरकार की इच्छाओं की दासी बनके रह गयी हैं । यह विभाजन धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिये और धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण बनाये रखने के लिये किया गया था परन्तु चाहें जानकार या अनजाने में, इसका प्रयोग हिन्दू समाज के विरुद्ध किया गया है और इस निष्कर्ष को किसी भी प्रकार न कारान हीं जा सकता है।

प्रत्येक गतिविधि, चाहें वो कितनी ही धार्मिक हो, उसका कोई न कोई धर्मनिरपेक्ष पक्ष भी होगा, क्योंकि पैसा कहीं न कहीं होगा ही । और यदि प्रत्येक धर्मनिरपेक्ष पक्ष पूरी तरह सरकार के अधीन है तो आपने धार्मिक गतिविधि को पूरी तरह सरकार के अधीन कर लिया है । और इस तरह आपके हाथ में केवल कागजी अधिकार रह जाते हैं जो कागजों से बाहर निकलकर किसी काम में नहीं आ सकते।

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