भारत में वामपंथी और दक्षिणपंथियो का विकास

जब ब्रिटिश आए, उन्होंने कुछ शुरू किया था। उन्होंने भारत का व्यवस्थित रूप से अध्ययन करना शुरू किया | उन्होंने भारत का एक व्यवस्थित अध्ययन शुरू किया था, जिसे हम सभी भारततत्त्व या इंडोलोजी के रूप से जानते हैं। और अंग्रेजों ने अपने स्वयं के दृष्टिकोण से, अपने तरीके से, अपनेअंदाज़ से भारत को चित्रित करना शुरू कर दिया | और उन्होंने कहा कि भारत एकपिछड़ा हुआदेश है, भारत एक आध्यात्मिक देश है, भारत जातिवादसे ग्रस्त देश है। वह कहने लगे की भारत किसी तरह का एक प्राच्यवादी धारणाहै, जैसा की आप जानते हैं, की वह एक विचित्रजगह है और एक प्रकार का विदेशी जगह है जहां लोग वास्तविक काम-काजकरते ही नहीं हैं, वे आत्मा और परमात्मा के बारे में अधिक सोच रखते हैं | और उन्होंने यह भी कहा की भारत एक बीते हुए स्थिर समाज के समय पे अटका हुआ है। यह ब्रिटिशों के द्वारा किया गया एक प्रकार का रोमांटिकतावाद था। यह पूरी तरह से बुरा भी नहीं था। एक औद्योगिक संस्कृति से आने के कारणउन्होंने भारत कोइसी तरह सेदेखा। हुआ ऐसा की जब उन्होंने इसे परिभाषित करना शुरू कर दिया और क्योंकि वे सत्ताधारी थे,सत्ता में थे, इसलिए क्यूंकिजब सत्ताधारी शक्ति कुछ परिभाषित करती है तो उसे मान्यतामिलजाती है | यहराष्ट्र की सत्ता और शासक वर्ग की शक्ति ही है जिसके कारण ऐसा हो पाता है।

इसके कारण दो तरह की प्रतिक्रिया पैदा होती हैं। पहला जवाब यह था कि, हाँ भारत एक पिछड़ा हुआदेश ही है, भारत जातिवादसे ग्रस्त देश है, भारत में कुछ भी अच्छा नहीं है। यहाँ पे केवल बाल विवाह और सती प्रथाचलती है और ब्रिटिश लोग सही कहते हैं, और हमें इस भारत को तोडकेनए ढंग से इसकीरचना करनी होगी और एक नया भारत बनाना होगा। हमें पूरी तरह से भारत का पुनर्गठन करना होगा और एक आधुनिक भारत बनाना होगा |ऐसे विचार भारत में जारी रहा है और मैं कहूंगा कि बहुत से लोग जो खुद को वामपंथी और उदारवादी मानते हैं, वे इस प्रतिक्रिया का उत्तराधिकारी है। जब ब्रिटिश ने आपको यह कहते हुए बताया कि आप एक पिछड़े स्थिर समाज थे, आप एक जाति से ग्रस्त समाज हैं, आपके बारे में कुछ भी अच्छा नहीं है, आप किसी तरह के दूसरे संसार में हैं, आप केवल आत्मा, परमात्मा और धर्म के बारे में सोचते हैं , आप असली दुनिया में कोई दिलचस्पी नहीं थी तोआपने अंग्रेजों को जवाब दियाके हां, अंग्रेजों को इस बात को ठीक करने का अधिकार है और हमें एक आधुनिक व्यवस्था बनानीहै, जहान्यायविराज करे ऐसा एक समाज बनाना है | बहुत सारे उदारवादी वास्तव में इस सोच से प्रभावित हो गए हैं | अभी मैं आपकोबहुत सामान्यीकृत तरीके से बता रहा हूँ, क्योंकि हर चीज की बारीकियों में जाना संभव नहीं है |

एक और प्रतिक्रिया थी और यह प्रतिक्रिया कहती है कि “हां, अंग्रेजों का कहना सही है, भारत एक कृषि-निर्भर समाज है, भारत एक आध्यात्मिक समाज है जो पश्चिम केभौतिकवादी समाजकेठीकविपरीत है। हां, जाति एक वास्तविकता है, यह हमारी संरचना है, लेकिन इसमें आखिर गलत क्या है”। इस पक्ष ने कहा कि हाँ, आप जैसेहमें वर्णन कर रहे हैं हमवास्तव मेंवैसे ही हैं | लेकिन हम जैसे भी हैं आप से बेहतर है, यह व्यवस्थाअच्छीहै और हम पश्चिम से बेहतर हैं। गांधी इस दृष्टिकोण रखने वालो में सेथे|

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