शनिवार, जुलाई 4, 2020
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सावरकर मानते थे कि एक राष्ट्र का उदय एक आधुनिक औद्योगिक समाज में ही संभव है

 

अभी मैं जिस विषय पे चर्चा करूँगा वह है,दक्षिणपंथियों में एक बड़ा दोष यहहै कि हम कहां से आयेवहभूल गए हैं | सावरकर की सोच, जो मेरे हिसाब से दक्षिणपंथियों में एक व्यवस्थित राजनीतिक विचार है, उसका उद्देश्य किसी ग्रामीणयूटोपिया का संरचना करना नहीं है। यह एक कृषिमूलक यूटोपिया के पक्ष में बहस नहीं कर रहा था; यह एक आधुनिक औद्योगिक देश के लिए बहस कर रहा था; क्योंकि वह समझ गया कि केवल एक आधुनिक औद्योगिक समाज में ही एक राष्ट्र का उदय हो सकता है | पूछियेक्यूं? क्यूंकि ये एक ही चीज़ की दो प्रक्रिया हैं | देखें, अगर आपके पास एक कृषिप्रधान समाज है, और भारत में यह समाज जाति मतभेद और अन्य समाजवादी स्तरों से प्रेरित है। इस व्यवस्था में आप कभी भी एक राष्ट्र नहीं बन सकते हैं और यह वही है जो अंबेडकर ने भी कहा, कि वास्तव में एक राष्ट्र क्या है और हालाकी इसके कई परिभाषाएं हैं लेकिन सबसे अच्छी परिभाषा यह है कि राष्ट्र एक ऐसा समुदाय है जिसमें लोग एक दूसरे से संबंधित हो, वे एक दूसरे के दर्द को महसूस कर सकते हैं और ख़ुशी को भी बाँट सकते है। सहज भाषा में कहा जाये तो यही राष्ट्र है|

अब एक बार जब आप जाति और अन्य सामाजिक भेदों के आधार पर समाज को विभाजित करते हैं, तो वह समाज एक राष्ट्र नहीं बन सकता। इसके साथ साथ जब आप सभ्यता और शहरीकरण जैसे चीज़ों का विकास करते हैं, तो लोग कृषि क्षेत्र से आधुनिक क्षेत्र के ओर आगे बढ़ना शुरू करतेहैं, क्योंकि आधुनिक क्षेत्र की एकआवश्यक शर्त यह है कि आप श्रम देने वाला मुक्त हो। आधुनिकीकरण याशहरीकरण का विकास जातिवाद द्वारा घिरे हुए समाज में नहीं हो सकता है। श्रम मुक्त होना चाहिए, लोगों को अपने व्यवसायों का चयन करने की आज़ादी होनी चाहिए। आपकीअर्थव्यवस्था में श्रम देने वाला मुक्त और गतिशील होना चाहिए, उसके बाद ही आपके पास शहरीकरण और औद्योगिकीकरण होगा। यह केवल तब होता है जब वे शहरी केंद्र और औद्योगिक केंद्र पर आते हैं और वे एक साथ रहने लगते हैं, चाहे उनकी जाति और पृष्ठभूमि और भाषा कुछ भी हो। ऐसे लोगों से ही एक नए वर्ग का उद्भव हो पाना संभव है जो समान अनुभव और समान चिंताएं रखते हैं। और यह वाही आधार है जिसके बल पर देश बढ़ता है। ऐसा हर जगह हुआ है;जहाँ भी आपआधुनिक राष्ट्रों के बारे में बात करते हैं, वहां किसीप्रकार का एकत्व होता हीहै।

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