गुरूवार, अक्टूबर 1, 2020
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एक सच्ची, शुद्ध और अच्छी जाति व्यवस्था कभी थी ही नहीं

 

दक्षिणपंथी विचारों में एक और समस्या यह भी है की यदि यहाँ आप एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करते ही नहीं हैं, वह विषय है जातिप्रथा | दक्षिणपंथी मंडलियों में जाति की चर्चा सिर्फ इस बारे में होती रहती है की वैदिक काल में जाति का मतलब क्या था? या फिर सच्ची जाति व्यवस्था क्या थी? मुझे यह कहते हुए खेद है कि सच्ची जाति व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं है। जाति व्यवस्था सिर्फ एक सामाजिक व्यवस्था है जो बढ़ती गयी, हमें यह भी नहीं पता है कि कब ऐसा होना शुरू हुआ | कुछ ऐसे अध्ययन हैं जो कहते हैं कि यह वैदिक युग से पूर्व समय की प्रथा है, यह सिन्धु घाटी सभ्यता के लोगों के बीच भी मौजूद था और यह वैदिक काल में भी जारी रहा, और यह बदलता रहा, लेकिन यह स्वाभाविक है, आप जानते हैं कि हर सामाजिक व्यवस्था में बदलाव आता है। तो जातिवाद भी बदल गई जब भारत में सामंतवाद का उदय हुआ, जातिवाद में तब भी परिवर्तन आया था जब मुगलों और तुर्क का शासन था, जब अंग्रेजों ने भारत में आकर जाति को बदल दिया तब भी ऐसा ही हुआ था क्योंकि समाज की अंतर्निहित वास्तविकता में एक परिवर्तन आ चूका था; और जाति आधुनिक स्वतंत्र भारत में भी एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है।

इसीलिए मेरा यह मानना है कि शुद्ध, वास्तविक जाति व्यवस्था क्या थी इस विषय पे तर्क करना एक बहुत व्यर्थ बात है, मुझे लगता है कि ऐसा कोई चीज नहीं है। इसे आपको दुसरे सामाजिक प्रणालीयों की तरह, एक गतिशील सामाजिक प्रणाली की तरह निपटना होगा। लेकिन एक समस्या यह है कि दक्षिणपंथी लोग ऐसा कहना शुरू कर देते है कि एक शुद्ध जाति व्यवस्था थी जो बहुत अच्छी थी, और यह विकृत हो गया और ब्रिटिश ने इसमें एक समस्या पैदा की, या मुगलों ने एक समस्या पैदा की। एक रूढ़िवादी के हैसियत से हमें ऐसा कहना ही नहीं चाहिए, क्योंकि हमारे विचारों का आधार सिर्फ वास्तविकता पर स्थापित होना चाहिए। मुगलों के सत्ता में आने से पहले भी जातिप्रथा कोई अच्छी व्यवस्था नहीं थी। आपको सरल इतिहास को पढ़ना होगा, आपको देखना होगा कि चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट पद पर लाते समय मगध के ब्राह्मणों ने एक भारी प्रतिरोध खड़ा किया था, यह कहकर की आप इस व्यक्ति को सम्राट नहीं बना सकते, आप उसे सम्राट के रूप में मुकुट नहीं कर सकते क्योंकि वह पिछड़े वर्ग में जन्मा हुआ व्यक्ति है। आप जानते हैं की वह चाणक्य थे जिन्होंने यह प्रयास किया था ताकी चन्द्रगुप्त सम्राट बन सके।

इसलिए यह हमेशा से ही एक समस्याजनक प्रणाली रहा है | यह केवल उस पर निर्भर करता है जिनके दृष्टिकोण से आप इसे देख रहे हैं। कुछ लोग कहेंगे की चलिए ठीक है, कुछ प्रतिबंध तो जिन्हें आप ऊंची जाति कहते हैं उन पर भी लागु थे, वहां शूद्रों पर भी कुछ प्रतिबंध लगाया गया था, और ऐसा करना ठीक ही था। लेकिन असल में यह प्रथा ऐसे लागु नहीं होती है; यह प्रथा कैसे काम करेगा वह तो उस दृष्टिकोण पर निर्भर करता है जहा से आप इसे देख रहे हैं। निचले स्तर के लोगों के लिए यह कभी भी एक अच्छी प्रणाली नहीं थी | यह कभी भी एक अच्छी प्रणाली नहीं थी, और यही वजह है कि पूरे इतिहास में आप इस प्रणाली के प्रति प्रतिरोध पाएंगे।

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