इंजीलवाद और हिन्दुओं की रक्षा भाषण के अंश

गोवा में धर्म न्यायाधिकरण – उसका आकार, उद्देश्य और कार्य पद्धति

 

गोवा में धर्म न्यायाधिकरण का गठन कैसे हुआ ? इस न्यायालाल के दो जिज्ञासु थे जो केवल पुर्तुगल के सम्राट को उत्तरदायी थे I उनकी नियुक्ति पुर्तुगल के सम्राट ही किया करते थे I वे गोवा के मुख्य पादरी को भी उत्तरदायी नहीं हुआ करते थे I वे गोवा के वाइसराय के भी उत्तरदायी नहीं थे, जिन्हें गोवा का वरिष्ट, धर्मनिरपेक्ष सत्ताधारी माना जाता था I उनको पोप नियोजित किया करते थे, किन्तु वे केवल पुर्तुगल के सम्राट को उत्तरदायी थे I इस धर्म न्यायालय का उद्देश्य केवल उन लोगों को दण्डित करना था जिन्होंने इसाई धर्म को अभी-अभी अपनाया था और जो अभी भी उपने पुराने तौर तरीकों का चयन कर रहे थे, चाहे वे यहूदी हो, मुसलमान हो, या फिर हिन्दू हो I लेकिन ये सत्य हैं कि यह न्यायलय केवल उन नवीन ईसाईयों के लिए नियुक्त की गयी थी जो अपने मूल धर्म में पुनः पतन करते थे I लेकिन इस न्यायाल को अधिकार था उन हिन्दुओं को दण्डित करने का जो धर्मपरिवर्तन के विरुद्ध थे या जिनके बारे में ऐसा कहा जाता था कि वे धर्मपरिवर्तन के विरुद्ध हैं I जैसे किसी शिशु का नाना जिसने अपने नवासे को मुख्याद्वीप भेजने का निर्णय लिया क्योकि वे नहीं चाहते थे कि शिशु इसाई पद्धति में प्रशिक्षित हो I ऐसे नाना को यह धर्म न्यायलय गिरफ्तार कर बंदी बना सकती थी I ऐसे हिन्दुओ को मारा नहीं जाता था, ईसाईयों को, मुसलमानों को, यहुदिओं को जिन्होंने इसाई धर्म को अपनाया था, उनको मारा जाता था लेकिन, ऐसे हिन्दुओ को यातनाये दी जाती थी, या फिर उन्हें प्रताड़ित किया जाता था, या फिर उन्हें दास बनाकर अन्य पुर्तुगाली नगरों में बेचा जाता था, ऐसा केवल हिन्दुओं के साथ ही हुआ करता था I

तो किन अपराधों के लिए यह धर्म न्यायलय नए इसाई अनुगामियों को गिरफ्तार किया करती थी? आप सोच रहे होंगे ना ? ऐसा क्या था ? ऐसे कौन से बड़े अपराधों के लिए ? और वोह अपराध थे, इस धर्म न्यायलय ने एक आदेशपत्र निकाला था जिसमे ५६ अपराधों की सूचि दी गयी थी I मैं यहाँ पूरी सूचि गिना नहीं सकती I लेकिन में कुछ अपराधों का उल्लेख करूंगी I सूचि बहुत व्यापक हैं और वोह ऐसे अपराध गिनाती हैं जैसे किसी को पान के पत्ते देना I अब हर शुभ काम में हिन्दू पान के पत्तों का उपयोग करते हैं I लेकिन जो हिन्दू इसाई बन गए थे उन्हें पान के पत्तों का उपयोग किसी भी प्रकार से निशिद था I यदि उनके पास दिखाई दिया तो उन्हें दण्डित किया जाता था I घर मैं तुलसी के पौधे का होना, न केवल ब्रिन्दावन में, या घर के आँगन में, आप के घर के पूरे परिग्रह में, कोई निरंकुषित तुलसी का पौधा ही क्यों न हो, यदि आपके घर में तुलसी पायी गयी तो आपको दण्डित किया जा सकता था I पारंपरिक लोकगीतों का गायन जैसे वोविओ जिसे हिन्दू विवाहों में गाया जाता था, वर-वधु के लिए हल्दी, नारयलके दूध का उबटन, नव जात शिशु के लिए छटें दिन का अनुष्ठान जो आज भी गोवा और  महाराष्ट्र में बहुत बड़ी बात होती हैं, ऐसी मान्यता है कि देवी स्वयं आकर शिशु के भाग्य को लिखतीं हैं I इसीलिए जब किसी के यहाँ शिशु का जन्म होता हैं तो उस घर के सदस्य जागरण करते थे I तो जो भी इस प्रकार का छ्टे दिन जागरण करता था उसे गिरफ्तार किया जाता था I पितरों के लिए समारोह, अर्थात श्राद्ध, गोबर से घर के फर्श और दीवारों पर लेप, नमक के बिना चावल पकाना, सप्ताह के कुछ दिनों में व्रत रखना, ग्रहण के दिन भोजन न करना, पुरुषों द्वारा धोती पेहेनना चाहे घर में हो या घर के बहार, इसाई धर्म कार्यक्रमों में हिन्दू वेश-भूषा पेहेनना जैसे साडी,धोती, माथे पर बिंदी लगाना, या चन्दन का टीका लगाना, संगीत के उपकरणों का उपयोग जैसे करताल, पारंपरिक त्यौहार मनाना जैसे शिग्मो, यह सारे अपराध माने जाते थे, और किसी एक अपराध के लिए भी आपको दण्डित किया जाता था I साक्षियों को प्रोत्साहित किया जाता था इसाई अपधार्मियों की निंदा करने का I और जैसा कि मैंने पहले कहा था यह साक्षियों का दायित्व नहीं था कुछ भी प्रमाणित करने का I परिणास्वरूप यदि आपकी किसी से नहीं बनती थी तब आप धर्म न्यायलय में जाकर कह सकतें थे कि मैंने इस आदमी को मूर्ति के सामने माथा तेकतें देखा हैं, और केवल आप के कथन के आधार पर धर्म न्यायलय आपको गिरफ्तार कर सकती थी I

कोई भी नए ईसाईयों पर इस प्रकार का आरोप लगा सकते थे I साक्षियों को अपनी बात सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं थी I इसका परिणाम यह हुआ कि कोई भी किसी पर भी आरोप लगा सकता था I धर्म न्यायलय उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती थी, उसे अपने परिवार जनो से दूर ले जाया जाता था, और सबसे पहला काम जो वो करते थे, वे उसकी संपत्ति को हड़प लेते थे I उस संपत्ति का कुछ हिस्सा साक्षी को दिया जाता था, जिसने झूटी गवाही दी, और बाकी पुर्तुगाली सम्राट की संपत्ति कहलाती थी I यंत्रणा सामान्य बात हुआ करती थी इस धर्म न्यायलय में, अपराध-स्वीकरण के लिए I दो प्रकार की यातनाएं हुआ करती थी I गिरनी की यातना, जहाँ अपराधी के पैरों में वजन डालकर अधर में लटकाया जाता था, और वजन को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता था जब तक वह अपराधी के लिए असहिष्णू न बन जाए और वो अपना अपराध स्वीकार न कर ले I दूसरी थी पानी की यातना, जहाँ अपराधी को एक्तरफे पायदान पर सुलाया जाता और उसका सर शरीर के निचले भाग से नीचे रखा जाता था, और गले पर लोहे का कटिबंध डाला जाता था, ताकि वोह अपना सर न हिला सके और तंग रस्सियाँ उसके शरीर को काटते थे I लोहे के शूल से उसके मुख को बलपूर्वक खुला रखा जाता था और फिर मुख में और नाक में पानी डाला जाता था अपराधी को घुटन और उसकी सास रोकने के लिए I और ये कई बार किया जाता था, जब तक अपराधी अपना अपराध कबूल न कर ले I दुसरे तरीकों से भी प्रताड़ित किया जाता  था, जैसे मोमबत्ती से बगल को जलाना, पैरों पर मारना इत्यादि I सब प्रकार की यातनाये हुआ करती थी I महिलाओं के साथ और भी बहुत कुछ हुआ करता था, आप उसकी कल्पना कर सकतें हैं I

अवेरा के मुख्य पादरी, जो पुर्तुगल के प्रमुख पादरी भी थे, अपने भाषण में एक बार कहा था कि उनके अफसरों ने महिला अपराधियों का यौन शोषण कर उन्हें धर्म विरोधी करार दे, जिंदा जलाया करते थे I सबसे भयानक यातना, होती थी ऑटो डा फे जिसका मतलब था अग्नि का इम्तेहान I यह ऑटो डा फे वर्ष में एक बार, या फिर दो वर्षों में एक बार हुआ करता था, जहाँ उन अपराधिओं को जिन्होंने अपना अपराध अस्वीकार किया था, या फिर जिन्हें इसाई धर्म विरोधी माना जाता था, उन्हें सार्वजनिक जगहों पर ज़िंदा जलाया जाता था I

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