भारत से चीन को ज्ञान का अंतरण

 

अब हम बात करेंगे भारत से चीन के ज्ञानान्तरण के बारे में I संस्कृत भाषा में लिखित कई सारे हस्तलेख चीन ले जाए गए, चीनी विद्वानों के द्वारा या फिर भारतीय विद्वानों द्वारा जिन्हें चीनी राजाओं ने इस कार्य के लिए नियुक्त किया था I कुछ समय पहले हमने बत की थी हुआन संग और आई सिंग के बारे में I वे उन विद्वानों में से थे जो चीन से भारत आये थे I वास्तव में भारत से बहुत सारे विद्वान, संस्कृत के विद्वान चीन गए और बहुत वर्षों तक चीन में रहकर अनुवाद करते थे क्योकि चीनी ऐसा मानते थे कि जितनी जल्दी हो सके अधिक से अधिक हस्तलेखों का अनुवाद करना एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य हैं I एक पूरी किताब लिखी जा सकती हैं ऐसे संस्कृत विद्वानों के अनुवादों की संख्या के बारे में I

सबसे पहले जो विद्वान गए उनके नाम कश्यप मतंग और धर्मरतना था I उन्हें एक बहुत ही दुर्गम यात्रा करनी पड़ी, चीनी तुर्किस्तान, गोबी की मुभूमि से होते हुए चीन पहुँचाना था, और वहां पहुंचकर चीन जैसी कठिन भाषा को सीखना था जो संस्कृत वाक्य-विन्यास से बिलकुल ही अलग था I इन सब के बावजूद उन दोनों ने कर दिखाया, जिसके परिणामस्वरूप एक बाढ़ सी शुरू हो गयी I उनके बाद कितने ही संस्कृत के विद्वान चीन गए जैसे सांग वर्मा, धर्मं सत्य, धर्मं कला, महामल्ला, विगना, धर्मपाला I उन सब की गणना करना यहाँ संभव नहीं, इतना ही नहीं, यह विद्वान केवल उत्तर भारत के ही नहीं थे I उदाहरंस्वरूप धर्मं रूचि दक्षिण भारत के विद्वान थे I उन्होंने चीन में २० वर्षों तक रहकर ५३ क्र्तितियों का अनुवादन किया I विद्वान को ज्ञात था कि चीन में उनके लिए बहुत मांग हैं, तो जब उन्हें भारत में अपने अनुरूप कोई कार्य नहीं मिलता था, तब वे चीन चले जाते थे I इसका परिणाम हमेशा सुखद नहीं होता था, जैसा के धर्मक्षेमा के साथ हुआ, जिसे दो चीनी राजाओं ने आमंत्रित किया था, और उन राजाओं के आपसी विवाद के कारण वे एक हत्यारे का शिकार बन गए I ऐसा दुसरे विद्वानों के साथ भी हुआ था I

अमोघवज्र एक और विदवान थे I उन्होंने भारत के विभिन्न भागों से लगभग ५०० ग्रंथों को एकत्र किया और चीन गए जहां उन्हें चीनी राजाओं से कई पदवियां प्राप्त हुई I उन्हें तांत्रिक बौध धर्म का संस्थापक भी माना जाता हैं I उनसे जुडी एक और घटना भी हैं I उन्होंने कई वर्षों तक अनुवाद किये I एक बार छुट्टीयों में वे भारत आये, भारत आते ही उन्हें संदेशा मिला कि चीनी राजा ने उन्हें वापस बुलाया है, इसीलिए वे अपने परिवार जनों से बिना भेंट किये ही वापस चले गए I

भारतीय विश्वविद्यालयों के खगोलविद और गणितज्ञ चीनी वैज्ञानिक संस्थानों में उच्च पदों पर नियुक्त किये जाते थे I  एक बहुत बड़ा उदहारण हैं गौतम सिद्ध का I उनका चीनी नाम कुतान सिद्धा था I भारत में उनके बारे में न जानने का कारन यह बी हो सकता हैं कि उनके नाम परिवर्तित कर दिए जाते थे I शायद इसी कारन हमे उन सबके बारे में नहीं पता जो भारत से चीन गए I तो उनका नाम कुतान सिद्धा था और उन्हें आठवी शताब्दी में चीन के वैज्ञानिक आधिकारिक मंडल का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था I उन्होंने नवग्रह के पंचांग को चीन में अनुवाद किया था I उन्होंने भारतीय अंकों को चीन में पुरःस्थापित किया था और मुद्रणालय के आविष्कार का श्रेय उन विद्वानों को दिया जाता हैं जो भारत से चीन गए थे I आज हमे सिखाया जाता हैं कि मुद्रण का आविष्कार चीन में हुआ था, लेकिन उसका निर्माण बौध विद्वानों ने किया जो भारत से गए थे और उन्होंने मुद्रण का उपयोग बौध विचार के प्रचार हेतु किया था I

यह कुमारजीव की प्रतिमा हैं; हम में से बहुत से कम लोगो ने उनके बारे में सुना होगा I लेकिन वे चीन में विख्यात हैं I कुमारजीवा कश्मीर में कश्मीरी संस्कृति में पले-बड़े थे, और उन्होंने १०० से भी अधिक संस्कृत कृतियों का अनुवाद किया था जिन्हें चीनी साहित्य की उत्तम कृतियाँ मानी जाती हैं I वज्र सूत्र का अनुवाद इन्होने ही किया हैं जो बौध धर्मं की मूल्यवान कृति मानी जाती हैं I और यह चिन्ह, चीन के ज़ेन्न जिआंग से हैं I उनको चीन के सबसे बड़े मेधावियों में मान जाता था और इसीलिए उन्हें इस प्रकार से सम्मानित किया गया हैं I लेकिन भारत में हम उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं I

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