शनिवार, अक्टूबर 24, 2020
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अठारहवीं शताब्दी के समय प्रचलित भारतीय शिक्षा प्रणाली पर प्रस्तुत ब्रिटिश रिपोर्ट

 

अपने लंदन प्रवास के दौरान धर्मपाल को कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण पुरालेख सामग्री को देखने का अवसर मिला – ब्रिटिश सरकार के द्वारा भारत की स्वदेशी शिक्षा प्रणाली पर किये गए सर्वेक्षणों की श्रृंखला पर लिखी गयी रिपोर्ट्स। ये सर्वेक्षण भारत के विभिन्न प्रान्तों में अति गम्भीरता से करवाये गए थे और उतनी ही सावधानी से उन्हें लिपिबद्ध भी किया गया।

इन सर्वेक्षणों में प्रस्तुत किये गए निष्कर्ष आंखे खोलने वाले थे। प्रत्येक गाँव में एक पाठशाला हुआ करती थी। केवल बिहार और बंगाल में ही एक लाख से अधिक पाठशालाएं थीं। इन पाठशालाओं में अनिवार्य रूप से लिखना-पढ़ना सिखाया जाता था अतः उनमें साक्षरता का स्तर बहुत ऊंचा था। वहाँ आने वाला कोई भी व्यक्ति निरक्षर नहीं रहता था। इन पाठशालाओं में रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों सहित अन्य कई विषयों जैसे अंकगणित का अध्ययन होता था। यहाँ पढ़ाने वाले शिक्षकों के हृदय में अपने उत्तरदायित्व को लेकर बहुत उत्साह रहता था और इसके चलते वहाँ बड़ी संख्या में शिक्षार्थियों की उपस्थित रहती थी।

सबसे अधिक अचंभित करने वाली जो बात सामने आयी वह यह थी कि इन विद्यालयों में बड़ी संख्या में शूद्र बच्चे अध्ययन करते थे और उनकी संख्या ब्राह्मणों एवं वैश्यों की तुलना में अधिक थी। कुछ विद्यालयों में तो इनका प्रतिशत 50% से 70% के मध्य था। इसी प्रकार इन पाठशालाओं में बड़ी संख्या में लड़कियां भी अध्ययन किया करती थीं।  इन रिपोर्ट्स में जो तथ्य सामने आए वह सामान्यतः प्रचलित रूढ़िवादी भावनाओं के ठीक विपरीत थे। इस्लामिक आक्रमणकारियों ने बड़े और प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया लेकिन गांवों में पाठशालाओं के द्वारा स्वदेशी शिक्षा प्रणाली फलती-फूलती रही।

श्रीमती सहाना सिंह ने सृजन संस्था द्वारा आयोजित गोष्ठियों की श्रृंखला में “प्राचीन भारत की शैक्षिक विरासत” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किये और ब्रिटिश रिपोर्ट्स में सामने आये तथ्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

आप उनके द्वारा दीये गए व्याख्यान को नीचे दिये गए लिंक पर जाकर सुन सकते हैं –
https://srijantalks.org/2018/06/18/educational-heritage-of-ancient-india-a-talk-by-sahana-singh/

हिंदी अनुवाद: महेश श्रीमाली

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