गुरूवार, सितम्बर 19, 2019
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तृतीय वर्ष के समापन समारोह में मोहन भगवत जी का संबोधन

 

इस वर्ग को देखने, संघ को समझने अपना समय खर्चा करके, अपना वय करते  हुए, हमारे ऊपर स्नेह रखकर यहाँ उपस्थित हुए सभी माननीय अतिथि गण, उपस्तिथ नागरिक सज्जन, माता-भगिनी, मंच पर उपस्तिथ माननीय सर्वाधिकारी जी, विदर्भा प्रांत के और नागपुर महानगर के माननीय संघचालक जी एवं, आत्मीय स्वयं सेवक बंधू I

प्रति वर्ष नागपुर में त्रितिय वर्ष का वर्ग लगता हैं I और प्रति वर्ष उसका प्रकट समापन कार्यक्रम होता हैं I ऐसे जो हमारे कार्यक्रम होतें हैं, उसमे संघ स्थापना के समय से, हमारी यह परंपरा रही है, कि देश के सज्जनों को हम आमंत्रित करतें हैं I जिनको आना संभव हैं वोह हमारा निमंत्रण स्वीकार करतें हैं और यहाँ पर आतें हैं I संघ का स्वरुप देखतें हैं, अपने तरफ से अपनी कुछ बात कहतें है I उसको पार्थीय रूप में स्वीकार कर, उसका चिंतन करतें हुए हम आगे बढ़तें हैं I

उस परंपरा के अनुसार ही आज का भी कार्यक्रम, नागपुर वासी सब जानते हैं, सरलता से, सहज रीति से संपन्न हो रहा हैं I परन्तु इस बार उसकी कुछ विशेष चर्चा चली I वास्तव में एक स्वाभाविक नित्य क्रम में होने वाला यह प्रसंग हैं I उसके पक्ष में और विपक्ष में जो चर्च होती हैं, उसका कोई अर्थ नहीं हैं I यह प्रति वर्ष जैसे होता हैं वैसे होता हैं I वैसे ही हुआ हैं I

डॉक्टर प्रणब मुख़र्जी साहब से हम परिचित हुए I सारा देश पहले से ही जानता हैं I अत्यंत समृद्ध, ज्ञान समृद्ध, अनिभव समृद्ध, ऐसा एक आदरणीय व्यक्तित्व हमारे पास हैं, और ऐसे सज्जनों से पार्थीय ग्रहण करने का लाभ मिल रहा हैं, हम उनके कृतज्ञ हैं I हमने सहज रूप से उनको आमंत्रण दिया, उन्होंने हमारे ह्रदय का स्नेह पहचानकर सम्मति दी और यहाँ उपस्तिथ हैं I एक सह स्वाभाविक बात हैं I उनको कैसे बुलाया और वोह क्यों जा रहें हैं ? यह चर्चा निरर्थक हैं I संघ संघ हैं, डॉक्टर प्रणब मुख़र्जी डॉक्टर प्रणब मुख़र्जी है I और रहेंगे I

परन्तु हम निमंत्रण इसलिए देतें हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नाते, संघ वाले नाम से देश में कोई बड़ा प्रभावी ग्रुप खड़ा करें, जो देश के सारे क्रिया-कलापों पर अपना स्वामित्व चलाये, इस आकांक्षा को लेकर संघ का काम नहीं चला हैं I हिन्दू समाज में एक अलग प्रभावी संघटन खड़ा करने के लिए संघ नहीं हैं I संघ को संपूर्ण समाज को संघटित करना चाहता हैं I और इसलिए हमारे लिए कोई पराया नहीं I और वास्तव में किसी भारत वासी के लिए दूसरा कोई भारत वासी पराया नहीं I

विविधता मैं एकता, यह अपने देश में हज़ारों वर्षों से परंपरा रही हैं I हम भारत वासी हैं यह नहीं क्या हैं ? संयोग से इस धरती पर जन्म लिया, यहाँ पैदा हुए, इसलिए केवल हम भारत वासी नहीं हैं I यह केवल नागरिकता की बात नहीं हैं I  भारत की धरती पर जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारतपुत्र हैं I इस मातृभूमि की निःसीम भाव से भक्ति करना उसका काम हैं I और जैसे-जैसे उसको समझ में आता हैं, छोटे तरीके से बड़ी तरीके से, सभी लोग ऐसा करतें हैं I

इस भारत भूमि में केवल हमको पोषण और आजीविका के लिए प्राकृतिक संसाधन नहीं दिए हैं I उसने हमको हमारा स्वाभाव भी दिया हैं I “सुजल, सफल, मलयज शीतल मातृभूमि” और चारों ओर से प्राकृतिक दृष्टि से सुरक्षित, इसमें बाहर के लोगों का आना-जाना बहुत कम हो सकता था I और अन्दर भरपूर समृद्धि थी I इसलिए जीवन जीने के लिए हमको किसी से लड़ना नहीं पड़ा I स्वाभाविक दृष्टि से हम इस मनोवृत्ति के बने I यहाँ सर्वत्र भरपूर हैं I हम उसका उपभोग कर रहें हैं अपनी जीवन को समृद्ध कर रहें हैं, कोई आता हैं, तो ठीक हैं I तुम भी आ जाओ, तुम भी साथ रहों I भाषाओं की पंथ-सम्प्रदायों की विविधताएं तो पहले से हैं I अलग-अलग प्रकार से प्रांत बनाते हैं, रचनाएँ बदलतीं रहतीं हैं I

राजनीतिक मत-प्रभाव, विचार प्रणालियाँ भी पहले से रही हैं I लेकिन इस विविधाता मैं हम सब भारत माता के पुत्र हैं, और अपने-अपने विविधता, वैशिस्थ पथ पर रहतें हुए, दूसरों की विविधताओं का सम्मान करतें हुए, स्वागत करते हुए, और उनके अपने विविधता पर रहने का स्वीकार करतें हुए, मिल-जुल कर रहना, विविधता में जो अंतर निहित एकता हैं भारत के उत्थान के लिए, परिश्रम करने वाले सभी प्रामाणिक बुद्धि के निस्वार्थ महापुरुषों ने अभी तक जिसका उल्लेख करना कभी छोड़ा नहीं, ऐसी उस अंत:र्निहित एकता का साक्षात्कार करके अपनी जीवन में रहना, यह हमारी संस्कृति बनी I

और उसी संस्कृति के अनुसार इस जीवन, इस देश में जीवन बने, और सारे विश्व के भेद और स्वार्थ मिटाकर, विश्व के कलह मिटाकर सुख-शांतिपूर्ण, संतुलित जीवन देने वाला प्राकृतिक धन उसको दिया जाए, इस प्रयोजन से इस राष्ट्र को अनेक महापुरुषों ने खडा किया I अपने प्राणों की बलि देकर सुरक्षित रक्खा I अपने पसीने को सींच कर बड़ा किया I यह सब महापुरुषों के, वे हमारे पूर्वज होने के कारण, गौरव का स्थान अपने ह्रदय में हम रखतें हैं और उनके आदर्शों का अनुसरण  करने का  अपने-अपने हिसाब से प्रयास करतें हैं I

मत-मतान्तर हो ही जातें हैं I मत का प्रतिपादन करते समय, शास्तार्थ करतें समय और विवाद भी करने पडतें हैं I लेकिन इन सब बातों की एक मर्यादा रहतीं हैं I अन्तोगत्वा हम सब लोग, भारत माता के पुत्र हैं I मत-मतान्तर कुछ भी होंगे, हम अपने-अपने मत के द्वारा यह मान कर चल रहें हैं कि भारत का भाग्य हम बदल देंगे I हम उसको परम संपन्न बनायेंगे I एक ही गंतव्य के लिए अलग-अलग रास्तें लेने वाले लोगों को अपने विसिष्ठता, विविधता को लेकर तो चलना चाहिए I उससे हमारा जन-जीवन समृद्ध होता हैं I

विविधता होना यह सुन्दरता की बात हैं I समृद्धि हैं I उसको स्वीकार करके हम चलतें ही हैं I परन्तु यह दिखने वाली विविधता एक ही एकता से उपजी हैं I इस भाव का भान रखकर, हम सब एक हैं, इसका भी दर्शन समय-समय पर होतें रहना चाहिए I क्योकि किसी राष्ट्र का भाग्य बनाने वाले, समूह नहीं होते, व्यक्ति नहीं होते, विचार, तत्त्व ज्ञान नहीं होता, सरकारे नहीं होती I सरकारें बहुत कुछ कर सकती हैं, लेकिन सरकारें सब कुछ नहीं कर सकती I देश का सामान्य समाज जब तक गुण-संपन्न बनकर अपने अंतःकरण से भेदों को तिलांजलि देकर मन के सारे स्वार्थ हटाकर, देश के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तैयार होता हैं, तब सारी सरकारें, सारे नेता, सारे विचार समूह उस अभियान के सहायक बनते हैं I और तब देश का भाग्य बदलता हैं I

स्वतन्त्रता के पहले अपने देश के लिए स्वतंत्रता का प्रयत्न करने वाले सभी विचार धाराओं के महापुरुषों के मन में यह चिंता थी, कि हम तो प्रयास कर रहें हैं, हमारे उपाय से कुछ तो भला होगा, लेकिन सदा के लिए बीमारी ख़तम नहीं होगी I जब तक अपने सामान्य समाज को एक विशिष्ठ गुणवत्ता के स्तर पर, मन के एकात्मता की भावना के आधार पर खडा नहीं किया जाता, देश के दुर्जनों का संपूर्ण अंत नहीं होगा I और हमने अपना काम चुन लिया हैं, हम उसमे व्यस्थ हैं, लेकिन यह काम हुए बिना कोई काम पूर्ण नहीं होता I

संघ के संस्थापक डॉक्टर हेग्देवार, इन सभी कार्यों के, सक्रिय कार्यों के करता थे, क्योकि उनके अपने जीवन में उनको अपने लिए करने की कोई इच्छा-आकांक्षा नहीं थी I वोह सब कार्यों में रहें I कांग्रेस के आन्दोलनों में दो बार कारावास भुगता I कांग्रेस के यहाँ पर कार्यकर्ता भी रहें I अग्रगण्य क्रन्तिकारको के साथ क्रन्तिकारकों की योजना बनायीं, उसकी क्रियान्वन में भाग लिया I समाज सुधार  के काम में सुधारकों के साथ रहें I अपने धर्म-संकृति के सनरक्षण में संत-महात्माओं के साथ भी रहें I और यह सारा करतें समय उनका अपना चिंतन भी चला और इन महापुरुषों के अनुभव चिंतन का भी, परामर्श उनको मिला I

तो उन्होंने यह विचार किया त्रिलोकीनाथ चक्रवर्ती, सुप्रसिद्ध क्रांतिकारक, बंगाल के, अनुशीलन समिति के सदस्य I डॉक्टर हेग्देवार की जन्मशताब्दी हुए १९९० में I तो उस जन्मशताब्दी समिति का सदस्य बनने का अनुरोध करने के लिए, वोह दिल्ली में थे उस समय I दिल्ली में हमारे कार्यकर्ता उनसे मिले I तो उन्होंने कहा, की १९११ में डॉक्टर हेग्देवर कोल्कता में मेरे घर आये, और तब की चर्चा में उन्होंने यह बात कहीं कि समाज को खड़ा किये बिना कोई भला काम सफल होना संभव नहीं लगता I और आगे उन्होंने कहा था, कि लगता है कि यह काम मुझे ही करना पड़ेगा I

सब लोग बड़े-बड़े कामों में व्यस्थ हैं, अच्छे लोग हैं, वरिष्ठ लोग हैं, बहुत गहरे और बहुत ऊँचे लोग हैं, इसलिए उन कामों की चिंता उनपर छोड़ दिया तो भी काम चलेगा I लेकिन यह काम करने वाला कोई नहीं हैं I तो इस कार्य को कैसे किया जाए ? यह सोचके उन्होंने १९११ से प्रयोग करना प्रारम्भ किया I और सारे प्रयोग करने के बाद १९२५ की विजयादशमी पर अपने छोटे से घर के पहली मंजिल पर १७ लोगों को साथ लेकर यह कहा कि हिन्दू समाज जो भारत का उत्तरदायी समाज हैं I केवल परम्परा से रहते आयें हैं इतनी बात नहीं I आज के तारीक में भारत एक बहुसंख्यक समाज हैं केवल इतनी बात नहीं I भारत के भाग्य के बारे में प्रश्न उसे ही पूछा जाएगा I उसका यह दायित्व हैं I उस हिन्दू समाज को संघटित करने के लिए इस संघ का कार्य वहां से शुरू हुआ, ऐसा उन्होंने कहा I

यह जो हमारी दृष्टि हैं, “हम सब एक हैं” I किसि-किसि को एकदम समझ में आता हैं, किसी-किसी को समझ में नहीं आता हैं I किसी-किसी को समझ में आने के बाद भी उसको लगता हैं कि इनके साथ हो गए तो कुछ नुक्सान होगा I मालूम होते हुए भी, थोडा सा उलटा ही चलेंगे, अलग ही चलेंगे I और किसी-किसी को मालूम ही नहीं I

चार ही प्रकार भारतवर्ष में हैं I पराया कोई नहीं हैं I दुश्मन कोई नहीं हैं I सब की माता भारत माता हैं I सबके पूर्वज समान हैं, ४०,००० वर्षों से I ऐसा DNA का विज्ञान आज कहता हैं I सबके जीवन के ऊपर भारतीय संस्कृति के प्रभाव स्पष्ठ रूप से देखने को मिलते हैं सारवत्त I इस सत्य को हम स्वीकार करेले समझ ले, अपने संकुचित भेद छोड़कर I सबकी विविधताओं का सम्मान करते हुए I इस देश के राष्ट्रीयता के इस सनातन प्राचीन प्रवाह को बल देने वाला काम करते जा रहें हैं I संघ ने यही विचार किया हैं, संघ सबको जोड़ने वाला संघटन हैं I समाज में संघटन को नहीं करना हैं, समाज का ही संघटन, संघ को करना हैं I

क्योकि संघटित समाज ही भाग्य परिवर्तन की पूँजी हैं I और इस भाषण को समझ कर, ऐसे पुस्तकों को पढ़कर संघटन होता नहीं I क्योकि संघ में एक विशिष्ठ व्यवहार आपेक्षित हैं I सौभाग्य्ता, सौम्यरसता I सबको समझ लेने का I आज की भाषा में, अंग्रेज़ी में कहतें हैं, “democratic mind” I उसके बिना संभव नहीं होता हैं I और व्यवहार की बात स्वभाव से सम्बंधित रहती हैं और स्वभाव आदतों से बनता हैं I आदतों को बनाए बिना, स्वभाव नहीं बनता, और पूरे समाज का स्वभाव बनाना हैं, तो पूरे समाज का प्रत्येक व्यक्ति विचार करके नहीं चलता I  अध्ययन करके नहीं चलता I समाज तो, जो वातावरण बनेगा, उस वातावरण के अनुसार चलता हैं I

वातावरण बनाने वाले लोग हैं I वो लोग चाहिए I तात्विक चर्चा, सामन्य समाज नहीं करता I उसको उसमे रस नहीं हैं I उसमे गति भी ही नहीं हैं I और तत्त्व की चर्चा करने जायेंगे, तो विषयों को लेकर अनेक प्रकार के मत होते हैं विद्वानों को, यह तो पहले से हैं I

प्रत्येक ऋषि अलग-अलग बात बताता हैं I कभी एक ही बात आग भाषा में बताता हैं, तो अनुयायी लोग उसको अलग ही मानकर चलते हैं I किसका प्रमाण माने ? श्रुति, स्मृति सबमे फरक हैं I “श्रुति विभिन्ना स्म्रितिअस्य भिन्ना, नैवेको मुनीर यस्य वाच प्रमाणं ?” “धर्मस्य तत्त्वं”, समाज को जड़ने वाला यह जो धर्म हैं, समाज को बिखरने न दने वाला यह जो धर्म हैं, समाज को उन्नत करके, अभ्युदय और नि:श्रेयस की प्राप्ति करा देने वाला, समाज के व्यवहार को संतुलित करने वाला यह जो धर्म है, “धर्मस्य तत्त्वं, निहितं द्वाया” उसका तत्त्व ढूँढता रहता हैं I

उसको पाने के लिए तपस्या करनी पड़ती हैं, सब लोग तपस्या नहीं करते I थोड़े लोग होते हैं I सब लोग क्या करतें हैं, “महाजनो ये न गतः पन्थाः” समाज के श्रेष्ठ लोग जैसे चलते हैं वैसे ही चलते हैं I “यज्ञदा चरती श्रेष्ठ, तत्त्ववेत चरो जनाः I सय्यत प्रमाणं कुरुते, लोकस्य दुन्न वरत I”

अपने इस विशाल भूमि वाले, विशाल जन संख्या वाले देश में प्रत्येक गाँव में, प्रत्येक शहर के गल्ली मोहल्ले में, अपने आचरण से समाज हितैषी आचरण का वातावरण बनाने वाले कार्यकर्ताओं का समूह चाहिए I  संघ का यही प्रयास हैं I विचार कुछ भी हो, देश के सामने विभिन्न जो विषय हैं, समस्याएँ हैं, उनके हल के बारे में मत कुछ भी हो, विचारधरा कोई भी हो, जाती-पाती, प्रान्त, पक्ष, पन्त भाषा कोई भी हो, लेकिन संपूर्ण समाज को, संपूर्ण राष्ट्र को अपना मानते हुए, व्यापक दृष्टि से उसके हित के प्रकाश में मेरा व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामजिक और आजीविका में आचरण कैसा हो, इसका विचार करके अपने आचरण का उदहारण अपने आस-पास प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति, वोह वातावरण बनाता हैं I

वोह महापुरुष नहीं होता, वोह सब में एक होता हैं I महापुरुषों के आदर्शों की समाज पूजा करता हैं, उत्सव करता हैं, जयंती, पुण्य तिथि मनाता हैं, लेकिन अनुकरण तो उसका करता हैं जो उसके आस-पास, पडौस में रहने वाला, उसके जैसा, लेकिन थोडा सा प्रमुख I ऐसे उदहारण, अपने जीवन से उपस्तिथ करने वाले कार्यकर्ता चाहिए I मार्गदर्शक हमारे पास भरपूर हैं, कमी नहीं है I सुविचार की कमी नहीं हैं I श्रेष्ठतम तत्वज्ञान हमारे पास हैं I परन्तु व्यवहार के बारे में, हम निकृष्ठ थे, अब हम कह सकतें हैं कि, तोडा सा सुधार हुआ हैं I लेकिन अभी तक जितिनी मात्रा में व्यवहार में चाहिए, वैसा नहीं हैं I

और वोह तब बनता हैं जब सब प्रकार की परिस्तिथि में उस व्यवहार पर अड़कर वैसा व्यवहार करने वाले, समाज में से ही समाज के जैसे ही, परन्तु अपने चारित्र से, शील से, विसिष्ठता रखने वाले लोग खड़े होते हैं I ऐसे लोग देशभर में खड़े करने का प्रयास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हैं I क्योकि सारे समाज के एक विशिष्ठ दृष्टी से चलने की आवश्यकता हैं I कार्य कोई भी संम्पन्न होता हैं तो शक्ति के आधार पर संपन्न होता हैं I किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए I यह जीवन का नियम हैं I विज्ञान सिद्ध नियम हैं I और शक्ति संघटन में होती हैं I सबके मिलके काम करने में होती है I और शक्ति को अगर शील का आधार नहीं रहा तो वह शक्ति दानवी शक्ति बनती है I अच्छी बातों का उपयोग बुरे कामों में होता है I “विद्याय विवादाय धनं मदाय i शक्ति परेशं परपीदीतत्यनाया” I विद्या प्राप्त लोग विवाद में समय गवातें हैं, सहमती नहीं बनातें I विद्या के आधार पर सहमती बननी चाहिए, लेकिन विवाद चलते हैं I धनपति लोग धन के मद में चूर हो जातें हैं, धन का वोह उपयोग नहीं हैं I और शक्ति दूसरों के….सब बातों की इच्छा करना और सबको पीड़ा देना उसको प्राप्त करने के लिए, यह कौन करते हैं? दुष्ट लोग करते हैं, “खलस्य” विद्या विवादाय, धनं मदाय शक्ति परपीडायानाम खलस्य I साधोहो विपरीत वेतत I” सज्जनों की गति उलटी चलती हैं I “ज्ञानाय, दानायचा, रक्षानाय” I विद्या का उपयोग समाज में ज्ञान बढाने के लिए करते हैं I धन का उपयोग दान में करते हैं और शक्ति का उपयोग रक्षण के लिए करते हैं I दुर्बलों का रक्षण करते हैं I

शक्ति को शील का आधार चाहिए, बिना उसके अनियंत्रित शक्ति, ये खतरे वाली बात हैं I और इसलिए उस शक्ति की उत्पत्ति, उस शील की उत्पत्ति, समाज के आज के स्तिथि में, सब संकटों से, समस्याओं से उभार कर, समाज श्रेय का मार्ग चलने लगे, ऐसे ज्ञान की आराधना, सब परिस्तिथियों में अपनी तपस्या पर अडिग रहने के लिए, वीररत्व की आराधना, और सब प्रकार के मोह, आकर्षणों से कष्टों से गुज़रते हुए भी अपने ध्येय को कभी ओझल न होने वाली, उल्टा अधिकाधि ध्येय प्राप्ति की उत्कंठा वाली, ध्येय निष्ठां, इन पाँच गुणों की आराधना संघ की शाखाओं में स्वयंसेवक करते हैं I एक घंटा यह सब अपने तन-मन में उत्पन्न करने वाले कार्यक्रम करते हुए, अंत में जो प्रार्थना करते हैं, भारत माता की, उसमे प्रभु से इन्ही पाँच गुणों का वरदान माँगा हैं I

१९२५ से संघ चला I धीरे-धीर बढ़ता गया I सब प्रहारों के, सब बाधाओं के बावजूत बढ़ता गया I धीरे-धीर प्रतिकूलता को उसने स्नेह में बदल दिया I आज लोकप्रिय हैं, जहाँ जातें हैं वहां समाज का स्नेह मिलता हैं I विशाल संघटन बन गया हैं I लेकिन हम इसमें कृतार्थ का अनुभव नहीं करते I हमको अपने को पसिद्ध करने के लिए काम नहीं करना था, और नहीं कर रहें हैं I आगे बढ़ना हैं I अनुकूलता का समय भी आता हैं, लेकिन अनुकूलता विश्राम के लिए नहीं करते, विश्राम हमको नहीं करना हैं I “परम वैभवं नेतुत स्वराष्ट्रं” I यह हमार लक्ष हैं I और उसके लिए सतत कार्यकरता के निर्माण की जो प्रक्रिया चलती हैं, उसके चलते, उस प्रक्रिया को चलाने वाले कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण भी प्रति वर्ष होता हैं I

तृतीय वर्ष के समापन का प्रसंग प्रति वर्ष हम यहाँ अनुभव करतें हैं I अपना खरचा करके, साम्पातिक सुस्तिथि में यह विद्यार्थी सब के सब नहीं हैं I प्रान्तों के वर्गों में और यहाँ के वर्ग में भी ऐसे लोग मिलते हैं, जो हज़ार रूपया शुल्क जुटाना, प्रवास शुल्क जुटाना इसके लिए २-३ महिना महनत-मजदूरी करके पैसा जुटाकर उस पैसे को अपने भौतिक आवश्यकता के लिए खर्चा न करते हुए वर्ग का शुल्क देकर यह प्राप्त करते हैं I उनको कोई मिलने वाला नहीं हैं I वोह ऐसा करते हैं, इसलिए उनको धन्यवाद भी नहीं दिया जाता, और यह आदत भी लगायी जाती हैं कि, अपेक्षा कुछ मत करो I नेकी करो, कुए में और डाल दो I

“वृत्त पत्र में नाम छपेगा पहनूंगा स्वागत सुमा, छोड़े चलो यह क्षुद्र भावना, हिन्दू रास्त्र के कारना I तेरा वैभव अमर रहें माँ, हम दिन-चार रहे न रहे I” यह सीख वोह लेते हैं I यह संस्कार लेते हैं I अपने मन के भाव को पुष्ट करते हैं I तृतीय वर्ष में आतें हैं, तो आज तक जो पुस्तकों में पढ़ा था, बौधिकों में सुना था, इधर-उधर से सुन रहे थे, उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति ग्रहण करते हैं, भारत वर्ष के कोने-कोने से आये हुए लोग I विभिन्न स्वभावों के, विभिन्न आर्थिक पृठभूमि के, विभिन्न भाषाभाषी, विभिन्न प्रान्तों के, विभिन्न जाती-उपजातियों के I अपरिचित लोग पहले दिन आतें है और जिस दिन जाने का समय होता हैं, पल हुआ, आखों में आँसू रहते हैं I भाषा समझ में नहीं आई, लेकिन आत्मीयता ऐसी हो गयी, कि लगता हैं कि बिछुड़े ही नहीं I

अनुभूती धारण करते हैं, कि सारा भारतवर्ष मेरा अपना हैं I सारे भारतीय मेरे अपने हैं I जो प्रतिज्ञा में विद्यालय की प्रार्थना में करता था, “भारत मेरा देश हैं, सारे भारतीय मेरे बांधव हैं I भारत के समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा का गौरव मेरे मन में हैं I” उन सारी बातों की प्रत्यक्ष्य अनुभूति वोह यहाँ प्राप्त करते है I इसके बाद उनको और प्रशिक्षण की आवश्यकता इसलिए नहीं रहती I अनुभूति मन को प्लावित करती है, मन ऐसा बनाकर आँख और कान खोलकर समाज में समाज  की सेवा-परोपकार का काम करते हैं I तो अपने-आप आगे का प्रशिक्षण हो जाता है I यह संघ का कार्य हैं I

हम सारे सज्जन शक्ति को जुटाना चाहतें हैं I हमे विचारों से मतों से कोई परेज़ नहीं I गंतव्य एक हो, परम वैभव, संपन्न भारत, विश्वगुरु भारत I उसकी दुनिया को आवश्यकता है I दूसरा कोई आज के दुनिया के, और समस्याओं को हल करने वाला उत्तर नहीं दे सकेगा I भारत वर्ष को देना हैं I बोलके नहीं देना है, अपना जीवन वैसा प्रस्थापित करके देना हैं I उस जीवन को स्थापित करने के लिए, लायक भारतीयों का भारत I उसके स्वत्व के आधार पर पक्का खड़ा अपने स्वत्व की पक्की पहचान जिसके मन में है I उसके बारे में जो स्पष्ठ हैं, उसके बारे में जो निर्भय हैं, संकोची नहीं हैं, ऐसा समाज इस देश में हम खड़ा करना चाहतें हैं, ऐसा समाज ही विश्व की, भारत की और हमारी-आपके दैनिक जीवन की सब  समस्याओं का पूर्ण उत्तर है I

उसको हम सबको खड़ा करना है I संघ का काम केवल संघ का काम नहीं हैं I यह तो हम सबके लिए है I इसको देखने के लिए अनेक विचारों के महापुरुष आ चुके है I आते रहतें है I मैं उसका विवरण नहीं दूंगा, आपको पता है I और इस प्रसंग के निमित का ऐसा बहुत आया भी है I आते हैं, देखते है, उनसे हम पथिया ग्रहण करते है I उनकी सूचनाएं, उसका विचार करते हैं I हमने जो पथ तै किया हैं, हमने जो कार्यक्रम तै किया है, हमने जो गंतव्य तै किया है, उसमे उसकी जो मदद होती है, उसका विचार करते है I उनको स्वीकार करते हैं I आपस में सद्भावना रखकर समाज सब एक-दुसरे का सम्मान करते चले I “परस्परं भाव यान्तं I” हम अपने-अपने पंथ से प्रमाणिकता से चले I तो प्रामाणिक लोगों में मत आड़े नहीं आते I प्रामाणिक लोगों में कुछ बात आड़े नहीं आती I

जो सही हैं उसपर सब चलते है I उनके मतों की आपस की चर्च एक सुन्दर संवाद बनता है I जैसे अपने उपनिषदों के संवाद I तरह-तरह के मत है I सबका प्रतिपादन है I उसमे से एक सहमती निकलकर आती है I पढ़ने के लियें, चिंतन के लिए और जीवन में उतारने के लिए भी अच्छा लगता है I क्योकि सत्य है I उस सत्य पथ पर चले हम सब, ऐसा हमारा संस्कार हो, ऐसी हमारी आदत हो, ऐसी हमारी बुद्धि हो, ऐसा समाज उपदेश से नहीं, अपने स्वयं के जीवन से उदहारण करने वाले कार्यकर्ता, संघ तैयार करता है I यह हम सबके लिए हम सब का काम है I और इसलिए मैं आपको आवाहन करता हूँ, इस कार्य को प्रत्यक्ष देखिये I जो कुछ मैंने अभी तक कहा, वोह वास्तव में है की नहीं इसका पड़ताल कीजिये, और आपको लगा की ऐसा है तो यह सर्वहित का कार्य है, इसमें आप भी सह्भागी होईये I

संघ को परखें I अन्दर से परखें I आना-जाना अपने मर्ज़ी की बात है यहाँ पर I मन-मर्ज़ी का काम है, सब आ सकते हैं, सब परख सकते हैं I और परखकर अपना भाव बना सकते है, जैसा बनेगा, वोह बनेगा I हमको उसकी चिंता नहीं I हम क्या हैं, हम जानते है I हम जो हैं वैसे दिखते हैं I हम जो हैं वही हम करते हैं I सबके प्रति सद्भाव रखकर, किसी का विरोध मन में न रखकर, हम अपने पथ पर दृढ़तापूर्वक आगे चल राहें है I लेकिन यह केवल हम करेंगे तो नहीं होगा, पूरे समाज का यह काम हैं I सारे समाज को इस मार्ग को परखना चाहिए और अगर ठीक लगता है तो इसके सहयोगी बनना चाहिए I  यह आवाहन मैं आपके सामने रखता हूँ, और मेरी बात समाप्त करते हुए, आदरणीय डॉक्टर प्रणब मुख़र्जी को अनुरोध करता हूँ, कि अपना पाथ्य हम सब लोगों को प्रदान करे I वोह अंग्रेजी भाषा में बोलेंगे I कान देकर सुनिए, तो समझ में भी आएगा I

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