भाषण के अंश

धर्मान्तरण के विषय विवेकानंद के वास्तविक विचारों का सुचिंतित रूप से स्तंभन

विवेकानद ने कहा था कि , अगर हिन्दुओं से एक बदल कर ईसाई या मुस्लिम होता हैं, तो न केवल कि एक हिन्दू घटता हैं, बल्कि हिन्दुओं का एक शत्रु बढ़ता है I अब इस एक पंक्ति को ही लीजिये तो पूरी philosophy उसमे I पूरा कर्त्तव्य उसमे दिखता हैं I लेकिन विवेकानंद को गए हुए ११७ साल हो गए, हमने आज तक इस बिंदु पर क्या किया ? बिलकुल खतम ी इस तरह की चर्चा भी न करे I अगर आप इस तरह की चीज़ें उदृत कर दीजिये तो अखबार में संपादक को लेख censor कर देता हैं I हम यह नहीं चाप सकते I

यह स्वतंत्र भारत की ही नहीं, यह उस भारत की स्तिथि हैं जहाँ पे हिंदूवादियों को सत्ता में माना जाता हैं I और आज की यह स्तिथि है, कि इस तरह के उद्धरण, विवेकानंद के, स्वामी श्रद्धानन्द के, डॉक्टर आंबेडकर के, महात्मा गाँधी के I मैंने इसको देखा हैं, और मैं अपने अनुभव से आपको कह सकता हूँ, और प्रामाणिक तौर पर, कि इस तरह के उद्धरणों के साथ लेखों को संपादक silently अलग कर देते हैं, बिना किसी जवाब के, कि हम यह नहीं छाप सकते I

यह कैसा भारत बना है ? यह कैसी हमरै धर्म चेतना है ? विवेकानंद ने जो कहा था, हम उसको भूल गए I जिन्नाह ने कहा था I जब उनसे तर्क किया जाता था कि, यह विभाजन होने का, विभाजन तो तभी तय हो गया था जब सदियों पहले, पहला हिन्दू इस्लाम में धर्मान्तरित हुआ था I अब विवेकानंद और जिन्नाह की बाते जोड़ दीजिये तो स्पष्ठ तस्वीर दिखती है I कि अगर इस धर्मांतरण के धंदे को सचेत रूप से आप रोकने का कोई काम नहीं लेते, या कोई कार्यभार अपने सामने नहीं रखते, तो हिन्दू भारत का अस्तित्व तो नहीं बच सकता I

इतनी स्पष्ट बात, इतनी स्पष्ट समस्या और समाधान की दिशा होते हुए भी, स्वतंत्र भारत में और स्वतंत्र भारत से पहले भी नेतृत्व ने इसको अपने notice में भी नहीं लिया, इसलिए नहीं कि उनके सामने यह बात नहीं थी, जैसा मैं कह रहा हूँ, उस ज़मानेमें जब किताबे rare छपा  करती थी, उसमे तीन-तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें आ चुकी थी I और तब इसकी चर्चा न करने का मतलब हुआ कि, हमने जान-मुझ करके उससे अपनी आँखें मोड़ली I

यह कौन सी प्रवृत्ति हैं ? क्या यह वही धर्म हैं जो उपनिषदों में सिखाया गया है ? क्या गीता में ऐसी प्रवृत्ति की कोई अनुशंषा है ? क्या रामायण या महाभारत में ऐसी कहीं शिक्षा हैं कि सच्चाई से तुम मुँह चुरा लो? क्या तुम किसी पीड़ित का मारा जान देखते रह जाओ और उसको justify करो या दूसरी ओर देखने लगो? उसके लिए झूठे explanations दो? लेकिन स्वतंत्र भारत में हमने इसको अपने शाशन और शिक्षा की policy बना लिया है I कि इस तरह के प्रश्नों को भी हम नबीन उठाएंगे, उसपे चर्चा करना और समाधान करना ढूंढें तो दूर रहा I

तो यह जो जनसांख्य की विमर्श पर हमारा संकोच हैं, यह अगर ख़तमन करेंगे तो इसका समाधान नहीं हो सकता I और हमे इस पर सोचना चाहिए कि, अपने महान गुरुओं, शास्त्रों की शिक्षा को उपेक्षित करके पाया क्या है ? गाँधी जी ने हमे जो policy दी – बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो- और इसको उन्होंने state political policy में बदल दिया, और जिसके कारन जो अत्याचारी और शिकारी थे, उनको  और खुली छूट मिल गए I वह जितना चाहे शिकार करे,  उसे देखा नहीं जायेगा I वह जितना चाहे अत्याचार करे, उस पर state या party कुछ नहीं बोलेगी I तो इसने हमे क्या दिय है अभी तक ?

विवेकानंद ने जो कहा था – एक हिन्दू जब धर्मान्तरित होता है – उसके साल बाद लाहौर में जो हुआ,   साल के बाद ढाका में जो हुआ, और जो ८० साल के बाद श्रीनगर, कश्मीर में जो हुआ, वह तो दिखाता हैं कि, उनकी बात कितनी शाट-प्रतिशत प्रमाणित थी I इसके बावजूद हम उसकी चर्चा नहीं करते हैं I इस आंख छिपाने वाली प्रवृत्ति को हमे ख़तम करना होगा I

Featured Image – https://www.indiatoday.in/education-today/gk-current-affairs/story/swami-vivekananda-952512-2016-01-12

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