भाषण के अंश

धर्मावलोकन में हमसे कहाँ त्रुटि हो गयी?

कहाँ हम भटक गए? कहाँ  हुई? इसके  है, लेकिन  , वह यह कि हमने स्वयं अपने धर्म को छोड़ दिया I हमे अपने धर्म पर चलना छोड़ दिया, धर्म की चिंता छोड़ दी I धर्म के बारे में एक सचेत समझ छोड़ दी, और हम गलत विचारों, गलत मुहावरों, गलत नेताओं, गलत विचारधाराओं और गलत शिक्षा के प्रभाव में धीरे-धीरे इतने मज़बूतीसे जकड गए कि, हमने बिना जाने धर्म का मार्ग छोड़  दिया I और यह सारी समस्या उसके कारन है I

और  मुझे लगता हैं कि  भी वही हैं I  कि अगर  मार्ग पर वापस चलना शुरू करें, कर सके, तभी हम समाधान का मार्ग ढूंढ पाएंगे I संस्कृत के मुहावरे बहुत इस्तेमाल होते हैं, लेकिन यदि उसको पूरा पढ़ें,  जो पर समझा जाता है, “धर्मो  रक्षति रक्षितः I”  मैंने  जब इसको मनुस्मृति   में से निकालकर पूरा श्लोक पढ़ातब मैंने पाया कि यह सिर्फ उसका १/४ हिस्सा है I इसका ३/४ हिस्सा एक अलग सन्देश देता है जो की शायद इस से अधिक महत्वपूर्ण है I “धर्मे वहतोहन्ती, धर्मो रक्षति रक्षितः I तस्मात् धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो धीत I” इसका अर्थ यह हुआ कि मारा हुआ धर्म,  मरा  हुआ धर्म, मारने वाले और रक्षित किया हुआ धर्म के रक्षक की रक्षा  करता  I    हम सिर्फ इतनाही दौहराते हैं, “धर्मो रक्षति रक्षितः I ” लेकिन मनु कहतें हैं धर्म का हनन  करो नहीं  तो मारा  हुआ धर्म हमे न मार डाले I “Dharma when destroyed, destroys. Dharma protects when it is protected. Therefore dharma must not be violated otherwise violated dharma destroys us.”

मैं मोटे तौर पर यही समझता हूँ कि ,  पिछले १०० सालों  ख़ासकरके गाँधी जी के बाद, जो हमारी   राजनितिक, वैचारिक और शैक्षिक दिशा थी, वह उससे भटक गयी ी जो  स्वामी विवेकानंद ने, श्रद्धानन्द ने हमे बताई थी I मैंने उनके राजनितिक साहित्य  का अच्छा अध्ययन किया हैं और मैं  साथ कह सकता हूँ कि श्री अरविन्द ने और स्वामी विवेकानंद ने,  राजनितिक बातें नहीं कही थी, लेकिन जो सामाजिक बातें कही थी और समस्याओं की जितनी  चर्चा की थी, और श्री अरविन्द ने तो बहुत विस्तार में कही थी, अपने क्रांतिकारी जीवन  के अंत तक जब वह योगी हो गए थे तब भी उन्होंने राजनितिक विषयों पर बोलना  जारी  रखा I  अपने आश्रम में और उसका पूरा संकलन हैं , “Evening Talks” में I  आप देखिये की उनकी जितनी राजनितिक टिप्पणियां हैं और जो सुझाव है वह सब  जो prevelant Congress की ideology थी, और जो उनका, जो उनकी theory थी, जो वह शिक्षा दे रहे थे, उसके ठीक विपरीत I

तो मैं महसूस करता हूँ कि   हमने धर्म का मार्ग छोड़दिया और इसका कारण, इसी कारण ऐसा हुआ, कि जब हम  विभाजन कर रहे थे तो हमारे लोगों  नहीं सोचा कि उस विशाल जनता का क्या होगा जो इस्लामी शासन में  शाशन में जाएगी? उन मंदिरों का क्या होगा, उन  मठों का क्या होगा, उन शिक्षा केंद्रों का क्या होगा जो लाहौर, मुझे लगता हैं कि इलाहबाद और लाहौर, ब्रिटिश भारत में यह दो सबसे बड़े ज्ञान के ज्ञान के केंद्र थे I और संभवतः लाहौर ही सबसे बड़ा ज्ञान केंद्र था I बहुत बड़े-बड़े संघटन, संस्थानें वही से शुरू हुए थे I आर्य समाज हो या श्रद्धानन्द जी का काम को, और बहुत सारे, मैं उतना ध्यान नहीं दिया हैं I वो पूरा का पूरा क्षेत्र गैर हिन्दू शासन में जा रहा हैं, भारत से अलग हो रहा हैं, लोगों ने इसकी चिंता नहीं की I उसका क्या होगा ?

शरद पीठ का क्या होगा? मुल्तान के सूर्य मंदिर का क्या होगा? लोगों ने इसकी चिंगता नहीं की I या मानकर के चले कि वे अपने आप सुरक्षित रहेंगे I धर्म अपने-आप सुरक्षित नहीं रहता है I उसकी रक्षा करनी होती हैं ताकि आपकी रक्षा वह करे I यह सीधा सा गणित जो मनुस्मृति के ज़माने से ५००० सालों से भारत के लोग जानते थे, साधारण लोग जानते थे, हमारे बड़े -बड़े नेता इसे भूल गए I

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