शनिवार, दिसम्बर 15, 2018
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इस्लाम व ईसाई धर्म की तुलना में सनातन धर्म में निहित एकेश्वरवाद की विचारधारा श्रेष्ठतर क्यों?

क्यों सनातन धर्म श्रेष्ठ है और अन्य कम, इसका कारण है की वे सब केवल एक कथानक पर किये जाने वाले अंधविश्वास पर आधारित हैं। उनकी कोई प्रमाणिकता नहीं है। साथ ही उनके बहुत सारे हानिकारक दुष्प्रभाव भी हैं। मुझे नहीं लगता क्रूर उपनिवेशवाद संभव होता अगर यह भावना नहीं पनपती की हम ईश्वर द्वारा चुने गए श्रेष्ठ लोग हैं और सच्चा ईश्वर केवल हमारे पास है। इसी तरह इस्लामिक आक्रमण इतना वीभत्स, क्रूर नहीं होता अगर मुस्लिम आक्रांता इस भावना को लेकर नहीं चलते की हमारे रिलिजन में विश्वास नहीं रखने वाले लोग दमन के पात्र हैं, और उनके साथ मानवीय संवेदनाओं का निर्वाह आवश्यक नहीं है। यह सब इतना भयावह था, इतना दर्दनाक था, लाखों लोग बिना कारण या गलत कारणों के चलते मौत के घाट उतार दिये गये।

अब ईसाई और इस्लाम का दावा है कि केवल हम लोगों के पास एक ईश्वर है, अन्य किसी के पास कोई ईश्वर नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि उन्हें एकेश्वरवाद की अवधारणा की समझ ही नहीं है। सनातन परंपरा में एक समरसता है, सब एक हैं, और एक ब्रह्म के स्वरूप हैं। इसके ठीक विपरीत इस्लाम और ईसाई समुदाय में ईश्वर एक अलग इकाई है, जिसका साक्षात्कार किसी मनुष्य के लिए संभव नहीं है। ईश्वर के अतिरिक्त आपको एक मसीहा प्रदान किया गया है, स्वर्गदूत हैं,  शैतान है और मनुष्य प्रजाति है।

इंटरफेथ संवाद के दौरान इन विषयों पर वास्तविक चर्चा होनी चाहिए। सामान्यतया इंटरफेथ सवांद अर्थहीन ही होते हैं। मुझे इन आयोजनों में जाने का दो बार अवसर प्राप्त हुआ। मेरे अनुभव के अनुसार यह आयोजन इस्लाम और ईसाई धर्म प्रचार के अतिरिक्त और कुछ नहीं होते। मैने एक बार इस पर एक आलेख भी लिखा था, जहाँ मैने कहा था कि इन आयोजनों में ईसाई समुदाय के लोग क्रिश्चियनिटी की प्रशंसा करते हैं, मुस्लिम समुदाय के लोग इस्लाम की प्रशंसा करते हैं, और हिंदू धर्मावलम्बी क्रिश्चियनिटी और इस्लाम दोनों की प्रशंसा करते हैं।

ऐसे ही एक इंटरफेथ सवांद के दौरान मैं देहरादून में थी, दिल्ली में तो आप कोई प्रश्न पूछ हो नहीं सकते, लेकिन सौभाग्य वश देहरादून में प्रश्न पूछना संभव था। अतः मैने एक प्रश्न पूछ लिया, वहाँ उपस्थित ईसाई पादरी ने पहले तो मेरे प्रश्न से परहेज करने का बहुत प्रयत्न किया, जब यह करना सहज नहीं रहा तो विषय को अपने व्यक्तिगत अनुभव से जोड़ने लगा। कहने लगा यीशु के साथ मेरा व्यक्तिगत अनुभव ऐसा रहा, वैसा रहा। मैने उसे रोकते हुए कहा यहाँ प्रश्न आपके व्यक्तिगत अनुभव पर नहीं है, आप सैद्धान्तिक स्तर पर बात रखिये। लेकिन वह इस कैसे कर सकता था? कभी नहीं। उनका यह दावा की सच्चा ईश्वर केवल उनके पास है एकदम झूठा है। अगर कहीं सत्य है तो वह भारत में है – प्राचीन काल से, अपने शुद्ध प्रामाणिक स्वरूप में।

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