अयोध्या राम मन्दिर भाषण के अंश मध्यकालीन इतिहास रामायण

पुरातात्त्विक साक्ष्य हमें राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद के बारे में क्या जानकारी प्रदान करते हैं?

सृजन संस्था ने अयोध्या राम मंदिर विवाद पर विचार विमर्श की एक श्रृंखला शुरू करने के उद्देश्य से डॉ मीनाक्षी जैन के साथ नई दिल्ली स्थित इनटेक परिसर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया।

इस अवसर पर श्रोताओं को सम्मानित वक्ता डॉ मीनाक्षी जैन के विचार सुनने का अवसर मिला। डॉ मीनाक्षी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करी है एवं वे सांस्कृतिक अध्ययन में विशेष महारत रखती हैं। वह वर्तमान में भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान की सदस्य हैं।

सृजन वार्ता के दौरान डॉ मीनाक्षी जैन ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) के द्वारा राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद स्थल पर की गयी खुदाई से मिले पुरातात्त्विक निष्कर्षों पर प्रकाश डाला।

पुरातत्वविदों एवं अन्य जानकारों के द्वारा बाबरी मस्जिद ढाँचे के नीचे एक प्राचीन हिन्दू मंदिर होने के कई प्रमाण प्रस्तुत किये जाने के बाद भी वामपंथी इतिहासकारों ने उन्हें सिरे से नकार दिया। इस विवाद का कोई हल होता हुआ नहीं दिखने के फलस्वरूप इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ASI को विवादित स्थल पर खुदाई कर बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर की उपस्थिति पता लगाने का आदेश दिया। साथ ही हाईकोर्ट ने अत्यंत सख्त निर्देश भी दिए कि खुदाई के समय बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और राम जन्मभूमि न्यास दोनों ही के प्रतिनिधि अनिवार्य रूप से उपस्थित होने चाहिए और खुदाई में जो भी साक्ष्य एवं जानकारी मील उसे एक रजिस्टर में दर्ज कर दोनों पक्षों के रोजाना हस्ताक्षर लिए जाएं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए ASI ने खुदाई का कार्य प्रारम्भ किया। खुदाई से प्राप्त साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि ईसा से 2000 वर्ष पूर्व से ही राम जन्मभूमि पर निरंतर अधिग्रहण रहा है और इसे एक पवित्र स्थल के रूप में आस्था प्रदान की गयी है।

ईसा पूर्व एक हजार साल के साथ ही, दो से एक शताब्दी ईसा पूर्व के शुंगा काल, एक से तीसरी शताब्दी ईस्वी के कुशन काल, और चौथी से छटी शताब्दी गुप्ता काल के समय भी अधिग्रहण के प्रमाण मिले हैं। ASI को गुप्ता काल के पश्चात ईंटो से बने मंदिर के अवशेष मिले। इस मंदिर में शिवलिंग के होने तथा वहाँ जल से पूजा अर्चना किये जाने के साक्ष्य उपलब्ध हैं।

खुदाई के दौरान दसवीं एवं ग्याहरवीं शताब्दी के प्रारंभिक मध्यकालीन युग में निर्मित एक विशालकाय मंदिर के अवशेषों का भी पता चला। यह मंदिर लगभग 50 मीटर चौड़ा एवं उत्तर-दक्षिण दिशा की और अभिमुख करे हुए था। ASI के अनुसार यह मंदिर बहुत अधिक समय तक विधमान नहीं रह पाया। सम्भवतया जिस प्रकार सोमनाथ मंदिर को बार बार विखंडित किया गया उसी प्रकार इसे भी नष्ट किया गया हो। उस समय इस क्षेत्र में बहुत से तुर्की सक्रिय थे अतः मन्दिर तोड़े जाने की बहुत सम्भावना बनती है।

फिर, इस दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी के मंदिर के अवशेषों पर बारहवीं शताब्दी में तीन चरणों में एक विशालकाय मन्दिर का निर्माण किया गया था। यह मंदिर तीन मंजिला था जिसमें पचास से अधिक खम्बे लगे हुए थे। उसका परिसर का विस्तार उत्तर-दक्षिण एवं पूर्व-पश्चिम दोनों ही दिशाओं में न्यूनतम 50 × 30 मीटर का था। यह विशाल सरंचना सोहलवीं शताब्दी तक उपस्थित थी, उसके बाद इसे ध्वस्त कर उसके ऊपर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया। यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात का पता चला जिस पर विशेष ध्यान देना चाहिए – बाबरी मस्जिद की कोई नींव नहीं बनाई गयी, उसे मंदिर की विशाल दीवारों के ऊपर ही खड़ा कर दिया गया था।

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