शनिवार, जुलाई 4, 2020
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अयोध्या परिसर में प्रथम सशस्त्र संघर्ष

सृजन संस्था ने अयोध्या राम मंदिर विवाद पर विचार विमर्श की एक श्रृंखला शुरू करने के उद्देश्य से डॉ मीनाक्षी जैन के साथ नई दिल्ली स्थित इनटेक परिसर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर श्रोताओं को सम्मानित वक्ता डॉ मीनाक्षी जैन के विचार सुनने का अवसर मिला। डॉ मीनाक्षी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करी है एवं वे सांस्कृतिक अध्ययन में विशेष महारत रखती हैं। वह वर्तमान में भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान की सदस्य हैं।

अयोध्या विवाद का वर्ष 1822 से वर्तमान तक का सारा ब्यौरा सौभाग्यवश फैजाबाद जिला अदालत में दर्ज है। इसमें हाफिजुल्ला नामक अदालत के एक कर्मचारी की विज्ञप्ति भी है जिसमें कहा गया है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर को ध्वस्त करके किया गया था और इस ढांचे को सीता जी की रसोई के समीप खड़ा किया गया। यह विवरण राम मंदिर और सीता की रसोई दोनों के वहाँ होने की पृष्टि करता है।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दो वर्ष पूर्व 1855 में एक ब्रिटिश अधिकारी ने अवध के नवाब को पत्र लिखकर सूचित किया कि गुलाम हुसैन नाम का एक सुन्नी मुसलमान नेता, हनुमान गढ़ी पर आक्रमण करने की योजना बना रहा है और उसने इसके लिए अपने समर्थकों की सेना तैयार कर ली है। गुलाम हुसैन का कहना था की हनुमान गढ़ी के अंदर एक मस्जिद है इसलिए वह इस स्थान को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं। उस अधिकारी ने अवध के नवाब से अनुरोध किया कि वह अपनी सेना भेज कर गुलाम हुसैन को रोकने का इंतजाम करे। लेकिन नवाब ने कोई कार्यवाही नहीं करी जिसके फलस्वरूप वहाँ एक छोटी लड़ाई छिड़ गयी। गुलाब हुसैन ने अपने सैनिकों के साथ हनुमान गढ़ी पर हमला कर दिया। हिन्दुओं ने भी अपनी रक्षा हेतु जवाबी हमला किया जिसमें 70 मुसलमान मारे गए।

इस घटना के बाद ब्रिटिश अधिकारी ने अवध के नवाब के पास दो अनुबन्धपत्र भेजे जिन पर बैरागी समुदाय की स्वीकृति अंकित थी। हनुमान गढ़ी का उत्तरदायित्व बैरागियों के पास ही था। पहले अनुबंध में बैरागियों ने आश्वासन दिया कि उनकी मुसलमानों के प्रति कोई शत्रुता नहीं है और वे उन पर हुए हमले के बाद भी पूर्व की भांति भाईचारे एवं आपसी सामंजस्य के साथ सम्बन्धों को जारी रखना चाहेंगे। दूसरे अनुबंध में उन्होंने हनुमान गढ़ी के अंदर मस्जिद के अस्तित्व पर एक स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच करवाने की अभिलाषा जताई। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि अगर जांच में यह सिद्ध हो जाता है कि हनुमान गढ़ी के अंदर मस्जिद थी तो वे उस जगह को बिना किसी लड़ाई झगड़े के मुस्लिम समुदाय को सौंप देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि यह जमीन उन्हें अवध के नवाब के पूर्वजों ने भेंट करी थी, अगर वहाँ मस्जिद होती तो वह जमीन उन्हें कभी नहीं देते। उन्होंने जमीन हस्तांतरण की प्रतियां भी साथ में संलग्न कीं।

इन साक्ष्यों ने अवध के नवाब को दुविधा में डाल दिया और उन्होंने एक समझौते का प्रस्ताव रखा जिसके अनुसार हनुमान गढ़ी के बगल में मस्जिद का निर्माण करने की बात कही गई। यह प्रस्ताव बैरागियों को स्वीकार्य नहीं किया। इसके बाद एक स्वतंत्र समिति का गठन किया गया जिसने भी यही निष्कर्ष दिया कि हनुमान गढ़ी में मस्जिद कभी थी ही नहीं। इस रिपोर्ट से जिहादी बल बहुत नाराज हो गए और उन्होंने एक नए नेता अमीर अली के नेतृत्व में हनुमान गढ़ी पर आक्रमण करने के लिए योजना बना ली। अंग्रेजों ने उसके साथ तर्क करते हुए उसे रोकने की बहुत कोशिश करी लेकिन वो तैयार नहीं हुआ। अतः इससे पहले की वह अयोध्या पर आक्रमण करता, अंग्रेजों ने उसे मौत के घाट उतार दिया। यह अयोध्या शहर का पहला सशस्त्र संघर्ष था जो वर्ष 1885 में कोर्ट की रिपोर्ट में दर्ज किया गया।

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