गुरूवार, अक्टूबर 17, 2019
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रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को ज्वलंत बनाये रखने के लिये वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाये गये झूठ

सृजन संस्था ने अयोध्या राम मंदिर विवाद पर विचार विमर्श की एक श्रृंखला शुरू करने के उद्देश्य से डॉ मीनाक्षी जैन के साथ नई दिल्ली स्थित इनटेक परिसर में एक संगोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर श्रोताओं को सम्मानित वक्ता डॉ मीनाक्षी जैन के विचार सुनने का अवसर मिला। डॉ मीनाक्षी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करी है एवं वे सांस्कृतिक अध्ययन में विशेष महारत रखती हैं। वह वर्तमान में भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान की सदस्य हैं।

सृजन वार्ता के दौरान डॉ मीनाक्षी जैन ने बताया कि किस सीमा तक वामपंथी इतिहासकार  रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को ज्वलंत बनाये रखने के उद्देश्य से झूठ का पुलिंदा गढ़ते रहे हैं।

वर्ष 1989 से वामपंथी इतिहासकारों ने इस विवाद में अपनी टाँग अड़ाना शुरू किया था। तब से लेकर आज तक वे देशभर में झूठ बोल-बोल कर इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हो सकने वाले किसी भी समझौते को रोकने का प्रयास कर रहे हैं। जब भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर वहाँ खुदाई की और अपने निष्कर्ष सामने रखे तो इन्होंने न्यायालय के भीतर और बाहर दोनों ही जगहों पर एक सोची समझी रणनीति के तहत पुरातत्व विभाग की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न खड़े करने शुरू कर दिये। अत्यंत खेदजनक है कि अदालत में दिये गये उनके नृशंस एवं हास्यास्पद वक्तव्यों के बाद भी लोग उन्हें गम्भीरता से लेते हैं।

वामपंथी इतिहासकारों की कार्य पद्धति:

वामपंथी इतिहासकारों की पूरी योजना बड़ी ही चतुराई पूर्ण थी। एक अकथित समझौते के अनुसार ये चार नामी इतिहासकार – आर एस शर्मा, डी एन झा, रोमिला थापर और इरफान हबीब स्वयं कभी अदालत में नहीं गये लेकिन अपनी बातों को वहाँ तक पहुँचाने के लिये अपने सहयोगियों और छात्रों का सहारा लेते रहे।

अदालत में जाने वाले व्यक्तियों में से एक सुप्रिया वर्मा थी जिन्होंने शेरीन रत्नागर के निर्देशन में अपनी पीएचडी करी। शेरीन ने भी अदालती कार्यवाही में भाग लिया। अदालत जाने वालों में दूसरा नाम सुविरा जैसवाल का था जिनका प्रशिक्षण आर एस शर्मा की देखरेख में हुआ। इस कड़ी में अन्य नाम थे – आर सी ठकरान (शिक्षक – सूरज भान), सीता राम रॉय (शिक्षक – आर एस शर्मा), एस सी मिहरा (शिक्षक – डी एन झा)। सुप्रिया वर्मा, शेरीन रत्नागर, सूरज भान, आर सी ठकरान आदि को सुन्नी बक्फ बोर्ड ने अपनी ओर से अदालत में पुरातत्व विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत किया। ध्यान देने योग्य बात है कि सूरज भान को छोड़कर, इन बाबरी मस्जिद समर्थक पुरातत्वविदों में से किसी के पास भी भूमिगत स्तर पर खुदाई का अनुभव नहीं था।

वामपंथी इतिहासकारों के खोखलेपन का नमूना:

अदालती कार्यवाही के दौरान इन तथाकथित विशेषज्ञों की ज्ञान रिक्तता एवं खोखलापन उजागर हो गया। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्राध्यापक सुविरा जैसवाल जो कि अदालत में प्राचीन भारतीय इतिहास विशेषज्ञ के रूप में प्रस्तुत हुईं थी ने कहा कि उन्होंने कभी इस विषय पर अध्ययन नहीं किया और न ही कोई रिपोर्ट पड़ी है कि क्या मुस्लिम शासकों ने मंदिरों को तोड़ कर उन पर मस्जिदों का निर्माण किया। उन्होंने शपथ लेकर यह कहा कि वह बाबरी मस्जिद के बारे में जो भी बयान दे रही हैं वह उनकी व्यक्तिगत समझ और राय पर आधारित है और उसी राय के अनुसार इस बात के कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण राम मंदिर को तोड़ कर किया गया। सुविरा जैसवाल ने अदालत में स्वीकार किया कि उन्होंने बाबरनामा या बाबरी मस्जिद से सम्बंधित आधिकारिक पुस्तकें कभी नहीं पढ़ी हैं। इस विवाद पर उनकी निजी राय केवल अखबार  की खबरों और वामपंथी इतिहासकारों के द्वारा प्रकाशित लेखों पर आधारित हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर उन्होंने एक पुस्तिका प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है – ‘राजनैतिक दुरुपयोग – बाबरी मस्जिद जन्मभूमि विवाद’. इस पुस्तिका में उपलब्ध करायी गयी जानकारियां अखबारों के आलेखों और उनके विभाग के कुछ विशेषज्ञों के बीच हुई चर्चाओं पर आधारित है।

सुविरा जैसवाल के कथन पर अदालत ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा की इस मामले के अतिसंवेदनशील होने के बाद भी, विशेषज्ञ होने का दावा करने वाला व्यक्ति कैसे बिना पर्याप्त जांच, अध्ययन और अनुसंधान के ऐसे गैर जिम्मेदारी भरे व्यक्तव्य दे सकता है? ऐसे बयानों से सौहार्दपूर्ण हल निकालने के बजाए मामला और पेचीदा और विवादास्पद हो जायेगा। अदालत में सुविरा जैसवाल ने यह भी स्वीकार किया कि उनके पीएचडी शोध जो कि उन्होंने इस विवाद से पहले प्रस्तुत किया था में यह बात सामने आयी थी कि ईसा पूर्व दो सौ साल पहले भी भगवान राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। वामपंथी इतिहासकारों ने यह झूठ फैलाया की प्रभु राम की पूजा 18 वी शताब्दी के आसपास आरम्भ हुई। यह उनके अपने ही शोध के ठीक विपरीत था जिसे उन्होंने अदालत में स्वीकार किया।

एक और विशेषज्ञ जिन्होंने अदातल में गवाही दी थे एस सी मिश्रा। वह दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक थे और उन्होंने  स्नातकोत्तर की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से करी थी। बीए में उनके विषय इतिहास, दर्शनशास्त्र और संस्कृत थे, और एमए में उनका मुख्य विषय था प्राचीन इतिहास। उन्होंने अदालत में कहा कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का गहन अध्ययन किया है और उनके निष्कर्ष के अनुसार मीर बाकी ने वहाँ मस्जिद निर्माण के समय किसी मंदिर को नहीं तोड़ा।  वहाँ मंदिर होंने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान राम का वास्तविक जन्म स्थान अयोध्या ब्रह्नकुण्ड और ऋषि मोचन घाट के मध्य स्थित है।

एस सी मिश्रा का अपने ज्ञान का महिमा मंडन यहीं नहीं रुका, उन्होंने यह भी कहा कि पृथ्वीराज चौहान गजनी का सम्राट था और मुहम्मद गोरी समीपवर्ती क्षेत्र का। उन्होंने कहा कि जजिया के बारे में उन्होंने सुना है लेकिन उन्हें यह स्मरण नहीं कि ये क्यों लिया जाता था? उनकी राय के अनुसार जजिया केवल हिन्दुओं पर ही लागू नहीं था। उन्होंने यहाँ तक भी कह डाला कि यह कहना गलत है कि औरंगजेब ने ज्ञान वापी मस्जिद का निर्माण काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने के बाद किया था हालांकि अपनी बात के समर्थन में उन्होंने कोई साक्ष्य नहीं दिये। उन्होंने कहा कि उन्होंने बाबरनामा सहित अन्य कई पुस्तकें पढ़ी हैं जो बाबरी मस्जिद निर्माण से सम्बंधित हैं लेकिन उन्हें उन पुस्तकों के नाम स्मरण नहीं हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक होते हुए उनके द्वारा दिये गए ऐसे गैरजिम्मेदाराना बयान बहुत ही अशोभनीय थे। सम्माननीय न्यायालय ने एस सी मिश्रा के बयानों को अविश्वसनीय माना क्योंकि उनमें प्रमाणिकता और निष्पक्षता का पूर्ण अभाव था।

इस मामले की एक और गवाह थी शिरीन मूसवी जिन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी और एमएससी करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में एमए और पीएचडी करी। उन्होंने बताया कि अपनी पढ़ाई के दौरान उन्होंने मध्ययुगीन काल से सम्बंधित कोई ऐसा साक्ष्य या जानकारी नहीं प्राप्त करी जो यह कहे कि बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को ध्वस्त करके किया गया। जब उन्होंने यह बयान दिया कि बाबरी शिलालेख तीन भागों में बांटा गया था तो विवश होकर अदालत को यह टिप्पणी करनी पड़ी की आपके बयान से लगता नहीं कि आपको इस मामले से सम्बंधित कोई ठीक जानकारी है।

अगले गवाह थे सुशील श्रीवास्तव जिन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से इतिहास एवं राजनीतिक शास्त्र में बीए करने के ग्यारह वर्ष बाद अपनी पीएचडी पूरी करी। उन्होंने अदालत से कहा कि अपने शोध के दौरान उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जो यह साबित कर सके कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़ कर बनायी गयी हो। उन्होंने अदालत में माना कि उन्हें अरबी, फारसी और संस्कृति तीनों ही भाषाओं का ज्ञान नहीं है। उन्होंने अपने श्वसुर की सहायता से फारसी का अनुवाद करा। वह इतना भी नहीं पहचान सके कि बाबरी मस्जिद पर स्थित शिलालेख फारसी में है या अरबी में। सुलेखकला और पुरालेख विद्या दोनों में ही उन्होंने कोई अध्ययन नहीं किया और यहाँ तक कि जिन पुस्तकों का उन्होंने जिक्र किया वे पुस्तकें तक उन्होंने नहीं पढ़ी थी।

इसी प्रकार इन वामपंथी विशेषज्ञों की गवाहियां होती रहीं। इनमें अगला नाम सूरज भान का था जिन्होंने संस्कृत में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करी थी लेकिन अदालत में कहा कि काफी समय से संस्कृत भाषा का उपयोग नहीं करने के फलस्वरूप न वे इसको बोल पाते हैं और न ही आराम से लिख पढ़ पाते हैं। उन्हें इतना स्मरण रहा कि प्राचीन भारत और मध्यकालीन भारत विषय उनकी पढ़ाई में नहीं आये। उन्हें तुलसीदास रामायण के बारे में ज्ञात नहीं था और न ही यह पता था कि सिंधुघाटी सभ्यता की खोज कब हुई। उन्हें वास्तुकला, मूर्तिकला, इतिहास, सुलेखकला, भूविज्ञान आदि विषयों में किसी के बारे में भी दक्षता हासिल नहीं थी। चिंता का विषय था कि ऐसे लोग विशेषज्ञ के तौर पर प्रस्तुत किये गये।

इसी क्रम में आगे थे डी मंडल जो रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद मुद्दे पर बहुत सक्रिय थे लेकिन जब अदालत में पोल खुली तो स्वीकार किया कि उन्हें बाबर के शासनकाल के बारे में कोई विशिष्ट जानकारी नहीं थी। बस इतना पता था कि सोहलवीं शताब्दी में बाबर नाम का एक शासक हुआ था। उन्होंने अदालत को बताया कि वह कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य जरूर हैं लेकिन पुरातत्व विज्ञान में उन्होंने न कोई विद्यार्जन किया है और न ही कोई अनुभव ही है।

इन सब महानुभावों में से किसी भी व्यक्ति के पास विवाद से सम्बंधित विषयों में दक्षता नहीं थी, वे केवल एक पूर्वनिर्धारित योजना के तहत अदालत में झूठ का पुलिंदा परोस रहे थे। यहाँ तक कि उन्हें हिंदू समाज की भावनाओं और उससे जुड़ रामजन्मभूमि आंदोलन का उपहास उड़ाने से भी कोई परहेज नहीं था। उनके अदालत को गुमराह करने का एक ही उद्देश्य था कि बाबरी समर्थक दल को जीत हासिल हो जाये।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य:

वामपंथी इतिहासकार और उनके समर्थक दलों की वर्तमान स्थिति रामजन्मभूमि विवाह में बहुत ही दयनीय है। उनकी एकमात्र उम्मीद यही है की सर्वोच्च न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बदल कर बाबरी मस्जिद के पक्ष में निर्णय दे दे। इस बात की कोई सम्भावना नजर नहीं आती की सर्वोच्च न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को बदलेगा क्योंकि एक भी ऐसा साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो यह साबित कर सके कि विवादित स्थल पर मुस्लिमों का निरंतर अधिग्रहण रहा हो। साथ ही इस बात के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं की वहाँ हिन्दुओं की उपस्थित हमेशा से बनी रही है।

सन 1949 में प्रभु श्री राम की मूर्ति को मस्जिद के अंदर स्थापित किया गया। इस घटना के 12 वर्ष बीत जाने के ठीक 5 दिवस पूर्व अदालत में याचिका दायर की गयी। सम्पत्ति विवाह में दावा पेश करने के लिये 12 वर्ष की समय सीमा तय है। इतने समय तक इंतजार करना और समय सीमा समाप्त हकने के केवल 5 दिन पूर्व मुकदमा दायर करना इस बात को दर्शाता है कि मुसलमानों का जन्मभूमि स्थल से कोई लगाव नहीं था। वेसे भी स्वतंत्र भारत मे और स्वतंत्रता से पूर्व न्यायालयों में यह बात मानी जा चुकी है कि नमाज किसी भी स्थल पर पढ़ी जा सकती है और उसके लिये मस्जिद आवश्यक नहीं है, जबकि हिंदू पूजा पद्धति में पवित्र स्थलों और मंदिरों का अहम भूमिका रहती है।

जब सभी तर्क और साक्ष्य वामपंथियों के विरुद्ध चले गए तो उन्होंने अंत विवादित स्थल पर प्रभु श्री राम के जन्म का प्रमाण मांग लिया। उन्होंने पूछा कि उस बात का क्या साक्ष्य उपलब्ध है कि भगवान राम का जन्म ठीक इसी जगह पर हुआ? अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर अब तक न्यायालय कई बार यह बात दुहरा चुके हैं कि जो विषय लाखों-करोड़ो लोगों की श्रद्धा और मान्यताओं पर आधारित है उसकी वैज्ञानिक परिपाटी तय करना या संवीक्षा करना न्यायालय का काम नहीं है। यही बात इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी स्वीकार करी थी की केंद्रीय गुम्बद के नीचे के स्थान हिन्दुओं का हक है क्योंकि करोड़ो हिन्दुओं का मानना है कि भगवान राम का जन्म वहाँ हुआ था।

हम सब नागरिकों की भूमिका:

हालांकि यह समझ पाना मुश्किल है कि सर्वोच्च न्यायालय, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बदलने के लिये क्या कर सकता है, फिर भी जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें अपनी सकारात्मक भूमिका अदा करनी होगी। इसके लिए हमें अपने चारों और जागरूकता बढ़ाने का प्रयास करना होगा। हमे बाबरी मस्जिद मामले की दुर्बलता और विशेषकर तथाकथित वामपंथी शिक्षाविदों के द्वारा पिछले दो दशकों से इस मामले पर किये गये छल-कपट और देश के लोगों एवं न्यायालयों को धोखा देने के प्रयासों के बारे में लोगों को अवगत कराना चाहिए।

के के महमूद, पूर्व क्षेत्रीय निदेशक (उत्तर), भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपनी आत्मकथा “मैं, एक भारतीय”, में लिखा है कि मुसलमान जन्मभूमि क्षेत्र को हिन्दुओं को दे देने पर गम्भीरता से विचार करके सहमति बनाने रहे थे क्योंकि जन्मभूमि का हिन्दुओं के लिये बहुत महत्व है। लेकिन तभी वामपंथी इतिहासकारों ने इस मामले में हस्तक्षेप कर उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया कि बाबरी मस्जिद के समर्थन में बहुत दमदार स्थिति है और वे बाबरी मस्जिद कमिटी की ओर से अदालत में केस लड़ेंगे। इस दुर्भावनापूर्ण हस्तक्षेप ने मामले के सौहार्दपूर्ण हल के सभी रास्ते बंद कर दिये।

यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण एवं खेदजनक है की देश के शिक्षाविद ही दो समुदायों के बीच की सदभावना और समानता की भावना को इस तरह से चोट पहुंचा रहे हैं। उनके इस गैरजिम्मेदाराना व्यवहार के कारण सामाजिक तानेबाने को जिसकी कभी क्षतिपूर्ति न हो सके ऐसा आघात झेलना पड़ रहा है। काश ये लोग इस मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग होते। उन्हें तथ्यों को बिना किसी छेड़छाड़ एवं पक्षपात के सामने रखना चाहिए न कि अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों की बलि चढ़ने देना चाहिए।

वामपंथी इतिहासकारों को गम्भीर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है। उनके सारे छलावों एवं षडयंत्रो से पर्दा उठ चुका है। उनकी दुर्भावनापूर्ण धोखाधड़ी और झूठी कहानियों से देश को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। अब उन्हें आगे बढ़ कर अपने किये पर क्षमा मांगनी चाहिए – और कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो वे कर ही सकते हैं।

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