गुरूवार, अक्टूबर 29, 2020
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आयुर्वेद का महत्व — जिज्ञासा आचार्या द्वारा एक व्याख्यान

प्राचीन काल से चली आ रही भारतीय आध्यात्म, ज्ञान और विज्ञान की अविरल परंपरा का एक अभिन्न अंग है आयुर्वेद| आयुर्वेद ऐसी प्रायोगिक चिकित्सा पद्धति है जिसे केवल वैद्यों-चिकित्सकों ने ही नहीं, परन्तु सामान्य जनों ने अपने जीवन में, विशेषकर अपने रसोईघरों में आत्मसात कर लिया| और यही कारण है की सदियों बाद ये परंपरा आज भी हमारे रसोई घरों में जीवित है|

आयुर्वेद के अनुसार आहार ही औषधि है| श्रीमती जिज्ञासा आचार्य हमें बता रही हैं किस प्रकार पदार्थों के गुणों के अनुकूल पथ्य-अपथ्य का पालन आवश्यक है; कैसे भोजन पकाते समय न केवल पात्रों, पदार्थों तथा स्थान की स्वच्छता व शुद्धता महत्त्वपूर्ण है, अपितु पकाने वाले के भाव की शुद्धता और पवित्रता उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं जो हमारे भोजन को, हमारे स्वास्थ्य को और अंततः हमारे मन को प्रभावित करते हैं|

यह सृजन व्याख्यान हमें अपनी दादी-नानी की याद दिलाता है, जिन्होंने ये सारा आयुर्वेद व पाक-विद्या का ज्ञान अपनी छोटी सी रसोई में समेट रखा था और जिनके धान्यों, दालों, मसालों और फल-सब्जियों के पिटारों में हर छोटी-बड़ी बीमारी का हल निकल आता था|

जिज्ञासा आचार्या ने 7 वर्षों तक गुरुकुल शिक्षा के अनुसार रामायण, भगवत गीता, महाभारत, इतिहास, आदि विषयों का ज्ञान प्राप्त किया। पिछले 7 वर्षों से भारत के विविध स्थानों पर सेमिनार ले रहे है जिसमे रसोईघर की औषधीया, गृह परिवार शिक्षा, रामायण, भगवत गीता, महाभारत पर 3 से 7 दिनों के सत्र का आयोजन, महिला शक्ति शिविर जीवन संध्या कार्यक्रम कर रहे हैंै। इन्होंने 300 से अधिक गीत व 200 से अधिक लघु कथाएं लिखी हैं।

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