बुधवार, सितम्बर 18, 2019
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‘वेस्टफेलिया की शांति-संधि’ क्या है?, इस घटना और इससे पैदा गतिरोध के कारण

राष्ट्र क्या है? इसे कौन परिभाषित करता है? यह यूरोपीय विचारों से परिभाषित होता है। संप्रभु राज्य क्या है? 1648 ई. में वेस्टफेलिया में एक शांति-संधि हुई। वेस्टफेलिया के बारे में आप में से कितने लोग जानते हैं? अच्छा..। वास्तव में, यह चर्च की कई रूढ़ियों में से एक है। यूरोपीय चर्च ने पहले रोमन साम्राज्य का हाथ थामा। शुरुआत में यह रोमन कैथोलिक ही था जो बाद में फिर ऑर्थोडॉक्स चर्च, ईस्टर्न चर्च, बिशप ऑफ़ रोम आदि में विभाजित किया गया। जब रोमन साम्राज्य का विघटन हुआ तो चर्च अपने आप में शक्ति बन कर उभरा जिसने विभिन्न राजाओं पर अधिकार कर लिया, लेकिन कई शक्तिशाली राजाओं ने विद्रोह कर दिया। उसके बाद सुधार का दौर शुरू हुआ जो मार्टिन लूथर के प्रोटोस्टेंट सुधार की तरह ही था। फिर दो युद्ध हुए, एक 30 वर्षों का और दूसरा 80 वर्षों का युद्ध। यूरोप में अलग-अलग गुटों के बीच लड़ाइयां अब भी चल रही हैं, कुछ रोमन और कैथोलिक के बीच, कुछ अन्य राजनैतिक समूहों के बीच। इन लडईयों का मुख्य आधार एकाधिकारवादी धर्म में मतभेद होना है| एकाधिकारवादी धर्म क्या होता है? ‘ सिर्फ एक ही मार्ग ’ होने का विश्वास अब्राहमिक धर्म का मौलिक सिद्धांत है। और हर कोई पापी एवं शैतान है जिसे नरक ही मिलना है। चर्च के बाहर रहकर किसी को मोक्ष नहीं मिल सकता। चर्च से विधर्मियों का निर्माण होता है। विधर्मियों के बारे में कौन जानता है?

सबसे पहले, चर्च ने कहा कि सबका आधार बाइबल है और उसकी व्याख्या भी वही मानी जाएगी जो चर्च कहेगा। विधर्म का मूल शब्द है: चुनाव करना। इसलिए, अपने लिए स्वयं चुनाव करने को अपराध माना गया, आपको बाइबिल पढ़ने का अलग तरीका चुनने के लिए मौत की सजा दी जा सकती थी। यह सिर्फ ऐसा नहीं है कि यह बाइबिल है और आपको इसका पालन करना है, आप इसकी अलग व्याख्या नहीं कर सकते क्योंकि केवल चर्च की व्याख्या ही मान्य व्याख्या है। चर्च मूल रूप से रोमन साम्राज्य में राजनीतिक अंग था। इसलिए चर्च में भ्रष्टाचार, अपराध, हत्याएं नियमित थीं। इसलिए मार्टिन लूथर ने बाइबिल के अधिकार के आधार को चुनौती दी। वे कहते हैं कि बाइबिल मुख्य आधार है। प्रोटेस्टेंटवाद कट्टरपंथी आंदोलन है। कट्टरवाद का मतलब है कि आप बाइबिल के मूल में वापस जा रहे हैं। आज कई सारी इसाई मत प्रचारक आन्दोलन वास्तव में प्रोटोस्टेंट हैं।

तो ऐसा नहीं है कि एक खुले सोंच वाला है जो अन्य के विरुद्ध है। चर्च का कहना है कि हमें अधिकार इसलिए मिला है क्योंकि सेंट पीटर ने चर्च की स्थापना की है। हमारे पास दैविक अधिकार है। पोप जो कहते हैं वह कभी गलत नहीं हो सकता। प्रोटोस्टेंट कहते हैं कि हम पोप के अधिकार को स्वीकार नहीं करते। पुस्तक में जो लिखा गया है वह कभी गलत नहीं हो सकता। ये दोनों ही कठोर और कट्टरपंथी हैं, लेकिन इनके विचार अलग-अलग हैं और प्रत्येक को लगता है कि दूसरा गलत है और इसलिए नरक में जा रहे हैं। यह ऐसा नहीं है कि एक ईसाई संप्रदाय अन्य संप्रदाय को सही ठहरा रहा है। इसलिए, एक बड़ा युद्ध हुआ जो दशकों तक जारी रहा। वास्तव में यह केवल शुरुआत है।

बाद में उन्हें धर्मनिरपेक्षता का आविष्कार करना पड़ा। क्योंकि उनके पास मिश्रित समाज की कोई धारणा नहीं थी। इसलिए उन्हें कम से कम विविधता का सामना करना पड़ा। इसी स्थिति में वेस्टफेलिया की संधि हुई, जिससे संप्रभु राज्य के विचार का जन्म हुआ।

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