केरल भाषण के अंश मुख्य चुनौतियाँ हिन्दू मन्दिरों का विध्वंस

शबरीमला हिन्दू प्रतिरोध: एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण

मैं शबरीमला हिन्दू प्रतिरोध की बात कर रहा हूँ l मेरे लिए एक मनोवैज्ञानिक के तौर पर यह रोचक है कि इससे पहले कभी भी लिपिबध्द इतिहास में हिन्दुओं को इतनी बड़ी संख्या में मंदिरों एवं परम्पराओं की सुरक्षा के लिए नहीं देखा गया है l हिन्दुओं के अंदर ही अंदर क्रोध उबल रहा है जोकि एक आंदोलन का रूप लेता जा रहा है, और मेरा ऐसा विश्वास है कि यह एक ऐसा समय होगा जो इतिहास के सबसे बड़े परिवर्तन काल में गिना जायेगा l शबरीमला में क्या हो रहा है, यह मानसिक रूप से समझने का प्रयत्न किया है l यह पृथक्करण, (विच्छेद )(अलगाव ) है जो प्रतिरोध उत्पन्न कर रहा है l व्यक्तिगत स्तर पर हम अलगाव नहीं चाहते हैं किन्तु जहाँ तक सामाजिक स्तर की बात है,समाज कैसे जुड़ता है? समाज जैसे हैं कैसे बनते हैं? हम समूहों की निकटता से ही समाज बनाते हैंl मेरा मतलब जिसने भी बेनेडिक्ट एंडरसन को पढ़ा है वो जानता है कि जब हम साथ आते हैं तो निकटता होती है l एक बंधन होता है और फ़िर उसके बाद अलगाव का दौर आता है विश्व में अधिकतर अलगाव जबरन ही होते हैं l लोग अलग होना पसंद नहीं करतेl अलगाव अचानक से होते हैं l यदि हम अपने जीवन में देखें तो निन्यानवे %अलगाव अचानक बिना किसी चेतावनी के ही होते हैं l शबरीमला में भी ऐसा ही हो रहा है l

हिन्दुओं को अपनी पाँच सौ वर्ष से भी अधिक पुरानी परम्पराओं से विच्छेद का सामना करना पड़ रहा है, यह विछेदन बलपूर्वक हो रहा है l बिना इसके सही -गलत में जाये मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि यह विच्छेद यकायक ही हुआ है l ये जबरन हुआ है और इससे वे बिलकुल भी तारतम्य नहीं बैठा सकते या कुछ ऐसा है जिसका कोई शिकार ना हो, जिससे कि वो कह सके ‘मुझे यह चाहिए.

यह विच्छेद उस जगह ले जा रहा है जिसे हम मनोविज्ञान में दुःख कहते हैं l विच्छेद से ही दुःख उत्पन्न होता है l यही हमारे साथ हो रहा है सामाजिक स्तर पर l हम इस विच्छेद से गुज़र रहे हैं l हिन्दुओं को एक लम्बे समय से तरह तरह के विच्छेदों से गुज़रना पड़ा है l हमें अपने मंदिरों से अलग होना पड़ा है, अपनी पवित्र भूमि से अलग हुयें है, अपनी संस्कृति से भी हम अलग हुये है, यहाँ तक कि हमारी शिक्षा पद्दति भी….अंग्रेज़ों ने हमारे विद्यालय बंद कर दिए और ये कहा कि ‘अब आप उनके विद्यालयों में पढ़िए ‘l तो इस तरह से एक के बाद एक कई तरह के विच्छेदों को हिन्दू समाज सहता रहा, किन्तु हमने कभी दुःख प्रकट नहीं किया l हम अपने दुखों को अंदर ही दबाये रखे और अब जो हमारे दुःख प्रकट हो रहे हैं उसका कारण राष्ट्रवाद है l राष्ट्रवादी भावनाएँ समाज में उभर कर सामने आ रही हैं l

अब दुःख की अवस्थाएँ, मैं संक्षेप में ये कहूँगा कि पहली अवस्था अस्वीकृति की होती है l हम सब जानते हैं कि अस्वीकृति का क्या अर्थ होता है l जब हम कोई दुःख भरा समाचार सुनते हैं तो सबसे पहले यही कहते हैं कि नहीं, ये सच नहीं हैं. ऐसा नहीं हो सकता l हम ये अस्वीकृति स्वयं को बचाने के लिए करते हैं, फ़िर उसके बाद क्रोध आता है, फ़िर हम दुःखी होते हैं l जब हमारे मंदिर अपवित्र किये जा रहे थे, हमारे स्थानों को विध्वंस किया जा रहा था, हमारा समाज , हिन्दू समाज इस स्थिति को स्वीकार तो नहीं कर पा रहा था परन्तु अपना क्षोभ व्यक्त नहीं कर सका,क्या कोई औरंगज़ेब के काल में क्रोध व्यक्त कर सकता था? नहीं ना, तो उस क्रोध का क्या हुआ? वो क्रोध मन के अंदर ही दबा रहा l हमारा समाज स्वयं को व्यक्त किये बिना सीधे ही तर्कसंगत हो गया l हम अपने घरों के अंदर ही सीमित हो गये, इस विषय पर चर्चा आगे होगी l क्रोध, उदासी, भय, ये सारी अवस्थाएँ हमारे समाज में उभर नहीं सकी. अब जब फ़िर से विच्छेद हुआ है, तो ये सब भी होगा l लोगों में क्रोध भी होगा, विरोध भी होगा जो हम शबरीमला में देख रहे हैं l

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