मंगलवार, जुलाई 16, 2019
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अर्बन नक्सल एवम उनके संचालकों को उजागर करते हुए हरिता पुसर्ला जी का व्याख्यान

स्वतंत्रता  प्राप्ति से  ही ये वामपंथी विचारक बड़े संगठित तरीके से एक समानांतर प्रशासनिक ढाँचा चला  रहे हैं l ये संस्थाएँ विदेशों से धन प्राप्त करतीं हैं व जिस तरह का विवरण  और तर्क ये सामने रखती हैं, वह उनके जैसी अनेक संस्थाओं द्वारा समर्थित होता है l

जैसा कि मैंने अभी कहा जम्मू कश्मीर की संस्था जो कश्मीरी पृथकतावादियों की आकाँक्षाओं को बल दे रही है, उस संस्था का कश्मीरियों के विचारों को दिशा देने में अत्यधिक प्रभाव है l अब ये उभर कर सामने आया है कुछ पृथकतावादी बड़ी निडरता से कहते हैँ कि माओवादियों, वामपंथियों एवम मानवतावादियों के अतिरिक्त भारत में कोई भी जम्मू कश्मीर की चिंता नहीं करता है l यद्यपि सरकार उनकी यथासंभव सहायता करती है कोई उसका संज्ञान नहीं लेता… और तो और भारतीय होने का भाव भी  मिटता जा रहा है, भारत से अपनेपन का  एहसास भी इन्ही संस्थाओं द्वारा कश्मीरियों के मन से मिटाया जा रहा है l इस संजाल को हम इतनी गंभीरता से क्यों लें? क्योंकि यह संजाल भारत की जड़ों पर आघात कर रहा है l ये ऐसे समन्वित प्रहार कर रहे हैं जो सामाजिक पक्ष, सांस्कृतिक पक्ष एवम राष्ट्रीय सुरक्षा के पक्ष को प्रभावित कर रहे हैं l

राष्ट्रीय सुरक्षा का पक्ष पहले मैंने जम्मू कश्मीर के बारे में बताया था, अब एक  और संस्था है COHR (मानवाधिकार समन्वय संस्था )जो मणिपुर में अत्यधिक सक्रिय है ये मणिपुर में जनता को  आत्मनिर्णय के  लिए समर्थन दे रहे हैं, उनका कहना है कि मणिपुर को अपनी इच्छा का पूरा अधिकार है, इसका अभिप्राय ये है कि वे उत्तर पूर्व के पृथकतावादी प्रवृत्तियों को समर्थन दे रहें हैं l वेNSC  समूह  खापलांग आतंकियों को मारने पर सरकार को खुले आम  दोष देते हैं, और विकास कार्यक्रमों जैसे कि बाँधो का निर्माण के विरोध के लिये लोगों को भड़काते हैं ये कहकर कि इनसे उन लोगों की आजीविका प्रभावित होगी l विचारों और सूचनाओं के द्वारा धीरे धीरे वे  एक ऐसा वातावरण निर्मित कर रहें हैं जो भारत के विरुद्ध रहता है l ये वे  तर्क और कारण हैं जिसलिये हमें इन दलों को गंभीरता से लेना चाहिए l

आंतरिक सुरक्षा या राष्ट्रीय हित का एक पक्ष और भी है इनके साथी, सहयोगी जिन्हे एक नयी उपाधि ‘अर्बन नक्सल ‘के नाम से जाना जाता है, लेकिन ये नक्सलवाद नगरीय ही रहा है, मार्क्स ने हमेशा ही अपनी विचारधारा /सिद्वान्तों से नगरवासियों को प्रभावित करने पर बल दिया है अतः ये आंदोलन सदा से नगरों में ही था l माओ के प्रभाव ये शनै शनै ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँच गया है, माओ की विचारधारा इन मजदूरों को ऊपर उठाने की रही है, ग्रामीण क्षेत्रों में इसका संजाल है l इन दोनों की जो युति है, वामपंथी विचारधारा वाले लोग जो भारत में सक्रिय हैँ, एक जो नगरों में हैँ जिसे हम एक अंग कह सकते हैं एवम दूसरा अंग ग्रामों में है जो कि सरकार के विरुद्ध सीधे सशस्त्र संघर्ष कर रहा हैl अतः ये दोनों बिल्कुल भी भिन्न नहीं हैं, बल्कि इनमें आपसी सामंजस्य है l

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